UPSC प्रासंगिकता: GS पेपर II (शासन, संविधान और अधिकार)
चर्चा में क्यों?
संसद में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ (Right to Disconnect) पर एक निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) पेश किया गया है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को निर्धारित कामकाजी घंटों के बाद काम से संबंधित डिजिटल संचार (जैसे कॉल, ईमेल या मैसेज) में शामिल होने के लिए मजबूर होने से बचाना है।
पृष्ठभूमि
भारत ने हाल ही में चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) के माध्यम से अपने श्रम ढांचे को एकीकृत किया है, जो काम के घंटों, ओवरटाइम और नियोक्ता के नियंत्रण को विनियमित करते हैं। हालाँकि, ये कानून अभी भी ‘कार्यस्थल’ और ‘समय-बद्ध’ कार्य की पुरानी अवधारणाओं पर आधारित हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था में, जहाँ निरंतर कनेक्टिविटी ने काम और आराम के बीच की सीमा को धुंधला कर दिया है, यह पुराना ढांचा अपर्याप्त साबित हो रहा है।
‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ विधेयक के प्रमुख प्रस्ताव
- कर्मचारियों को काम के घंटों के बाद काम से संबंधित कॉल, ईमेल या संदेशों का जवाब न देने का अधिकार देता है।
- डिजिटल अतिरेक के इस दौर में कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance) की रक्षा करना इसका मुख्य लक्ष्य है।
विधेयक में मौजूद प्रमुख कानूनी कमियाँ
1. ‘काम’ की स्पष्ट परिभाषा का अभाव भारतीय श्रम कानून यह स्पष्ट नहीं करते हैं कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में ‘काम’ किसे माना जाएगा। यह विधेयक काम के घंटों के बाद के संचार को तो नियंत्रित करता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता कि क्या ऐसी गतिविधियों में शामिल होना ‘कार्य’ की श्रेणी में आता है या नहीं। इससे संचार विनियमन और कार्य-समय कानून के बीच एक असंतुलन पैदा होता है।
2. मौजूदा श्रम संहिताओं के साथ तालमेल की कमी ‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020’ (OSH Code) काम के घंटों और ओवरटाइम को नियंत्रित करती है। लेकिन यह विधेयक यह स्पष्ट नहीं करता है कि क्या काम के घंटों के बाद डिजिटल माध्यम से सक्रिय रहने पर ये सुरक्षा और लाभ मिलेंगे। इसके अभाव में, यह अधिकार एक बाध्यकारी कानूनी मानक के बजाय केवल एक व्यवहारगत मानदंड (Behavioural Norm) बनकर रह जाने का जोखिम रखता है।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: अन्य देशों से सीख
- यूरोपीय संघ: यहाँ ‘नियोक्ता का नियंत्रण’ मुख्य आधार है। न्यायिक निर्णयों (जैसे SIMAP, Jaeger, Tyco) के अनुसार, ऑन-कल और स्टैंडबाय समय को कामकाजी समय माना जाता है।
- फ्रांस: यहाँ काम के समय और आराम के समय के बीच स्पष्ट अंतर है। नियोक्ता के नियंत्रण में रहने वाली उपलब्धता की अवधि को काम माना जाता है और इसे सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) के माध्यम से विनियमित किया जाता है।
- जर्मनी: यहाँ काम के घंटों की सख्त सीमा और अनिवार्य आराम की अवधि को सख्ती से लागू किया जाता है।
इन मॉडलों से एक मौलिक प्रश्न उठता है: एक कर्मचारी का समय कब नियोक्ता का हो जाता है?
अनिवार्य अधिकार या संविदात्मक शर्त?
भारतीय श्रम कानून में ‘अनिवार्य मानक’ और ‘संविदात्मक लचीलापन’ दोनों शामिल हैं। यह विधेयक यह स्पष्ट नहीं करता है कि ‘डिस्कनेक्ट होने का अधिकार’ एक ऐसा अधिकार है जिस पर समझौता नहीं किया जा सकता, या यह नियोक्ता की नीतियों और अनुबंधों के अधीन होगा। यह अनिश्चितता इसे लागू करने की शक्ति को कमजोर करती है।
संवैधानिक आयाम
डिस्कनेक्ट होने का अधिकार सीधे तौर पर निम्नलिखित से जुड़ा है:
- अनुच्छेद 21: गरिमा, स्वायत्तता, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता। हालाँकि, यह विधेयक इस संवैधानिक आधार को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं करता है और न ही यह स्पष्ट करता है कि यह अधिकार वैधानिक (Statutory) है या संवैधानिक।
आगे की राह
- डिजिटल अर्थव्यवस्था में ‘काम’ को नियोक्ता के नियंत्रण के आधार पर परिभाषित किया जाना चाहिए।
- डिजिटल श्रम को कार्य-समय और ओवरटाइम के प्रावधानों में एकीकृत किया जाए।
- यह स्पष्ट किया जाए कि डिस्कनेक्ट होने का अधिकार एक अनिवार्य श्रम मानक है।
- इस अधिकार को अनुच्छेद 21 से जोड़ा जाए ताकि कार्यस्थल पर स्वायत्तता और गरिमा को मान्यता मिल सके।
- विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए सामूहिक सौदेबाजी के ढांचे को प्रोत्साहित किया जाए।
निष्कर्ष
‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ विधेयक डिजिटल कार्य की वास्तविकताओं को तो स्वीकार करता है, लेकिन इसे भारत के श्रम कानून ढांचे में पूरी तरह एकीकृत करने में विफल रहता है। जब तक नियोक्ता के अधीन डिजिटल उपलब्धता को ‘काम का समय’ नहीं माना जाता और इसके संवैधानिक आधार स्पष्ट नहीं होते, तब तक यह विधेयक एक क्रांतिकारी सुधार के बजाय केवल एक औपचारिक संकेत मात्र बना रहेगा।
| महत्वपूर्ण अवधारणाएं (Important Concepts) निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) निजी सदस्य विधेयक वह विधेयक है जिसे मंत्री के अलावा संसद के किसी भी अन्य सदस्य द्वारा पेश किया जाता है। यह सरकारी रुख के बजाय सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर व्यक्तिगत या विपक्षी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है। मुख्य विशेषताएं: इसे पेश करने से पहले एक महीने का पूर्व नोटिस आवश्यक है।संसद के दोनों सदनों में शुक्रवार का दिन ‘निजी सदस्य विधेयक’ की चर्चा के लिए आरक्षित होता है।ऐसे विधेयक मुख्य रूप से एजेंडा तय करने का काम करते हैं और शायद ही कभी कानून बन पाते हैं। विधायी इतिहास: आजादी के बाद पारित होने वाला पहला निजी सदस्य विधेयक 1952 का ‘मुस्लिम वक्फ विधेयक’ था। अब तक केवल 14 निजी सदस्य विधेयक ही कानून बने हैं। अंतिम बार ऐसा 1970 में हुआ था। वक्फ (Wakf) वक्फ से तात्पर्य धार्मिक, धर्मार्थ या पवित्र उद्देश्यों के लिए किसी संपत्ति (चल या अचल) के स्थायी समर्पण से है। मुख्य विशेषताएं: संपत्ति को वापस लेने के इरादे के बिना दान किया जाता है।एक बार वक्फ घोषित होने के बाद, संपत्ति ‘अहस्तांतरणीय’ (Inalienable) हो जाती है (इसे बेचा, उपहार में दिया या स्थानांतरित नहीं किया जा सकता)।इससे होने वाली आय का उपयोग केवल धर्मार्थ या धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जाता है। |
जीएस पेपर II / जीएस पेपर III – मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्र. “डिजिटल अर्थव्यवस्था में डिस्कनेक्ट होने का अधिकार एक महत्वपूर्ण श्रम अधिकार के रूप में उभरा है।” इस संदर्भ में, भारत में डिस्कनेक्ट होने के अधिकार विधेयक के महत्व का विश्लेषण कीजिए। इसके कार्यान्वयन से जुड़ी कानूनी, संवैधानिक और श्रम संबंधी चुनौतियों पर चर्चा कीजिए और इसे प्रभावी बनाने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)
