लद्दाख के लिए ‘Sui Generis’ शासन मॉडल

Source: The Hindu

Context:

गृह मंत्रालय और लद्दाख के प्रतिनिधि संगठनों (लेह एपेक्स बॉडी – LAB तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस – KDA) के बीच हालिया वार्ताओं में यह स्पष्ट किया गया है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा या अनुच्छेद 239AA जैसा पारंपरिक UT मॉडल देने के बजाय अनुच्छेद 371 (प्रस्तावित 371-K) के तहत एक विशिष्ट ‘Sui Generis’ (अनूठा) मॉडल प्रदान किया जाएगा।

प्रश्न:

Formate of the Answer:

1. परिचय (Introduction):

लद्दाख की सामरिक स्थिति, जनजातीय जनसांख्यिकी (>90%) तथा ‘Sui Generis’ मॉडल के संवैधानिक अर्थ को स्पष्ट करना।

2. मुख्य भाग (Body – बहुआयामी दृष्टिकोण):

  • ‘Sui Generis’ मॉडल की मुख्य विशेषताएं: अनुच्छेद 371-K, प्रत्यक्ष निर्वाचित निकाय, और स्वायत्त विधाई व वित्तीय अधिकार।
  • प्रशासनिक नवाचार की आवश्यकता: रणनीतिक सीमांत सुरक्षा (LAC/LOC), संवेदनशील हिमालई पारिस्थितिकी और स्थानीय अधिकारों का संरक्षण।
  • सीमाएं एवं चुनौतियाँ: छठी अनुसूची व पूर्णराज्यत्व से अंतर, LAHDC तथा नए निकाय के बीच शक्तियों का दोहराव (Overlapping), और प्रक्रियात्मक अविश्वास।
  • आगे की राह (Way Forward):

3. निष्कर्ष (Conclusion):

असिम्मित संघवाद, लोकतांत्रिक संस्थागीकरण और पारदर्शी संवाद के माध्यम से स्थायी समाधान का मार्ग।

Answer:

परिचय:

सुई जेनेरिस (‘Sui Generis’) (स्व-लक्षण/अद्वितीय) मॉडल एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था को निरूपित करता है जिसकी कोई पूर्व मिसाल न हो। वर्ष 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के पश्चात बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेश बने लद्दाख (>90% जनजातीय आबादी) के लिए यह मॉडल भारतीय असम्मित संघवाद का एक अभिनव प्रयास है।

Sui Generis शब्द का अर्थ:

Sui Generis शब्द लैटिन भाषा (Latin language) से आया है। अगर हम इस शब्द को अलग-अलग टुकड़ों में तोड़ें, तो इसका मतलब इस प्रकार होगा:

Sui (सू-ई): इसका लैटिन में अर्थ होता है “अपना खुद का” या “स्वयं का”

Generis (जेनेरिस): इसका लैटिन में अर्थ होता है “प्रकार”, “किस्म” या “श्रेणी”

दोनों शब्दों को मिलाकर अर्थ:

जब इन दोनों शब्दों को जोड़ा जाता है, तो Sui Generis का सीधा मतलब होता है “अपने ही प्रकार का” या “अपनी तरह का इकलौता”।

सरल शब्दों में, इसका उपयोग किसी ऐसी चीज़, कानून या व्यवस्था के लिए किया जाता है जो इतनी अनोखी (Unique) है कि उसकी तुलना किसी दूसरी चीज़ से नहीं की जा सकती क्योंकि उस जैसी कोई दूसरी श्रेणी बनी ही नहीं है।

  • अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संरक्षण: गृह मंत्रालय द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज पर लद्दाख हेतु अनुच्छेद 371 (संभावित 371-K) के अंतर्गत एक विशिष्ट संवैधानिक अध्याय जोड़ने का प्रस्ताव है।
  • प्रत्यक्ष निर्वाचित विधायी निकाय: निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से गठित होने वाला एक प्रत्यक्ष निकाय, जिसके पास भूमि, भाषा, रोजगार, पर्यावरण, वन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर कानून बनाने की विधाई शक्ति होगी।
  • वित्तीय एवं कार्यकारी स्वायत्तता: स्थानीय निकायों को बजट निर्माण, स्थानीय कर लगाने, सार्वजनिक धन के व्यय और विकासात्मक प्राथमिकताओं के निर्धारण का स्वायत्त अधिकार।
  • स्वायत्त पहाड़ी परिषदों (LAHDC) का एकीकरण: मौजूदा लेह और कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों (LAHDC) के साथ तालमेल बिठाते हुए त्रि-स्तरीय शासन व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण।
  • रणनीतिक एवं सीमावर्ती सुरक्षा: चीन (LAC) और पाकिस्तान (LOC) से घिरे होने के कारण पूर्ण राज्यत्व से उत्पन्न संभावित भू-राजनीतिक जोखिमों को नियंत्रित करना तथा केंद्रीय सुरक्षा हितों को बनाए रखना।
  • पारिस्थितिकी एवं जनजातीय संरक्षण: सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा उठाए गए नाजुक हिमालई पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय जनजातीय पहचान के संरक्षण से जुड़े मुद्दों का समाधान।
  • संघवाद में लचीलापन: भारतीय संविधान के लचीलेपन का प्रदर्शन, जो क्षेत्रीय विविधताओं के अनुसार विशेष शासन मॉडल (जैसे नागालैंड हेतु 371A या मिजोरम हेतु 371G) प्रदान करने की क्षमता रखता है।
  • छठी अनुसूची और पूर्णराज्यत्व की उपेक्षा: लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) की प्राथमिक मांग संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) और पूर्ण राज्य का दर्जा है, जिसके बिना यह मॉडल स्थानीय स्तर पर आंशिक समाधान माना जा रहा है।
  • प्रशासनिक दोहराव (Administrative Overlap): उप-राज्यपाल (L-G), प्रस्तावित UT-स्तरीय निर्वाचित निकाय तथा मौजूदा पहाड़ी परिषदों (LAHDC) के बीच शक्तियों के स्पष्ट विभाजन का अभाव संस्थागत टकराव उत्पन्न कर सकता है।
  • कार्यकारी अस्पष्टता एवं अविश्वास: पुलिस व कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण न होना तथा वार्ताओं के दौरान विस्तृत मसौदे (Draft Proposal) के अभाव के कारण स्थानीय नेतृत्व में प्रक्रियात्मक अविश्वास बना हुआ है।

1. लिखित और पारदर्शी ड्राफ्ट का प्रस्तुतीकरण:

केंद्र सरकार को वार्ताओं के दौरान केवल मौखिक चर्चा के बजाय एक स्पष्ट, विस्तृत और लिखित वैधानिक मसौदा (Draft) प्रस्तुत करना चाहिए ताकि अविश्वास दूर हो सके।

2. शक्तियों का स्पष्ट सीमांकन:

उप-राज्यपाल, प्रस्तावित नए विधाई निकाय और मौजूदा हिल काउंसिल्स (LAHDC) के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जाए ताकि प्रशासनिक दोहराव और टकराव से बचा जा सके।

3. स्थानीय जनभावनाओं का समावेश:

छठी अनुसूची के प्रावधानों या उसके समकक्ष सशक्त सुरक्षा उपायों को ‘Sui Generis’ ढांचे में भी इस प्रकार एकीकृत किया जाए कि भूमि और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सके।

4. निरंतर और संस्थागत संवाद:

LAB और KDA जैसे क्षेत्रीय संगठनों के साथ अनिश्चितकालीन अंतराल के बजाय एक समयबद्ध, नियमित और उच्च-स्तरीय संयुक्त समिति के माध्यम से संवाद स्थापित किया जाए।

5. पर्यावरणीय एवं विकासात्मक संतुलन:

स्थानीय युवाओं के रोजगार और नाजुक हिमालई पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए एक संधारणीय (Sustainable) विकास नीति बनाई जाए।

निष्कर्ष:

प्रस्तावित ‘Sui Generis’ मॉडल भारतीय संघवाद की रचनात्मकता का प्रतीक है। हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता केवल शक्तियों के औपचारिक हस्तांतरण पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, स्थानीय संस्थाओं के सशक्तिकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा क्षेत्रीय लोकतंत्र के मध्य एक न्यायसंगत संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करेगी।

1. इस मॉडल के तहत लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत पूर्ण संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

2. यह मॉडल संविधान के अनुच्छेद 371 के दायरे में एक विशिष्ट कानूनी ढांचे के रूप में लद्दाख के लिए प्रस्तावित है, जिसमें विधाई, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां शामिल हैं।

3. इस प्रस्तावित ढांचे के तहत गठित होने वाला UT-स्तरीय निकाय निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से चुना जाएगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

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