| UPSC पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (GS Paper 2): महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएं और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश। मुख्य परीक्षा विषय: संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधार, सुरक्षा परिषद (UNSC) का विस्तार और वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व। |
चर्चा में क्यों ?
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र की हालिया चर्चाओं ने वैश्विक शांति और सुरक्षा के स्तंभ के रूप में स्थापित इस संस्था के अस्तित्व पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। इस वर्ष की केंद्रीय थीम—”विश्वास की बहाली, परिवर्तन का प्रबंधन: सभी के लिए परिणाम देने वाला एक संयुक्त राष्ट्र”—यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करती है कि वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रति दुनिया का भरोसा बड़े पैमाने पर खंडित हुआ है। समकालीन भू-राजनीतिक संघर्षों (जैसे यूक्रेन, गाजा और ईरान) को रोकने में यूएन की असमर्थता के बीच यह विषय आत्मनिरीक्षण की मांग करता है।

विश्वास में कमी के मुख्य कारण
- सुरक्षा परिषद (UNSC) का गतिरोध: पांच स्थायी सदस्यों (P5) के पास मौजूद वीटो पावर (Vito Power) ने सुरक्षा परिषद को एक पंगु संस्था बना दिया है। जब भी किसी स्थायी सदस्य या उसके सहयोगी का भू-राजनीतिक हित प्रभावित होता है, तो वीटो का उपयोग कर पूरे वैश्विक निर्णय को रोक दिया जाता है। यूक्रेन और गाजा संकट इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
- वैश्विक दक्षिण का कम प्रतिनिधित्व: वर्तमान यूएन ढांचा 1945 के उत्तर-द्वितीय विश्व युद्ध की भू-राजनीति को दर्शाता है। इसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और भारत जैसे विशाल जनसांख्यिकी और आर्थिक शक्ति वाले क्षेत्रों को सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जिससे विकासशील देशों का इस पर से भरोसा उठ रहा है।
- बहुपक्षवाद (Multilateralism) का पतन: महाशक्तियां अब संयुक्त राष्ट्र के मंच के बजाय अपनी सुविधानुसार क्वाड (QUAD), ब्रिक्स (BRICS), या जी-20 (G20) जैसे वैकल्पिक मंचों या द्विपक्षीय समझौतों को प्राथमिकता दे रही हैं। इससे वैश्विक स्तर पर सामूहिक निर्णय लेने की यूएन की क्षमता कमजोर हुई है।
- वित्तीय निर्भरता: यूएन का बजट कुछ अमीर देशों के योगदान पर अत्यधिक निर्भर है। यह वित्तीय निर्भरता अक्सर यूएन की एजेंसियों को निष्पक्ष रूप से काम करने से रोकती है या उनके एजेंडे को प्रभावित करती है।
- शांति स्थापना का सिकुड़ता दायरा: मानवीय मोर्चे पर सराहनीय कार्य करते हुए यूएन ने दुनिया की 1.1% आबादी यानी 98 मिलियन (9.8 करोड़) लोगों को सुरक्षा और सहायता पहुंचाई है, परंतु मुख्य दायित्व ‘शांति स्थापना’ में यह पिछड़ गया है। युद्धों में यह केवल ‘सामरिक हस्तक्षेप’ (जैसे काला सागर से अनाज निर्यात चालू रखना या लाल सागर में तेल रिसाव रोकना) तक सीमित रह गया है। शांति स्थापना की पूरी प्रक्रिया शीर्ष नौकरशाही के हाथों में अत्यधिक केंद्रीकृत हो चुकी है, जिससे यह जमीन पर अप्रभावी साबित हो रही है।
विश्वास में कमी से सम्बंधित सर्वे और डेटा
- एडेलमैन ट्रस्ट और प्यू सर्वे: पिछले वर्ष आए इन दोनों वैश्विक सर्वेक्षणों से स्पष्ट हुआ है कि वैश्विक नागरिकों के बीच संयुक्त राष्ट्र के प्रति विश्वास और अनुकूलता में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
- यूएन फाउंडेशन पोल: इस हालिया पोल के अनुसार, 52% उत्तरदाता मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र अपने वादों और परिणामों को देने में संघर्ष कर रहा है तथा इसमें गहरे संरचनात्मक सुधार की तत्काल आवश्यकता है। आधे से अधिक का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लागू करने और मानवाधिकारों की रक्षा में विफल रहा है तथा इस पर कुछ चुनिंदा शक्तिशाली देशों का वर्चस्व है।
- रॉकफेलर फाउंडेशन और फोकडेटा सर्वे: इसके अनुसार केवल 58% लोग ही यह मानते हैं कि यूएन वैश्विक समस्याओं के समाधान के प्रयासों का नेतृत्व कर सकता है, जो इस संस्था के इतिहास का संभवतः सबसे निचला स्तर है।
संस्थागत संकट के मुख्य कारण
- सुरक्षा परिषद (UNSC) का गतिरोध और वीटो का दुरुपयोग: सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (P5) के बीच का आपसी भू-राजनीतिक गतिरोध पूरी संस्था की साख को समाप्त कर रहा है। हालांकि, जवाबदेही तय करने के लिए पूर्व में महासभा द्वारा एक प्रस्ताव (A/76/262) पारित किया गया था, जिसके तहत वीटो का उपयोग करने वाले स्थायी सदस्य को महासभा के सामने आकर इसका कारण स्पष्ट करना अनिवार्य है। परंतु, व्यावहारिक धरातल पर इसका कोई ठोस प्रभाव नहीं दिखा है और वीटो का राजनीतिक दुरुपयोग बदस्तूर जारी है।
- आंतरिक प्रक्रियाओं और सत्यनिष्ठा का अभाव: संयुक्त राष्ट्र की आंतरिक नियुक्तियों, खरीद और संसाधनों के आवंटन की प्रणालियों पर लगातार गंभीर सवाल उठते रहे हैं। पूर्व में अफगानिस्तान में हुआ खरीद घोटाला, शांति सैनिकों (Peacekeepers) द्वारा यौन शोषण और दुर्व्यवहार के मामले, तथा घाना और भारत में गैर-मौजूद आवास परियोजनाओं के अनुबंधों से जुड़े भ्रष्टाचार इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। सबसे बड़ी कमी यह है कि इन मामलों में जवाबदेही प्रणालियों को दुरुस्त करने के बजाय दोष केवल व्यक्तिगत स्तर पर मढ़कर संस्थागत कमियों को छिपा दिया जाता है।
- वित्तीय शक्ति का अनुचित प्रभाव: कुछ अमीर देश अपने भारी वित्तीय योगदान और अतिरिक्त बजटीय अनुदान के बल पर पूरे यूएन सिस्टम की नीतियों को प्रभावित करते हैं। वे अपने नागरिकों को यूएन के शीर्ष व तकनीकी पदों पर नियुक्त कराने के लिए दबाव डालते हैं। स्थिति यह है कि एक विशिष्ट यूएन एजेंसी में आठ में से सात तकनीकी विशेषज्ञ केवल एक ही देश की सरकार द्वारा वित्तपोषित पाए गए। ऐसी स्थिति में इन विशेषज्ञों द्वारा लाभार्थी देशों को सुझाई गई नीतियों की निष्पक्षता और तटस्थता संदिग्ध हो जाती है। इसके अतिरिक्त, यूएन विकास प्रणाली अपने खर्चों की पारदर्शिता को केवल दाता सरकारों तक सीमित रखती है, जिससे सार्वजनिक जवाबदेही खत्म होती है।
- वैश्विक दक्षिण (Global South)की उपेक्षा और प्रशासनिक असंतुलन
- यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश मानवीय और विकास कार्यक्रम ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील और अल्पविकसित देशों) में संचालित होते हैं, लेकिन निर्णय लेने वाली शीर्ष संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है।
- दुनिया की 84% आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले विकासशील देशों के पास यूएन की नागरिक सेवा के नेतृत्व वाले पदों की केवल 44% हिस्सेदारी है।
- अफ्रीका में होने वाले यूएन ऑपरेशन्स के नेतृत्व में से केवल एक-तिहाई ही अफ्रीकी मूल के लोग हैं।
- वैश्विक स्तर पर यूएन की संस्थाओं के मुख्यालयों में से केवल दो-पाँचवां हिस्सा ही वैश्विक दक्षिण के शहरों में स्थित है।
- लागत में कटौती के नाम पर जब न्यूयॉर्क और जिनेवा से हजारों पदों को बाहर स्थानांतरित किया गया, तब भी लागत लाभ के बावजूद वैश्विक दक्षिण के शहरों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।
आगे की राह
संयुक्त राष्ट्र को यदि अपनी प्रासंगिकता और साख को बचाना है, तो उसे तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
- सुरक्षा परिषद का विस्तार: भारत जैसी उभरती शक्तियों के साथ-साथ अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व देकर 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप लोकतांत्रिक बनाना होगा।
- वित्तीय लोकतांत्रीकरण: वैश्विक नीतियों को किसी एक दाता देश के अनुचित प्रभाव से मुक्त रखने के लिए बजटीय स्रोतों में विविधता और पारदर्शिता लाना अनिवार्य है।
- प्रशासनिक संतुलन और विकेंद्रीकरण: आबादी और आवश्यकताओं के अनुपात में वैश्विक दक्षिण को शीर्ष पदों, निर्णयों और मुख्यालयों के निर्धारण में न्यायसंगत हिस्सेदारी दी जानी चाहिए।
- शांति स्थापना का पुनरुद्धार: मध्यस्थता और शांति स्थापना की पहलों को शीर्ष नौकरशाही के चंगुल से निकालकर अधिक व्यावहारिक और धरातली बनाना होगा।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र केवल एक अंतर-सरकारी संगठन या सदस्य सरकारों का मंच नहीं है; यह मानवता की सामूहिक उम्मीदों और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का प्रतीक है। महासभा के 81वें सत्र की थीम के अनुसार वास्तविक ‘परिवर्तन’ और लक्ष्यों की प्राप्ति तभी संभव है, जब इसकी शुरुआत पूरी निष्पक्षता के साथ प्रशासनिक, वित्तीय और संरचनात्मक स्तर पर विश्वास बहाली से की जाए। यदि समय रहते यूएन के ढांचे में सुधार नहीं किए गए, तो यह संस्था भी इतिहास की पूर्ववर्ती असफल संस्थाओं की तरह अप्रासंगिक हो जाएगी।
