अमेरिकी चुनाव से पहले डीजल महंगा, ट्रम्प रूस से खरीदेंगे: इसी वजह से भारत पर 100% टैरिफ की धमकी; जेलेंस्की बोले- पैसा जंग में इस्तेमाल होगा
- अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने रूसी डीजल खरीदने पर लगी रोक 7 अप्रैल 2027 तक हटा दी है। अब अमेरिका रूस से डीजल खरीद सकेगा। रूस ने 2022 में यूक्रेन पर हमला किया था। इसके बाद अमेरिका ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगा दिए थे।
- यह फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब ईरान जंग के बाद अमेरिका में डीजल की कीमतें बढ़ गई हैं। फिलहाल वहां डीजल करीब 6.28 डॉलर प्रति गैलन बिक रहा है, जबकि जंग से पहले इसकी कीमत करीब 3.70 डॉलर थी।
- व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रम्प ने पुतिन का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि कम कीमतें, खासकर अमेरिकी किसानों, पशुपालकों और ट्रक चालकों के लिए, उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं।
- यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस से डीजल खरीदने के समझौते की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इससे पुतिन की युद्ध लड़ने की ताकत बढ़ेगी और रूस ज्यादा आक्रामक हमले कर सकेगा।
- जेलेंस्की के मुताबिक, इस समझौते से रूस को युद्ध लंबा खींचने, ज्यादा लोगों की जान लेने और दुनिया को नुकसान पहुंचाने में मदद मिलेगी।
होर्मुज पर ट्रंप का दावा
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, ‘होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर हमारे पूर्ण नियंत्रण और रूसी ऊर्जा पर इस शानदार घोषणा के बीच, अमेरिकियों और वास्तव में पूरी दुनिया के लिए डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर और तेजी से नीचे आएंगी. अमेरिकी लोगों, खासकर हमारे महान किसानों, पशुपालकों और ट्रक ड्राइवरों के लिए कीमतें कम करना मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यह एक बहुत बड़ी और अहम घोषणा है.’
- अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने हैं। ऐसे में ईंधन की बढ़ती कीमतें ट्रम्प प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई हैं। कीमतें कम करने के लिए ट्रम्प तेल और डीजल की सप्लाई बढ़ाने जैसे कदम उठा रहे हैं।
- हालांकि, इस फैसले पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इससे रूस को पैसा मिलेगा, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ करेगा।
- खास बात यह है कि सितंबर में ही ट्रम्प ने ऐसे कानून पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
यूक्रेन के लिए नया राष्ट्रपति चुनने का समय आ गया- ट्रंप
- ट्रंप ने कहा कि वह युद्ध कभी शुरू ही नहीं होता। यूक्रेन और रूस के बीच उस युद्ध के शुरू होने की कोई वजह नहीं थी। यह अक्षमता के कारण शुरू हुआ। जेलेंस्की ने अपने देश का 30% हिस्सा खो दिया और दोनों देशों के बीच दस लाख से ज्यादा लोग इधर-उधर हुए, 20 लाख से ज्यादा लोग मारे गए।
- यह एक ऐसा युद्ध है जो कभी शुरू नहीं होना चाहिए था। और मुझे लगता है कि यूक्रेन के लिए नया राष्ट्रपति चुनने का समय आ गया है।
- डोनाल्ड ट्रंप को आलोचकों, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों द्वारा अक्सर एक “अविश्वसनीय” या “धोखेबाज” नेता कहा जाता है। उन्हें इस रूप में देखने के पीछे कई रणनीतिक, व्यावहारिक और राजनीतिक कारण हैं:

- सहयोगियों को छोड़ना
- विदेशी मामलों में ट्रंप का रुख अक्सर बहुत अनिश्चित (unpredictable) रहता है। उदाहरण के लिए, सीरिया में ISIS के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का साथ देने वाले कुर्दिश लड़ाकों को अचानक अकेला छोड़ना हो, या फिर यूक्रेन के समर्थन पर समय-समय पर अपने रुख से पीछे हटना और रूस के साथ व्यापारिक समझौते करना हो—उनकी नीतियों में स्थिरता की कमी के कारण उनके सहयोगियों को लगता है कि उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
‘अमेरिका फर्स्ट‘ (America First) का कठोर दृष्टिकोण
- ट्रंप किसी भी विचारधारा या पुराने अंतरराष्ट्रीय समझौतों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहने के बजाय केवल अपने तात्कालिक (आर्थिक या राजनीतिक) लाभ को तरजीह देते हैं।
- जब वे अपने किसी कड़े बयान या फैसले के बाद अमेरिका के भीतर दबाव महसूस करते हैं (जैसे महंगाई, चुनाव या कॉर्पोरेट दबाव), तो वे अपने ही बनाए नियमों या बयानों को बदलकर नया समझौता कर लेते हैं।
बयानों और तथ्यों में विरोधाभास (फैक्ट-चेकर्स का रिकॉर्ड)
- ट्रंप के अपने बयानों और दावों से मुकरने का एक लंबा इतिहास रहा है।
- अमेरिकी मीडिया और फैक्ट-चेकिंग एजेंसियों (जैसे The Washington Post और FactCheck.org) ने अपने अध्ययनों में पाया था कि उन्होंने अपने बयानों, चुनावी वादों और आंकड़ों को लेकर कई बार झूठे या भ्रामक दावे किए। सार्वजनिक मंचों से बड़े-बड़े दावे करने के बाद कड़वी सच्चाई से पीछे हट जाने के कारण उन पर यह ठप्पा लगता रहा है।
व्यापारिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि
- राजनीति में आने से पहले ट्रंप एक व्यवसायी (रीयल एस्टेट डेवलपर) थे। उनकी रणनीतियों में “डील मेकिंग” (Deal Making) सबसे ऊपर रहती है।
- व्यवसायी होने के नाते, वे अपनी बात पर टिके रहने से ज्यादा “सौदेबाज़ी में बढ़त हासिल करने” को अहमियत देते हैं। दबाव बनाने के लिए वे शुरुआत में कड़ा रुख अपनाते हैं और फिर सौदा तय करने के लिए पीछे हट जाते हैं—राजनीतिक दुनिया में लोग इसे ‘धोखा’ या ‘अपनी ही बात से मुकरना’ मानते हैं।
- डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक शैली हमेशा से ही अप्रत्याशित (Unpredictable) और “अमेरिका फर्स्ट” (America First) के एजेंडे पर आधारित रही है। वे अक्सर कड़े बयान देने या कड़े फैसले लेने के बाद कूटनीतिक या घरेलू दबाव के चलते अचानक अपने बयानों या नीतियों से पलट (U-turn) जाते हैं।
- यहाँ ऐसी 10 प्रमुख घटनाओं का विवरण है, जहाँ ट्रंप के यू-टर्न को आलोचकों ने “धोखेबाजी” या वादों से पलटने के रूप में देखा है:
- भारत और टैरिफ का मुद्दा (India & Tariffs U-Turn)
- भारत-रूस तेल व्यापार और कूटनीतिक रुख
- सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का यू-टर्न
- ईरान के साथ परमाणु समझौता (JCPOA) और सैन्य टकराव
- तालिबान के साथ समझौता और अफगानिस्तान से वापसी
- टिकटक (TikTok) प्रतिबंध का मामला
- उत्तर कोरियाई तानाशाही और किम जोंग उन के प्रति रुख
- जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौता (Paris Climate Agreement)
- सऊदी अरब और जमाल खगोश की हत्या का प्रकरण
- नाटो (NATO) सहयोगियों को लेकर रुख
1. भारत और टैरिफ/व्यापार का मुद्दा (India & Tariffs U-Turn)

पृष्ठभूमि और सुर की शुरुआत
- डोनाल्ड ट्रंप अपने अभियानों और भाषणों में अक्सर अमेरिकी उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग को बचाने की बात करते हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने भारत की व्यापारिक नीतियों पर बार-बार कड़ा रुख अपनाया। वे भारत को सार्वजनिक मंचों पर “टैरिफ किंग” (Tariff King) या आयात शुल्क का सबसे बड़ा आरोपी कहते थे। उनका तर्क था कि भारत अमेरिकी सामानों पर (जैसे हार्ले-डेविडसन बाइक्स, कृषि उत्पाद और टेक्नोलॉजी) बहुत ज्यादा टैक्स वसूलता है, जो अमेरिका के साथ अन्याय है।
कड़ा फैसला और धमकी
- GSP दर्जा खत्म करना: अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप प्रशासन ने भारत से Generalized System of Preferences (GSP) का दर्जा वापस ले लिया था। इसके तहत भारत के अरबों डॉलर के सामान अमेरिका में बिना किसी सीमा शुल्क (टैरिफ) के जाते थे।
- अतिरिक्त शुल्क की धमकी: ट्रंप ने बार-बार चेतावनी दी कि अगर भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर टैक्स कम नहीं किया, तो वे भारतीय स्टील, एल्युमिनियम और अन्य सामानों पर भारी जवाबी टैक्स (Reciprocal Tax) लगाएंगे।
अचानक आया यू-टर्न
- जब भारतीय पक्ष ने कड़ा रुख अपनाया और अमेरिका में कृषि व ऑटोमोबाइल लॉबी का दबाव बढ़ा, तो ट्रंप अचानक अपने कड़े रुख से पीछे हट गए:
- सुर में बदलाव: ट्रंप ने अचानक भारत के प्रधानमंत्री और भारतीय अर्थव्यवस्था की तारीफ करना शुरू कर दिया और कहा कि “भारत और अमेरिका एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक ट्रेड डील करने वाले हैं।”
- कार्रवाई में ढील: जिस तरह से वे भारत पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध या भारी पेनल्टी लगाने की बातें कर रहे थे, उस पर कोई ठोस और सख्त बड़ा कदम आगे नहीं बढ़ाया गया। इसके विपरीत, कई मौकों पर उन्होंने भारतीय उत्पादों पर आंशिक राहत देने के संकेत दिए।
इसे ‘यू-टर्न‘ या धोखे के रूप में क्यों देखा गया?
- अमेरिकी समर्थकों और विश्लेषकों दोनों का मानना था कि ट्रंप ने घरेलू राजनीति में भारी-भरकम वादे किए कि वे भारत को सबक सिखाएंगे और अमेरिकी व्यापारियों का पूरा फायदा कराएंगे, लेकिन जब वास्तविक कूटनीति की बात आई तो वे पीछे हट गए। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक नीतियों को लेकर अस्थिरता बनी रही।
2. भारत-रूस तेल व्यापार और अमेरिका का दोहरा मापदंड
पृष्ठभूमि
- फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, पश्चिमी देशों (अमेरिका और यूरोपीय संघ) ने रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए उस पर कड़े प्रतिबंध लगाए। अमेरिका का मुख्य मकसद था कि दुनिया का कोई भी देश रूस से कच्चा तेल न खरीदे, ताकि रूस को युद्ध के लिए पैसे (War Fund) न मिल सकें।
भारत पर दबाव और सख्त बयानबाजी
- अमेरिकी चेतावनी: ट्रंप और उनके सहयोगियों ने लगातार भारत द्वारा रूस से छूट पर खरीदे जा रहे सस्ते कच्चे तेल (Discounted Russian Crude) की कड़ी आलोचना की।
- दबाव की राजनीति: अमेरिकी अधिकारियों और कूटनीतिक बयानों में भारत को चेतावनी दी गई कि रूस से ईंधन खरीदना और उस पर से प्रतिबंधों को दरकिनार करना वैश्विक सुरक्षा के खिलाफ है और इसके लिए भारत को परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
अमेरिका और ट्रंप का खुद यू-टर्न लेना
- अपनी जरूरत पड़ी तो नीतियां बदलीं: जब ईरान से जुड़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के संकट के कारण अमेरिका के भीतर डीजल और पेट्रोल की कीमतें अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गईं, तो ट्रंप प्रशासन ने अपने ही सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया।
- रूस के साथ समझौता: अमेरिका ने घरेलू स्तर पर महंगाई और ट्रांसपोर्टरों के विरोध से बचने के लिए रूस से सीधे डीजल खरीदने का समझौता कर लिया और अपनी ट्रेजरी (Treasury Department) के माध्यम से प्रतिबंधों में ढील दे दी।
इसे ‘यू-टर्न‘ या धोखे के रूप में क्यों देखा गया?
- इस घटना को दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों ने दोहरे मापदंड (Double Standards) और नीतिगत विश्वासघात के रूप में देखा:
- भारत के लिए अलग नियम: जब भारत अपनी 140 करोड़ आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से तेल खरीद रहा था, तब अमेरिका ने उसे सही नहीं ठहराया।
- अपने फायदे के लिए नियम तोड़ना: लेकिन जैसे ही अमेरिका के अपने किसानों और ट्रांसपोर्टरों पर महंगाई की मार पड़ी, ट्रंप ने बिना किसी हिचकिचाहट के खुद रूस के साथ व्यापारिक समझौता कर लिया।
3. सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का यू-टर्न

पृष्ठभूमि और ‘अमेरिका फर्स्ट‘ का वादा
- अपने पहले राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वे अमेरिका को पश्चिम एशिया (Middle East) के “अंतहीन और महंगे युद्धों” से बाहर निकालेंगे। उनका कहना था कि अमेरिकी सैनिकों का दूसरे देशों में फंसे रहना देश के पैसे और जवानों की जान की बर्बादी है। सीरिया में गृहयुद्ध चल रहा था, और वहां इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ लड़ाई में सीरियाई कुर्दिश लड़ाके (Kurds) अमेरिका के सबसे बड़े और भरोसेमंद जमीनी सहयोगी थे।
अचानक उठाया गया कड़ा कदम
- अचानक सैनिकों की वापसी की घोषणा: 2019 में ट्रंप ने बिना अपने सैन्य जनरलों या पारंपरिक सहयोगियों से लंबी सलाह-मशविरा किए अचानक घोषणा कर दी कि वे सीरिया से सभी अमेरिकी सैनिकों को तुरंत वापस बुला रहे हैं।
- सहयोगियों के साथ विश्वासघात: इस फैसले के तुरंत बाद तुर्की की सेना ने सीरिया के कुर्द बहुल इलाकों पर हमला कर दिया। कुर्दिश लड़ाकों ने, जिन्होंने अमेरिका के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी, इसे अपनी “पीठ में छुरा घोंपा जाना” (Stab in the back) और अमेरिका की तरफ से बहुत बड़ा धोखा करार दिया। पूरी दुनिया में संदेश गया कि अमेरिका अपने वफादार दोस्तों को संकट में अकेला छोड़ सकता है।
दबाव और फिर यू-टर्न
- आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय विरोध: अमेरिका के भीतर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के नेताओं, पेंटागन के सैन्य अधिकारियों और पश्चिमी सहयोगियों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उनका कहना था कि इससे रूस और ईरान का प्रभाव सीरिया में और बढ़ जाएगा तथा ISIS दोबारा मजबूत हो जाएगा।
- रणनीतिक यू-टर्न: भारी विरोध के चलते ट्रंप को अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा। उन्होंने सीरिया से सभी सैनिकों को निकालने के बजाय, सीरिया के तेल क्षेत्रों (Oil Fields) की सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी सैनिकों का एक हिस्सा वहां बनाए रखने का फैसला किया।
इसे ‘यू-टर्न‘ के रूप में क्यों देखा गया?
- पहले ट्रंप ने सीरिया से पूरी तरह हटने का बड़ा दावा किया और अपने वफादार सहयोगियों (कुर्दों) को दुश्मन के हवाले कर दिया, लेकिन राजनीतिक और सैन्य दबाव के आगे झुकते हुए उन्हें अपने ही आदेश में फेरबदल करना पड़ा।
4. ईरान के साथ परमाणु समझौता (JCPOA) और सैन्य टकराव से पीछे हटना
पृष्ठभूमि और कड़ा रुख
- 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका और अन्य देशों ने ईरान के साथ एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता (JCPOA) किया था। इसके तहत ईरान पर से कुछ प्रतिबंध हटाए गए ताकि वह परमाणु बम न बना सके।
- ट्रंप का विरोध: ट्रंप इस समझौते के घोर विरोधी थे। उन्होंने राष्ट्रपति बनते ही 2018 में इस समझौते को “इतिहास का सबसे खराब और एकतरफा सौदा” करार देते हुए अमेरिका को इससे बाहर निकाल लिया।
- अधिकतम दबाव की नीति: ट्रंप ने ईरान पर दुनिया के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध (Maximum Pressure Campaign) लगा दिए और ईरान को पूरी तरह आर्थिक रूप से कुचलने की धमकी दी।
तनाव का चरम और सैन्य टकराव के हालात
- सुलेमानी की हत्या: जनवरी 2020 में ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने ईरान के ताकतवर जनरल कासिम सुलेमानी को इराक में एक ड्रोन हमले में मार गिराया।
- युद्ध का खतरा: इसके जवाब में ईरान ने इराक में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दाग दीं। दोनों देशों के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ने की स्थिति पैदा हो गई।
अचानक आया यू-टर्न
- जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिखी और वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल की आशंका पैदा हुई, तो ट्रंप ने अचानक अपने आक्रामक रुख से यू-टर्न ले लिया:
- युद्ध से पीछे हटना: जहाँ एक तरफ वे ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने की बात कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने सैन्य कार्रवाई को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।
- बातचीत की पेशकश: ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि अमेरिका ईरान के साथ बिना किसी पूर्व शर्त के बातचीत करने और एक नया, बेहतर समझौता करने के लिए तैयार है।
इसे ‘यू-टर्न‘ के रूप में क्यों देखा गया?
- ट्रंप ने जिस ईरान को पूरी तरह तबाह करने और ओबामा के समझौते को घटिया बताकर अमेरिका को उससे अलग किया था, जब ईरान की तरफ से कड़ा पलटवार हुआ, तो वे युद्ध से पीछे हट गए और दोबारा बातचीत की गुहार लगाने लगे।
5. तालिबान के साथ समझौता और अफगानिस्तान से वापसी
पृष्ठभूमि और ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘
- साल 2001 में 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। अमेरिका का घोषित रुख था कि वह “आतंकवादियों से बातचीत नहीं करता” और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई अफगान सरकार का समर्थन करता रहेगा।
कड़ा फैसला और तालिबान से सीधी डील
- दोहा समझौता (2020): अपने कार्यकाल के दौरान ट्रंप ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को बाहर निकालने की जल्दबाजी में कतार (दोहा) में तालिबान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- सहयोगी सरकार को नजरअंदाज करना: इस समझौते में सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका की समर्थित अफगान सरकार को पूरी तरह से बातचीत की मेज से बाहर रखा।
यू-टर्न और विश्वासघात का आरोप
- तालिबान को वैधता देना: जिस तालिबान को अमेरिका आतंकवाद का पर्याय मानता था, ट्रंप ने उसी तालिबान को मान्यता देकर समझौते पर हस्ताक्षर किए और हजारों तालिबानी कैदियों को रिहा करने की शर्त मान ली।
- सुरक्षा देने के वादे से हटना: अमेरिका ने जिस अफगान सरकार और वहां के आम लोगों को सुरक्षा और लोकतंत्र का वादा किया था, उन्हें बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के तालिबान के भरोसे छोड़ दिया।
इसे ‘यू-टर्न‘ के रूप में क्यों देखा गया?
- अमेरिका की दशकों पुरानी नीति (आतंकवादियों से कोई समझौता नहीं) से पूरी तरह पलटते हुए ट्रंप ने अपने ही सहयोगी देश (अफगान सरकार) की पीठ पीछे तालिबान के साथ डील कर ली, जिससे बाद में अफगानिस्तान पूरी तरह तालिबान के कब्जे में चला गया।
6. टिकटॉक (TikTok) प्रतिबंध का मामला

पृष्ठभूमि और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा‘
- 2020 में, चीन के साथ व्यापार युद्ध (Trade War) के दौरान ट्रंप ने चीनी ऐप टिकटॉक (TikTok) पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि टिकटॉक अमेरिकी नागरिकों का निजी डेटा चीन की कम्युनिस्ट सरकार को सौंपता है, जो अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
कड़ा फैसला और प्रतिबंध का आदेश
- प्रतिबंध का एग्जीक्यूटिव ऑर्डर: ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) जारी किया कि अगर टिकटॉक का स्वामित्व किसी अमेरिकी कंपनी को नहीं बेचा गया, तो इसे अमेरिका में पूरी तरह बैन कर दिया जाएगा।
- सख्त रुख: उन्होंने सार्वजनिक मंचों से बार-बार कहा कि चीनी ऐप्स को अमेरिका में किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अचानक आया यू-टर्न
- जैसे-जैसे चुनाव पास आए और स्थिति बदली, ट्रंप के रुख में अचानक भारी बदलाव देखा गया:
- निर्णय को टालना: उन्होंने बार-बार प्रतिबंध की समयसीमा (Deadlines) बढ़ाई और बैन लगाने के फैसले को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया।
- सुर में बदलाव: बाद में, अमेरिकी युवाओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की महत्ता को देखते हुए ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से टिकटॉक का समर्थन करना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि उन्होंने अपने चुनावी अभियानों में युवाओं से जुड़ने के लिए टिकटॉक का पक्ष लिया और कहा कि टिकटॉक पर बैन लगाने से अन्य अमेरिकी टेक कंपनियों का एकाधिकार बढ़ जाएगा।
इसे ‘यू-टर्न‘ के रूप में क्यों देखा गया?
- जिस ऐप को ट्रंप ने “देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा” बताया था, राजनीति और अपने फायदे के अनुसार उन्होंने उसी ऐप पर कड़े फैसले से कदम पीछे खींच लिए और उसके बचाव में बयान देने लगे।
7. उत्तर कोरियाई तानाशाही और किम जोंग उन के प्रति रुख
पृष्ठभूमि और तीखी बयानबाजी
- अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच जुबानी जंग चरम पर थी। ट्रंप ने उन्हें सार्वजनिक रूप से “लिटिल रॉकेट मैन” (Little Rocket Man) कहा था और धमकी दी थी कि यदि उत्तर कोरिया ने अमेरिका या उसके सहयोगियों को धमकी दी, तो अमेरिका उसे “पूरी तरह तबाह” (Fire and Fury) कर देगा। उत्तर कोरिया ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति को मानसिक रूप से विक्षिप्त करार दिया था।
अचानक आया यू-टर्न और दोस्ती का दावा
- ऐतिहासिक मुलाकात: कुछ ही महीनों बाद, बिना किसी पूर्व शर्त के ट्रंप ने अपने सख्त रुख से पूरी तरह यू-टर्न ले लिया। वे सिंगापुर और वियतनाम में किम जोंग उन से आमने-सामने मिले।
- तारीफों के पुल: जिस तानाशाह को वे दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, मुलाकात के बाद उन्होंने उसकी तारीफ करते हुए यहां तक कह दिया कि “हमें आपस में प्यार हो गया है” और किम जोंग उन एक बहुत “स्मार्ट” और शानदार नेता हैं।
इसे ‘यू-टर्न’ के रूप में क्यों देखा गया?
- अमेरिका के सहयोगी देशों (जैसे दक्षिण कोरिया और जापान) को उम्मीद थी कि अमेरिका उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रमों के खिलाफ कड़ा रुख बनाए रखेगा। लेकिन ट्रंप ने अचानक दुश्मनी को भुलाकर व्यक्तिगत दोस्ती और वार्ताओं का दौर शुरू कर दिया, जिससे कूटनीतिक हलकों में इसे एक बड़ा यू-टर्न माना गया।
8. जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौता (Paris Climate Agreement)
पृष्ठभूमि और कड़ा विरोध
- अपने पहले चुनाव अभियान के दौरान और राष्ट्रपति बनते ही 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक पर्यावरण समझौते यानी ‘पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट’ को सिरे से खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि यह समझौता अमेरिकी उद्योगों और कोयला/तेल सेक्टर के खिलाफ एक “अन्यायपूर्ण आर्थिक बोझ” है, जिससे चीन और भारत जैसे देशों को फायदा मिलता है और अमेरिका को नुकसान होता है।
औपचारिक यू-टर्न और वापसी के संकेत
- समझौते से बाहर होना: ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया, जिसके कारण दुनियाभर के पर्यावरणविदों ने उनकी कड़ी आलोचना की।
- लचीला रुख और कूटनीतिक दबाव: हालांकि, अपने कार्यकाल के अंत तक और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ते दबाव को भांपते हुए उन्होंने कई मौकों पर यह संकेत भी दिए कि पर्यावरण की रक्षा के प्रति वे पूरी तरह नकारात्मक नहीं हैं और यदि शर्तें बदलें तो अमेरिका नए सिरे से विचार कर सकता है। (बाद में बाइडन प्रशासन ने अमेरिका को इसमें दोबारा शामिल किया, लेकिन ट्रंप के पुनः सत्ता में आने पर उन्होंने इस पर फिर से रोक या बदलाव की नीतियां अपनाईं)।
इसे ‘यू-टर्न’ के रूप में क्यों देखा गया?
- पर्यावरण जैसे गंभीर और वैश्विक मुद्दे पर एक तरफ उन्होंने पूरी दुनिया के साथ किए गए ऐतिहासिक समझौते को तुरंत फाड़कर फेंकने जैसा कदम उठाया, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपने बयानों के जरिए बार-बार अपने रुख में विरोधाभास दिखाया।
9. सऊदी अरब और जमाल खगोशी की हत्या का प्रकरण
पृष्ठभूमि और शुरुआती कड़ा रुख
- साल 2018 में वॉशिंगटन पोस्ट के जाने-माने पत्रकार और सऊदी सरकार के आलोचक जमाल खगोशी (Jamal Khashoggi) की तुर्की स्थित सऊदी वाणिज्य दूतावास में बेहद निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। शुरुआती दौर में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और खुद डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस घटना पर तीखी नाराजगी जताई थी और कहा था कि यह बेहद भयानक है और इसके पीछे उच्च स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
व्यापारिक और रणनीतिक दबाव के चलते यू-टर्न
- सऊदी क्राउन प्रिंस को क्लीन चिट: कुछ ही हफ्तों के भीतर, ट्रंप का यह कड़ा रुख पूरी तरह बदल गया। उन्होंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) को इस हत्याकांड में सीधे तौर पर दोषी मानने से इनकार कर दिया।
- हथियार और तेल के सौदों का हवाला: ट्रंप ने खुलकर कहा कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच अरबों डॉलर के रक्षा (हथियार) सौदे हैं और यदि अमेरिका ने सऊदी नेतृत्व के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाए, तो सऊदी अरब रूस और चीन से हथियार खरीदने लगेगा, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नौकरियों को नुकसान होगा। उन्होंने यह भी कहा कि “अमेरिका-सऊदी के रिश्ते खराब नहीं हो सकते।”
इसे ‘यू-टर्न‘ के रूप में क्यों देखा गया?
- मानवाधिकारों और एक पत्रकार की हत्या जैसे गंभीर नैतिक मुद्दे पर ट्रंप ने शुरुआत में कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए थे, लेकिन अंत में आर्थिक और व्यापारिक फायदों के आगे झुकते हुए उन्होंने सऊदी नेतृत्व को पूरी तरह से बचा लिया।
- नाटो (NATO) सहयोगियों को लेकर रुख
पृष्ठभूमि और तीखी आलोचना
- अपने चुनाव अभियानों और राष्ट्रपति कार्यकाल के शुरुआती दिनों में डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिमी देशों के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो (NATO) पर जमकर निशाना साधा था। उन्होंने यहां तक कह दिया कि नाटो अब “पुराना और बेकार” (Obsolete) हो चुका है। उनका मुख्य आरोप था कि यूरोपीय देश (जैसे जर्मनी आदि) अपनी सुरक्षा के लिए तय किया गया न्यूनतम रक्षा बजट (जीडीपी का 2%) खर्च नहीं कर रहे हैं और मुफ्त में अमेरिका की सैन्य ताकत का फायदा उठा रहे हैं।
धमकी और कड़े तेवर
- ट्रंप ने बार-बार यूरोपीय देशों को खुलेआम चेतावनी दी कि यदि उन्होंने अपना रक्षा खर्च नहीं बढ़ाया, तो संकट के समय अमेरिका उनकी रक्षा के लिए रूस के खिलाफ आगे नहीं आएगा। इससे यूरोप के देशों में भारी डर और असमंजस का माहौल बन गया था कि अमेरिका उनके दशकों पुराने सुरक्षा समझौते को तोड़ सकता है।
कूटनीतिक दबाव के बाद यू-टर्न
- नाटो की अनिवार्यता को स्वीकार करना: जैसे-जैसे यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप से मुलाकात की और अपने रक्षा बजट में कुछ बढ़ोतरी के संकेत दिए, ट्रंप के सुर बदल गए।
- समर्थन का ऐलान: बाद के सम्मेलनों में उन्होंने नाटो की तारीफ करना शुरू कर दिया और यह मानने से इंकार किया कि वे नाटो को छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने केवल इस बात पर जोर दिया कि उनका दबाव काम आया और यूरोपीय देश अब ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हैं।
इसे ‘यू-टर्न‘ के रूप में क्यों देखा गया?
- जिस सैन्य गठबंधन को ट्रंप ने कुछ ही समय पहले “बेकार” बताकर अमेरिका को उससे अलग करने की धमकी दी थी, पश्चिमी देशों के कूटनीतिक दबाव और आंतरिक सुरक्षा समीकरणों के चलते उन्हें अपने उस आक्रामक रुख से पूरी तरह पीछे हटना पड़ा।
- इस प्रकार, डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति की यह शैली रही है कि वे जनता या अपने वोटर्स को खुश करने के लिए शुरुआती दौर में बहुत कड़े और बड़े बयान देते हैं, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय दबाव, व्यापार या सत्ता के वास्तविक समीकरण सामने आते हैं, तो वे अपनी नीतियों में आसानी से यू-टर्न ले लेते हैं।