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CA for Mains

मणिपुर संकट और अनुच्छेद 356 (Manipur Crisis and Article 356)

By Result Mitra •
RESULT MITRA | CURRENT AFFAIRS

मणिपुर संकट और अनुच्छेद 356

Manipur Crisis and Article 356

📅 22 अक्टूबर 2026   |   स्रोत: The Hindu
UPSC Indian Polity Current Affairs Mains Answer Writing

1. मणिपुर संकट: संदर्भ

कुकी-ज़ो (Kuki-Zo) संगठनों ने मणिपुर में फिर से राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लागू करने की मांग की है। उनका दावा है कि मार्च 2026 से हिंसा की घटनाओं में कम से कम 32 नागरिक मारे जा चुके हैं तथा दर्जनों घर जला दिए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि मणिपुर में 13 फरवरी 2025 से लागू राष्ट्रपति शासन को 4 फरवरी 2026 को हटाया गया था। नागरिक समूहों का तर्क है कि राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा स्थिति विफल हो चुकी है।

उनका मानना है कि इस संकट को केवल सुरक्षा समस्या न मानकर राजनीतिक समाधान तथा केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की आवश्यकता के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

मुख्य मुद्दा: राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता और राष्ट्रपति शासन के उपयोग के बीच संबंध।

2. UPSC परीक्षा के लिए सीख

भारतीय राजव्यवस्था

अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन, इसके लागू करने के आधार, संसदीय स्वीकृति तथा S. R. बोम्मई मामले (1994) के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ।

आंतरिक सुरक्षा

पूर्वोत्तर राज्यों में जातीय संघर्ष, उग्रवादी गुटों (जैसे NSCN-IM, ZUF) की भूमिका तथा सीमा पार से होने वाली अशांति एवं हथियारों के प्रसार की चुनौतियाँ।

शासन और नैतिकता

मानवीय संकट से जूझ रहे विस्थापित समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा संकटग्रस्त क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं की निरंतर आपूर्ति बनाए रखना।

3. मुख्य परीक्षा का प्रश्न

प्रश्न: “अनुच्छेद 356 का उद्देश्य आपातकालीन स्थिति में राज्य के संवैधानिक तंत्र की रक्षा करना था, किंतु इसका दुरुपयोग भारतीय संघवाद के समक्ष एक चुनौती रहा है।” एस. आर. बोम्मई मामले (1994) के प्रकाश में अनुच्छेद 356 के संवैधानिक प्रावधानों, इसके दुरुपयोग की सीमाओं और न्यायिक समीक्षा की भूमिका का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर का प्रारूप

भूमिका
अनुच्छेद 356 का संवैधानिक परिचय और डॉ. बी. आर. आंबेडकर का दृष्टिकोण—‘मृत पत्र’ (Dead Letter) की अवधारणा।
मुख्य भाग
  • अनुच्छेद 356 और 365 के प्रावधान तथा संसदीय अनुमोदन की शर्तें।
  • राष्ट्रपति शासन के प्रमुख प्रभाव और संघवाद पर प्रभाव: राज्य सरकार का निलंबन/विघटन तथा विधायी शक्तियों का संसद को हस्तांतरण।
  • S. R. बोम्मई मामला (1994): न्यायिक समीक्षा, फ्लोर टेस्ट और अनुचित उपयोग के विरुद्ध सुरक्षा कवच।
  • राजनीतिक लाभ हेतु उपयोग बनाम वास्तविक संवैधानिक तंत्र की विफलता, जैसे कानून-व्यवस्था का ध्वस्त होना।
निष्कर्ष
सरकारिया आयोग एवं पुंछी आयोग की सिफारिशों का उल्लेख करते हुए संतुलित एवं सकारात्मक भावी मार्ग प्रस्तुत करें।

4. मॉडल उत्तर

भूमिका

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को राज्य में ‘संवैधानिक तंत्र के विफल होने’ पर राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति प्रदान करता है। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने संविधान सभा में इसे एक “मृत पत्र” (Dead Letter) कहा था, जिसका उपयोग केवल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए।

हालांकि, समय के साथ इसका बार-बार राजनीतिक प्रयोग केंद्र-राज्य संबंधों और भारतीय संघवाद की भावना के लिए एक गंभीर प्रश्नचिह्न बनता रहा है।

5. अनुच्छेद 356 के संवैधानिक प्रावधान एवं प्रक्रिया

अनुच्छेद 356: लागू करने का आधार

यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट से या अन्यथा (otherwise) यह समाधान हो जाए कि राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तो राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा की जा सकती है।

अनुच्छेद 365

यदि कोई राज्य केंद्र द्वारा दिए गए संवैधानिक निर्देशों का अनुपालन करने या उन्हें प्रभावी करने में विफल रहता है, तो यह संवैधानिक तंत्र की विफलता के आकलन में प्रासंगिक हो सकता है।

संसदीय अनुमोदन एवं अवधि

  • राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को जारी होने की तारीख से दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित होना अनिवार्य है।
  • अनुमोदन होने पर यह छह महीने तक लागू रहता है।
  • इसे अधिकतम तीन वर्ष तक, निर्धारित संवैधानिक शर्तों के अधीन, बढ़ाया जा सकता है।

6. अनुच्छेद 356 का क्रियान्वयन एवं सुरक्षा उपाय

राज्य में संवैधानिक संकट / विफलता
↓
अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन
↓
दो महीने में संसदीय स्वीकृति
S. R. बोम्मई निर्णय (1994)
स्वीकृत: छह महीने तक लागू, आगे विस्तार के लिए संवैधानिक शर्तें
न्यायिक समीक्षा एवं फ्लोर टेस्ट

यह लेख में दिए गए प्रमुख चरणों का सरल शैक्षिक फ्लोचार्ट है।

7. S. R. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)

सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने S. R. बोम्मई मामले में अनुच्छेद 356 के मनमाने प्रयोग पर ऐतिहासिक अंकुश लगाया।

1. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
राष्ट्रपति की उद्घोषणा निरपेक्ष (Absolute) नहीं है और न्यायिक समीक्षा के अधीन है। न्यायालय यह जांच सकता है कि राष्ट्रपति का समाधान किसी प्रासंगिक सामग्री (Relevant Material) पर आधारित था या नहीं।
2. विधानसभा का निलंबन बनाम विघटन
संसद द्वारा उद्घोषणा का अनुमोदन किए जाने तक राज्य विधानसभा को केवल ‘निलंबित’ (Suspended) रखा जा सकता है; उसे ‘विघटित’ (Dissolved) नहीं किया जा सकता।
3. बहुमत का परीक्षण (Floor Test)
सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका निर्णय राज्य विधानसभा के पटल पर (Floor of the House) होना चाहिए, न कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय के आधार पर।
4. पंथनिरपेक्षता और मूल ढांचा
पंथनिरपेक्षता (Secularism) को संविधान का मूल ढांचा माना गया। स्रोत सामग्री के अनुसार, पंथनिरपेक्ष नीतियों के विरुद्ध कार्य करने वाली राज्य सरकार के संदर्भ में अनुच्छेद 356 लागू किया जा सकता है।
5. सरकार की पुनर्बहाली की शक्ति
यदि न्यायालय उद्घोषणा को असंवैधानिक पाता है, तो उसके पास बर्खास्त सरकार और भंग विधानसभा को पुनः बहाल करने की शक्ति है।

8. संघवाद एवं दुरुपयोग से जुड़ी चुनौतियाँ

राजनीतिक दुर्भावना (Mala fide Intent)

केंद्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों द्वारा विपक्षी दलों के शासन वाली राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग किया जाता रहा है।

कानून-व्यवस्था बनाम संवैधानिक विफलता

अक्सर केवल कानून-व्यवस्था की अल्पकालिक विफलता को संवैधानिक तंत्र की विफलता मान लिया जाता है। जबकि सरकारिया आयोग ने स्पष्ट किया था कि आंतरिक अशांति या कानून-व्यवस्था की समस्या मात्र के लिए अनुच्छेद 356 का सहारा अंतिम विकल्प होना चाहिए।

9. निष्कर्ष

अनुच्छेद 356 संघवाद का उल्लंघन करने का हथियार नहीं, बल्कि आपात स्थिति में संविधान की रक्षा का सुरक्षा कवच है।

सरकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2007) की सिफारिशों के अनुरूप अनुच्छेद 356 का उपयोग केवल “अंतिम विकल्प” (Last Resort) के रूप में होना चाहिए। सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच संवाद एवं संवैधानिक मर्यादाओं का पालन अत्यंत आवश्यक है।

10. अभ्यास प्रश्न (MCQ)

नीचे दिए गए प्रश्न को हल करें। विकल्प चुनने के बाद उत्तर जाँचें पर क्लिक करें।

प्रश्न: भारतीय संविधान के तहत राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तिथि से एक महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
  2. संसद द्वारा अनुमोदन के बिना भी राष्ट्रपति राज्य की विधानसभा को तुरंत विघटित (Dissolve) कर सकते हैं।
  3. S. R. बोम्मई मामले (1994) के अनुसार, राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

मूल स्रोत में दिया गया उत्तर: (B) केवल 3

अभ्यास के लिए: अनुच्छेद 356, संसदीय अनुमोदन और S. R. बोम्मई मामले के सिद्धांतों को दोहराएँ।

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