खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर भारत का रूपांतरण (India’s transition from food security to nutritional security)

चर्चा में क्यों?
16 अक्टूबर 2026 को मनाए जा रहे विश्व खाद्य दिवस (World Food Day) के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख एजेंसियों द्वारा भारत की खाद्य प्रणालियों में नवाचार की आवश्यकता पर एक विशेष विमर्श प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान में भारत खाद्यान्न उत्पादन में तो आत्मनिर्भर हो चुका है, लेकिन वैश्विक स्तर पर बढ़ते जलवायु संकट, भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण खाद्य मुद्रास्फीति और देश में ‘छिपी हुई भूख’ (Hidden Hunger) ने नीति-निर्माताओं का ध्यान ‘खाद्य सुरक्षा’ से आगे बढ़कर ‘पोषण सुरक्षा’ सुनिश्चित करने की ओर खींचा है । इसी संदर्भ में वैश्विक और घरेलू संस्थाएं मिलकर खाद्य प्रणाली को अधिक आधुनिक और पौष्टिक बनाने के लिए काम कर रही हैं।
खाद्य सुरक्षा बनाम पोषण सुरक्षा (Food Security vs. Nutritional Security)
- खाद्य सुरक्षा: इसका प्राथमिक लक्ष्य भुखमरी (Hunger) को समाप्त करना है। यह मुख्य रूप से कैलोरी पूर्ति के लिए बुनियादी खाद्यान्न (जैसे- गेहूं और चावल) की उपलब्धता, पहुंच और सामर्थ्य सुनिश्चित करने तक सीमित है।
- पोषण सुरक्षा: इसका दायरा कैलोरी से बहुत आगे का है। इसमें व्यक्ति को एक ऐसा संतुलित आहार मिलना शामिल है जो प्रोटीन, आवश्यक विटामिन (जैसे विटामिन B12, फोलिक एसिड) और खनिजों (लोहा, जिंक) से भरपूर हो। इसका मुख्य उद्देश्य ‘छिपी हुई भूख‘ को समाप्त करना और मानव शरीर द्वारा पोषक तत्वों का सकारात्मक जैविक उपयोग सुनिश्चित करना है।
वैश्विक स्थिति
- भुखमरी का भयावह स्तर: संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में दुनिया भर में लगभग 64.5 करोड़ लोग तीव्र भुखमरी का सामना कर रहे हैं।
- पौष्टिक आहार की पहुंच से दूरी: वैश्विक आबादी का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा आज भी एक स्वास्थ्यवर्धक, संतुलित और पौष्टिक आहार का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ है।
- त्रिपक्षीय वैश्विक संकट: बदलता मौसम व जलवायु जोखिम (जो पैदावार घटा रहे हैं), आर्थिक झटके (जो खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ा रहे हैं) और भू-राजनीतिक संघर्ष (जो आपूर्ति शृंखला नष्ट कर रहे हैं) मिलकर वैश्विक खाद्य प्रणालियों को पंगु बना रहे हैं।
भारत की वर्तमान स्थिति
- रिकॉर्ड कृषि उत्पादन: चालू वित्त वर्ष (2025-26) के दौरान भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 33.2 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर के आसपास बना हुआ है, जो देश को वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादक महाशक्ति बनाता है।
- बड़ी आबादी तक सुरक्षा का जाल: भारत सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PM-GKAY) के तहत देश के लगभग 81 करोड़ लाभार्थियों को पूरी तरह मुफ्त खाद्यान्न की सुरक्षा प्रदान कर रही है।
- पोषण का विरोधाभास: उत्पादन में आत्मनिर्भरता के बाद भी भारत की 40.4% आबादी स्वास्थ्यवर्धक आहार वहन करने में असमर्थ है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, देश में 35.5% बच्चे स्टंटिंग (नाटापन) और 19.3% बच्चे वेस्टिंग (सूखा रोग) से पीड़ित हैं।
भारत का सफर: कमी (Scarcity) से अधिशेष (Surplus) तक
स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक भारत ने कृषि और खाद्य प्रबंधन के क्षेत्र में एक गौरवशाली सफर तय किया है:
- अभाव से आत्मनिर्भरता: 1960 के दशक में ‘शिप-टू-माउथ’ (विदेशी सहायता पर निर्भरता) की स्थिति से गुजरने के बाद, हरित क्रांति (Green Revolution) और उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYV) के आगमन ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न, दूध, दालों और फलों के उत्पादकों में से एक है।
- विशालतम खाद्य सुरक्षा ढांचा: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत देश की लगभग 75% ग्रामीण और 50% शहरी आबादी (लगभग 81 करोड़ लोग) को रियायती अनाज का कानूनी अधिकार दिया गया। जनवरी 2024 से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PM-GKAY) के माध्यम से इसे पूरी तरह मुफ्त कर वर्ष 2028 तक बढ़ा दिया गया है।
- तकनीकी समावेशन: लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) को पूरी तरह डिजिटल किया गया है। आधार सीडिंग और ‘वन नेशन वन राशन कार्ड‘ प्रणाली के कारण देश के प्रवासी श्रमिकों को देश के किसी भी कोने में अपना राशन प्राप्त करने की अचूक सुविधा मिली है।
पोषण सुरक्षा के मार्ग में विद्यमान चुनौतियाँ

- PDS में फसली एकरूपता (Monoculture): दशकों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का झुकाव केवल गेहूं और चावल की खरीद पर रहा है। इसके कारण पारंपरिक और पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाज (जैसे- रागी, बाजरा, ज्वार) आम जनता की थाली से बाहर होते गए।
- सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी: देश की 50% से अधिक महिलाएं और बच्चे एनीमिया (रक्तअल्पता) से पीड़ित हैं, जिसका मुख्य कारण आहार में विविधता का न होना है।
- संरचनात्मक सीमाएं: भारत की कृषि प्रणाली छोटे व सीमांत किसानों, मानसूनी निर्भरता और सीमित संसाधनों की सीमाओं के भीतर काम करती है ।
- कृषि पर जलवायु आघात: बेमौसम बारिश, सूखा, कीटों का हमला और बढ़ता तापमान फसलों के भीतर प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पोषक तत्वों के स्तर को भी कम कर रहा है।
भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था: संस्थागत सहयोग और ‘नवाचार‘
वर्तमान में भारत सरकार तीन प्रमुख वैश्विक संस्थाओं (FAO, IFAD, WFP) के सहयोग से खाद्य सुरक्षा के ढांचे को आधुनिक और पोषण-संवेदनशील बनाने के लिए कई नवाचारों पर कार्य कर रही है:
- A.खाद्य और कृषि संगठन (FAO)का तकनीकी सहयोग:
- सतत कृषि रोडमैप: एफएओ भारतीय कृषि को अधिक संसाधन-कुशल और जलवायु-अनुकूल बनाने के लिए नीतिगत रोडमैप तैयार कर रहा है।
- डिजिटल पशुपालन: डेयरी क्षेत्र के लिए ‘क्लीन मिल्क स्कोरकार्ड‘ जैसा डिजिटल टूल विकसित किया गया है, जो पशु प्रबंधन, स्वच्छता और दूध उत्पादन में सुधार के लिए वास्तविक समय (Real-time) डेटा प्रदान करता है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): यह कृषि अवशेषों से कंपोस्टिंग और बायोएनर्जी बनाने के रास्ते तलाश रहा है ताकि पर्यावरण को नुकसान कम हो।
- B.अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD)का वित्तीय नवाचार:
- अंतिम छोर तक निवेश: इफाड खाद्य प्रणालियों के ‘फर्स्ट माइल’ (जहाँ लघु किसानों के पास सबसे कम निवेश होता है) पर केंद्रित है।
- Financing Plus दृष्टिकोण: यह उत्पादन से लेकर बाजार तक की मूल्य शृंखला में निजी निवेश को आकर्षित करता है। इस संस्थागत भागीदारी से लक्षित क्षेत्रों में किसानों की आय में 64% तक की वृद्धि देखी गई है ।
- C.विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP)का आपूर्ति शृंखला नवाचार:
- अनाज एटीएम (Grain ATMs): सार्वजनिक वितरण को पारदर्शी बनाने और कतारों को कम करने के लिए स्वचालित अनाज वितरण मशीनें (अन्नपूर्ति) लगाई जा रही हैं।
- पब्लिक सर्विसेज लैब: आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) के साथ मिलकर आपूर्ति शृंखला के अनुकूलन के लिए नए तकनीकी मॉडल विकसित किए जा रहे हैं।
- न्यूट्री-सीरियल्स का समावेशन: डब्ल्यूएफपी पूरक पोषण योजनाओं में बायो-फोर्टिफाइड फसलों और पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाजों (Millets) को शामिल करने की पुरजोर वकालत कर रहा है ।
आगे की राह
- PDS का विविधीकरण: सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गेहूं-चावल के कोटे के साथ अनिवार्य रूप से दालें, खाद्य तेल और फोर्टिफाइड न्यूट्री-सीरियल्स (Nutrient-rich millets) दिए जाने चाहिए।
- लघु-किसान और महिला-केंद्रित नवाचार: तकनीकी समाधान ऐसे होने चाहिए जो सीमांत किसानों और महिला श्रमिकों के लिए किफायती और उपयोग में सरल हों (जैसे स्थानीय स्तर पर सौर-ऊर्जा संचालित कोल्ड स्टोरेज)।
- जैव-फोर्टिफिकेशन (Bio-fortification): कृषि विज्ञान प्रयोगशालाओं को ऐसी बीजों की किस्में विकसित करनी होंगी जो सूखा-रोधी होने के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से जिंक, आयरन और प्रोटीन से समृद्ध हों।
- अंतर-विभागीय अभिसरण: पोषण सुरक्षा को केवल कृषि मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसे ‘जल जीवन मिशन’ (स्वच्छ पेयजल) और ‘स्वच्छ भारत मिशन’ (बेहतर स्वच्छता) के साथ एकीकृत करना होगा, क्योंकि अस्वच्छ पानी के रहते शरीर पोषण का अवशोषण नहीं कर पाता।
निष्कर्ष
भारत ने खाद्यान्न के मोर्चे पर ‘कमी के युग’ से ‘अधिशेष के युग’ में प्रवेश कर अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया है । परंतु, विकसित भारत @2047 की यात्रा एक कुपोषित जनसंख्या के सहारे पूरी नहीं की जा सकती। विश्व खाद्य दिवस 2026 की यह सीख बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि हम आज कृषि और वितरण प्रणालियों में नवाचार करेंगे, तभी देश के हर नागरिक का पोषण युक्त कल सुनिश्चित हो सकेगा। भारत का यह ‘नवाचार-संचालित खाद्य सुरक्षा मॉडल’ पूरे ग्लोबल साउथ के देशों के लिए मार्गदर्शक ब्लूप्रिंट बन सकता है।