पराली संकट: कारण, प्रभाव और समाधान (Stubble Crisis: Causes, Impact, and Solutions)
पराली संकट: कारण, प्रभाव और समाधान
Stubble Crisis: Causes, Impact, and Solutions
Source: The Hindu
संदर्भ
यह आलेख इस बात की गहराई से पड़ताल करता है कि उत्तर भारत में तमाम कानूनी प्रतिबंधों, उड़न दस्तों और भारी-भरकम मशीनरी के बावजूद पराली जलाने की घटनाएं क्यों कम नहीं हो रही हैं। इसके मूल कारणों में धान-गेहूं का फसल चक्र, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खरीद नीतियों द्वारा इन दोनों फसलों को दिया जाने वाला अत्यधिक संरक्षण, भूजल का तेजी से गिरता स्तर, और कटाई तथा अगली बुवाई के बीच बहुत कम समय का होना शामिल है। इसके अलावा, उपग्रह आधारित निगरानी प्रणालियों की सीमाओं के कारण वास्तविक आंकड़ों के आकलन में भी भिन्नता पाई गई है।
संघ लोक सेवा आयोग के लिए सीख
- पर्यावरण और प्रदूषण (Environment & Pollution): वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का गिरना, पार्टिकु लेट मैटर (PM), कार्बन मोनोऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) का उत्सर्जन तथा मानव स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव।
- कृषि अर्थव्यवस्था (Agricultural Economics): MSP आधारित खरीद नीति, धान-गेहूं के फसल चक्र पर अत्यधिक निर्भरता, और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) की आवश्यकता।
- संसाधन प्रबंधन (Resource Management): भूजल संरक्षण कानून, इन-सीटू और एक्स-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन तकनीकें और उनकी आर्थिक व्यवहार्यता।
- प्रशासनिक और तकनीकी चुनौतियां (Administrative & Technical Challenges): उपग्रह आधारित निगरानी की सीमाएं और डेटा सटीकता।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
Q. “पराली जलाना केवल एक कृषि या तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह विकृत आर्थिक प्रोत्साहनों और बाजार की नीतियों का परिणाम है।” इस कथन के आलोक में फसल अवशेष प्रबंधन की चुनौतियों का विश्लेषण करें और इस जटिल समस्या के स्थायी समाधान हेतु आधुनिक तकनीकी तथा नीतिगत उपायों का सुझाव दें।
Answer Format
- भूमिका (Introduction): पराली जलाने की परिघटना को परिभाषित करें और उत्तर भारत में शरद ऋतु के दौरान उत्पन्न होने वाले गंभीर वायु प्रदूषण संकट से परिचय कराएं।
- मुख्य भाग (Body):
- आर्थिक और नीतिगत कारण: धान-गेहूं के चक्र को बढ़ावा देने वाली MSP नीति और मुफ्त बिजली।
- तकनीकी व व्यावहारिक बाधाएं: इन-सीटू और एक्स-सीटू प्रबंधन में आने वाली भारी लागत और समय का अभाव।
- पर्यावरणीय और प्रशासनिक प्रभाव: भूजल स्तर में भारी गिरावट और निगरानी प्रणालियों की सीमाएं।
- आधुनिक तकनीकों एवं समाधानों की भूमिका: सटीक उपग्रह निगरानी, सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, और फसल विविधीकरण हेतु वित्तीय प्रोत्साहन।
- निष्कर्ष: बहुआयामी दृष्टिकोण (कानूनी सख्ती, आर्थिक प्रोत्साहन और तकनीकी एकीकरण) के साथ एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
भूमिका
पराली जलाना भारत के उत्तरी मैदानों में धान कटाई के बाद उत्पन्न होने वाली एक आवर्ती मौसमी समस्या है। यह मुख्य रूप से धान-गेहूं के फसल चक्र, संकीर्ण फसल खिड़की और असंतुलित आर्थिक प्रोत्साहनों का परिणाम है। यह न केवल दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, बल्कि मृदा के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी एक गंभीर खतरा है।
पराली (Stubble) क्या होती है और यह समस्या किन राज्यों में है:
- पराली क्या है: धान की कटाई के बाद खेतों में पौधों का जो निचला हिस्सा (डंठल और अवशेष) शेष बच जाता है, उसे पराली कहा जाता है। कम्बाइन हार्वेस्टर से कटाई के बाद यह समस्या और बढ़ जाती है क्योंकि वे पौधे का एक बड़ा हिस्सा खेत में ही छोड़ देते हैं।
- उदाहरण: पंजाब (जैसे अमृतसर के बाहरी इलाके ) और हरियाणा में धान की कटाई के बाद किसान खेतों में बड़े पैमाने पर अवशेष जलाते हैं। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से भी इस परिघटना से प्रमुख रूप से प्रभावित हैं।
पराली जलाने की वजह:
- फसल चक्र और समय की कमी: धान की पछेती किस्मों (जैसे पूसा-44 जो 150-160 दिन लेती है) की कटाई और अगली रबी फसल की बुवाई के बीच केवल 10-15 दिन का बेहद कम समय मिलता है।
- MSP आधारित संरक्षण: भारत में धान और गेहूं की खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी के कारण किसान सुरक्षित बाजार चाहते हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब और हरियाणा में 2012 से 2024 के बीच कुल उत्पादन का लगभग 37 प्रतिशत धान उत्पादन हुआ, जबकि राष्ट्रीय औसत केवल 30 प्रतिशत था।
- मुफ्त बिजली और भूजल दोहन: कृषि क्षेत्र में मुफ्त या बेहद सस्ती बिजली मिलने से किसानों को पानी खींचने की छूट मिलती है, जिससे जल-सघन धान की खेती को लगातार बढ़ावा मिलता है।
- कम्बाइन हार्वेस्टर का उपयोग: हाथ से कटाई श्रम-प्रधान और महंगी होने के कारण किसान कम्बाइन हार्वेस्टर का उपयोग करते हैं। ये मशीनें फसल का निचला हिस्सा खेत में ही छोड़ जाती हैं, जिससे मजबूरी में पराली जलानी पड़ती है।
- मशीनरी और परिवहन लागत की बाधा: हैप्पी सीडर या सुपर सीडर चलाने के लिए 60-हॉर्सपावर (HP) के महंगे ट्रैक्टर की जरूरत होती है और एक एकड़ की कटाई में 10,000 रुपये तक खर्च आते हैं। वहीं एक्स-सीटू उपायों में भी 1,500 से 2,500 रुपये प्रति एकड़ का भारी खर्च आता है।
इससे होने वाले नुकसान:
- पर्यावरण एवं वायु गुणवत्ता: जलने से पार्टिकु लेट मैटर (PM), कार्बन मोनोऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) निकलते हैं। इससे दिल्ली और उत्तर भारत का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है।
- मानव स्वास्थ्य: इस जहरीले धुएं के कारण उत्तर भारत के नागरिकों में गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां और आंखों में जलन जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- मृदा स्वास्थ्य: आग की गर्मी से मिट्टी की ऊपरी परत का तापमान बढ़ने से नाइट्रोजन, सल्फर, पोटाश और फास्फोरस जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
- जल संकट: नासा के जीआरएसीई (GRACE) उपग्रह के आंकड़ों के अनुसार, 2002 से 2008 के बीच केवल पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में 109 क्यूबिक किलोमीटर भूजल समाप्त हो गया था, जो दुनिया में सबसे तेज भूजल गिरावट में से एक है।
आगे की राह (तकनीकी समाधान):
- उन्नत इन-सीटू मशीनरी: किसानों को हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और रोटावेटर जैसी मशीनरी के लिए वित्तीय सहायता (जैसे हरियाणा सरकार द्वारा ₹4,000 प्रति एकड़ सीडिंग प्रोत्साहन या ₹1,000 प्रति एकड़ CRM प्रोत्साहन) प्रदान करना।
- फसल विविधीकरण: किसानों को धान की जगह मक्का या अन्य कम पानी की खपत वाली फसलें उगाने के लिए आर्थिक पैकेज देना।
- एक्स-सीटू उद्योगों का विस्तार: पराली का उपयोग संपीड़ित बायोगैस (CBG) प्लांट्स और बायो-इथेनॉल इकाइयों में ईंधन के रूप में करना।
- सटीक निगरानी तकनीक: केवल पारंपरिक ध्रुवीय उपग्रहों के बजाय भू-स्थिर उपग्रहों (geostationary satellites) के हाइब्रिड डेटा मॉडल का उपयोग करना, क्योंकि इसरो के अध्ययन बताते हैं कि शाम के समय जलने वाली आग ध्रुवीय उपग्रहों की नजर से छूट जाती है।
निष्कर्ष
पराली जलाने की समस्या का कोई एकल समाधान नहीं है। इसके लिए दंडात्मक उपायों के साथ-साथ आर्थिक विसंगतियों को दूर करने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और आधुनिक तकनीकी हस्तक्षेपों (जैसे उन्नत मशीनरी और हाइब्रिड उपग्रह निगरानी) को अपनाने की आवश्यकता है। टिकाऊ कृषि की ओर बढ़ने के लिए किसानों को मजबूत वित्तीय प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता देना ही एकमात्र दीर्घकालिक समाधान है।
अभ्यास प्रश्न
Q.भारत में फसल अवशेष प्रबंधन और पराली जलाने की समस्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- ‘इन-सीटू’ (In-situ) प्रबंधन के अंतर्गत हैप्पी सीडर और सुपर सीडर जैसी मशीनों का उपयोग करके खेतों में ही पराली का प्रबंधन किया जाता है।
- वर्तमान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खरीद नीतियां फसल विविधीकरण को अत्यधिक प्रोत्साहित करती हैं।
- भू-स्थिर उपग्रहों के उपयोग से ध्रुवीय उपग्रहों की तुलना में पराली जलाने की घटनाओं के समय का अधिक सटीक आकलन संभव हुआ है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?