☎
9235313184 9235446806 • Help & Enquiries
Home › Editorial Corner Hindi› सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश में 34% BC आरक्षण की मांग वाली…
Editorial Corner Hindi

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश में 34% BC आरक्षण की मांग वाली याचिका खारिज की (The Supreme Court dismissed a petition seeking 34% BC reservation in Andhra Pradesh.)

By Result Mitra •

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को पूरी तरह खारिज कर दिया है। राज्य सरकार ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों (BC) के लिए 34% आरक्षण बहाल करने के सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण की 50% की सीमा (Ceiling) को पार करने के लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त कानूनी, संवैधानिक और तार्किक आधार नहीं थे। न्यायालय का यह रुख यह साफ करता है कि सामाजिक न्याय के नाम पर किए जाने वाले प्रशासनिक फैसले संवैधानिक सीमाओं के परे नहीं जा सकते हैं।

  • हाईकोर्ट का निर्णय: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ के माध्यम से राज्य सरकार के दो प्रमुख सरकारी आदेशों—जी.ओ. एमएस संख्या 105 (ग्रामीण स्थानीय निकाय) और जी.ओ. आरटी संख्या 1065 (शहरी स्थानीय निकाय)— को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया था। इन आदेशों के लागू होने से राज्य के स्थानीय निकायों में कुल आरक्षण 50% की स्वीकृत सीमा को पार कर रहा था।
  • डेटा की अपर्याप्तता: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के माध्यम से राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि यह निर्णय 2026 के एक नए सर्वेक्षण, स्थानीय-निकाय डेटा और एक समर्पित आयोग (Dedicated Commission) के निष्कर्षों पर आधारित था। हालांकि, न्यायालयों ने गहराई से जांच करने के बाद पाया कि सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़े कानूनी रूप से इस बढ़े हुए कोटे को सही ठहराने और पिछड़ेपन को सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
  • राजनीतिक प्रतिक्रिया: सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने एक बड़ी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि भले ही कानूनी आरक्षण को बहाल न किया जा सका हो, लेकिन उनकी पार्टी (TDP) आगामी स्थानीय चुनावों में पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को 34% टिकट (सीटें आवंटित करके) देना जारी रखेगी, ताकि जमीनी स्तर पर उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।

भारतीय संविधान में 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक दर्जा दिया गया, जिसमें आरक्षण के संबंध में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं:

  • अनुच्छेद 243-D (पंचायतों में आरक्षण): यह अनुच्छेद ग्रामीण स्थानीय निकायों में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण को अनिवार्य बनाता है। इसके साथ ही, महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई (33.33%) सीटें आरक्षित करना अनिवार्य है।
  • अनुच्छेद 243-T (नगर पालिकाओं में आरक्षण): यह अनुच्छेद शहरी स्थानीय निकायों (नगर पालिकाओं और नगर निगमों) में भी एससी, एसटी और महिलाओं के लिए समान रूप से अनिवार्य आरक्षण का प्रावधान करता है।
  • पिछड़े वर्गों (BC/OBC) के लिए प्रावधान (अनुच्छेद 243-D(6) और 243-T(6)): यह संविधान का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जो राज्यों को अधिकार देता है। ये उप-अनुच्छेद स्पष्ट करते हैं कि राज्य का विधानमंडल (Legislature) यदि चाहे, तो कानून बनाकर पंचायतों या नगर पालिकाओं में पिछड़े वर्गों के नागरिकों के पक्ष में सीटों के आरक्षण या अध्यक्षों के पद आरक्षित करने का प्रावधान कर सकता है।
  • नोट: ध्यान देने योग्य बात यह है कि एससी/एसटी और महिलाओं का आरक्षण जहां संविधान द्वारा ‘अनिवार्य’ है, वहीं पिछड़े वर्गों (BC) का आरक्षण पूरी तरह से राज्यों के विवेक और उनके द्वारा बनाए गए कानून पर निर्भर करता है।

स्थानीय निकायों में 50% की आरक्षण सीमा को समझने के लिए हमें 2011 की जनगणना के आधार पर भारत की कुल 121.09 करोड़ की जनसंख्या और केंद्रीय स्तर पर लागू वर्तमान आरक्षण ढांचे का विश्लेषण करना होगा:

श्रेणी आरक्षण प्रतिशत भारत की जनसंख्या में अनुपात
(
2011 जनगणना)
OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग)27%41.1% (लगभग 49.8 करोड़)
SC (अनुसूचित जाति)15%16.6% (लगभग 20.1 करोड़)
ST (अनुसूचित जनजाति)7.5%8.6% (लगभग 10.4 करोड़)
EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग)10%—
कुल आरक्षण (SC+ST+OBC)49.5%66.3% (लगभग 80.3 करोड़)
कुल आरक्षण (EWS सहित)59.5%—
सामान्य वर्ग (General)—52.2% (लगभग 63.2 करोड़)
  • उत्पत्ति (इंदिरा साहनी वाद, 1992): नौ न्यायाधीशों की ऐतिहासिक पीठ ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14 और 16) के व्यापक सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए कुल आरक्षण किसी भी सामान्य परिस्थिति में 50% से अधिक नहीं होना चाहिए।
  • राजनीतिक आरक्षण बनाम नौकरियों में आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ (2010) मामले में स्पष्ट किया था कि नौकरियों/शिक्षा में मिलने वाला आरक्षण (अनुच्छेद 15(4) व 16(4)) और स्थानीय निकायों में मिलने वाला राजनीतिक आरक्षण (अनुच्छेद 243-D(6) व 243-T(6)) दोनों की प्रकृति अलग है। नौकरियों में आरक्षण ‘कल्याणकारी’ है, जबकि स्थानीय निकायों में आरक्षण ‘राजनीतिक प्रतिनिधित्व’ से जुड़ा है।
  • ‘त्रिपल टेस्ट‘ की अनिवार्यता: सुप्रीम कोर्ट ने विकास किशनराव गावली बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) मामले में स्पष्ट किया कि यदि कोई राज्य स्थानीय निकायों में ओबीसी/बीसी को आरक्षण देना चाहता है और वह 50% की सीमा को छूता या लांघता है, तो उसे ‘त्रिपल टेस्ट’ का पालन करना ही होगा:
    • स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और इसके प्रभावों की कठोर जांच के लिए एक स्वतंत्र और समर्पित आयोग का गठन करना।
    • उस आयोग की सिफारिशों के आधार पर प्रत्येक स्थानीय निकाय के अनुसार आवश्यक आरक्षण के अनुपात का निर्धारण करना।
    • एससी, एसटी और ओबीसी/बीसी का कुल आरक्षण मिलाकर किसी भी परिस्थिति में कुल सीटों के 50% से अधिक न होना।
  • सर्वेक्षण के वैधानिक आधार पर सवाल: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार से बेहद तीखा सवाल पूछा कि “आप हमें दिखाएं कि इस डेटा पर कैसे विचार किया जा सकता है? यह एक एकीकृत परिवार सर्वेक्षण (Unified Family Survey) है। यह किस कानून के तहत बनाया जा रहा है?” अदालत ने माना कि एक सामान्य कल्याणकारी पारिवारिक सर्वेक्षण स्थानीय निकायों में विशिष्ट ‘राजनीतिक पिछड़ेपन’ को सिद्ध करने के लिए कानूनी रूप से अपर्याप्त है।
  • अनुभवजन्य डेटा की अनुपस्थिति: न्यायालय ने पाया कि आंध्र प्रदेश सरकार ने जो 34% आरक्षण बढ़ाया, उसके पीछे कोई ठोस और विशिष्ट अनुभवजन्य डेटा (Empirical Data) नहीं था, जो यह साबित कर सके कि बीसी वर्ग का राजनीतिक प्रतिनिधित्व वास्तव में कम है।
  • हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की सराहना: शीर्ष अदालत ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट शब्दों में कहा कि हाईकोर्ट द्वारा राज्य के इस लोकलुभावन प्रशासनिक आदेश को रद्द करने का दृष्टिकोण “बेहद तर्कसंगत” (Very reasonable approach) था, क्योंकि यह संविधान की मूल भावना और 50% की स्थापित सीमा की रक्षा करता है।

इस निर्णय के बहुआयामी निहितार्थ

  • प्रशासनिक व नीतिगत निहितार्थ (Evidence-based Policy): यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर यह सिद्धांत स्थापित करता है कि भविष्य में कोई भी नीति या आरक्षण व्यवस्था केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति या लोकलुभावन प्रशासनिक घोषणाओं से नहीं बनाई जा सकती है। इसके लिए साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण और सटीक अनुभवजन्य डेटा (Empirical Data) का होना अनिवार्य है।
  • संवैधानिक निहितार्थ (Judicial Review): यह मामला न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका और विधायिका की शक्तियों पर एक आवश्यक नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) को प्रदर्शित करता है। यह साफ संदेश देता है कि चुनावी लाभ या राजनीतिक दबाव के लिए ‘50% की आरक्षण सीमा’ की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
  • राजनीतिक निहितार्थ (Alternative Representation): कानूनी या वैधानिक बाध्यता समाप्त होने के बावजूद, राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन में (जैसा कि मुख्यमंत्री ने बीसी वर्ग को 34% टिकट देने की बात कही) पिछड़े वर्गों को अपनी इच्छा से बड़ी हिस्सेदारी देना, भारतीय राजनीति में ‘स्वैच्छिक सामाजिक न्याय’ के एक नए व्यावहारिक और परिपक्व मॉडल का संकेत देता है।

केस स्टडी एवं अन्य राज्यों के उदाहरण

1. तमिलनाडु मॉडल (69% Reservation):

  • मामला: तमिलनाडु में 69% आरक्षण लागू है।
  • रणनीति: तमिलनाडु ने 1994 में विशेष कानून बनाकर इसे संविधान की नौवीं अनुसूची (9th Schedule) में शामिल कराया था ताकि इसे न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से सुरक्षा मिल सके।
  • सीख: बिना संवैधानिक संशोधन या 9th Schedule के संरक्षण के, केवल राज्य अधिनियम के दम पर 50% की सीमा लांघना अदालती जाँच में टिक नहीं पाता।

2. महाराष्ट्र मराठा आरक्षण केस (2021 – Supreme Court Verdict):

  • मामला: महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय को आरक्षण देकर 50% की सीमा लांघी थी।
  • सुप्रीम कोर्ट का रुख: जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामला (2021) में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द करते हुए कहा कि केवल आबादी या सामान्य पिछड़ेपन के आधार पर 50% की सीमा नहीं तोड़ी जा सकती, जब तक कि समुदाय “अत्यंत अलग-थलग या समाज की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ” न हो। मध्य प्रदेश पर भी यही नज़ीर लागू हुई।

आगे की राह

  • वैज्ञानिक और सटीक डेटा संग्रहण: यदि राज्य सरकारें वास्तव में स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों का वास्तविक प्रतिनिधित्व बढ़ाना चाहती हैं, तो उन्हें ‘एकीकृत परिवार सर्वेक्षण’ जैसे सामान्य प्रशासनिक डेटा पर निर्भर रहने के बजाय प्रत्येक स्थानीय निकाय-वार (Local Body-wise) विशिष्ट राजनीतिक पिछड़ेपन का वैज्ञानिक डेटा एकत्र करना चाहिए।
  • समर्पित आयोगों को सशक्त करना: राज्यों को केवल न्यायिक प्रक्रियाओं से बचने के लिए नाममात्र के आयोग नहीं बनाने चाहिए, बल्कि उन स्वतंत्र आयोगों को पर्याप्त संसाधन, विशेषज्ञ और समय देना चाहिए ताकि उनकी रिपोर्ट और सिफारिशें न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतर सकें।
  • संविधान सम्मत नीतियां: स्थानीय स्वशासन भारतीय लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। अतः इसमें किए जाने वाले किसी भी बड़े संरचनात्मक या आरक्षण संबंधी बदलावों में संवैधानिक अनुशासन (अनुच्छेद 243) और सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित होना चाहिए।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह दूरगामी निर्णय सामाजिक न्याय की क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संवैधानिक सीमाओं के बीच एक उत्कृष्ट और व्यावहारिक संतुलन स्थापित करता है। यह स्पष्ट करता है कि समाज के पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व अपरिहार्य है, लेकिन इसे प्राप्त करने के मार्ग में ‘विधि के शासन’ (Rule of Law) और प्रक्रियात्मक शुद्धता की अनदेखी कदापि नहीं की जा सकती है। सरकारों को लोकलुभावन शॉर्टकट या जल्दबाजी अपनाने के बजाय एक पारदर्शी, वैज्ञानिक और संवैधानिक रूप से सुदृढ़ व्यवस्था का निर्माण करना होगा ताकि सामाजिक न्याय की नीतियां दीर्घकालिक, टिकाऊ और न्यायसंगत बनी रहें।

Share this post: TG f
Scroll to Top