परीक्षा प्रणाली में सुधार: AI और कंप्यूटर-आधारित परीक्षा की भूमिका (Reforming the Examination System: The Role of AI and Computer-Based Examinations)
| UPSC Syllabus Linkage GS Paper 2 – शासन व्यवस्था: पारदर्शिता, जवाबदेही, ई-गवर्नेंस और संस्थागत सुधार। GS Paper 3 – विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और साइबर सुरक्षा। GS Paper 4 – नैतिकता: निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, समान अवसर और सार्वजनिक संस्थाओं में विश्वास। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम 2026 के एक सत्र में परीक्षा सुधारों पर गठित उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स के अध्यक्ष नंदन नीलेकणि ने देश में लगातार हो रहे प्रश्नपत्र लीक की समस्या का एक स्थायी तकनीकी समाधान प्रस्तुत किया है । नीलेकणि ने पारंपरिक ‘पेन-एंड-पेपर’ मॉडल को पूरी तरह त्यागने की वकालत करते हुए “लास्ट-मिनट प्रश्नपत्र निर्माण” और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित परीक्षा प्रणाली को अपनाने पर बल दिया है। इस वक्तव्य ने देश में ‘परीक्षा प्रणाली सुधार 2.0’ की बहस को मुख्यधारा में ला दिया है।

पृष्ठभूमि: वर्तमान परीक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
पारंपरिक परीक्षा प्रणाली (Pen-and-Paper/OMR Mode) कई ऐसे अंतर्निहित दोषों से ग्रसित है जो इसे आधुनिक समय के संगठित अपराधियों के सामने कमजोर बनाते हैं:
- ‘प्रश्नपत्र’ का आर्थिक प्रलोभन (Economic Incentive): नंदन नीलेकणि के अनुसार, वर्तमान प्रणाली की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि परीक्षा से कई दिन या हफ्ते पहले एक निश्चित ‘प्रश्नपत्र’ का भौतिक या डिजिटल वजूद तैयार हो जाता है। यह निश्चित प्रश्नपत्र लीक होने पर ब्लैक मार्केट में करोड़ों रुपये के अवैध व्यापार का जरिया बनता है, जिससे इसे चुराने का एक बड़ा आर्थिक प्रलोभन पैदा होता है।
- जटिल लॉजिस्टिक शृंखला (Single-Point Failure): देशव्यापी स्तर पर पेपर आयोजित कराने के लिए प्रश्नपत्रों की छपाई, उन्हें सुरक्षित बक्शों में ट्रकों के जरिए देश भर के परीक्षा केंद्रों, बैंकों और स्ट्रांग-रूम तक पहुँचाना पड़ता है। इस लंबी शृंखला में किसी भी एक बिंदु (Single-Point) पर सुरक्षा में चूक पूरी परीक्षा को रद्द करने का कारण बनती है।
- कोचिंग-माफिया-कंसल्टेंसी नेक्सस: परीक्षाओं के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी होने के कारण कुछ भ्रष्ट कोचिंग संस्थानों, प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों और परीक्षा नियंत्रकों के बीच एक अनैतिक सांठगांठ विकसित हो गई है, जो कड़े प्रशासनिक पहरों को भी भेदने में सफल रही है।
- मूल्यांकन में असमानता और रटने की संस्कृति: वर्तमान प्रश्नपत्र अक्सर उम्मीदवारों की तार्किक और व्यावहारिक क्षमता को परखने के बजाय उनके रटने की प्रवृत्ति (Rote Learning) को बढ़ावा देते हैं। साथ ही, मानवीय मूल्यांकन में व्यक्तिपरकता (Subjectivity) के कारण निष्पक्षता प्रभावित होती है।
कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका
तकनीकी हस्तक्षेप वर्तमान सड़े-गले प्रशासनिक ढांचे को एक पारदर्शी, सुरक्षित और गतिशील (Dynamic) प्रणाली में बदल सकता है।
कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) का भूमिका:
- भौतिक संचलन की समाप्ति: CBT मोड लागू होने से प्रश्नपत्रों को भौतिक रूप से छापने और वितरित करने की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
- एन्क्रिप्टेड डिजिटल वितरण: प्रश्नपत्र सीधे परीक्षा शुरू होने से चंद मिनट पहले केंद्रीय सर्वर से उम्मीदवारों के कंप्यूटर टर्मिनलों पर भेजे जाते हैं, जिससे बीच में पेपर इंटरसेप्ट होने का जोखिम शून्य हो जाता है।
- त्वरित और त्रुटिहीन परिणाम: OMR शीट्स के खोने, फटने या उनमें हेरफेर (जैसे बाद में बबल्स भरना) की गुंजाइश खत्म हो जाती है, और परिणाम तेजी से घोषित किए जा सकते हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका:
- वास्तविक समय में प्रश्नपत्र का निर्माण (Spontaneous Generation): AI एल्गोरिदम का उपयोग करके परीक्षा के दिन ही, वास्तविक समय में प्रश्नपत्र तैयार किए जा सकते हैं।
- AI-प्रोक्टरिंग और उन्नत निगरानी: परीक्षा केंद्रों पर लगे CCTV कैमरों को AI से जोड़कर छात्रों की संदिग्ध गतिविधियों (जैसे बार-बार नजरें घुमाना, बॉडी लैंग्वेज में बदलाव) को ट्रैक किया जा सकता है। साथ ही, प्रतिरूपण (मुन्नाभाई संस्कृति) को रोकने के लिए परीक्षा हॉल के प्रवेश द्वार पर AI-आधारित फेशियल रिकग्निशन अनिवार्य की जा सकती है।
- समानांतर मूल्यांकन (Parallel Evaluation): मुख्य (Mains) जैसी वर्णनात्मक परीक्षाओं में मानवीय पूर्वाग्रह को कम करने के लिए AI-असिस्टेड डिजिटल स्कैनिंग और मूल्यांकन का उपयोग किया जा सकता है।
नंदन नीलेकणि द्वारा सुझाए गए समाधान का महत्व
नीलेकणि टास्क फोर्स का प्रस्ताव कोई सतही सुधार नहीं, बल्कि परीक्षा के बुनियादी दर्शन में बदलाव है:

- लीक की संभावना का समूल नाश: यदि परीक्षा से पहले कोई तय ‘प्रश्नपत्र’ अस्तित्व में ही नहीं होगा, तो लीक होने या बिकने का आर्थिक प्रलोभन स्वतः समाप्त हो जाएगा।
- वैयक्तिकृत रैंडमाइजेशन (Personalized Questioning): एक विशाल ‘क्वेश्चन बैंक’ से AI के जरिए प्रश्न चुने जाने के कारण यह संभव है कि साथ बैठे दो अभ्यर्थियों के कंप्यूटर पर प्रश्नों का क्रम और सेट पूरी तरह अलग हो।
- प्रणालीगत विश्वसनीयता की बहाली: यह मॉडल छात्रों में यह भरोसा पैदा करेगा कि उनकी मेहनत किसी पेपर लीक माफिया की भेंट नहीं चढ़ेगी।
तकनीकी सुधारों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
यद्यपि तकनीकी समाधान अत्यधिक आकर्षक हैं, परंतु भारत जैसी विशाल और विविधतापूर्ण जनसांख्यिकी वाले देश में इन्हें लागू करने में कई व्यावहारिक बाधाएं हैं:
- बुनियादी ढांचे का संकट: नंदन नीलेकणि के अनुसार, वर्तमान में देश भर में केवल 1.5 लाख ऐसे डिजिटल लोकेशंस/टर्मिनल्स हैं जहां युवा उम्मीदवार CBT मोड में परीक्षा दे सकते हैं। यदि NEET या देशव्यापी रेलवे/बैंकिंग परीक्षाओं को देखें, जिनमें 20 से 25 लाख अभ्यर्थी बैठते हैं, तो यह वर्तमान नेटवर्क बेहद अपर्याप्त है और इसके भारी विस्तार की आवश्यकता है।
- डिजिटल विभाजन (Digital Divide): ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के छात्रों के पास कंप्यूटर का समान क्रेडेंशियल नहीं होता। कंप्यूटर आधारित परीक्षा उन्हें शहरी पृष्ठभूमि के छात्रों की तुलना में मनोवैज्ञानिक रूप से पीछे धकेल सकती है।
- निजी वेंडर्स पर अत्यधिक निर्भरता: वर्तमान में CBT कराने के लिए सरकारी संस्थाएं निजी आईटी कंपनियों और सेंटर्स को आउटसोर्स करती हैं। इन निजी केंद्रों में लैब ऑपरेटरों द्वारा ‘रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर’ (जैसे AnyDesk या UltraViewer) के जरिए स्क्रीन शेयर करके लैब हैकिंग और नकल कराने के कई मामले सामने आ चुके हैं।
- एल्गोरिथमिक पूर्वाग्रह और बिजली/इंटरनेट की समस्या: AI टूल्स में भाषाई या क्षेत्रीय पूर्वाग्रह हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, टियर-3 शहरों या ग्रामीण केंद्रों पर अप्रत्याशित बिजली कटौती या सर्वर क्रैश होने पर पूरी परीक्षा बाधित हो सकती है।
परीक्षा प्रणाली में सुधार हेतु उठाए गए हालिया कदम
सरकार और संबंधित आयोगों ने इस दिशा में हाल ही में कई महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए हैं:

- सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024: इस कड़े कानून के तहत संगठित पेपर लीक और नकल माफिया में संलिप्त व्यक्तियों के लिए ₹1 करोड़ तक का भारी जुर्माना और 10 साल तक की कैद का प्रावधान किया गया है।
- डॉ. के. राधाकृष्णन समिति का गठन: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के कामकाज में सुधार, डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत करने और परीक्षा प्रक्रियाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए इसरो (ISRO) के पूर्व प्रमुख डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया था, जिसने अपनी व्यापक सिफारिशें सौंपी हैं।
- UPSC द्वारा तकनीकी अपग्रेडेशन: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने परीक्षाओं के दौरान प्रतिरूपण और धोखाधड़ी को रोकने के लिए आधार-आधारित फेशियल रिकग्निशन, डिजिटल फिंगरप्रिंट कैप्चरिंग और परीक्षा हॉलों में QR कोड-आधारित उपस्थिति प्रणालियों का निविदा-आधारित परीक्षण शुरू किया है।
आगे की राह (Way Forward)
तकनीकी सुधारों को न्यायसंगत और फुलप्रूफ बनाने के लिए निम्नलिखित बहु-आयामी रणनीति अपनानी होगी:
- ‘सिक्योर टेस्टिंग सेंटर्स’ (STCs) का राष्ट्रीय नेटवर्क: निजी साइबर कैफे या सेंटर्स पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार को केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IITs, NITs और केंद्रीय विद्यालयों के कंप्यूटर लैब्स का उपयोग करके एक समर्पित राष्ट्रीय परीक्षा बुनियादी ढांचा (STC नेटवर्क) विकसित करना चाहिए। नीलेकणि द्वारा रेखांकित 1.5 लाख सेंटर्स की सीमा को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP Mode) से बढ़ाना होगा।
- हाइब्रिड परीक्षा मॉडल: जब तक शत-प्रतिशत CBT इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं होता, तब तक प्रारंभिक परीक्षाओं (जैसे UPSC Prelims) के लिए एक ‘हाइब्रिड मॉडल’ अपनाया जा सकता है, जिसमें प्रश्नपत्र डिजिटल टर्मिनल पर अंतिम समय में दिखेगा, लेकिन उत्तर OMR शीट पर ऑफलाइन भरे जाएंगे।
- सॉलिड साइबर सुरक्षा और नियमित ऑडिट: परीक्षा प्रणालियों में प्रयुक्त होने वाले AI एल्गोरिदम और सॉफ्टवेयर का सर्ट-इन (CERT-In) जैसी राष्ट्रीय नोडल एजेंसियों द्वारा कड़ा ‘सोर्स-कोड ऑडिट’ और ‘पेनिट्रेशन टेस्टिंग’ होना चाहिए ताकि रिमोट हैकिंग को रोका जा सके।
- उम्मीदवारों का डिजिटल समावेशन: ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के लिए मुफ्त मॉक-टेस्ट सेंटर्स स्थापित किए जाने चाहिए ताकि वे CBT परीक्षा के इंटरफेस से पूरी तरह परिचित हो सकें।
- समझ एवं विश्लेषणात्मक क्षमता पर ध्यान: गहन अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए परीक्षाओं में स्मृति-आधारित प्रश्नों को न्यूनतम किया जाना चाहिए। इसके स्थान पर छात्रों की समझ और विश्लेषणात्मक कौशल का आकलन होना चाहिए। प्रश्न-पत्रों में पाठ्यक्रम के अनुदेशात्मक उद्देश्यों के अनुरूप विभिन्न योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए बहुविकल्पीय, केस स्टडीज और वैचारिक प्रश्नों का मिश्रण होना चाहिए।
निष्कर्ष
परीक्षा प्रणाली किसी भी राष्ट्र के प्रशासनिक तंत्र की रीढ़ और उसके युवाओं के सपनों का प्रवेश द्वार होती है। नंदन नीलेकणि टास्क फोर्स द्वारा सुझाया गया AI और लास्ट-मिनट प्रश्नपत्र निर्माण का मॉडल भारत की सार्वजनिक परीक्षाओं को ‘सुरक्षा के संकट’ से निकालकर ‘तकनीकी सुदृढ़ता के युग’ में ले जाने की क्षमता रखता है। कानून (2024 का अधिनियम) और तकनीक (CBT + AI) का यह संगम तभी सफल होगा जब इसे मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ धरातल पर उतारा जाए। भारत के युवाओं में परीक्षा की निष्पक्षता के प्रति विश्वास बहाल करना केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक अनिवार्यता है।