तपेदिक (TB) के विरुद्ध नई वैज्ञानिक रणनीति: संक्रमण को मारने के बजाय उसे ‘मात’ देना

UPSC प्रासंगिकता – प्रारम्भिक परीक्षा: सामान्य विज्ञान, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और समसामयिक घटनाएँ

मुख्य परीक्षा – GS पेपर III: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे और JIS इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के शोधकर्ताओं ने माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mtb) की उत्तरजीविता और अनुकूलन क्षमता पर क्रांतिकारी खुलासे किए हैं। यह शोध इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह बैक्टीरिया को केवल एक ‘बीमारी पैदा करने वाले कारक’ के रूप में नहीं, बल्कि एक अत्यधिक अनुकूलनशील प्रणाली के रूप में देखता है। यह खोज टीबी के उपचार, विशेष रूप से दवा-प्रतिरोधी टीबी (DR-TB), और इसके सस्ते एवं सटीक निदान के लिए नए द्वार खोलती है।

  • तपेदिक (TB) सदियों से मानव जाति के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत में दुनिया के टीबी मामलों का एक बड़ा हिस्सा है। पारंपरिक रूप से, टीबी नियंत्रण का मुख्य केंद्र ‘बैक्टीरिया को मारना’ रहा है, लेकिन एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से ‘मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी’ (MDR-TB) की समस्या उत्पन्न हो गई है।
  • वर्तमान शोध इस बात पर केंद्रित है कि कैसे यह बैक्टीरिया दशकों तक मानव शरीर के भीतर बिना पकड़े रहे जीवित रहता है और कैसे इसकी अपनी आंतरिक प्रणालियों को बाधित कर इसे कमजोर किया जा सकता है।

1. लिपिड-आधारित सुरक्षा कवच: एक बदलती हुई ढाल

माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस की सबसे बड़ी ताकत इसकी बाहरी झिल्ली है।

  • गतिशील संरचना: यह झिल्ली लिपिड (वसा) से समृद्ध होती है। शोध के अनुसार, यह झिल्ली स्थिर नहीं रहती, बल्कि बैक्टीरिया की अवस्था (सक्रिय या सुप्त) के अनुसार खुद को बदलती रहती है।
  • प्रतिरक्षा और एंटीबायोटिक से बचाव: जब बैक्टीरिया सुप्त अवस्था में होता है, तो वह अपनी कोशिका भित्ति को और अधिक कठोर बना लेता है। यह कठोरता उसे न केवल मानव प्रतिरक्षा प्रणाली से बचाती है, बल्कि एंटीबायोटिक दवाओं को भी बेअसर कर देती है। यही कारण है कि टीबी का बैक्टीरिया शरीर में दशकों तक बना रह सकता है।

2. मेजबान कोशिकाओं (Host Cells) का अनुकूलन

बैक्टीरिया शरीर में केवल प्रवेश नहीं करता, बल्कि वह मेजबान कोशिकाओं को अपने अनुसार ढालता है।

  • एक्टिन पुनर्गठन: शोध से पता चला है कि बैक्टीरिया के ‘सल्फोग्लाइकोलिपिड-1’ जैसे अणु मानव कोशिका की झिल्ली और उसके ढांचे को इस तरह बदलते हैं कि बैक्टीरिया आसानी से कोशिका के भीतर प्रवेश कर सके।
  • भड़काऊ प्रतिक्रिया में बदलाव: यह बैक्टीरिया मानव शरीर की सूजन संबंधी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है, ताकि उसे कोशिका के भीतर पनपने के लिए सुरक्षित वातावरण मिल सके। इसे ‘कंडीशनिंग’ कहा जाता है, जहाँ रोगजनक मेजबान को खुद को स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है।

3. आंतरिक संकेतन प्रणाली (c-di-AMP) और वास्तविक समय निगरानी

बैक्टीरिया के भीतर एक सूक्ष्म अणु होता है जिसे c-di-AMP कहा जाता है, जो इसकी ‘जीवन रेखा’ की तरह काम करता है।

  • महत्त्वपूर्ण नियामक: यह अणु बैक्टीरिया के विकास, चयापचय और तनाव सहने की क्षमता को नियंत्रित करता है।
  • FRET-आधारित बायोसेंसर: शोधकर्ताओं ने एक नया उपकरण विकसित किया है जो ‘फॉस्टर रेजोनेंस एनर्जी ट्रांसफर’ (FRET) का उपयोग करता है। यह तकनीक पारंपरिक स्थिर चित्रों के बजाय, जीवित कोशिकाओं के भीतर इस अणु की गतिविधियों को रीयल-टाइम में देखने की सुविधा देती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि बैक्टीरिया विभिन्न स्थितियों में खुद को कैसे नियंत्रित करता है।

4. निदान में नवाचार: लिक्विड क्रिस्टल विधि

टीबी नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा सुप्त संक्रमण (Latent TB) की पहचान है।

  • स्मार्टफोन-आधारित पहचान: IIT बॉम्बे की टीम ने एक ऐसी विधि विकसित की है, जो लिपिड परिवर्तनों के आधार पर सक्रिय और सुप्त टीबी के बीच अंतर कर सकती है।
  • कम लागत और सुलभता: यह तकनीक महंगे लैब उपकरणों या रसायनों के बजाय लिक्विड क्रिस्टल प्लेटफॉर्म पर आधारित है। भारत जैसे देश के लिए, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी है, स्मार्टफोन द्वारा कैप्चर किया जाने वाला यह सरल परिणाम गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

5. भविष्य की रणनीति: बैक्टीरिया को कमजोर करना

दवा-प्रतिरोधी टीबी (DR-TB) से निपटने के लिए अब ‘सीधे हत्या’ के बजाय ‘सिस्टम व्यवधान’ की रणनीति अपनाई जा रही है।

  • सिग्नलिंग पाथवे को रोकना: यदि बैक्टीरिया की आंतरिक संचार प्रणाली को बाधित कर दिया जाए, तो वह कमजोर हो जाता है।
  • एंटीबायोटिक संवेदनशीलता: कमजोर होने के बाद, वही बैक्टीरिया जो पहले दवाओं के प्रति प्रतिरोधी था, अब मौजूदा सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं से भी मारा जा सकता है। इससे बैक्टीरिया पर ‘विकासवादी दबाव’ कम पड़ता है और नई प्रतिरोधी प्रजातियों के पैदा होने की संभावना कम हो जाती है।
  • कम चयनात्मक दबाव: चूँकि, नया दृष्टिकोण जीवाणु को सीधे मारने के बजाय उसे कमजोर करता है, इसलिए जीवाणु में दवा-प्रतिरोध विकसित होने की संभावना कम हो जाती है।
  • कम लागत वाला निदान: स्मार्टफोन-आधारित जांच से दूरस्थ क्षेत्रों में टीबी की पहचान आसान और सस्ती हो जाएगी।
  • सटीक उपचार: सुप्त टीबी की पहचान से भविष्य में होने वाले सक्रिय संक्रमण को समय रहते रोका जा सकता है।

चुनौतियां:

  • नैदानिक परीक्षण का अभाव: वर्तमान में अधिकांश शोध माइकोबैक्टीरियम स्मेग्मैटिस (एक मॉडल जीव) पर आधारित हैं। वास्तविक Mtb और मानव नमूनों पर इसके परिणाम अलग हो सकते हैं।
  • प्रयोगशाला से क्लिनिक तक की दूरी: इन वैज्ञानिक खोजों को बाजार में उपलब्ध दवाओं और टेस्ट किट में बदलने के लिए भारी निवेश और समय की आवश्यकता होती है।
  • जैव-सुरक्षा चिंताएं: Mtb के साथ काम करने के लिए उच्च स्तर की लैब (BSL-3) की आवश्यकता होती है, जो अनुसंधान की गति को धीमा कर सकती है।

तपेदिक के विरुद्ध भारत की लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर है। जहाँ एक ओर मामलों में गिरावट आई है, वहीं ‘दवा-प्रतिरोधी टीबी’ (DR-TB) और ‘अघोषित मामलों’ की चुनौती अभी भी बनी हुई है।

नोट: भारत में टीबी के मामलों में गिरावट की गति (21%) वैश्विक औसत (12%) की तुलना में लगभग दोगुनी रही है।

1. प्रमुख रुझान और आंकड़े (2015 बनाम 2024-25)

सूचक 2015 (आधार वर्ष)2024-25परिवर्तन
टीबी व्यापकता दर237 प्रति लाख187 प्रति लाख21% की गिरावट
मृत्यु दर28 प्रति लाख21 प्रति लाख28% की गिरावट
उपचार कवरेज53%92%39% की वृद्धि
उपचार सफलता दर~75%90%15% का सुधार

2. व्यापकता और बीमारी का बोझ

  • कुल मामले: वर्ष 2024 में भारत में लगभग 26.18 लाख टीबी रोगियों की पहचान की गई।
  • वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया के कुल टीबी मामलों का लगभग 25% से 26% हिस्सा अकेले भारत में है।
  • मृत्यु का आंकड़ा: वैश्विक स्तर पर टीबी से होने वाली कुल मौतों में भारत की हिस्सेदारी लगभग 28% है।

3. प्रमुख चुनौतियां: ‘Missing Cases’ और ‘MDR-TB’

  • गुमशुदा मामले (Missing Cases): वर्ष 2015 में लगभग 15 लाख मामले ऐसे थे जो स्वास्थ्य प्रणाली की निगरानी से बाहर थे। 2024 में यह संख्या घटकर 1 लाख से भी कम रह गई है।
  • दवा-प्रतिरोधी टीबी (DR-TB): वैश्विक स्तर पर ‘मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट’ (MDR) टीबी के 32% मामले भारत में हैं। यह भारत के लिए सबसे बड़ी नैदानिक चुनौती है।
  • कुपोषण: भारत में सक्रिय टीबी के लगभग 35% मामलों का सीधा संबंध कुपोषण से है।

4. सरकारी पहल और उनकी प्रभावशीलता

  • नि-क्षय पोषण योजना: इस योजना के तहत 2018 से अब तक 1.28 करोड़ से अधिक रोगियों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से वित्तीय सहायता दी गई है। 2024 में पोषण सहायता राशि बढ़ाकर 1,000 रुपये प्रति माह कर दी गई है।
  • टीबी मुक्त भारत अभियान: दिसंबर 2024 में शुरू हुए इस अभियान के तहत 19 करोड़ से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई, जिसमें लगभग 9 लाख ‘लक्षणहीन’ मामलों का पता चला।
  • BPaLM उपचार: दवा-प्रतिरोधी टीबी के लिए नई BPaLM (Bedaquiline, Pretomanid, Linezolid, Moxifloxacin) पद्धति अपनाई गई है, जिससे उपचार की अवधि 18 महीने से घटकर मात्र 6 महीने रह गई है।

यह शोध स्पष्ट करता है कि टीबी के खिलाफ लड़ाई केवल नई दवाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बैक्टीरिया की सूक्ष्म प्रणालियों को समझने पर आधारित होनी चाहिए। हालाँकि, इन निष्कर्षों को प्रयोगशाला से क्लिनिक (मरीजों तक) ले जाने के लिए व्यापक नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता है। लेकिन 21% की गिरावट और 92% उपचार कवरेज यह दर्शाता है कि भारत सही दिशा में अग्रसर है। टीबी अनुसंधान की यह नई दिशा भारत के ‘2027 तक टीबी मुक्त भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

यूपीएससी प्रारम्भिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न 1: माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mtb) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. Mtb की बाहरी झिल्ली एक स्थिर संरचना है, जो केवल सक्रिय संक्रमण के दौरान ही लिपिड का स्राव करती है।
  2. सल्फोग्लाइकोलिपिड-1 मेजबान कोशिका के साइटोस्केलेटन (एक्टिन) को पुनर्गठित कर जीवाणु के प्रवेश को सुगम बनाता है।
  3. जीवाणु का लिपिडोम कोशिका भित्ति को लचीला बनाकर उसे एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

प्रश्न 2. भारत में टीबी की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत में टीबी व्यापकता दर में गिरावट की गति वैश्विक औसत की तुलना में कम रही है।
  2. BPaLM उपचार पद्धति ने दवा-प्रतिरोधी टीबी के उपचार की अवधि को काफी कम कर दिया है।
  3. नि-क्षय पोषण योजना के तहत प्रदान की जाने वाली मासिक वित्तीय सहायता को हाल ही में बढ़ाकर 1,000 रुपये कर दिया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 3

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

यूपीएससी मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mtb) केवल एक संक्रामक रोगजनक नहीं है, बल्कि एक जटिल और अनुकूलनशील जैविक प्रणाली है, जो मेजबान की प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को अपने अस्तित्व के पक्ष में कुशलतापूर्वक विनियमित करती है।” हालिया वैज्ञानिक शोधों के आलोक में, इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।  (शब्द सीमा: 250)

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