Indian Geography Daily Practice MCQ | Result Mitra
Indian Geography
Daily Practice MCQ
भारतीय भूगोल | प्रश्न, उत्तर एवं विस्तृत व्याख्या
इस अभ्यास में भारतीय भूगोल से संबंधित 10 बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं। प्रत्येक प्रश्न के विकल्प चुनें और फिर “उत्तर और व्याख्या देखें” पर क्लिक करके उत्तर तथा विस्तृत व्याख्या पढ़ें।
भारत का अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार लगभग समान (लगभग (30°) है, फिर भी इसकी उत्तर से दक्षिण की वास्तविक दूरी, पूर्व से पश्चिम की दूरी से अधिक है। इसका मुख्य भौगोलिक कारण क्या है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- भौगोलिक विसंगति का कारण: भारत का अक्षांशीय विस्तार और देशांतरीय विस्तार दोनों ही लगभग (30°) हैं। इसके बावजूद उत्तर-दक्षिण की दूरी (3,214 किमी) और पूर्व-पश्चिम की दूरी (2,933 किमी) में 281 किमी का अंतर पाया जाता है।
- देशांतर रेखाओं की प्रकृति: सभी देशांतर रेखाएं (Longitudes) दोनों ध्रुवों पर जाकर आपस में मिल जाती हैं। इस कारण भूमध्य रेखा (Equator) पर दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी सबसे अधिक (लगभग 111.3 किमी) होती है, लेकिन जैसे-जैसे हम ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, यह दूरी लगातार कम होती जाती है और ध्रुवों पर शून्य हो जाती है। चूंकि भारत भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर स्थित है, इसलिए यहाँ दो देशांतरों के बीच की वास्तविक भूमि दूरी कम हो जाती है।
- अक्षांश रेखाओं की प्रकृति: अक्षांश रेखाएं (Latitudes) पूर्ण वृत्त होती हैं जो एक-दूसरे के समानांतर चलती हैं। दो क्रमिक अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी भूमध्य रेखा से लेकर ध्रुवों तक हर जगह लगभग एक समान (लगभग 111 किमी) बनी रहती है।
नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को कथन (A) और दूसरे को कारण (R) के रूप में अंकित किया गया है:
कथन (A): तीव्र महाद्वीपीय या स्थलीय प्रभाव (Continental Effect) के कारण अत्यधिक वार्षिक तापांतर और न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सघन जनसंख्या विन्यास और तीव्र नगरीकरण प्रतिरूप देखा जा सकता है।
कारण (R): द्वितीयक और तृतीयक आर्थिक क्रियाकलापों का संकेंद्रण तथा प्रशासनिक केंद्रीयता, विपरीत वितान (Macro-climate) वाले क्षेत्रों में भी प्राकृतिक भौगोलिक अवरोधों को प्रतिस्थापित कर मानवीय बसाव को आकर्षित करती है।
उपर्युक्त दोनों कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- कथन (A) सही है: भौगोलिक रूप से यह सत्य है कि अत्यधिक मौसमी विषमता (भीषण गर्मी, तीव्र शीत) और कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में कृषि अनुकूलता न होने पर भी कुछ विशिष्ट स्थानों पर बहुत घनी आबादी और बड़े शहरी केंद्र विकसित हो जाते हैं।
- कारण (R) सही है: मानव भूगोल के नियमानुसार, विनिर्माण (द्वितीयक क्रिया) और सेवा क्षेत्र (तृतीयक क्रिया) जैसे आर्थिक कारक तथा प्रशासनिक राजधानी का होना, विपरीत जलवायु वाले क्षेत्रों में भी प्रकृति द्वारा उत्पन्न बाधाओं को दूर कर बड़े पैमाने पर रोजगार और मानवीय बसाव को आकर्षित करते हैं।
- कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है: कथन (A) एक विसंगति को दर्शाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी घनी आबादी और शहर कैसे बन जाते हैं। कारण (R) इसका सीधा उत्तर देता है कि जब ऐसे शुष्क क्षेत्रों में उद्योगों, सेवाओं और प्रशासनिक राजधानियों का विकास होता है, तो वहाँ आजीविका के साधन बनते हैं। यह आर्थिक ढांचा विषम तापांतर और कम वर्षा जैसी प्राकृतिक बाधाओं को प्रतिस्थापित (कमजोर) कर देता है। चूंकि रोजगार और प्रशासनिक शक्ति ही उस क्षेत्र में तीव्र नगरीकरण और जनसंख्या के संकेंद्रण का मुख्य कारण बनती है, इसलिए कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
भारत के सुदूरस्थ बिंदुओं और उनकी भौगोलिक अवस्थिति के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| सूची-I (सुदूरस्थ बिंदु) | सूची-II (भौगोलिक अवस्थिति) |
|---|---|
| 1. इंदिरा कॉल | उत्तरतम बिंदु |
| 2. इंदिरा पॉइंट | मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु |
| 3. किबिथु | पूर्वी बिंदु |
| 4. गुहारमोती | पश्चिमी बिंदु |
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सुमेलित हैं?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (c)
व्याख्या:
- युग्म 1 सुमेलित है: भारत का सबसे उत्तरी भाग (उत्तरतम बिंदु) ‘इंदिरा कॉल’ (Indira Col) को माना जाता है। इसकी अक्षांशीय अवस्थिति 37° 6′ उत्तरी अक्षांश है।
- युग्म 2 सुमेलित नहीं है: भारत का सबसे दक्षिणी विस्तार अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में स्थित ‘इंदिरा पॉइंट’ (Indira Point) है, जो 6° 45′ उत्तरी अक्षांश पर अवस्थित है। इसे पूर्व में ‘पिग्मेलियन पॉइंट’ या ‘पार्सन पॉइंट’ के नाम से भी जाना जाता था। यह भूमध्य रेखा से मात्र 876 किलोमीटर की दूरी पर है। ध्यान रहे कि ‘केप कैमरिन’ (कन्याकुमारी) भारत की मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु (8° 4′ उ. अक्षांश) है, जबकि इंदिरा पॉइंट संपूर्ण भारत का दक्षिणतम बिंदु है।
- युग्म 3 सुमेलित है: भारत का सबसे पूर्वी स्थान ‘किबिथु’ (Kibithu) है, जो अरुणाचल प्रदेश राज्य के अंजाव जिले में स्थित है। यह लगभग 97° 25′ पूर्वी देशांतर पर पड़ता है।
- युग्म 4 सुमेलित है: भारत का सबसे पश्चिमी बिंदु गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में स्थित ‘गौरमोता’ या ‘गुहारमोती’ (Gaur Mota / Guhar Moti) है। यह 68° 7′ पूर्वी देशांतर पर अवस्थित है।
अतिरिक्त परीक्षा-उपयोगी तथ्य: भारत का कुल अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार लगभग 30° है। देशांतरीय अंतर के कारण ही भारत के सुदूर पूर्वी बिंदु (किबिथु) और सुदूर पश्चिमी बिंदु (गौरमोता) के स्थानीय समय में लगभग 2 घंटे का अंतर पाया जाता है।
भारत के भौतिक विभाजनों (पर्वत, पहाड़ियाँ, पठार और मैदान) को उनके क्षेत्रफल की प्रतिशत हिस्सेदारी के आधार पर आरोही क्रम (बढ़ते क्रम) में व्यवस्थित करने वाला सही विकल्प कौन-सा है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- भौगोलिक आकृतियों का प्रतिशत वितरण: भारत का धरातल अत्यधिक विविधताओं से भरा है। देश के कुल क्षेत्रफल के भौतिक विभाजनों का सांख्यिकीय अनुपात इस प्रकार है:
- पर्वत (Mountains): 10.7% (सबसे कम हिस्सा, जो मुख्य रूप से उच्च हिमालयी चोटियों के रूप में अवस्थित है)
- पहाड़ियाँ (Hills): 18.6% (इसके अंतर्गत देश की मध्यवर्ती और प्रायद्वीपीय श्रेणियों के टूटे हुए हिस्से आते हैं)
- पठार (Plateaus): 27.7% (प्रायद्वीपीय भारत का खनिज संपदा से समृद्ध प्राचीन भू-भाग)
- मैदान (Plains): 43.0% (सर्वाधिक विस्तृत हिस्सा, जिसमें उत्तर भारत का विशाल मैदान और तटीय मैदान शामिल हैं)
अतः विकल्प (b) इस बढ़ते क्रम को पूर्णतः और सही रूप से प्रदर्शित करता है।
ट्रांस-हिमालय क्षेत्र की प्रमुख पर्वत श्रेणियों के भू-आकृतिक विन्यास के संदर्भ में, निम्नलिखित श्रेणियों को उत्तर से दक्षिण की ओर उनकी सही भौगोलिक अवस्थिति के अनुसार व्यवस्थित करने वाला सही अनुक्रम कौन-सा है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- भौगोलिक अनुक्रम (उत्तर से दक्षिण): ट्रांस-हिमालय क्षेत्र मुख्य हिमालय के उत्तर में स्थित है और यह तिब्बत पठार का ही एक हिस्सा माना जाता है। इसमें शामिल पर्वत श्रेणियों का उत्तर से दक्षिण की ओर क्रमिक विन्यास इस प्रकार है: (काराकोरम श्रेणी → लद्दाख श्रेणी → जास्कर श्रेणी → कैलाश पर्वत श्रेणी)
पर्वत श्रेणियों का विस्तृत भू-आकृतिक विवरण
1. काराकोरम श्रेणी: यह ट्रांस-हिमालय की सबसे उत्तरी और सुदूर पर्वत श्रृंखला है, जिसे ‘उच्च एशिया की रीढ़’ (Backbone of High Asia) कहा जाता है।
- भारत की सबसे ऊंची चोटी K2 (गॉडविन ऑस्टिन – 8,611 मीटर) इसी श्रेणी में स्थित है, जो वर्तमान में पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) का हिस्सा है।
- विश्व के सबसे बड़े गैर-ध्रुवीय हिमनदों (Glaciers) में से एक, सियाचिन ग्लेशियर (76 किमी लंबा) इसी श्रृंखला की नुब्रा घाटी में स्थित है। इसके अलावा बाल्टोरो, बियाफो और हिस्पर जैसे विशाल हिमनद भी यहीं अवस्थित हैं।
- ऐतिहासिक रूप से इस श्रेणी के पश्चिमी हिस्से में बुर्जिला दर्रा अवस्थित है, जो कश्मीर घाटी को देवसाई मैदानों और गिलगित से जोड़ता था।
2. लद्दाख श्रेणी: यह काराकोरम के ठीक दक्षिण में और उसके समानांतर विस्तृत है। यह श्रेणी लेह के उत्तर में दीवार की तरह खड़ी है।
- विश्व की सबसे तीव्र ढाल वाली चोटी राकापोशी (Rakaposhi) लद्दाख श्रेणी का ही हिस्सा है।
- लद्दाख श्रेणी का पूर्वी भाग आगे चलकर तिब्बत में निरंतर होता है। इस श्रेणी के उत्तर में श्योक नदी और दक्षिण में सिंधु नदी प्रवाहित होती है।
3. जास्कर श्रेणी: यह लद्दाख श्रेणी के दक्षिण में तथा महान हिमालय के ठीक उत्तर में स्थित है। सिंधु नदी लद्दाख और जास्कर श्रेणियों के बीच एक संकीर्ण और गहरी घाटी (Gorge) से होकर बहती है, तथा लेह शहर इसी घाटी में सिंधु के दाएं तट पर स्थित है। जास्कर श्रेणी में प्रसिद्ध जोजिला दर्रा (Zojila Pass) स्थित है। यह दर्रा कश्मीर घाटी (श्रीनगर) को लद्दाख (लेह) से जोड़ता है। सामरिक महत्व का राष्ट्रीय राजमार्ग 1 (NH-1) इसी दर्रे से होकर गुजरता है। यहीं एशिया की सबसे लंबी द्विदिश (Bi-directional) सुरंग ‘जोजिला टनल’ का निर्माण किया जा रहा है।
4. कैलाश पर्वत श्रेणी: यह मुख्य रूप से तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (चीन) में स्थित ट्रांस-हिमालय का सुदूर दक्षिणी-पूर्वी विस्तार है, जो लद्दाख और जास्कर श्रेणियों के देशांतरीय संरेखण के समानांतर पूर्व की ओर बढ़ता है।
- इसकी सर्वोच्च चोटी कैलाश पर्वत (6,638 मीटर) है, जो हिंदू और बौद्ध धर्म के लिए अत्यंत पवित्र सांस्कृतिक और धार्मिक स्थल है।
- इस श्रेणी के निकट स्थित मानसरोवर झील और चेमायुंगडुंग हिमनद से तीन अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ—सिंधु (Indus), सतलुज (Sutlej) और ब्रह्मपुत्र (Yarlung Tsangpo) निकलती हैं।
भू-आकृति विज्ञान तथा प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांतों के संदर्भ में, वह संकीर्ण भू-वैज्ञानिक क्षेत्र जिसके दोनों ओर सर्वथा भिन्न चट्टानी संरचनाएँ पायी जाती हैं तथा जो ट्रांस-हिमालय को महान हिमालय से पृथक करता है, क्या कहलाता है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- इण्डो-सांगपो सचर जोन (Indo-Tsangpo Suture Zone – ITSZ): यह वह मुख्य विवर्तनिक रेखा या क्षेत्र है जो ट्रांस-हिमालय को महान हिमालय (Greater Himalayas) से अलग करता है। भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह वह रेखा है जहाँ भारतीय विवर्तनिक प्लेट (Indian Plate) और यूरेशियाई प्लेट (Eurasian Plate) का आपस में अभिसरण (Collision) हुआ था। चूंकि यह दो अलग-अलग प्लेटों के मिलन बिंदु को दर्शाता है, इसलिए इसके दोनों तरफ सर्वथा भिन्न प्रकार की चट्टानी विशेषताएँ और भू-वैज्ञानिक संरचनाएँ पाई जाती हैं। सिंधु और सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदियाँ इस सचर जोन के समानांतर घाटियों में प्रवाहित होती हैं।
- हिमालय की अन्य प्रमुख विवर्तनिक सीमाएँ व फॉल्ट:
- मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT): यह विवर्तनिक भ्रंश रेखा महान हिमालय (Greater Himalayas) को मध्य/लघु हिमालय (Lesser Himalayas) से पृथक करती है। यह अत्यधिक भूकंपीय संवेदनशीलता वाला क्षेत्र है।
- मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT): यह भ्रंश रेखा मध्य/लघु हिमालय को सुदूर दक्षिणी श्रेणी यानी शिवालिक (Shiwaliks) से अलग करती है।
- हिमालयन फ्रंटल फॉल्ट (HFF): इसे मुख्य अग्रगंभीर भ्रंश भी कहा जाता है, जो शिवालिक पहाड़ियों को भारत के उत्तरी विशाल मैदानों (Indo-Gangetic Plains) से अलग करता है।
हिमालय की बाह्यतम श्रेणी यानी शिवालिक के भू-आकृतिक लक्षणों और उससे जुड़े क्षेत्रीय प्रतिरूपों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. शिवालिक श्रेणी का एक सतत और स्वतंत्र श्रृंखला के रूप में अलग अस्तित्व केवल कोसी नदी तक ही स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
2. शिवालिक और लघु हिमालय के मध्य कई अनुदैर्ध्य घाटियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें उत्तराखंड में ‘दून’ व ‘द्वार’ तथा नेपाल में ‘काठमांडू घाटी’ कहा जाता है।
3. अरुणाचल प्रदेश में शिवालिक श्रेणी का विन्यास पूरी तरह लुप्त हो जाता है और वहाँ कोई भी पहाड़ी जनजातीय नाम पर अवस्थित नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- कथन 1 सही है: शिवालिक या बाह्य हिमालय, मुख्य हिमालय की सबसे नवीनतम और सुदूर दक्षिणी श्रृंखला है। पश्चिम में सिंधु गॉर्ज से शुरू होकर पूर्व की ओर बढ़ते हुए, कोसी नदी तक ही इस श्रेणी का एक अलग, स्वतंत्र और सतत (Continuous) अस्तित्व दिखाई देता है। कोसी नदी के पूर्व में अत्यधिक भारी वर्षा और तीव्र अपरदन के कारण यह श्रेणी मध्य हिमालय के साथ लगभग विलीन हो जाती है।
- कथन 2 सही है: शिवालिक और लघु हिमालय के बीच संकीर्ण, टेक्टोनिक और समतल संरचना वाली अनुदैर्ध्य घाटियाँ (अभिनतीय और अपनतीय घाटियाँ) विकसित हुई हैं। इन घाटियों को देश के पश्चिमी और मध्य भाग (जैसे उत्तराखंड) में ‘दून’ (जैसे देहरादून) और पूर्वी भाग में ‘द्वार’ (जैसे हरिद्वार) कहा जाता है। पड़ोसी देश नेपाल में इस प्रकार की घाटी की संरचना को ‘काठमांडू घाटी’ के रूप में जाना जाता है।
- कथन 3 सही नहीं है: अरुणाचल प्रदेश में भी शिवालिक के विखंडित अवशेष पहाड़ियों के रूप में विस्तृत हैं। यहाँ इन पहाड़ियों का नामकरण वहाँ निवास करने वाली स्थानीय जनजातियों के नाम पर किया गया है। इनमें डफला (Dafla), मिरी (Miri), अबोर (Abor) और मिशमी (Mishmi) पहाड़ियाँ शामिल हैं। इनके अतिरिक्त इस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में पटकाई बुम, मिकिर और रेंगमा जैसी पहाड़ियाँ भी अवस्थित हैं। चूंकि कथन में इन्हें पूरी तरह लुप्त और जनजातीय नाम पर न होना बताया गया है, इसलिए यह गलत है।
पश्चिमी घाट (सहाद्रि) में अवस्थित निम्नलिखित प्रमुख दर्रों पर विचार कीजिए:
1. पालघाट
2. थालघाट
3. भोरघाट
4. सेनकोट्टा दर्रा
उपर्युक्त दर्रों का उत्तर से दक्षिण की ओर सही भौगोलिक अनुक्रम कौन-सा है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- थालघाट (Thalghat): यह पश्चिमी घाट का सबसे उत्तरी प्रमुख दर्रा है जो महाराष्ट्र में अवस्थित है। यह मुंबई को नासिक और कोलकाता से जोड़ने वाले मुख्य सड़क और रेल मार्ग को रास्ता प्रदान करता है।
- भोरघाट (Bhorghat): यह थालघाट के दक्षिण में महाराष्ट्र में ही स्थित है। यह दर्रा मुंबई को पुणे, चेन्नई और बेंगलुरु से जोड़ने वाले परिवहन नेटवर्क के लिए मार्ग बनाता है।
- पालघाट (Palghat/Palakkad Gap): यह दर्रा और दक्षिण में नीलगिरि पहाड़ियों और अन्नामलाई पहाड़ियों के मध्य केरल और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित है। यह कोच्चि और कोयम्बटूर को आपस में जोड़ता है।
- सेनकोट्टा दर्रा (Senkotta Gap): यह इन चारों में सुदूर दक्षिण में इलायची (कार्डमम) पहाड़ियों में अवस्थित है, जो केरल के तिरुवनंतपुरम को तमिलनाडु के मदुरै शहर से जोड़ता है।
नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को कथन (A) और दूसरे को कारण (R) के रूप में अंकित किया गया है:
कथन (A): अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भारत के दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों (जैसे चेन्नई) में चरम मौसमी घटनाओं के कारण अत्यधिक तीव्र वर्षा और विनाशकारी बाढ़ की बारंबारता देखी जाती है।
कारण (R): अल नीनो (El Niño) वर्ष के दौरान प्रशांत महासागर में होने वाले तापीय उतार-चढ़ाव हिंद महासागर के परिसंचरण को प्रभावित करते हैं, जिससे उत्तर-पूर्वी मानसून अत्यधिक सुदृढ़ हो जाता है।
उपर्युक्त दोनों कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (c)
व्याख्या:
- कथन (A) सही है: भारत के कोरोमंडल तट विशेषकर चेन्नई में लौटते हुए मानसून या उत्तर-पूर्वी मानसून के समय (अक्टूबर-दिसंबर) भीषण वर्षा होती है। तटीय अवस्थिति और शहरीकरण के अवरोधों के कारण यह तीव्र वर्षा चेन्नई में बार-बार गंभीर बाढ़ (Urban Flooding) जैसी चरम आपदाओं का रूप ले लेती है।
- कारण (R) सही है: जलवायु विज्ञान के अध्ययनों के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में होने वाले अल नीनो (गर्म जलधारा का विकास) का प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणालियों पर पड़ता है। जहाँ अल नीनो भारत के दक्षिण-पश्चिमी मानसून (जून-सितंबर) को कमजोर और शुष्क बनाता है, वहीं इसके विपरीत यह भारत के उत्तर-पूर्वी मानसून (लौटते हुए मानसून) को अत्यधिक सक्रिय और तीव्र कर देता है।
- कारण (R), कथन (A) की सही व्याख्या कैसे करता है: चेन्नई में सामान्यतः लौटते मानसून से वर्षा होती ही है, परंतु जिन वर्षों में अल नीनो सक्रिय होता है, उन वर्षों में वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव के कारण कोरोमंडल तट पर बादलों का निर्माण और वर्षा की तीव्रता अपने सामान्य स्तर से कहीं अधिक बढ़ जाती है। यही तापीय और वायुमंडलीय अंतर्संबंध चेन्नई में अप्रत्याशित भारी वर्षा और विनाशकारी बाढ़ को सीधे तौर पर गति प्रदान करता है। अतः कारण (R), कथन (A) के पीछे के मुख्य वैज्ञानिक कारक को स्पष्ट करता है।
उत्तराखंड के ‘पंच प्रयाग’ और वहाँ मिलने वाली नदियों के संगम के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| प्रयाग (सूची-I) | नदियों का संगम (सूची-II) |
|---|---|
| 1. विष्णुप्रयाग | अलकनंदा और धौलीगंगा |
| 2. कर्णप्रयाग | अलकनंदा और मंदाकिनी |
| 3. रुद्रप्रयाग | अलकनंदा और पिंडर |
| 4. देवप्रयाग | अलकनंदा और भागीरथी |
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सुमेलित हैं?
उत्तर और व्याख्या देखें
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- युग्म 1 सुमेलित है: चमोली जिले में स्थित विष्णुप्रयाग में अलकनंदा नदी का संगम धौलीगंगा (नंदादेवी हिमनद से आने वाली) नदी से होता है। यह पंच प्रयागों में सबसे पहला प्रयाग है।
- युग्म 2 सुमेलित नहीं है: कर्णप्रयाग में अलकनंदा नदी का संगम पिंडर नदी (पिंडारी ग्लेशियर से आने वाली) से होता है। कथन में इसे मंदाकिनी से मिलाकर गलत प्रस्तुत किया गया है।
- युग्म 3 सुमेलित नहीं है: रुद्रप्रयाग में अलकनंदा नदी का संगम केदारनाथ की ओर से आने वाली मंदाकिनी (काली गंगा) नदी से होता है। प्रश्न में युग्म 2 और 3 को आपस में बदल दिया गया है, इसलिए यह सुमेलित नहीं है।
- युग्म 4 सुमेलित है: देवप्रयाग में अलकनंदा नदी का संगम गोमुख ग्लेशियर से आने वाली भागीरथी नदी से होता है। इसी संगम के बाद इस संयुक्त जलधारा को आधिकारिक रूप से ‘गंगा नदी’ के नाम से जाना जाता है।
अतिरिक्त परीक्षा-उपयोगी तथ्य: इन प्रयागों के अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयाग ‘नंदप्रयाग’ है, जहाँ अलकनंदा नदी का संगम नंदाकिनी नदी से होता है। इन सभी संगमों में मुख्य और निरंतर बहने वाली धारा अलकनंदा नदी की ही होती है।
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