भारत के निर्वाचन आयोग में आंतरिक मतभेद और निर्णय लेने की प्रक्रिया

(Internal differences and the decision-making process within the ECI)

GS Paper-2: संवैधानिक निकाय, अनुच्छेद 324, शक्तियों का पृथक्करण, संस्थागत स्वायत्तता।शासन व्यवस्था (Governance): निर्णय लेने की प्रक्रिया, पारदर्शिता, जवाबदेही, आंतरिक लोकतंत्र।

हाल ही में एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि निर्वाचन आयोग के तीन सदस्यों में से दो आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी)  ने पिछले 10 महीनों में महत्वपूर्ण निर्णयों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां (Objections) दर्ज कराई हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कई बड़े और महत्वपूर्ण निर्णय इन दोनों आयुक्तों की जानकारी के बिना, केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त (ज्ञानेश कुमार) के नाम पर लिए जा रहे थे। इसके जवाब में, निर्वाचन आयोग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि आयोग के भीतर भिन्न विचार और टिप्पणियां निर्णय लेने की एक ‘सामान्य मानक प्रक्रिया’ (Standard Practice) का हिस्सा हैं, और आयोग की सभी कार्रवाइयाँ पूरी तरह से कानून सम्मत हैं। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर बहु-सदस्यीय निकाय के भीतर निर्णय लेने की पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र पर बहस छेड़ दी है।

  • संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की सर्वोच्च जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को दी गई है।
  • एक-सदस्यीय से बहु-सदस्यीय निकाय: मूल रूप से 1989 तक यह एक-सदस्यीय निकाय था। लेकिन वर्ष 1993 में इसे स्थायी रूप से एक बहु-सदस्यीय निकाय (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त – CEC और दो निर्वाचन आयुक्त – ECs) में बदल दिया गया।
  • शक्तियों में समानता: उच्चतम न्यायालय ने टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) मामले में स्पष्ट किया था कि CEC और अन्य दोनों ECs की शक्तियां, वेतन और दर्जा बिल्कुल समान हैं। CEC आयोग का केवल प्रशासनिक प्रमुख (समकक्षों में प्रथम – Primus inter pares) होता है, उसके पास अन्य आयुक्तों को ओवररूल करने की कोई विशेष वीटो शक्ति नहीं होती।

1. निर्णय लेने का सिद्धांत:

‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (सशर्त सेवा और कार्य संचालन) अधिनियम’ के तहत आयोग में निर्णय दो तरह से होते हैं:

  • आम सहमति (Consensus): जहां तीनों सदस्य सर्वसम्मति से फैसला लेते हैं।
  • बहुमत का सिद्धांत (Majority Principle): यदि किसी मुद्दे पर आम सहमति न बने, तो निर्णय बहुमत (2:1) के आधार पर लिया जाता है।

2. वर्तमान विवाद के बिंदु :

नवीनतम मीडिया रिपोर्ट और आयोग के स्पष्टीकरण से तीन मुख्य बातें सामने आती हैं:

  • निर्णयों में बाईपास करने का आरोप: यह बात सामने आई कि विशेष रूप से मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (Special Intensive Revision of Electoral Rolls) जैसे संवेदनशील और बड़े फैसले दोनों निर्वाचन आयुक्तों की पूर्ण सहमति या जानकारी के बिना लिए जा रहे थे।
  • तथ्यात्मक आपत्तियां (10 महीने में 14 आपत्तियां): दोनों आयुक्तों (संधू और जोशी) ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित रूप से आपत्ति दर्ज की।
  • सॉफ्टवेयर और केंद्रीकरण पर ‘रेड-फ्लैग’ (Red-Flag on Centralisation): दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीकरण (Centralisation of Electoral Roll Database) पर गंभीर चिंता जताई थी। उनका मानना था कि केंद्रीय सॉफ्टवेयर ग्राउंड-लेवल के मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के निर्णयों को ओवरराइड कर रहा है, जिससे पात्र मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।

आयोग ने इन मतभेदों को स्वीकार करते हुए इसे संस्था की मजबूती बताया:

  • आयोग के अनुसार, लिखित नोट्स और आंतरिक ‘चेक-एंड-बैलेंस’ उसकी मानक प्रक्रिया है।
  • विविधतापूर्ण विचार (Differing Views) किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में निर्णय लेने से पहले की एक सामान्य और स्वस्थ प्रक्रिया है।
  • आयोग ने स्पष्ट किया कि पिछले एक वर्ष में लिए गए अधिकांश बड़े नीतिगत निर्णय और लगभग 40 नए चुनावी सुधार सर्वसम्मति से ही लागू किए गए हैं।

पारदर्शिता के पक्ष में तर्क (Arguments for Recording Dissent):

  • संस्थागत विश्वसनीयता (Institutional Credibility): यदि किसी संवेदनशील निर्णय में आयुक्तों के बीच असहमति है, तो उसे रिकॉर्ड पर लाना जनता का संस्था पर विश्वास बढ़ाता है। यह दर्शाता है कि निर्णय किसी राजनीतिक या एकतरफा दबाव में नहीं, बल्कि गहन मंथन के बाद लिए गए हैं।
  • न्यायिक मिसालें: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भी अपने फैसलों में अल्पमत के विचार (Dissenting Judgments) लिखते हैं। निर्वाचन आयोग को भी इस स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का पालन करना चाहिए और अल्पमत के विचारों (Dissent Notes) को अंतिम आदेश में शामिल करना चाहिए।

गोपनीयता के पक्ष में तर्क (Arguments for Confidentiality):

  • संस्था की छवि पर प्रभाव: चुनाव के संवेदनशील समय में आयोग के भीतर की असहमति यदि गलत तरीके से बाहर आती है, तो राजनीतिक दलों द्वारा पूरी चुनाव प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
  • प्रशासनिक दक्षता: एक प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक निकाय होने के नाते, आयोग को त्वरित निर्णय लेने होते हैं। हर आंतरिक विमर्श को सार्वजनिक करने से प्रशासनिक कामकाज में शिथिलता आ सकती है।

निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ी अन्य संस्थागत चुनौतियाँ

  • नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्य अवधि) अधिनियम, 2023 के तहत बनी चयन समिति में कार्यपालिका (प्रधानमंत्री और एक कैबिनेट मंत्री) का बहुमत है। इससे यह आशंका बनी रहती है कि नियुक्त सदस्य स्वतंत्र रूप से कार्यपालिका के खिलाफ निर्णय ले पाएंगे या नहीं।
  • कार्यकाल की सुरक्षा में असमानता: संविधान केवल CEC को हटाने के लिए महाभियोग जैसी सुरक्षा देता है, जबकि अन्य दो ECs को CEC की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। यह असमानता आयोग के भीतर पदानुक्रम (Hierarchy) पैदा करती है और अन्य आयुक्तों को स्वतंत्र रुख अपनाने से रोक सकती है।
  • लिखित प्रक्रियाओं का दस्तावेज़ीकरण (Formal Rules for Dissent): निर्वाचन आयोग को एक स्पष्ट और पारदर्शी नियमावली बनानी चाहिए। यदि कोई आयुक्त किसी बड़े फैसले पर असहमत है, तो उसके ‘डिसेंट नोट’ को आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, जैसा कि न्यायपालिका में होता है।
  • संवैधानिक और संस्थागत समानता: विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट के अनुसार, तीनों आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया एक समान होनी चाहिए ताकि तीनों बिना किसी असुरक्षा की भावना के पूरी स्वतंत्रता से निर्णय ले सकें।
  • केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण का संतुलन: हालिया विवाद (ERO के अधिकारों को सॉफ्टवेयर द्वारा ओवरराइड करना) को देखते हुए तकनीक का उपयोग पारदर्शी होना चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म (जैसे ECINet) को सुरक्षित रखते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह जमीनी स्तर के अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों को कमजोर न करे।

भारत का निर्वाचन आयोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का वास्तविक प्रहरी है। हालिया विवाद में 10 महीनों में दर्ज की गई 14 आपत्तियां यह दर्शाती हैं कि आयोग के भीतर आंतरिक विमर्श और ‘चेक-एंड-बैलेंस’ की प्रक्रिया अभी भी जीवित है, जो कि एक अच्छा संकेत है। हालांकि, आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि आंतरिक निर्णय लेने की यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। आयोग की असली ताकत केवल सुचारू रूप से चुनाव संपन्न कराने में नहीं, बल्कि अपनी अखंड निष्पक्षता (Impeccable Neutrality) और संस्थागत पारदर्शिता को बनाए रखने में है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC Mains Practice Question):

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