पश्चिमी घाट संरक्षण: पारिस्थितिक सुरक्षा बनाम स्थानीय आजीविका का द्वंद्व
संदर्भ
कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट एक विकास-समर्थक दृष्टिकोण रखती है जो पश्चिमी घाटों में मानवीय बस्तियों और कुछ आर्थिक गतिविधियों की अनुमति देती है, फिर भी कर्नाटक विधानसभा ने इसकी सिफारिशों को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया है। रिपोर्ट के विरोध का मुख्य कारण 2012 के उपग्रह डेटा की सटीकता पर संदेह, राजस्व गांवों को पूरी तरह से पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) में शामिल करने के नियम, तथा खनन जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध के चलते विस्थापन और आजीविका का डर है। जहां अन्य राज्य (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु) केंद्र के साथ इस दिशा में समझौते या आंशिक संशोधन की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं कर्नाटक के लिए बिना किसी ठोस विकल्प के इस फ्रेमवर्क को पूरी तरह नकारना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है।
यूपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए महत्व
उत्तर
पश्चिमी घाट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जैव-विविधता हॉटस्पॉट में से एक हैं। इनके संरक्षण के लिए गठित कस्तूरीरंगन समिति ने क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की थी। हालांकि, यह रिपोर्ट पर्यावरण संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती है, फिर भी राज्यों के स्तर पर इसके कार्यान्वयन को लेकर गंभीर विरोध देखने को मिला है।
पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। कर्नाटक सरकार और केंद्र को चाहिए कि वे टकराव की स्थिति को छोड़कर किसानों और श्रमिकों की चिंताओं को दूर करें तथा एक व्यावहारिक व समावेशी विकल्प तैयार करें, जिससे पश्चिमी घाट का दीर्घकालिक संरक्षण भी सुनिश्चित हो और नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।

