मणिपुर में मेइतेई-कुकी संघर्ष और आंतरिक सुरक्षा की चुनौती। (Meitei-Kuki Conflict and Internal Security Challenge in Manipur.)
मणिपुर में मेइतेई-कुकी संघर्ष और आंतरिक सुरक्षा की चुनौती।
Meitei-Kuki Conflict and Internal Security Challenge in Manipur.
हाल ही में, मणिपुर के इम्फाल पूर्वी जिले के नोंगशम पहाड़ियों (कांगपोक्पी जिले की सीमा के पास) के पास लकड़ी इकट्ठा करने गए तीन मेइतेई नागरिकों की उग्रवादियों द्वारा घात लगाकर की गई हत्या ने राज्य में कुछ समय की शांति के बाद फिर से जातीय संघर्ष की आशंकाओं को गहरा कर दिया है। इस घटना के विरोध में स्थानीय नागरिकों ने शवों को मुख्यमंत्री के आधिकारिक बंगले के सामने रखकर उग्र प्रदर्शन किया, जिसके बाद सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। यह घटना पूर्वोत्तर राज्य में लंबे समय से चली आ रही जातीय दरार, सुरक्षा अंतराल और शांति बहाली के प्रयासों की विफलता को रेखांकित करती है।
- आंतरिक सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्र: पूर्वोत्तर भारत में जातीय विविधता और पहचान की राजनीति किस प्रकार स्थायी संघर्ष का रूप ले सकती है, इसकी समझ।
- राज्य प्राधिकार और कानून-व्यवस्था: सुरक्षा बलों और खुफिया तंत्र की विफलता, तथा नागरिकों में प्रशासन के प्रति घटते विश्वास का आकलन।
- मानवीय संकट और विस्थापन: संघर्ष क्षेत्रों में आजीविका के साधन (जैसे जंगल से लकड़ी लाना) किस प्रकार जानलेवा जोखिम बन जाते हैं।
- राज्य प्रायोजित और अनौपचारिक शांति समझौते: सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) जैसे समझौतों की समीक्षा और उनके क्रियान्वयन में कमियां।
- प्रस्तावना: हालिया घटनाओं के संदर्भ में मणिपुर संकट का परिचय।
- मुख्य भाग:
- हालिया घटनाएँ: नोंगशम पहाड़ियों में घात लगाकर हमला, नागरिकों की मौत और स्थानीय जन-आक्रोश।
- घटनाओं के मूल कारण: भू-राजनीतिक, ऐतिहासिक, जनसांख्यिकीय और सुरक्षा संबंधी कारण।
- सरकारी प्रयास: केंद्रीय बलों की तैनाती, SoO समझौतों की निगरानी, राहत व पुनर्वास कार्य।
- आगे की राह: संवाद, निष्पक्ष जांच, सीमा प्रबंधन और निरस्त्रीकरण।
- निष्कर्ष: संवैधानिक एवं समावेशी समाधान द्वारा स्थायी शांति बहाली पर बल।
प्रस्तावना
मणिपुर में मेइतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच चल रहा जातीय तनाव भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। हाल ही में इम्फाल पूर्वी और कांगपोक्पी के सीमावर्ती नोंगशम पहाड़ियों में निर्दोष नागरिकों पर हुआ उग्रवादी हमला यह दर्शाता है कि सतही शांति के बावजूद अविश्वास और हिंसा की स्थिति बनी हुई है।
हालिया घटनाएं
- इम्फाल पूर्वी सीमा पर हमला: अक्टूबर 2026 में नोंगशम पहाड़ियों के पास सूखी लकड़ी इकट्ठा करने गए मेइतेई ग्रामीणों पर अचानक भारी गोलीबारी की गई, जिसमें 3 लोगों की मृत्यु हो गई तथा 3 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।
- जन-आक्रोश और विरोध: हत्याओं के विरोध में स्थानीय निवासियों ने शवों को मुख्यमंत्री के आधिकारिक बंगले के सामने रखकर प्रदर्शन किया, जिसे नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों को आंसू गैस का प्रयोग करना पड़ा।
- सुरक्षा बलों के आश्वासन पर सवाल: ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उग्रवादियों द्वारा पूर्व-नियोजित घात लगाकर हमला किया गया।
घटनाओं के मूल कारण
- भौगोलिक एवं जनसांख्यिकीय विभाजन: इम्फाल घाटी में बहुसंख्यक मेइतेई आबादी और चारों ओर स्थित पहाड़ी जिलों में कुकी तथा नागा समुदायों का निवास है। भूमि सुधार कानूनों के कारण घाटी निवासियों के पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि खरीदने पर प्रतिबंध तथा जनजातीय दर्जे की मांग मुख्य विवाद बिंदु हैं।
- संसाधनों एवं स्वायत्तता की होड़: पहाड़ी क्षेत्रों पर नियंत्रण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक अवसरों को लेकर दोनों समुदायों के बीच लंबे समय से ऐतिहासिक अविश्वास रहा है।
- अवैध अप्रवासन एवं नार्को-टेररिज्म: म्यांमार सीमा की छिद्रिलता (porous border) के कारण अवैध घुसपैठ, नशीले पदार्थों की तस्करी और अत्याधुनिक हथियारों की उपलब्धता ने इस हिंसा को और अधिक जटिल बना दिया है।
- सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) का उल्लंघन: SoO समझौतों के तहत कैडर के शिविरों तक सीमित रहने के नियमों के उल्लंघन और हथियार लहराने की घटनाओं ने स्थानीय आबादी के बीच भय व अविश्वास को बढ़ाया है।
सरकारी प्रयास
- सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती: शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारतीय सेना, असम राइफल्स और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की भारी तैनाती की गई है।
- बफर जोन का निर्माण: संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में दो समुदायों के बीच प्रत्यक्ष टकराव रोकने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा बफर जोन स्थापित किए गए हैं।
- राहत और पुनर्वास पैकेज: हिंसा से प्रभावित एवं विस्थापित परिवारों के लिए राहत शिविरों की स्थापना और वित्तीय सहायता प्रदान करने के कदम उठाए गए हैं।
- उच्च स्तरीय शांति समितियां: गृह मंत्रालय द्वारा हितधारकों के साथ वार्ता आयोजित करने और शांति बहाली के प्रयास किए गए हैं।
आगे की राह
- समावेशी राजनीतिक संवाद: दोनों समुदायों के नागरिक समाज संगठनों (Civil Society Organizations), धार्मिक नेताओं और युवाओं को शामिल करके बिना किसी पूर्व शर्त के उच्च-स्तरीय वार्ता प्रक्रिया संचालित की जानी चाहिए।
- व्यापक निरस्त्रीकरण (Disarmament Drive): क्षेत्र में अवैध रूप से मौजूद और लूटे गए हथियारों को जब्त करने के लिए निष्पक्ष एवं सख्त अभियान चलाया जाना चाहिए।
- SoO शिविरों की सख्त निगरानी: उग्रवादी समूहों से जुड़े SoO शिविरों की गतिविधियों की कड़ी निगरानी की जानी चाहिए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ विधिक कार्रवाई होनी चाहिए।
- सुरक्षा एवं सीमा प्रबंधन: म्यांमार सीमा पर फेंसिंग (बाड़ लगाने) की प्रक्रिया में तेजी लाना तथा बायोमेट्रिक ट्रैकिंग को प्रभावी बनाना।
- विश्वास बहाली उपाय (Trust Building Measures): संकटग्रस्त क्षेत्रों में आम नागरिकों की दैनिक आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि नागरिक निर्भय होकर गतिविधियां संचालित कर सकें।
निष्कर्ष
मणिपुर में जारी संकट का समाधान केवल सैन्य या सुरक्षात्मक उपायों तक सीमित नहीं हो सकता। इसके लिए सामाजिक सौहार्द, संवैधानिक गारंटी और रणनीतिक दूरदर्शिता के संयोजन की आवश्यकता है। सभी हितधारकों को हिंसा का मार्ग छोड़कर न्याय, समानता और परस्पर सम्मान पर आधारित एक स्थायी राजनीतिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
Q. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ (SoO) समझौता पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी समूहों के साथ हिंसा रोकने और शांतिवार्ता के लिए एक ढांचा प्रदान करता है।
2. मणिपुर की भौगोलिक संरचना मुख्य रूप से इम्फाल घाटी और घिरे हुए पहाड़ी जिलों में विभाजित है, जहां मेइतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जनसांख्यिकीय भिन्नता पाई जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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