कानून के समक्ष समानता vs चुनाव आयोग की स्वतंत्रता (Equality Before the Law vs Independence of the Election Commission)
कानून के समक्ष समानता vs चुनाव आयोग की स्वतंत्रताEquality Before the Law vs Independence of the Election Commission
संदर्भ
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा दायर एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की धारा 16 को चुनौती दी गई है। यह धारा CEC और ECs को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई कार्रवाइयों के लिए आजीवन दीवानी और आपराधिक मामलों से पूर्ण उन्मुक्ति (Immunity) प्रदान करती है।
UPSC मुख्य परीक्षा के लिए सीख)
अनुच्छेद 14 और कानून का शासन: कानून के समक्ष समानता (A.V. Dicey का सिद्धांत) और यह समझना कि क्या इस तरह की आजीवन उन्मुक्ति समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।
अनुच्छेद 361 के तहत संवैधानिक उन्मुक्ति: राष्ट्रपति और राज्यपालों को मिलने वाली उन्मुक्ति केवल उनके कार्यकाल के दौरान होती है। इसकी तुलना CEC/ECs को दी गई ‘आजीवन’ उन्मुक्ति से करना।
अन्य संवैधानिक और वैधानिक निकाय: CAG, UPSC सदस्य, न्यायाधीश और लोकपाल जैसे अन्य स्वतंत्र अधिकारियों के पास भी इस प्रकार की आजीवन और असीमित उन्मुक्ति नहीं है।
संसदीय विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105 और 194): विशेषाधिकार सीमित और विशिष्ट संदर्भों में होते हैं, जबकि निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संस्थाओं के लिए जवाबदेही बनाम स्वतंत्रता में संतुलन आवश्यक है।
मॉडल उत्तर
प्रस्तावना
हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जो CEC और ECs को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए आजीवन कानूनी उन्मुक्ति प्रदान करती है।
1. उन्मुक्ति प्रदान करने के पक्ष में तर्क
प्रशासनिक स्वतंत्रता एवं निडरता
भारत में चुनाव कराना एक अत्यधिक संवेदनशील और राजनीतिक रूप से दबावपूर्ण प्रक्रिया है।
यदि चुनाव आयुक्तों को सेवानिवृत्ति के बाद भी उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए निर्णयों पर मुकदमों का डर रहेगा, तो वे कड़े निर्णय लेने से हिचकिचा सकते हैं।
दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से सुरक्षा
चुनाव परिणामों से असंतुष्ट दल या उम्मीदवार चुनाव अधिकारियों को परेशान करने के उद्देश्य से फर्जी दीवानी या आपराधिक मामले दर्ज करा सकते हैं।
आजीवन उन्मुक्ति अधिकारियों को ऐसे प्रतिशोध (Vindictive Politics) से सुरक्षा कवच प्रदान करती है।
संस्थानीकरण और निरंतरता
कार्यपालिका के अनुचित हस्तक्षेप से परे रहकर संस्थागत स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक माना गया, ताकि अधिकारी निष्पक्ष रूप से संविधान के अनुच्छेद 324 का अनुपालन कर सकें।
2. उन्मुक्ति के विरोध में तर्क
संवैधानिक एवं कानूनी आयाम
अनुच्छेद 14 और समानता का सिद्धांत: ए.वी. डाइसी के ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) के तहत कानून के समक्ष सभी समान हैं। किसी भी पदधारक को ऐसा ‘विशेष अधिकार’ देना समानता के मूल ढांचे (Basic Structure) को चोट पहुँचाता है।
अनुच्छेद 361 से तुलना: संविधान राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों को केवल उनके कार्यकाल के दौरान (During their term of office) ही आपराधिक मामलों से सुरक्षा देता है, आजीवन नहीं। चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति से भी अधिक व्यापक सुरक्षा देना संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता है।
अनुच्छेद 105 और 194 (संसदीय विशेषाधिकार): सांसदों और विधायकों के विशेषाधिकार भी सीमित हैं और वे केवल सदन की कार्यवाही और सत्र की अवधि तक सीमित रहते हैं।
प्रशासनिक एवं संस्थागत जवाबदेही का आयाम
अकाउंटेबिलिटी का अभाव: पूर्ण और असीमित उन्मुक्ति से पद के दुरुपयोग, पक्षपात या प्रशासनिक गफला करने पर भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता बंद हो जाता है, जो ‘शक्ति के पृथक्करण’ और ‘जांच और संतुलन’ (Checks and Balances) के खिलाफ है।
अन्य स्वतंत्र निकायों से असमानता: CAG, UPSC के अध्यक्ष/सदस्य, न्यायपालिका के न्यायाधीश, लोकपाल और सूचना आयुक्तों जैसे अन्य स्वतंत्र अधिकारियों को ऐसी आजीवन आपराधिक उन्मुक्ति प्राप्त नहीं है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (1991 बनाम 2023 अधिनियम): 1991 के अधिनियम के तहत चुनाव आयोग ने टी.एन. शेषन जैसे आयुक्तों के नेतृत्व में बेहतरीन कार्य किया, जहाँ इस तरह की आजीवन उन्मुक्ति का कोई प्रावधान नहीं था।
संसदीय प्रक्रिया और पारदर्शिता का आयाम
प्रक्रियागत विसंगति: विधेयक के मूल रूप (‘Statement of Objects and Reasons’) में इस प्रावधान का कोई उल्लेख नहीं था। इसे अंतिम दिन एक संशोधन के रूप में राज्यसभा में लाया गया और बिना व्यापक चर्चा के पारित कर दिया गया।
सार्वजनिक विश्वास (Public Trust): चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता में जनता का विश्वास केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि चुनाव कराने वाले अधिकारियों की पारदर्शिता और जवाबदेही से भी आता है।
3. आगे का रास्ता
सशर्त या सीमित उन्मुक्ति (Qualified Immunity): पूर्ण और आजीवन उन्मुक्ति के बजाय उन्मुक्ति को केवल कार्यकाल तक सीमित किया जा सकता है या इसे केवल सद्भावना (Good Faith) में किए गए कार्यों तक सीमित रखा जाना चाहिए।
पूर्व-अनुमति तंत्र (Prior Sanction Mechanism): यदि सेवानिवृत्ति के बाद किसी आयुक्त के खिलाफ मामला दर्ज करना हो, तो उसके लिए उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति/समीक्षा को अनिवार्य बनाया जा सकता है, ताकि फर्जी मुकदमों से भी बचाव हो और जवाबदेही भी बनी रहे।
निष्कर्ष
लोकतंत्र की मजबूती के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थाओं का होना अनिवार्य है, लेकिन असीमित उन्मुक्ति संस्थागत जवाबदेही को कमजोर कर सकती है। इसलिए, संस्था की स्वतंत्रता और संवैधानिक जवाबदेही के बीच एक सूक्ष्म संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए ताकि ‘कानून का शासन’ अक्षुण्ण रहे।
अभ्यास MCQ
प्रश्न 1. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 तथा कानून के शासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
उत्तर और व्याख्या देखें
तीनों कथन लेख में चर्चा किए गए संवैधानिक विषयों पर आधारित हैं: अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति/राज्यपाल की उन्मुक्ति, और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही का संतुलन।
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