पराली जलाने की समस्या: कारण, प्रभाव और स्थायी समाधान (The Problem of Stubble Burning: Causes, Impacts, and Sustainable Solutions)
| UPSC Syllabus Linkage GS Paper I: भारतीय कृषि और फसल प्रतिरूप। GS Paper II: सरकारी नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप। GS Paper III: पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण और क्षरण; कृषि उपज का भंडारण और ई-तकनीक। |
चर्चा में क्यों है?
हर साल अक्टूबर और नवंबर के महीने आते ही उत्तर भारत, विशेषकर दिल्ली-NCR क्षेत्र एक गैस चैंबर में तब्दील हो जाता है। हाल ही में सर्दियों की शुरुआत के साथ ही वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पुनः ‘खतरनाक’ (Severe+) श्रेणी में पहुँच गया है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा निगरानी के बावजूद, पंजाब और हरियाणा के खेतों में आग की घटनाएं बड़े पैमाने पर दर्ज की जा रही हैं। यह समस्या केवल किसानों की ‘लापरवाही’ नहीं, बल्कि भारत के कृषि-पारिस्थितिक तंत्र में गहरे तक समाई कानूनी, तकनीकी और आर्थिक विफलता का परिणाम है।

पराली संकट क्या है ?
धान की फसल की कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों (डंठल और जड़ों) को जलाना ही ‘पराली संकट‘ कहलाता है। पंजाब और हरियाणा में सालाना लगभग 29 मिलियन मीट्रिक टन धान की पराली पैदा होती है।
यह संकट हर साल बार-बार इसलिए उत्पन्न हो रहा है, क्योंकि यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कानूनी, तकनीकी और आर्थिक कारकों का एक जटिल अंतर्संबंध है। जब तक सर्दियों के आगमन के साथ मौसम की स्थितियां (कम तापमान और हवा की धीमी गति) बदलती हैं, तब तक किसानों के पास खेत खाली करने का कोई और व्यावहारिक विकल्प नहीं बचता, जिससे यह एक वार्षिक दुष्चक्र बन चुका है।
पराली संकट के मूल कारण
- कानूनी हस्तक्षेप और अति-संक्षिप्त बुवाई चक्र: पंजाब और हरियाणा में गिरते भूजल स्तर को रोकने के लिए वर्ष 2009 में ‘पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल वॉटर एक्ट‘ लागू किया गया। इस कानून ने धान की बुवाई को जून के मध्य तक टाल दिया ताकि मानसून के पानी का उपयोग हो सके। इसके परिणामस्वरूप, अक्टूबर के अंत में धान की कटाई और नवंबर की शुरुआत में गेहूं की बुवाई के बीच केवल 10 से 15 दिनों का अत्यंत संक्षिप्त समय बचता है। खेत को जल्द खाली करने के लिए आग लगाना सबसे त्वरित उपाय बन जाता है।
- असममित मशीनीकरण: मजदूरों की कमी और तीव्र कृषि के कारण कंबाइन हार्वेस्टर का उपयोग अनिवार्य हो गया है। ये मशीनें धान के केवल ऊपरी हिस्से को काटती हैं और जमीन पर 25 से 30 सेंटीमीटर ऊंचे सख्त डंठल छोड़ देती हैं, जिन्हें सामान्य ट्रैक्टरों से हटाना बेहद कठिन होता है।
- नीति-प्रेरित एकल-फसल पद्धति: पंजाब और हरियाणा में धान और गेहूं पर सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और शत-प्रतिशत सरकारी खरीद की व्यवस्था है। वर्ष 2021-22 में पंजाब में 87% और हरियाणा में 74% धान सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीदा गया, जबकि राष्ट्रीय औसत केवल 30% था। यह आर्थिक सुरक्षा किसानों को कम अवशेष वाली फसलों (जैसे मक्का या दलहन) की ओर जाने से रोकती है।
- लंबी अवधि की किस्में (जैसे PUSA-44): किसान अभी भी PUSA-44 जैसी धान की किस्मों को प्राथमिकता देते हैं जिन्हें पकने में 150 से 160 दिन का लंबा समय लगता है। यह गेहूं की बुवाई के समय को और अधिक संकुचित कर देता है।
इसके बहुआयामी प्रभाव (Multidimensional Impacts)
(A) पर्यावरणीय एवं वायुमंडलीय प्रभाव
1 टन धान की पराली जलाने से वातावरण में भारी मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), मीथेन (CH4), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) और कार्सिनोजेनिक (कैंसरकारी) रसायन निकलते हैं। सर्दियों में तापमान व्युत्क्रमण के कारण ये प्रदूषक सतह के पास ही फंस जाते हैं। दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में पराली के धुएं का योगदान कुछ दिनों में 40% तक पहुँच जाता है।
(B) मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी का विनाश
वैज्ञानिक डेटा के अनुसार, खेतों में आग लगाने से मिट्टी की ऊपरी 3 इंच की परत का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी की नमी और उसकी जल-धारण क्षमता समाप्त हो जाती है। प्रति टन पराली दहन से मिट्टी के आवश्यक पोषक तत्वों का निम्नलिखित नुकसान होता है:
- कार्बन: 400 किलोग्राम
- नाइट्रोजन: 5.5 किलोग्राम
- फॉस्फोरस: 2.3 किलोग्राम
- पोटेशियम: 2.5 किलोग्राम
- सल्फर: 1.2 किलोग्राम
- सूक्ष्मजीवों की क्षति: मिट्टी में मौजूद मित्र बैक्टीरिया और फंगस पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी बंजर होने लगती है और अगले फसल चक्र में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता एवं लागत दोनों बढ़ जाती है।
(C) गंभीर जल संकट
सुनिश्चित खरीद के कारण पंजाब में 2012 तक लगभग 73% फसली क्षेत्र भूजल सिंचाई पर निर्भर हो गया, जिससे सालाना 14.31 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का घाटा दर्ज किया गया। नासा (NASA) के GRACE सैटेलाइट डेटा के मुताबिक, इस क्षेत्र ने 2002-2008 के बीच 109 क्यूबिक किलोमीटर भूजल खो दिया, जो वैश्विक स्तर पर जल स्तर में सबसे तेज गिरावट में से एक है।
सरकारी प्रयास और नीतियां (Government Initiatives)
- CAQM का गठन: वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को दिल्ली-NCR और आसपास के राज्यों में पराली दहन की सख्त निगरानी और ग्रैप्ड (GRAP) नियमों को लागू करने का वैधानिक अधिकार दिया गया है।
- प्रशासनिक जवाबदेही: CAQM ने ‘डायरेक्शन नंबर 95’ के तहत जिला कलेक्टरों और मजिस्ट्रेटों को उन नोडल अधिकारियों या पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कानूनी शिकायत दर्ज करने का अधिकार दिया है जो अपने क्षेत्रों में पराली दहन रोकने में ढिलाई बरतते हैं।
- फसल अवशेष प्रबंधन योजना (2018-19 से लागू): इस केंद्रीय योजना के तहत व्यक्तिगत किसानों को इन-सिटू मशीनों (हैप्पी सीडर, सुपर-SMS, मल्चर आदि) की खरीद पर 50% की सब्सिडी दी जाती है।
- कस्टम हायरिंग सेंटर: सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और पंचायतों को इन मशीन बैंकों की स्थापना के लिए 80% तक की भारी वित्तीय सहायता (अधिकतम ₹24 लाख तक की सब्सिडी) दी जा रही है ताकि सीमांत किसानों को मशीनें आसानी से किराए पर मिल सकें।
- डिजिटल पहल: पंजाब सरकार ने ‘i-Khet’ ऐप और ‘कोऑपरेटिव मशीनरी ट्रैकर’ लॉन्च किया है, जो किसानों को उनके नजदीक उपलब्ध CRM मशीनों को बुक करने में मदद करता है।
- पूसा बायो-डीकंपोज़र: आईसीएआर (ICAR) द्वारा विकसित इस कवक मिश्रण को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में हरियाणा सरकार ने किसानों को मुफ्त डीकंपोज़र पाउडर वितरित करने की घोषणा की है ताकि पराली को खेत में ही 20 दिनों के भीतर जैविक खाद में बदला जा सके।
- उत्तर प्रदेश का अनूठा मॉडल: उत्तर प्रदेश सरकार ने “पराली के बदले गोवंश खाद” पहल शुरू की है, जिसके तहत किसान अपनी पराली गौशालाओं में दान करते हैं और बदले में उन्हें जैविक गाय का गोबर/खाद मुफ्त दी जाती है।
समाधान: स्व-स्थाने (In-situ) और बाह्य-स्थाने (Ex-situ) उपाय
संसदीय समितियों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, दंडात्मक कार्रवाई के बजाय एक मजबूत प्रोत्साहन ढांचा तैयार करना होगा:
(A) स्व-स्थाने उपाय (खेत के भीतर प्रबंधन)
- तकनीकी लोकतंत्रीकरण: हैप्पी सीडर, सुपर-एसएमएस और रोटावेटर जैसी मशीनें इन-सिटू प्रबंधन के लिए सर्वोत्तम हैं। लेकिन एक हैप्पी सीडर की लागत लगभग ₹10,000 है और इसे चलाने के लिए 60-HP (हॉर्सपावर) के महंगे ट्रैक्टर की आवश्यकता होती है। चूंकि ये मशीनें साल में सिर्फ 15 दिन काम आती हैं, इसलिए सरकार को कस्टम हायरिंग सेंटर्स (CHCs) के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को इसे मुफ्त या अत्यंत कम किराए पर उपलब्ध कराना चाहिए।
- पारिस्थितिक सेवा भुगतान: संसदीय पैनल की सिफारिशों के अनुसार, फसल विविधीकरण अपनाने वाले किसानों को ₹7,000 प्रति एकड़ की सीधी वित्तीय सहायता और वैकल्पिक फसलों के लिए ₹1,000 से ₹4,000 प्रति एकड़ का प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, पूसा बायो-डीकंपोजर के छिड़काव को 100% सरकारी अनुदान पर उपलब्ध कराया जाए।
(B) बाह्य-स्थाने उपाय (खेत के बाहर प्रबंधन)
- आर्थिक व्यवहार्यता: वर्तमान में खेत से पराली को इकट्ठा करने और उसकी गांठें बनाने की लागत ₹1,500 से ₹2,500 प्रति एकड़ आती है, जो किसानों के लिए भारी बोझ है।
- अपशिष्ट से धन: पराली को कच्चे माल के रूप में उपयोग करने के लिए उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए:
- थर्मल पावर प्लांटों में कोयले के साथ पराली के पेलेट्स का सह-दहन अनिवार्य हो।
- राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत 2G इथेनॉल संयंत्रों और कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) ग्रिड की स्थापना में तेजी लाई जाए ताकि पराली किसानों के लिए एक अतिरिक्त आय का साधन बन सके।
(C) निगरानी प्रणाली में सुधार
- वर्तमान प्रणाली की कमी: अभी पराली की आग को गिनने के लिए NASA के MODIS और VIIRS सैटेलाइट्स का उपयोग किया जाता है। ये ध्रुवीय उपग्रह भारत के ऊपर से दिन में केवल एक बार (सुबह 10:30 से दोपहर 01:30 बजे के बीच) गुजरते हैं। किसान अक्सर इस समय अंतराल के बाद या शाम को आग लगाते हैं जिससे वास्तविक डेटा सामने नहीं आता।
- नया दृष्टिकोण (ISRO 2025): इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, केवल ध्रुवीय उपग्रहों पर निर्भर रहने के बजाय ध्रुवीय (Polar) और भू-स्थैतिक उपग्रहों के डेटा का संयुक्त उपयोग किया जाना चाहिए ताकि 24 घंटे की वास्तविक और सटीक निगरानी सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा उड़न दस्तों की तैनाती, एफआईआर दर्ज करने या दंडात्मक जुर्माना लगाने जैसे पुलिसिया तरीके इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं। इससे केवल अधिकारियों और किसानों के बीच मिलीभगत बढ़ती है और किसान छिपकर आग लगाने लगते हैं। जब तक वैकल्पिक फसलों (जैसे मक्का, कपास, दलहन) के लिए सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और एक मजबूत बाजार तंत्र विकसित नहीं किया जाता, तब तक उत्तरी भारत का यह वार्षिक पर्यावरणीय आपातकाल थमता नजर नहीं आएगा। भारत को अब एक मजबूत सहकारी संघवाद के तहत राज्यों और केंद्र के सामूहिक वित्तीय प्रयासों की आवश्यकता है।