The Israel-Hamas War: Military Triggers and the Human Toll in Palestine
इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष: मानवीय संकट और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
Israel–Palestine Conflict: Humanitarian Crisis and the Role of the United Nations
चर्चा में क्यों?
इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच जारी संघर्ष एक गहरा और लंबे समय से चला आ रहा ऐतिहासिक विवाद है, लेकिन इसका वर्तमान दौर 7 अक्टूबर 2023 से आरंभ हुआ।
तनाव की शुरुआत: वह प्रमुख घटनाक्रम जहाँ से इज़राइल ने युद्ध का निर्णय लिया
वर्तमान सैन्य टकराव का मुख्य बिंदु 7 अक्टूबर 2023 की सुबह घटित हुआ:
- हमास का ‘ऑपरेशन अल-अक्सा फ्लड’ (Operation Al-Aqsa Flood): 7 अक्टूबर 2023 को गाज़ा पट्टी से नियंत्रित सशस्त्र समूह हमास (Hamas) ने इज़राइल पर अचानक स्थल, समुद्र और वायु मार्ग से एक बड़ा हमला किया। इस दौरान हमास द्वारा इज़राइल की ओर हजारों रॉकेट दागे गए।
- इज़राइल के भीतर घुसपैठ: हमास के लड़ाकों ने इज़राइल के सुरक्षा घेरे (border fence) को तोड़कर इज़राइली कस्बों, किब्बुत्ज़ (सामूहिक बस्तियों) और रीइम (Re’im) में आयोजित ‘सुपरनोवा म्यूजिक फेस्टिवल’ पर धावा बोला।
- जनधन और नागरिकों पर हमला: इस हमले के दौरान लगभग 1,200 इज़राइली नागरिकों और सैनिकों की मृत्यु हुई और 240 से अधिक लोगों को बंधक (Hostages) बनाकर गाज़ा ले जाया गया।
- इज़राइल का निर्णय (‘ऑपरेशन स्वॉर्ड्स ऑफ आयरन’): इस घटना के तुरंत बाद इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा की। इज़राइल ने इसे अपनी संप्रभुता और अस्तित्व पर हमला माना और दो स्पष्ट सैन्य लक्ष्य निर्धारित किए:
- हमास का पूर्ण सैन्य व प्रशासनिक विनाश।
- सभी बंधकों की सुरक्षित रिहाई।
फ़िलिस्तीन में जन-धन की क्षति (मानवीय और भौतिक नुकसान)
इज़राइल की वायु सेना द्वारा भारी बमबारी, ज़मीनी आक्रमण और नाकाबंदी के कारण फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों, विशेषकर गाज़ा पट्टी, में अभूतपूर्व क्षति हुई है:
(क) जीवन की क्षति (Human Casualties)
- मौतें: 7 अक्टूबर 2023 से शुरू हुए इस सैन्य अभियान में 75,000 से अधिक फ़िलिस्तीनियों की जान जा चुकी है।
- महिलाएं और बच्चे: संयुक्त राष्ट्र और स्वास्थ्य अधिकारियों के आँकड़ों के अनुसार, मारे गए लोगों में लगभग 70% महिलाएं और बच्चे शामिल हैं।
- घायल और लापता: 100,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, और हज़ारों लोग मलबे के नीचे दबे होने के कारण लापता माने गए हैं।
(ख) अवसंरचना और भौतिक क्षति (Infrastructure & Material Loss)
- आवास और इमारतें: गाज़ा के लगभग 60% से 70% आवासीय भवन या तो पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं या रहने योग्य नहीं बचे हैं।
- स्वास्थ्य प्रणाली का पतन: गाज़ा के प्रमुख अस्पतालों (जैसे अल-शिफा, कमल अदवान) को सैन्य अभियानों के तहत निशाना बनाया गया या वे ईंधन, बिजली और चिकित्सा आपूर्ति की कमी के कारण निष्क्रिय हो गए।
- नागरिक अवसंरचना: पानी के डिसेलिनेशन प्लांट, बिजली ग्रिड, सीवेज सिस्टम, स्कूल, और यूएन (UNRWA) राहत शिविर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं।
फ़िलिस्तीनी लोगों पर प्रभाव (विभिन्न आयाम)
इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों और पूर्ण नाकाबंदी ने फ़िलिस्तीनी आबादी के जीवन को कई प्रकार से प्रभावित किया है:
1. सामूहिक विस्थापन (Mass Displacement)
गाज़ा की 2.3 मिलियन (23 लाख) आबादी में से 85% से अधिक लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो चुके हैं। उत्तरी गाज़ा से लोगों को ज़बरन दक्षिण (रफ़ाह और अल-मवासी क्षेत्रों) की ओर स्थानांतरित होना पड़ा, जहाँ वे बुनियादी सुविधाओं के बिना तंबुओं (Tents) में रहने को मजबूर हैं।
2. भुखमरी और अकाल (Famine and Starvation)
इज़राइल द्वारा भोजन, ईंधन और दवाओं की सख्त नाकाबंदी के कारण संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि गाज़ा की आबादी अकाल जैसी स्थितियों से गुजर रही है। कुपोषण के कारण कई बच्चों और नवजात शिशुओं की जान जा चुकी है।
3. स्वास्थ्य एवं संक्रामक बीमारियाँ (Public Health Crisis)
स्वच्छ पानी की कमी और सीवेज प्रणाली के ठप होने से पोलियो, हैजा, त्वचा रोग, और श्वसन संबंधी बीमारियाँ शरणार्थी शिविरों में तेज़ी से फैली हैं।
4. वेस्ट बैंक (West Bank) पर प्रभाव
संघर्ष केवल गाज़ा तक सीमित नहीं रहा। वेस्ट बैंक में इज़राइली सेना की छापेमारी और इज़राइली बसने वालों (Settlers) की हिंसा में भारी वृद्धि हुई है, जिससे सैकड़ों फ़िलिस्तीनियों की जान गई है और व्यापार तथा आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध (Roadblocks & Checkpoints) लगा दिए गए हैं।
5. सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Psychological Trauma)
लाखों बच्चों ने अपने पूरे परिवार को खो दिया है। पीढ़ियों का विस्थापन, शिक्षा प्रणाली का पूर्ण विनाश और अनिश्चित भविष्य ने पूरी फ़िलिस्तीनी आबादी पर गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव डाला है।
संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र जाँच समिति के निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्वतंत्र जाँच समिति (Independent International Commission of Inquiry on the Occupied Palestinian Territory) ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला है कि इज़राइल ने फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में युद्ध अपराध (War Crimes) और मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes against Humanity) को अंजाम दिया है।
1. मुख्य निष्कर्ष और आरोप
- युद्ध अपराध तथा नरसंहार का प्रयास: रिपोर्ट के अनुसार, गाज़ा पट्टी पर जारी सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाना, सामूहिक विनाश और गाज़ा में बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं (भोजन, पानी, दवाएँ) की नाकाबंदी करना अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन है।
- मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes Against Humanity): वेस्ट बैंक (West Bank) और गाज़ा पट्टी में लोगों को सामूहिक रूप से विस्थापित करना, घरों को नष्ट करना तथा ‘जातीय सफाए’ (Ethnic Cleansing) जैसी स्थितियाँ पैदा करने को मानवता के विरुद्ध अपराध माना गया है।
- नागरिकों और बुनियादी ढांचे पर हमले: अस्पतालों, स्कूलों, शरणार्थी शिविरों और निर्दोष बच्चों व महिलाओं पर हुए हमलों को अनुचित तथा अत्यधिक सैन्य बल का प्रयोग ठहराया गया है।
- सामूहिक दंड (Collective Punishment): संपूर्ण गाज़ा आबादी पर भोजन और बिजली की आपूर्ति रोककर नाकाबंदी लगाने को अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सामूहिक दंड की श्रेणी में रखा गया है।
2. वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में स्थितियाँ
- अवैध बस्तियाँ और विस्थापन: यूएन समिति ने नोट किया कि केवल गाज़ा ही नहीं, बल्कि वेस्ट बैंक में भी इज़राइली सुरक्षा बलों और चरमपंथी निवासियों (Settlers) द्वारा फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा, भूमि पर कब्जा और जबरन बेदखली की घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है।
- जांचकर्ताओं का बयान: समिति का कहना है कि वेस्ट बैंक में बुनियादी ढांचे को नष्ट करना फ़िलिस्तीनियों के जीवन को असंभव बनाने और उन्हें वहाँ से हटाने की एक योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा है।
3. दोनों पक्षों के उल्लंघनों का उल्लेख
- संयुक्त राष्ट्र की जाँच रिपोर्ट में 7 अक्टूबर के हमास के हमलों और हमास द्वारा इज़राइली नागरिकों की हत्या, यौन हिंसा तथा बंधक बनाए जाने की घटनाओं को भी अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और युद्ध अपराध माना गया है।
- हालाँकि, समिति ने स्पष्ट किया है कि किसी एक पक्ष के अपराध दूसरे पक्ष द्वारा बड़े पैमाने पर नागरिकों के विनाश और युद्ध अपराधों को जायज़ ठहराने का आधार नहीं बन सकते।
4. इज़राइल की प्रतिक्रिया
इज़राइल का रुख: इज़राइल सरकार ने संयुक्त राष्ट्र समिति की इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित और “इज़राइल विरोधी दुष्प्रचार” (Propaganda) करार दिया है। इज़राइल का कहना है कि उसकी सेना (IDF) अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत और आत्मरक्षा (Self-defense) के लिए कार्य कर रही है तथा वह हमास के आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने के उद्देश्य से अभियान चला रही है, न कि फ़िलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ।
5. अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव और आगे की राह
- ICJ और ICC की कार्यवाही: इस रिपोर्ट का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में चल रहे नरसंहार के मामलों और अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा जारी की जाने वाली कानूनी कार्रवाइयों में साक्ष्य के रूप में किया जा रहा है।
- वैश्विक आह्वान: संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और हथियार आपूर्ति करने वाले देशों से आग्रह किया है कि वे ऐसे सैन्य अभियानों के लिए जवाबदेही तय करें और गाज़ा में स्थायी युद्धविराम सुनिश्चित कराएं।
इज़राइल की नीतियों का विरोध करने वाले प्रमुख देश
गाज़ा युद्धविराम प्रस्तावों, फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की औपचारिक मान्यता और इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले प्रमुख देशों में ग्लोबल साउथ (विकासशील देश), खाड़ी देश और कई यूरोपीय देश शामिल हैं:
- दक्षिण अफ्रीका (South Africa): इज़राइल के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में नरसंहार (Genocide) का मुकदमा दर्ज कराने में सबसे आगे रहा है।
- तुर्की (Turkey): इज़राइल के साथ व्यापारिक संबंध पूरी तरह से निलंबित कर चुका है और इज़राइली नेतृत्व पर युद्ध अपराध के मुकदमे की खुलकर मांग करता है।
- चीन (China): संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा में हमेशा इज़राइली सैन्य अभियानों की कड़ी आलोचना करता रहा है और फिलिस्तीन के पूर्ण संयुक्त राष्ट्र सदस्यता का समर्थन करता है।
- रूस (Russia): गाज़ा में मानवीय संकट और इज़राइल-अमेरिका की नीतियों का मुखर विरोधी है।
- सऊदी अरब (Saudi Arabia): खाड़ी देशों का नेतृत्व करते हुए इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष पर दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) और फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना पर जोर देता है।
- ब्राज़ील (Brazil): राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने गाज़ा के सैन्य अभियानों की तुलना सीधे तौर पर ऐतिहासिक नरसंहारों से की है।
- स्पेन (Spain): यूरोपीय देशों में सबसे मुखर आलोचकों में से एक है, जिसने औपचारिक रूप से फ़िलिस्तीन देश को मान्यता दी है और यूरोपीय संघ से इज़राइल पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
- आयरलैंड (Ireland): फ़िलिस्तीनी अधिकारों का प्रबल समर्थक और इज़राइली बस्तियों की नीतियों का कड़ा विरोधी।
- नॉर्वे (Norway): मानवीय सहायता में अग्रणी और इज़राइल की आक्रामक नीतियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाने वाला देश।
- ईरान (Iran): हमास और तथाकथित ‘प्रतिरोध की धुरी’ (Axis of Resistance) का मुख्य समर्थक और इज़राइल के अस्तित्व का वैचारिक विरोधी।
- कतर (Qatar): संघर्ष विराम वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के साथ-साथ गाज़ा पर इज़राइली हमलों की निरंतर निंदा करता रहा है।
- कोलम्बिया (Colombia): इज़राइल के साथ कूटनीतिक संबंध और सैन्य समझौते तक तोड़ चुका है।
- चिली (Chile): लैटिन अमेरिकी देशों में फिलिस्तीन का सबसे बड़ा समर्थक, जहाँ बड़ा फिलिस्तीनी प्रवासी समुदाय रहता है।
- मलेशिया (Malaysia): अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इज़राइल विरोधी प्रस्तावों का पुरजोर समर्थन करता है।
- इंडोनेशिया (Indonesia): दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुसंख्यक देश, जो आधिकारिक रूप से इज़राइल को मान्यता नहीं देता और फिलिस्तीन का समर्थन करता है।
- बेल्जियम (Belgium): इज़राइल के विरुद्ध मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच का समर्थन करने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में शामिल है।
- अल्जीरिया (Algeria): संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अरब देशों का प्रतिनिधित्व करते हुए इज़राइल के खिलाफ प्रस्ताव लाने में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।
- पाकिस्तान (Pakistan): इज़राइल को मान्यता नहीं देता और फिलिस्तीन के लिए कूटनीतिक समर्थन जुटाता है।
- क्यूबा (Cuba): इज़राइली नीतियों को साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी बताकर कड़ा विरोध करता है।
- स्लोवेनिया (Slovenia): हाल के वर्षों में फिलिस्तीन को मान्यता देकर इज़राइली सैन्य नीतियों की मुखर आलोचना करने वाला यूरोपीय देश।
इज़राइल की नीति का समर्थन या कूटनीतिक सुरक्षा देने वाले देश
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): इज़राइल का सबसे बड़ा रणनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक सहयोगी है। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई बार इज़राइल के पक्ष में Veto Power का उपयोग किया है ताकि युद्धविराम या इज़राइल विरोधी प्रस्तावों को रोका जा सके।
- हंगरी (Hungary): यूरोपीय संघ के भीतर एक ऐसा देश है जो कई मंचों पर इज़राइल के रुख का समर्थन करता है।
- अर्जेंटीना (Argentina): राष्ट्रपति जेवियर माइली के नेतृत्व में अर्जेंटीना ने इज़राइल के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हैं और संयुक्त राष्ट्र में इज़राइल विरोधी प्रस्तावों के खिलाफ वोट किया है।
- चेक गणराज्य (Czechia – चेकिया): ऐतिहासिक रूप से इज़राइल के यूरोपीय संघ में सबसे करीबी मित्रों में गिना जाता है।
- जर्मनी (Germany): ऐतिहासिक कारणों (Holocaust के प्रभाव) से इज़राइल की सुरक्षा को अपनी ‘राष्ट्रीय नीति’ (Staatsräson) मानता है।
- ब्रिटेन (UK) और फ़्रांस (France): ये देश इज़राइल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करते हैं, लेकिन गाज़ा में मानवीय क्षति और अंतरराष्ट्रीय कानून के मुद्दों पर इज़राइल की आलोचना भी करते हैं।
- प्रशांत महासागरीय द्वीप देश: जैसे माइक्रोनेशिया, नाउरू, पलाऊ और पापुआ न्यू गिनी।
इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष पर भारत का रुख
इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच जारी तनाव व युद्ध के संदर्भ में भारत का रुख संतुलित, व्यावहारिक और सिद्धांतों पर आधारित (Principled and Balanced Stand) रहा है। भारत अपनी पुरानी ‘डी-कपलिंग’ (De-hyphenation) कूटनीति का पालन करता है, जिसके तहत वह इज़राइल और फ़िलिस्तीन दोनों के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग रूप से साधता है।
1. आतंकवाद पर ‘जीरो टॉलरेंस’ और 7 अक्टूबर के हमले की निंदा
- आतंकवाद की कड़ी निंदा: 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इज़राइल पर किए गए हमले के तुरंत बाद भारत के प्रधानमंत्री ने इसकी कड़ी निंदा की थी।
- इज़राइल के साथ एकजुटता: भारत ने स्पष्ट किया है कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है और इज़राइल को अपनी सुरक्षा व आत्मरक्षा का अधिकार है।
2. गाज़ा में मानवीय संकट पर गहरी चिंता और सहायता
- नागरिक मौतों की आलोचना: गाज़ा में सैन्य कार्रवाइयों के कारण बड़ी संख्या में निर्दोष फ़िलिस्तीनी नागरिकों, महिलाओं और बच्चों की मौतों तथा मानवीय तबाही पर भारत ने चिंता जताई है।
- मानवीय सहायता (Humanitarian Aid): भारत ने गाज़ा के प्रभावित लोगों के लिए दवाओं, भोजन और अन्य जीवन रक्षक सामग्रियों की खेप भेजी हैं।
3. ‘द्वि-राष्ट्र समाधान’ (Two-State Solution) का समर्थन
- स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राज्य का समर्थन: भारत हमेशा से एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फ़िलिस्तीन राज्य (Sovereign, Independent and Viable State of Palestine) की स्थापना का पक्षधर रहा है।
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व: भारत का मानना है कि इस दीर्घकालिक संघर्ष का स्थाई समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से “दो-राष्ट्र सिद्धांत” (Two-State Solution) द्वारा ही संभव है।
- संयुक्त राष्ट्र में मतदान: भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में फ़िलिस्तीन से जुड़े प्रस्तावों के पक्ष में मतदान किया है।
4. संवाद और कूटनीति (Dialogue and Diplomacy) की मांग
- युद्धविराम की अपील: भारत ने दोनों पक्षों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हिंसा रोकने, संयम बरतने, सभी बंधकों की रिहाई करने और बातचीत की मेज पर लौटने की अपील की है।
- ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत ने पश्चिम एशिया के संकट को हल करने के लिए मध्य पूर्व के प्रमुख देशों, इज़राइल और फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण के नेतृत्व से संपर्क बनाए रखा है।
फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों पर नियंत्रण, आबादी और आर्थिक स्थिति
1. भू-भाग और इज़राइल का नियंत्रण (Territorial Control)
ऐतिहासिक रूप से फ़िलिस्तीन क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल लगभग 6,020 वर्ग किलोमीटर है, जो मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ है:
- गाज़ा पट्टी (Gaza Strip): इसका क्षेत्रफल लगभग 365 वर्ग किलोमीटर है।
- वेस्ट बैंक (West Bank): इसका क्षेत्रफल लगभग 5,655 वर्ग किलोमीटर है। 1993 के ओस्लो समझौते के तहत इसे तीन हिस्सों में बांटा गया था:
- एरिया ‘ए’ (Area A): लगभग 18% हिस्सा, जिस पर फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण का प्रशासनिक नियंत्रण है।
- एरिया ‘बी’ (Area B): लगभग 22% हिस्सा, जहाँ प्रशासनिक नियंत्रण फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण का है लेकिन सुरक्षा नियंत्रण इज़राइल के पास है।
- एरिया ‘सी’ (Area C): लगभग 60% हिस्सा, जिस पर पूरी तरह से इज़राइल का सैन्य और नागरिक नियंत्रण है।
निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो, कुल फ़िलिस्तीनी भू-भाग के बड़े हिस्से पर इज़राइल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण बताया गया है।
2. फ़िलिस्तीनी लोगों की वर्तमान जनसंख्या (Palestinian Population)
- कुल जनसंख्या: वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी को मिलाकर कुल फ़िलिस्तीनी आबादी लगभग 54 से 57 लाख के आसपास बताई गई है।
- गाज़ा पट्टी: गाज़ा की अनुमानित आबादी लगभग 21 से 22 लाख बताई गई है।
- वेस्ट बैंक (पूर्वी यरुशलम सहित): यहाँ की कुल फ़िलिस्तीनी आबादी लगभग 30 से 32 लाख बताई गई है।
3. फ़िलिस्तीनियों की आर्थिक स्थिति (Economic Status)
- भीषण मंदी: विश्व बैंक और IMF की रिपोर्टों के अनुसार, गाज़ा की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है।
- बेरोजगारी और गरीबी: युद्ध के कारण कारखाने, कृषि भूमि और व्यापारिक प्रतिष्ठान तबाह हुए हैं।
- मानवीय सहायता पर निर्भरता: गाज़ा और कई विस्थापित क्षेत्रों के लोग संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा दी जाने वाली राहत सामग्री पर निर्भर हैं।
- वित्तीय संकट: फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण भी गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र इज़राइल को रोकने में क्यों असमर्थ दिखाई देता है?
संयुक्त राष्ट्र (UN) के पास दुनिया भर में शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी है, लेकिन इज़राइल-फ़िलिस्तीन मामले में वह कोई कड़ा या निर्णायक सैन्य कदम उठाने में असमर्थ दिखाई देता है। इसका कारण संयुक्त राष्ट्र की संरचनात्मक और कूटनीतिक सीमाएँ (Structural and Diplomatic Limitations) हैं।
1. वीटो पावर (Veto Power) और अमेरिका की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद (UNSC) में 5 स्थायी सदस्य देश हैं—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। यदि इनमें से कोई स्थायी सदस्य किसी प्रस्ताव के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल कर दे, तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।
- दिक्कत: इज़राइल के सहयोगी अमेरिका ने कई मौकों पर सुरक्षा परिषद में वीटो पावर का इस्तेमाल करके इज़राइल के खिलाफ आने वाले प्रस्तावों को रोक दिया है।
- जब तक सुरक्षा परिषद में आवश्यक सहमति न बने, यूएन के लिए बाध्यकारी सैन्य या आर्थिक प्रतिबंध लागू करना कठिन होता है।
2. संयुक्त राष्ट्र के पास अपनी कोई सेना नहीं है
यूएन के पास अपनी स्वतंत्र सेना या पुलिस बल नहीं होता। शांति स्थापित करने या किसी देश पर कार्रवाई के लिए उसे सदस्य देशों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
3. संप्रभुता (Sovereignty) और अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाएं
- अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यूएन किसी संप्रभु देश की सीमाओं के भीतर सीधे कार्रवाई नहीं कर सकता, जब तक कि आवश्यक कानूनी और सुरक्षा परिषद संबंधी शर्तें पूरी न हों।
- इज़राइल एक संप्रभु राष्ट्र है और अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश उसके आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करते हैं।
4. महाशक्तियों के बीच भू-राजनीतिक खींचतान (Geopolitical Rivalry)
- वर्तमान वैश्विक राजनीति में रूस और चीन एक तरफ हैं, तो अमेरिका और पश्चिमी देश दूसरी तरफ।
- महाशक्तियों के बीच मतभेदों के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सहमति बनाना कठिन हो सकता है।
क्या यूएन पूरी तरह सक्षम नहीं है?
संयुक्त राष्ट्र को 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचाने के लिए बनाया गया था, न कि किसी एक युद्ध को तुरंत बलपूर्वक रोकने वाली “विश्व सरकार” के रूप में।
- कमजोर कहाँ है? यूएन राजनीतिक और सैन्य फैसले लेने में अपने सदस्य देशों, विशेषकर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की सहमति पर निर्भर करता है।
- सक्षम कहाँ है? इसके मानवीय संगठन जैसे UNRWA, WHO और UNICEF राहत सामग्री, दवाएँ और भोजन पहुँचाने का कार्य करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं में अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।
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