भारत के वन्यजीव संरक्षण में नई उम्मीद: सफलताएं, चुनौतियां और भविष्य की राह (New Hope for Wildlife Conservation in India: Successes, Challenges, and the Way Forward)

चर्चा में क्यों?
हाल ही में अक्टूबर 2025 में अबू धाबी में आयोजित IUCN विश्व संरक्षण कांग्रेस (World Conservation Congress) में भारत ने अपनी महत्वाकांक्षी “नेशनल रेड लिस्ट रोडमैप विजन 2025-2030″ लॉन्च की। यह कदम वैश्विक स्तर पर जैव-विविधता के संरक्षण और लुप्तप्राय प्रजातियों को विलुप्ति की कगार से वापस लाने की भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
वैश्विक परिदृश्य और भारत की स्थिति
- जैव-विविधता का महा-केंद्र (Megadiverse Nation): भारत दुनिया के मात्र 2.4% भू-भाग पर स्थित है, लेकिन यह दुनिया की लगभग 8% पौधों और 7.5% पशु प्रजातियों को आश्रय देता है। यह दुनिया के 17 ‘मेगा-डाइवर्स’ देशों में से एक है।
- हॉटस्पॉट और उच्च स्थानिकता (High Endemism): विश्व के 36 वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट में से 4 हॉटस्पॉट (हिमालय, पश्चिमी घाट, भारत-म्यांमार क्षेत्र और सुंडालैंड) का हिस्सा भारत में आता है। भारत की लगभग 28% वनस्पतियां और 30% से अधिक जंतु प्रजातियां स्थानिक हैं, जो दुनिया में कहीं और नहीं पाई जातीं।
- डेटा अंतराल (The Data Gap): वैश्विक स्तर पर IUCN की रेड लिस्ट में वर्तमान में भारत की केवल 7.2% प्रलेखित जंतु प्रजातियों को ही शामिल किया गया है। भारत के आकलित 7,516 जंतुओं में से 1,012 प्रजातियां वर्तमान में संकटग्रस्त श्रेणी में हैं, जो नीतिगत सुधारों की मांग करती हैं।
प्रजाति-विशिष्ट सफलताएं (Species-Specific Success Stories)
| क्र.सं. | प्रजाति (Species) | प्राथमिक आवास (Primary Habitat) | हालिया वैज्ञानिक डेटा, प्रगति एवं प्रमुख सफलताएं |
| 1. | बाघ (Royal Bengal Tiger) | मध्य भारत, पश्चिमी घाट, सुंदरवन और पूर्वोत्तर के जंगल | ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के सफल कार्यान्वयन से भारत में बाघों की संख्या 3,167 या उससे अधिक हो चुकी है। भारत ने वैश्विक ‘सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा’ के लक्ष्य को समय से पहले पूरा कर दुनिया की 75% बाघ आबादी को सुरक्षित किया है। |
| 2. | एशियाई शेर (Asiatic Lion) | गिर राष्ट्रीय उद्यान और सौराष्ट्र क्षेत्र, गुजरात | स्थानीय समुदायों (मालधारियों) के सहयोग से शेरों की आबादी 674 (2020) से बढ़कर 891 (2025) हो गई है। इनके वितरण क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। |
| 3. | हिम तेंदुआ (Snow Leopard) | उच्च हिमालयी क्षेत्र (लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम) | वर्ष 2024 में जारी पहले वैज्ञानिक आकलन के अनुसार भारत में कुल 718 स्नो लेपर्ड होने का अनुमान है, जो इस शर्मीले जीव के संरक्षण की नई उम्मीद है। |
| 4. | डगोंग / समुद्री गाय | मन्नार की खाड़ी, पाल्क बे (तमिलनाडु), अंडमान और कच्छ की खाड़ी | तमिलनाडु ने पाल्क बे में 448.34 वर्ग किमी का भारत का पहला डगोंग संरक्षण रिजर्व स्थापित किया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के 2026 के आकलन के अनुसार कुल 270 डगोंग दर्ज हैं (158 पाल्क बे और 112 मन्नार की खाड़ी में)। |
| 5. | एक सींग वाला गैंडा (Greater One-Horned Rhino) | काजीरंगा, मानस और पोबितोरा वन्यजीव अभ्यारण्य (असम) | सफल ‘इंडियन राइनो विजन’ के तहत असम में इनकी संख्या 3,000 से अधिक हो चुकी है। पोबितोरा अभ्यारण्य में वर्तमान में दुनिया का सबसे सघन गैंडा घनत्व दर्ज है। |
| 6. | ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) | थार मरुस्थल (राजस्थान) और कच्छ (गुजरात) | विलुप्ति के कगार पर खड़े (Critically Endangered) इस पक्षी के कृत्रिम संरक्षण और प्राकृतिक आवास सुधार के प्रयासों के तहत हाल ही में कच्छ में एक नए चूजे का जन्म हुआ है। |
| 7. | चीता (African Cheetah) | कुनो राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश | वर्ष 1952 में देश से विलुप्त घोषित होने के बाद, ‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाकर पुनर्वासित किया गया। यह दुनिया का पहला अंतर-महाद्वीपीय बड़े मांसाहारी जीव का स्थानांतरण कार्यक्रम है। |
| 8. | ग्रेटर वन-हार्न राइनो (गेंडा) | पोबितोरा वन्यजीव अभ्यारण्य (असम) | घास के मैदानों के प्रबंधन, आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण और अवैध शिकार विरोधी कड़े उपायों के कारण यहाँ दुनिया का सबसे सघन गैंडा घनत्व स्थापित हुआ है। |
संरक्षण के केस स्टडीज: सफल मॉडल
- किब्बर का कम्युनिटी-लेड मॉडल (हिमाचल प्रदेश): हिमाचल प्रदेश के उच्च ऊंचाई वाले किब्बर क्षेत्र में स्थानीय विलेज कौंसिल और महिलाओं ने ‘स्नो लेपर्ड ट्रस्ट’ और ‘नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ के साथ भागीदारी की। ग्रामीणों द्वारा स्वयं कैमरा ट्रैप लगाने, पशुधन बीमा योजना चलाने और वन्यजीवों की निगरानी करने से हिम तेंदुओं के शिकार में भारी कमी आई है।
- तमिलनाडु का नीलगिरि तहर प्रोजेक्ट: तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य पशु के संरक्षण के लिए एक समर्पित परियोजना शुरू की है। इसमें भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के साथ मिलकर रेडियो-कॉलरिंग, सिंक्रोनाइज्ड सर्वे और ड्रोन आधारित आवास मूल्यांकन को शामिल किया गया है, जो वैज्ञानिक संरक्षण का एक बेहतरीन उदाहरण है।
- पिंजौर गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र (हरियाणा): मवेशियों को दी जाने वाली ‘डाइक्लोफेनाक’ दवा के कारण देश के 99% गिद्ध खत्म हो चुके थे। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) और वन विभाग द्वारा संचालित पिंजौर केंद्र के प्रयासों से गिद्धों की आबादी में सुधार हुआ है। इसके कारण मध्य प्रदेश के 2025 के सर्वेक्षण में 12,981 गिद्ध रिकॉर्ड किए गए।
- मेघालय का क्लाउडेड लेपर्ड परिदृश्य दृष्टिकोण: मेघालय में इस अत्यंत दुर्लभ तेंदुए के संरक्षण के लिए किसी एकल पार्क के बजाय 14 प्राथमिकता वाले परिदृश्यों (Priority Landscapes) की पहचान की गई है, जिससे जंगलों के बीच विखंडित हो चुके गलियारों (Corridors) को आपस में जोड़ा जा सके।
प्रमुख चुनौतियां
- मानव-वन्यजीव संघर्ष: विकास और शहरीकरण के कारण वन्यजीव गलियारे (Corridors) टूट रहे हैं। हाथी और बाघ भोजन-पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं, जिससे प्रतिवर्ष सैकड़ों इंसानों और वन्यजीवों की असमय मृत्यु होती है।
- रैखिक बुनियादी ढांचा: जंगलों के बीच से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे ट्रैक और हाई-टेंशन बिजली के तार वन्यजीवों के लिए बड़े खतरे बन चुके हैं। असम और उत्तराखंड जैसे राज्यों में ट्रेनों से कटकर हाथियों की मौत इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- संरक्षण में वित्तीय असमानता: बाघ, हाथी और शेर जैसे ‘अम्ब्रेला स्पेशीज’ (बड़ी प्रजातियों) को तो पर्याप्त राजनीतिक और वित्तीय समर्थन मिल जाता है, परंतु पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण छोटे जीव (जैसे पैंगोलिन, मद्रास हेजहॉग, लॉयन-टेल्ड मकाक) फंड और संसाधनों के गंभीर संकट से जूझते हैं।
- जलवायु परिवर्तन और विदेशी आक्रामक प्रजातियां: दावानल (Forest Fires) और मौसम के बदलते चक्र से जंगलों के जलस्रोत सूख रहे हैं। साथ ही, ‘लैंटाना कैमारा’ और ‘प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा’ जैसी विदेशी आक्रामक खरपतवार स्थानीय चारागाहों को नष्ट कर रही हैं, जिससे शाकाहारी जीवों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया है।
भारत सरकार द्वारा किए जा रहे अन्य प्रमुख प्रयास
- संवैधानिक संरक्षण: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A (राज्य के नीति निदेशक तत्व) राज्य को पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करने का निर्देश देता है। वहीं, अनुच्छेद 51A(g) के तहत वन्यजीवों के प्रति दयाभाव रखना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।
- वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022: इस कानून के माध्यम से ‘साइट्स’ (CITES) के प्रावधानों को भारत में कड़ाई से लागू किया गया है। लुप्तप्राय प्रजातियों के अवैध व्यापार पर जुर्माने की राशि को बढ़ाकर विधिक तंत्र को और मजबूत किया गया है।
- वन्यजीव आवासों का एकीकृत विकास (IDWH): इस केंद्रीय योजना के तहत देश के राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें विशेष रूप से 24 चिन्हित रिकवरी प्रजातियों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व: भारत ने वैश्विक स्तर पर बाघों और अन्य सात बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) की शुरुआत की है, जो भारत की सॉफ्ट-पावर को प्रदर्शित करता है।
आगे की राह (Way Forward)
- ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर का अनिवार्य निर्माण: देश में भविष्य की सभी रैखिक परियोजनाओं में इको-डक्ट्स (Eco-ducts) और ओवरपास/underpass का निर्माण अनिवार्य होना चाहिए, जैसा कि नागपुर-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) पर पेंच टाइगर रिजर्व के पास सफलतापूर्वक किया गया है।
- डेटा-संचालित नीतियां: ‘विजन 2030’ के तहत भारत को अपनी सभी स्थानिक और कम चर्चित प्रजातियों के लिए स्पष्ट समय-सीमा और मापने योग्य परिणामों के साथ डिजिटल मैपिंग करनी होगी।
- फ्रंटलाइन स्टाफ का तकनीकी सशक्तिकरण: वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों को केवल पारंपरिक गश्त तक सीमित न रखकर उन्हें जेनेटिक विश्लेषण, आधुनिक जीपीएस ट्रैकिंग और एआई-संचालित कैमरा ट्रैप के संचालन का उन्नत प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
- स्थानीय समुदायों को वित्तीय प्रोत्साहन: यदि मछुआरे डगोंग को बचाने के लिए अपने कीमती जालों को काटते हैं, तो उन्हें तत्काल और पारदर्शी रूप से मुआवजा मिलना चाहिए। स्थानीय लोगों को इको-टूरिज्म के लाभांश में भागीदार बनाकर ही दीर्घकालिक संरक्षण संभव है।
निष्कर्ष
भारत में वन्यजीवों का “विलुप्ति की कगार से वापसी” (From Brink to Comeback) का सफर यह साबित करता है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, आधुनिक विज्ञान और स्थानीय सामुदायिक सहभागिता का त्रिकोण किसी भी लुप्तप्राय प्रजाति को जीवनदान दे सकता है। वर्तमान समय की मांग ‘विकास बनाम संरक्षण’ के पुराने ढर्रे को छोड़कर ‘विकास के साथ संरक्षण’ के प्रतिमान को अपनाने की है, ताकि देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ हमारी अमूल्य प्राकृतिक विरासत भी अक्षुण्ण बनी रहे।