भारत में चीता पुनर्वास: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य की राह (Cheetah Reintroduction in India: Achievements, Challenges, and the Way Forward)

| UPSC पाठ्यक्रम से संबंध: GS-III — जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरणीय चुनौतियाँ और संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में भारत में जन्मी दूसरी पीढ़ी की मादा चीता केजीपी-12 द्वारा 4 नए शावकों को जन्म दिया गया, जिससे भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 58 हो गई है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने इसे भारत में चीता संरक्षण के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया है क्योंकि यह परियोजना के चार वर्ष पूरे होने के ठीक बाद हुआ है, जिसमें वर्ष 2026 में बोत्सवाना से लाए गए नए चीते भी शामिल हैं। हालांकि, इसी अवधि के दौरान कूनो की सीमा से बाहर एक 19 महीने के नर शावक (KNG22) की गोली लगने से हुई दुखद मृत्यु ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था, अवैध शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
भारत में चीता का इतिहास और विलुप्ति के कारण
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: चीता (Cheetah) शब्द संस्कृत के ‘चित्रक’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘चित्तीदार’। भारत में मुग़ल काल (विशेषकर अकबर के समय) में चीतों का उपयोग कुलीन वर्गों द्वारा काले हिरण और अन्य शाकाहारी जीवों के शिकार (Coursing) के लिए किया जाता था।
- अंतिम गवाह और विलुप्ति: भारत में अंतिम तीन जीवित एशियाई चीतों का शिकार वर्ष 1947 में छत्तीसगढ़ के कोरिया रियासत के महाराज रामानुज प्रताप सिंह देव द्वारा किया गया था। इसके बाद, भारत सरकार ने वर्ष 1952 में आधिकारिक रूप से चीते को भारत से विलुप्त घोषित कर दिया था।
विलुप्ति के मुख्य कारण:
- अत्यधिक शिकार और खेल (Bounty Hunting): ब्रिटिश काल और रियासतों के समय चीतों का बड़े पैमाने पर शिकार किया गया और उन्हें एक खेल की वस्तु बना दिया गया।
- आवास का विनाश (Habitat Loss): कृषि भूमि के विस्तार, जंगलों की कटाई और मानव बस्तियों के बढ़ने के कारण घास के मैदान (Grasslands) और अर्ध-शुष्क कांटेदार वन समाप्त हो गए, जो चीतों के प्राकृतिक आवास थे।
- शिकार की कमी: घास के मैदानों के नष्ट होने से चीतों के मुख्य भोजन—जैसे चिंकारा, चौसिंगा और काले हिरण—की आबादी तेजी से घटी, जिससे चीते भुखमरी की कगार पर पहुंच गए।
- बंदी अवस्था में प्रजनन में विफलता: चीते दुनिया के उन गिने-चुने जीवों में से हैं जो बंदी (Captivity) या तनावपूर्ण मानवीय वातावरण में बहुत कम या न के बराबर प्रजनन करते हैं, जिससे उनकी आबादी प्राकृतिक रूप से नहीं बढ़ सकी।
भारत में चीता पुनर्वास कार्यक्रम (Project Cheetah)
- प्रोजेक्ट चीता का शुभारंभ: इस परियोजना की औपचारिक शुरुआत 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कूनो राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश) में नामीबिया से लाए गए 8 चीतों को छोड़कर की गई थी।
- अंतर-महाद्वीपीय स्थानांतरण: यह दुनिया की पहली और सबसे बड़ी अंतर-महाद्वीपीय बड़े जंगली मांसाहारी जीव की स्थानांतरण परियोजना है।
- उद्देश्य: इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारत में चीते की ऐतिहासिक भूमिका को बहाल करना और देश के घास के मैदानों को पुनर्जीवित करना है।
- क्रियान्वयन एजेंसी: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इसका नेतृत्व कर रहे हैं।
- बहु-देशीय कूटनीति (Multi-Nation Sourcing):
- चरण 1: सितंबर 2022 में नामीबिया से 8 चीते लाए गए।
- चरण 2: फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए ।
- चरण 3: वर्ष 2026 में वैश्विक सहयोग का विस्तार करते हुए बोत्सवाना से भी नए चीतों को भारत लाया गया है।
- वर्तमान आवास: मध्य प्रदेश का कूनो राष्ट्रीय उद्यान (मुख्य केंद्र)। कूनो के अलावा दबाव कम करने के लिए चीतों को गांधी सागर वन्यजीव अभ्यारण्य और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में भी फैलाया गया है।
चीता (Cheetah) के बारे में
- विकास और वर्गीकरण: चीता आनुवंशिक रूप से ‘पुमा वंशावली’ से संबंधित है। इसका विकास पुमा और जगुआरुंडी से अलग होकर हुआ है। यह एक ‘बड़ी बिल्ली‘ नहीं है, क्योंकि यह शेर या बाघ की तरह दहाड़ नहीं सकता, यह केवल म्याऊं, घुरघुर और चीख (Purrs & Yelps) सकता है।
- विश्व में चीतों के प्रकार (Subspecies): विश्व में चीतों की मुख्य रूप से 5 उपप्रजातियां हैं—साउथ अफ्रीकन चीता (प्रोजेक्ट चीता के तहत इसी उपप्रजाति को भारत लाया गया है), एशियाई चीता (केवल ईरान में), नॉर्थवेस्ट अफ्रीकन चीता (सहारा), नार्थईस्ट अफ्रीकन चीता (सोमाली) और ईस्ट अफ्रीकन चीता (तंजानियन)।

- गति के लिए शारीरिक अनुकूलन: चीता दुनिया का सबसे तेज दौड़ने वाला स्थलीय स्तनधारी जीव है, जिसकी शीर्ष गति 60+ मील प्रति घंटा (96+ किमी/घंटा) तक होती है।
- व्यवहार और जीवन चक्र: ये मुख्य रूप से दिन के समय सक्रिय होते हैं ताकि रात के शिकारियों (शेर, तेंदुए) से सीधे टकराव से बचा जा सके। नर चीते अक्सर छोटे समूहों में रहते हैं जिन्हें ‘कोएलिशन‘) कहा जाता है। इनका गर्भकाल 3 महीने का होता है और ये एक बार में 2 से 6 शावकों को जन्म देते हैं।
| विशेषता | अफ्रीकी चीता (African Cheetah) | एशियाई चीता (Asiatic Cheetah) |
| वैज्ञानिक नाम | Acinonyx jubatus jubatus | Acinonyx jubatus venaticus |
| IUCN स्थिति | सुभेद्य (Vulnerable – VU) | गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered – CR) |
| वर्तमान आबादी | अफ्रीका के जंगलों में लगभग 6,500 – 7,000 | केवल ईरान में (50 से भी कम जीवित) |
| शारीरिक बनावट | आकार में थोड़े बड़े, त्वचा का रंग हल्का पीला। | आकार में थोड़े छोटे, त्वचा गहरी पीली और गर्दन पर घने बाल। |
प्रमुख उपलब्धियाँ (Key Achievements)
- F2 पीढ़ी का ऐतिहासिक जन्म: भारत में जन्मी चीता केजीपी-12 (जिसकी मां गामिनी दक्षिण अफ्रीका से आई थी) द्वारा 4 शावकों को जन्म देना यह साबित करता है कि चीते अब भारतीय धरती पर जैविक चक्र को पूरी तरह अपना चुके हैं।
- भारत में जन्मी आबादी की वृद्धि: देश में अब तक जन्मे चीतों की संख्या बढ़कर 36 हो गई है, जो इस अंतर-महाद्वीपीय परियोजना की अनुकूलन क्षमता की बड़ी सफलता है।
- सफल आवास विविधीकरण: चीतों को केवल कूनो तक सीमित न रखकर गांधी सागर अभ्यारण्य (4 चीते) और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (2 चीते) में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है।
- वैश्विक वन्यजीव कूटनीति: नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना के साथ त्रिकोणीय कूटनीति के माध्यम से भारत ने दुनिया का पहला और सबसे बड़ा ‘मांसाहारी जीव स्थानांतरण मॉडल’ सफलतापूर्वक संचालित किया है।
मुख्य चुनौतियाँ
- सुरक्षा एवं अवैध शिकार: कूनो के बफर जोन (श्योपुर वन संभाग) के बाहर 19 महीने के शावक (KNG22) के शरीर से 5 छर्रे मिलना और उसकी मौत होना इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय उद्यानों से बाहर निकलते ही चीते अत्यधिक असुरक्षित हो जाते हैं।
- तेंदुआ बनाम चीता: कूनो में तेंदुओं की घनी आबादी है। चीते शारीरिक रूप से तेंदुओं और बाघों से कमजोर होते हैं, जिसके कारण आपसी संघर्ष में शावकों और वयस्क चीतों की मृत्यु दर उच्च रही है।
- चिकित्सीय और तकनीकी सीमाएँ: रेडियो कॉलर के अत्यधिक घर्षण और मानसूनी नमी के कारण चीतों में ‘सेप्टीसीमिया’ (रक्त संक्रमण) जैसी बीमारियां देखी गईं। आपातकालीन स्थिति में वन्यजीव सर्जनों तक पहुंच में देरी भी एक मुद्दा है।
- सीमित प्रादेशिक क्षेत्र: कूनो का 748 वर्ग किमी का क्षेत्रफल 50 से अधिक चीतों के मुक्त विचरण के लिए छोटा पड़ रहा है, जिससे वे अक्सर मानव बस्तियों की ओर पलायन करते हैं।
विश्व के प्रमुख सफल उदाहरण
भारत इस परियोजना में दुनिया के अन्य सफल पुनर्वासों से सीख ले सकता है:
- मजीते वन्यजीव अभ्यारण्य, मलावी: यहां 2000 के दशक में पूरी तरह विलुप्त हो चुके शेर, तेंदुए और काले गैंडों का पुनर्वास किया गया। सख्त सामुदायिक बाड़े (Fencing) और स्थानीय रोजगार के माध्यम से आज यह अफ्रीका का प्रमुख ‘बिग फाइव’ रिजर्व बन चुका है।
- येलोस्टोन नेशनल पार्क, यूएसए: वर्ष 1995 में यहाँ ‘ग्रे वुल्फ’ (सलेटी भेड़ियों) को दोबारा लाया गया था। भेड़ियों की वापसी ने वहां के पूरे पारिस्थितिक तंत्र की नदियों के बहाव और हिरणों की अनियंत्रित आबादी को संतुलित कर दिया। इसे ट्रोफिक कास्केड का सबसे सफल वैश्विक उदाहरण माना जाता है।
आगे की राह
- प्रवर्तन और खुफिया तंत्र का सुदृढ़ीकरण: हालिया शावक की हत्या के बाद नवगठित 4-सदस्यीय विशेष कार्य बल (Special Task Force) और स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स को अवैध शिकार विरोधी खुफिया नेटवर्क विकसित करना चाहिए।
- इको-कॉरिडोर का विकास: कूनो को राजस्थान के मुकुंदरा हिल्स और मध्य प्रदेश के माधव राष्ट्रीय उद्यान से जोड़ने वाले गलियारों (Corridors) को सुरक्षित और अतिक्रमण मुक्त किया जाना चाहिए।
- सख्त बाड़े और बफर जोन प्रबंधन: जब तक चीतों की आबादी स्थिर नहीं हो जाती, तब तक संवेदनशील सीमाओं पर ‘कंट्रोल फेंसिंग’ और चौबीसों घंटे सैटेलाइट ट्रैकिंग की आवश्यकता है।
- सामुदायिक संवेदीकरण: स्थानीय ग्रामीणों को ‘चीता मित्र’ बनाकर उन्हें यह समझाना होगा कि चीते मनुष्यों पर हमला नहीं करते हैं। तेंदुओं के भ्रम में चीतों पर होने वाले हमलों को रोकने के लिए व्यापक दृश्य-जागरूकता अभियान चलाना होगा।
निष्कर्ष
‘प्रोजेक्ट चीता’ केवल एक खोई हुई वन्यजीव प्रजाति को वापस पाने का भौतिक प्रयास नहीं है, बल्कि यह भारत के लुप्तप्राय घास के मैदानों को बचाने और वैश्विक वन्यजीव संरक्षण में नए प्रतिमान स्थापित करने की एक दूरदर्शी यात्रा है। केजीपी-12 के शावकों का जन्म जहां आशा की नई किरण जगाता है, वहीं कूनो के बाहर शावक की बंदूक की चोटों से मौत हमें अपनी सुरक्षा प्रणालियों को अभेद्य बनाने की चेतावनी देती है। संरक्षण के इस लंबे मार्ग में शुरुआती नुकसान अपरिहार्य हैं, लेकिन वैज्ञानिक प्रबंधन, कड़े विनियामक प्रवर्तन और जन-भागीदारी के अनूठे समन्वय से भारत इस परियोजना को वैश्विक पटल पर एक अद्वितीय मिसाल बना सकता है।