UPSC प्रासंगिकता – GS पेपर III – पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन
चर्चा में क्यों?
वैश्विक मंचों पर ‘जलवायु अनुकूलन’ (Climate Adaptation) और ‘हानी एवं क्षति’ (Loss and Damage) से जुड़ी हालिया चर्चाओं ने एक बढ़ती चिंता को उजागर किया है: जलवायु विज्ञान में प्रगति के बावजूद, भारत जलवायु ज्ञान को प्रभावी स्थानीय कार्रवाई में बदलने के लिए संघर्ष कर रहा है, जिसका मुख्य कारण संचार (Communication) में अंतराल है।
पृष्ठभूमि
भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है, जो बढ़ती लू (Heatwaves), बाढ़, चक्रवात और समुद्र के स्तर में वृद्धि तथा भूमि क्षरण जैसी धीमी गति से आने वाली आपदाओं का सामना कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में, जिला-स्तर के अनुमानों, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और जलवायु रोपण अध्ययनों (Climate Attribution Studies) के साथ भारत की जलवायु विज्ञान क्षमता में काफी सुधार हुआ है। हालांकि, इस वैज्ञानिक प्रगति का लाभ प्रशासकों और समुदायों तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पाया है, जिससे वैश्विक जलवायु विमर्श और स्थानीय शासन के बीच एक अलगाव पैदा हो गया है।
जलवायु शासन में भाषा का अंतराल
अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में, “हानी एवं क्षति” (Loss and Damage) जैसे शब्द उन अपरिवर्तनीय जलवायु प्रभावों को संदर्भित करते हैं जो केवल भौतिक विनाश से परे जाकर आजीविका, संस्कृति, पारिस्थितिकी तंत्र और पहचान के नुकसान को भी शामिल करते हैं। हालांकि, जब यह भाषा भारत के घरेलू शासन स्तर तक पहुंचती है, तो इसे अक्सर “नुकसान आकलन” (Damage Assessment), “हानि पूर्ति” (Compensation) और “आपदा प्रबंधन” (Disaster Management) जैसी प्रशासनिक श्रेणियों तक सीमित कर दिया जाता है।
भाषा का यह संकुचन नीतिगत प्रतिक्रियाओं को भी सीमित कर देता है। जलवायु परिवर्तन को एक दीर्घकालिक, संरचनात्मक संकट के बजाय अलग-थलग आपदाओं की एक श्रृंखला के रूप में देखा जाता है। परिणामस्वरूप, वैश्विक प्रतिबद्धताएं अमूर्त (Abstract) बनी रहती हैं, जबकि स्थानीय शासन मुख्य रूप से आपदा के बाद की राहत पर केंद्रित रहता है।
विज्ञान–नीति–समुदाय के बीच अलगाव
उन्नत जलवायु डेटा होने के बावजूद, भारत एक विरोधाभास का सामना कर रहा है: जानकारी अधिक है लेकिन कार्रवाई योग्य स्पष्टता कम। जिला अधिकारियों को अक्सर तकनीकी रूप से जटिल भेद्यता आकलन (Vulnerability Assessments) मिलते हैं जिन्हें तत्काल प्रशासनिक निर्णयों में बदलना कठिन होता है। वहीं, समुदायों को जलवायु संदेश खंडित रूप में मिलते हैं, जो यह मान लेते हैं कि सभी साक्षर हैं, उनके पास डिजिटल पहुंच है, या वे आसानी से अपना व्यवहार बदल सकते हैं।
अनुसंधान बताते हैं कि लोग केवल अधिक जानकारी होने से कार्रवाई नहीं करते; वे तब कार्य करते हैं जब जानकारी प्रासंगिक, व्यावहारिक और उनके जीवन की वास्तविकताओं के अनुरूप हो। उदाहरण के लिए, अत्यधिक गर्मी के दौरान बाहरी काम से बचने की सलाह अनौपचारिक श्रमिकों की मजबूरियों की अनदेखी करती है।
जलवायु संचार एक मुख्य प्रवर्तक (Core Enabler) क्यों है?
जलवायु संचार को अक्सर नीति का एक “सॉफ्ट” घटक माना जाता है। वास्तव में, यह जलवायु वितरण (Climate Delivery) का एक महत्वपूर्ण प्रवर्तक है। स्पष्ट और विश्वसनीय संचार:
- लू (Heatwave) की तैयारी में सुधार कर सकता है।
- बाढ़ प्रतिक्रिया को बढ़ा सकता है।
- जलवायु निवेश को रोजमर्रा के परिणामों जैसे स्कूल बंद होने, पानी की कमी, स्वास्थ्य आपात स्थिति और उत्पादकता के नुकसान से जोड़कर न्यायसंगत बना सकता है।
ओडिशा का चक्रवात तैयारी मॉडल इसे अच्छी तरह से दर्शाता है। इसकी सफलता केवल तकनीक में नहीं बल्कि वर्षों के विश्वास-निर्माण में निहित है, जिससे चेतावनियां विश्वसनीय और कार्रवाई योग्य बनती हैं।
प्रभावी जलवायु संचार के आवश्यक तत्व
जलवायु विज्ञान को कार्रवाई में बदलने के लिए, भारत को एक जानबूझकर बनाए गए संचार ढांचे की आवश्यकता है जो:
- सटीकता को कम किए बिना वैज्ञानिक जानकारी को सरल बनाए।
- संदेशों को क्षेत्रों और भाषाओं के अनुसार स्थानीयकृत (Localise) करे।
- मानवीय अनुभवों के माध्यम से जलवायु जोखिमों को उजागर करे।
- सरकारी प्रणालियों के भीतर संचार क्षमता को संस्थागत रूप दे।
- निरंतर और विश्वसनीय विमर्श सुनिश्चित करने के लिए मीडिया के साथ साझेदारी मजबूत करे।
आगे की राह
- जलवायु संचार को आपदा प्रबंधन और जलवायु कार्य योजनाओं में एकीकृत करें।
- जिला अधिकारियों और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं (Frontline Workers) में संचार कौशल का निर्माण करें।
- स्थानीय हितधारकों के साथ जलवायु संदेशों के सह-निर्माण (Co-creation) को बढ़ावा दें।
- क्षेत्रीय भाषाओं और सामुदायिक मीडिया का व्यापक उपयोग करें।
- संचार को जलवायु शासन के एक वित्तपोषित (Funded) और निगरानी किए जाने वाले घटक के रूप में मानें।
निष्कर्ष
भारत की जलवायु चुनौती केवल वैज्ञानिक या वित्तीय नहीं है—यह भाषाई और संस्थागत भी है। जब जलवायु की भाषा संकुचित होती है, तो नीतिगत प्रतिक्रियाएं भी सिकुड़ जाती हैं। जब संचार सफल होता है, तो लचीलापन (Resilience) एक साझा सामाजिक और राजनीतिक संभावना बन जाता है। इसलिए, भारत के जलवायु संचार अंतराल को पाटना जलवायु विज्ञान को सार्थक जलवायु कार्रवाई में बदलने के लिए आवश्यक है।
UPSC अभ्यास प्रश्न – GS पेपर III – पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन
प्रश्न: “जलवायु विज्ञान और पूर्वानुमान में प्रगति के बावजूद, स्थानीय स्तर पर भारत की जलवायु प्रतिक्रिया कमजोर बनी हुई है।” इस संदर्भ में, समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए कि जलवायु संचार में अंतराल—विशेष रूप से भाषा और स्थानीयकरण—भारत में जलवायु शासन को कैसे प्रभावित करते हैं। इस अंतराल को पाटने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)
