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इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर उठने वाले विवाद(Controversies Surrounding Electronic Voting Machines (EVMs)

By Result Mitra •
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर उठने वाले विवाद | Result Mitra

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर उठने वाले विवाद
(Controversies Surrounding Electronic Voting Machines (EVMs))

भारत में चुनाव और लोकतंत्र की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण और रोचक रही है। देश की आजादी के बाद से लेकर डिजिटल युग तक मतदान प्रक्रिया में कई बदलाव आए।

भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का उपयोग

1. भारत में बैलेट पेपर से कब तक हुए चुनाव?

भारत में 1951-52 के पहले आम चुनाव से लेकर 1990 के दशक के उत्तरार्ध तक मुख्य रूप से बैलेट पेपर (पेपर मतपत्र) से ही चुनाव हुए।

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की शुरुआत

EVM का पहला प्रयोग मई 1982 में केरल के ‘पारूर’ विधानसभा क्षेत्र के 50 मतदान केंद्रों पर प्रायोगिक (Experimental) तौर पर किया गया था।

संसदीय चुनाव (लोकसभा) में बदलाव

1999 के लोकसभा चुनाव में देश के कुछ सीमित निर्वाचन क्षेत्रों में पहली बार EVM का प्रयोग किया गया।

2004 का 14वां लोकसभा चुनाव भारत के इतिहास का पहला ऐसा आम चुनाव था, जिसमें देश की सभी 543 लोकसभा सीटों पर संपूर्ण रूप से EVM का उपयोग किया गया और बैलेट पेपर प्रणाली को पूरी तरह से हटा दिया गया।

वर्तमान स्थिति

हालांकि आम चुनाव EVM से होते हैं, लेकिन स्थानीय निकाय (जैसे- पंचायत और नगरपालिका) के कुछ चुनावों में आज भी राज्य चुनाव आयोगों द्वारा आवश्यकतानुसार बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही, पोस्टल बैलेट (Postal Ballot) के रूप में मतपत्र का सीमित प्रयोग सरकारी कर्मचारियों और सेना के जवानों के लिए आज भी जारी है।

2. शुरुआत में बैलेट पेपर की पद्धति क्यों अपनाई गई?

1947 में आजादी के बाद जब भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुना, तब चुनाव आयोग के सामने कई ऐतिहासिक चुनौतियां थीं:

1. तकनीक का अभाव

1950 के दशक में डिजिटल तकनीक या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का अस्तित्व ही नहीं था। उस समय दुनिया भर में बैलेट पेपर ही मतदान का एकमात्र मानक और विश्वसनीय तरीका था।

2. अत्यधिक निरक्षरता (Literacy Rate)

पहले आम चुनाव (1951-52) के समय भारत की साक्षरता दर मात्र लगभग 18% थी। देश की 80% से अधिक आबादी पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी।

3. चुनाव चिह्नों और मतपेटी (Ballot Box) की अनोखी व्यवस्था

शुरुआती चुनावों में साक्षरता की कमी को देखते हुए प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अलग-अलग रंग या चुनाव चिह्न वाली अलग-अलग मतपेटी (Ballot Box) रखी जाती थी।

मतदाता को सिर्फ अपनी पसंद के उम्मीदवार की पेटिका में सादा कागज डालना होता था। बाद में इसे बदलकर एक ही बैलेट पेपर पर सभी उम्मीदवारों के नाम और चिह्न छापे जाने लगे, जिस पर मतदाता मुहर (Stamp) लगाते थे।

4. व्यापक स्तर पर व्यवस्था

भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में हर नागरिक को मताधिकार (वयस्क मताधिकार) देना एक ऐतिहासिक कदम था, जिसके लिए कागजी मतपत्र ही सबसे सहज और सुलभ माध्यम था।

3. बैलेट पेपर चुनाव पद्धति की प्रमुख खामियां (Disadvantages & Vulnerabilities)

समय के साथ बैलेट पेपर प्रणाली की कई गंभीर कमियां उजागर हुईं, जिसके कारण देश को EVM की ओर बढ़ना पड़ा:

1. बूथ कैप्चरिंग और बाहुबल (Booth Capturing & Muscle Power)

बैलेट पेपर काल की सबसे बड़ी समस्या ‘बूथ कैप्चरिंग’ थी। दबंग और असामाजिक तत्व आपराधिक बल के आधार पर मतदान केंद्रों पर कब्जा कर लेते थे।

वे चुनाव अधिकारियों को डरा-धमका कर सैकड़ों बैलेट पेपर पर खुद ही मुहर लगाकर मतपेटियों में भर देते थे।

2. फर्जी मतदान और मतपेटी की चोरी या लूट

मतपेटियों को चुरा लेना, उनमें पानी या स्याही डाल देना, या रास्ते में बदल देना आसान था।

कई मामलों में स्ट्रांग रूम से मतपेटियों को गायब कर दिया जाता था या उनके साथ छेड़छाड़ की जाती थी।

3. भारी मात्रा में मतों का अमान्य (Invalid/Rejected Votes) होना

बैलेट पेपर पर मतदाता को रबर की मुहर (Stamp) लगानी होती थी।

यदि मुहर दो उम्मीदवारों के खाने के बीच की रेखा पर लग जाती थी या स्याही फैल जाती थी, तो उस वोट को अमान्य (Cancel) घोषित कर दिया जाता था।

कई बार अमान्य वोटों की संख्या उम्मीदवारों की हार-जीत के अंतर से भी अधिक होती थी, जिससे जनता का जनमत बेकार चला जाता था।

4. मतगणना (Counting) में अत्यधिक समय और धांधली

लाखों बैलेट पेपर को हाथों से गिनने में 2 से 4 दिन तक का समय लग जाता था।

गिनती के दौरान धांधली की आशंका बनी रहती थी और मतगणना एजेंटों के बीच अक्सर विवाद और हिंसा की स्थिति बन जाती थी।

5. भारी वित्तीय लागत और कागजों की बर्बादी

करोड़ों बैलेट पेपर छापने के लिए हजारों टन कागज की आवश्यकता होती थी, जिससे लाखों पेड़ काटे जाते थे।

प्रिंटिंग, भारी मतपेटी (Ballot Boxes) का परिवहन (Transportation), और उनकी सुरक्षा पर अत्यधिक सरकारी पैसा खर्च होता था।

6. चुनाव प्रक्रिया की धीमी गति

बैलेट पेपर छापने से लेकर, मतपेटियों को बूथ-बूथ तक पहुंचाने और फिर मतगणना तक पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल, धीमी और श्रम-साध्य थी।

4. लोकसभा चुनाव में कितने EVM का प्रयोग होता है?

लोकसभा चुनाव के दौरान भारत के विशाल भूगोल और मतदाताओं की संख्या को देखते हुए लाखों EVM का उपयोग किया जाता है। एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र (Constituency) में औसतन 2,000 से लेकर 3,500 तक मतदान केंद्र (Polling Booths) होते हैं।

प्रत्येक मतदान केंद्र पर मुख्य रूप से दो और उपकरणों (VVPAT को मिलाकर तीन इकाइयों) का सेट उपयोग किया जाता है:

1. बैलट यूनिट (Ballot Unit – BU)

यह वह मशीन होती है जिस पर मतदाता उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न देखकर अपना वोट दबाते हैं। (यदि एक सीट पर बहुत अधिक उम्मीदवार हैं, तो एक से अधिक बैलट यूनिट्स को आपस में जोड़ा जा सकता है)।

2. कंट्रोल यूनिट (Control Unit – CU)

यह मतदान अधिकारी के पास रखी होती है। अधिकारी के बटन दबाने पर ही बैलट यूनिट एक्टिव होती है और यही यूनिट सारे वोटों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखती है।

3. VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail)

इसके साथ एक छोटी प्रिंटर मशीन जुड़ी होती है, जिससे मतदाता को यह देखने के लिए 7 सेकंड पर्ची दिखती है कि उसने जिसे वोट दिया है, उसी को गया है या नहीं।

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और VVPAT यूनिट

कुल संख्या

पूरे देश में होने वाले आम चुनाव (543 लोकसभा सीटें) के लिए निर्वाचन आयोग को मतदान केंद्रों की संख्या के आधार पर लगभग 12 से 15 लाख (या उससे अधिक) EVM सेट और VVPAT की आवश्यकता होती है (यदि विधानसभा चुनाव साथ हों तो यह संख्या और बढ़ जाती है)।

5. EVM की टेक्नोलॉजी कहाँ से आयात (Import) की जाती है या कैसे बनती है?

EVM की तकनीक पूरी तरह से स्वदेशी (Indigenous) है। इसे किसी भी देश से आयात नहीं किया जाता है।

डिजाइन

भारत के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा डिजाइन किया गया है, जिसमें IIT बॉम्बे के प्रोफेसरों की मुख्य भूमिका रही है।

निर्माण (Manufacturing)

भारत के चुनाव आयोग (ECI) के निर्देश पर इनका निर्माण भारत सरकार के दो सार्वजनिक उपक्रम (PSUs) द्वारा बेहद गोपनीय और कड़े सुरक्षा घेरे में किया जाता है:

  • BEL (Bharat Electronics Limited, बेंगलुरु) – रक्षा मंत्रालय के अधीन।
  • ECIL (Electronics Corporation of India Limited, हैदराबाद) – परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन।

6. EVM को भरोसेमंद (Tamper-Proof) क्यों माना जाना चाहिए?

भारतीय EVM को दुनिया के सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद चुनावी उपकरणों में गिना जाता है, जिसके पीछे कई पुख्ता तकनीकी और प्रशासनिक कारण हैं:

इंटरनेट या किसी नेटवर्क से डिस्कनेक्ट (Stand-alone Device)

EVM किसी भी कंप्यूटर, वाई-फाई, ब्लूटूथ या इंटरनेट से जुड़ी नहीं होती है। यह एक पूरी तरह से ‘स्टैंड-अलोन’ मशीन है, इसलिए इसे दुनिया के किसी भी कोने से हैंक (Hack) करना असंभव है।

हार्डकोडेड सॉफ्टवेयर

EVM के माइक्रोकंट्रोलर चिप में जो सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम एक बार कंपनी में फिक्स कर दिया जाता है, उसे बदला या दोबारा प्रोग्राम (Reprogram) नहीं किया जा सकता। यह वन-टाइम प्रोग्रामाबल (OTP) चिप होती है।

मैन्युफैक्चरिंग के समय परिणामों की अनिश्चितता

जब मशीनें बनती हैं, तब किसी को नहीं पता होता कि भविष्य में किस चुनाव में, किस सीट पर कौन से उम्मीदवार खड़े होंगे और उनका क्रम क्या होगा। इसलिए पहले से किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में मशीन सेट करना असंभव है।

डायनेमिक कोडिंग (Dynamic Coding)

बैलट यूनिट से कंट्रोल यूनिट तक जो सिग्नल जाता है, वह एनक्रिप्टेड (Encrypted) और डायनेमिक कोड में होता है, जिसे कोई बाहरी उपकरण डिकोड या बदल नहीं सकता।

वोट डालने की सीमा (Speed Limit)

एक EVM एक मिनट में अधिकतम 5 वोट ही दर्ज कर सकती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई जबरन तेजी से या फर्जी तरीके से धांधली न कर सके।

VVPAT का पहरा

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार अब हर वोट के साथ VVPAT पर्ची निकलती है, जिससे यह पारदर्शी सत्यापन हो जाता है कि मशीन ने सही गिनती की है या नहीं। इसके अलावा यादृच्छिक (Random) रूप से EVM के वोटों का मिलान VVPAT पर्चियों से किया जाता है।

राजनीतिक दलों की निगरानी

चुनाव से पहले ‘फर्स्ट लेवल चेकिंग’ (FLC) सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में लाइव वीडियो के साथ की जाती है। स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा में भी राजनीतिक दलों के एजेंटों की सीधी नजर रहती है।

7. EVM पर लगने वाले प्रमुख आरोप एवं उनके पीछे के तर्क

भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के उपयोग को लेकर समय-समय पर विपक्षी राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और तकनीकविदों द्वारा सवाल उठाए जाते रहे हैं। हालांकि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।

नीचे EVM पर लगने वाले प्रमुख आरोपों, उनके पीछे के तर्कों और निर्वाचन आयोग व तकनीकी मानकों के आधार पर उनके निष्पक्ष विश्लेषण का पूरा विवरण दिया गया है:

आरोप 1: EVM की हैकिंग या चिप मैन्युपुलेशन (Malware / Microchip Hack)

तर्क: आलोचकों का तर्क है कि EVM के अंदर लगी चिप (Microcontroller) में निर्माण (Manufacturing) या प्रोग्रामिंग के समय ऐसा सॉफ्टवेयर/ट्रोजन वायरस डाला जा सकता है, जो बटन दबाने पर किसी खास राजनीतिक दल के पक्ष में वोट ट्रांसफर कर दे।

दावा: ‘स्मार्ट ईवीएम’ में ब्लूटूथ, वाई-फाई या गुप्त रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) रिसीवर लगाकर परिणाम बदले जा सकते हैं।

आरोप 2: VVPAT और ग्लास (कांच) का धुंधलापन

तर्क: 2017 के बाद VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail) की खिड़की के कांच को ज्यादा डार्क/ट्रांसल्यूसेंट (धुंधला) कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इसमें मतदाता केवल 7 सेकंड तक लाइट जलने पर ही पर्ची देख पाता है, जबकि पहले कांच पारदर्शी था।

संदेह: मतदाता यह पुष्टि पूरी तरह नहीं कर पाता कि पर्ची डिब्बे में कटी या नहीं या सॉफ्टवेयर केवल दिखने वाली पर्ची कुछ और प्रिंट करके मेमोरी में वोट किसी और को दर्ज कर रहा है।

आरोप 3: 100% VVPAT पर्चियों का मिलान न होना

तर्क: वर्तमान नियम के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में केवल 5 यादृच्छिक (Randomly selected) EVM की VVPAT पर्चियों का मिलान कंट्रोल यूनिट के नतीजों से किया जाता है।

मांग: विरोधियों की मांग है कि 100% VVPAT पर्चियों की मैनुअल गिनती की जाए या पर्ची मतदाता को सौंपकर उसे मतपेटी में डालने का मौका दिया जाए।

आरोप 4: विदेशी देशों द्वारा EVM का इस्तेमाल बंद करना

तर्क: जर्मनी, नीदरलैंड्स, अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग बंद करके पुनः बैलेट पेपर को अपनाया है। जब विकसित देश EVM पर भरोसा नहीं कर रहे, तो भारत को इस पर निर्भर क्यों रहना चाहिए?

8. निर्वाचन आयोग (ECI) और तकनीकी प्रणाली का विश्लेषण

भारत निर्वाचन आयोग, BEL/ECIL के वैज्ञानिकों और सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों के खिलाफ निम्नलिखित मजबूत तकनीकी व प्रशासनिक तर्क प्रस्तुत किए हैं:

1. हैकिंग की असंभवता (Stand-alone Unit)

तकनीकी तथ्य: भारतीय EVM पूरी तरह से ‘स्टैंड-अलोन’ (Standalone) डिवाइस है। इसमें कोई इंटरनेट, वाई-फाई, ब्लूटूथ, सिम कार्ड या external पोर्ट नहीं होता।

OTP चिप: EVM का सॉफ्टवेयर One-Time Programmable (OTP) माइक्रोचिप में जलाया (Burned) जाता है। इसे न तो री-प्रोग्राम किया जा सकता है और न ही चुनाव के दौरान संशोधित किया जा सकता है।

2. निर्माण और क्रम निर्धारण की अनिश्चितता (Randomisation)

तर्क का खंडन: जब BEL और ECIL में मशीनें बनती हैं, तब किसी को यह ज्ञात नहीं होता कि कौन सी मशीन किस राज्य, किस जिले या किस प्रत्याशी को आवंटित होगी।

रैंडमाइजेशन (Randomisation): मशीनों का आवंटन दो स्तरों पर कंप्यूटर द्वारा रैंडम तरीके से किया जाता है। उम्मीदवार का बैलेट पेपर पर क्रम (अल्फाबेटिकली) नामांकन के बाद तय होता है, जिससे किसी फिक्स्ड प्रोग्रामिंग की संभावना समाप्त हो जाती है।

3. मॉक पोल और राजनीतिक दलों की प्रत्यक्ष मौजूदगी (Administrative Checks)

चुनाव से पहले ‘फर्स्ट लेवल चेकिंग’ (FLC) होती है, जहां राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि खुद मशीन में 1,000+ वोट डालकर चेक करते हैं।

मतदान के दिन सुबह actual वोटिंग से पहले सभी दलों के पोलिंग एजेंटों के सामने मॉक पोल (Mock Poll) कराया जाता है और प्रमाण पत्र जारी होता है।

4. VVPAT का निष्पक्ष ऑडिट

VVPAT प्रणाली लाने का उद्देश्य ही voter audit क्षमता देना था।

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, अब तक 5 VVPAT पर्चियों के मिलान में लाखों बूथों में EVM डेटा और VVPAT slips के आंकड़ों में 99.99% सटीकता पाई गई है।

5. अंतर्राष्ट्रीय तुलना का भ्रम

जर्मनी या अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली मशीनों का स्वरूप Direct Recording Electronic (DRE) प्रकार का और कमर्शियल ऑपरेटिंग सिस्टम (जैसे Windows/Linux) पर चलने वाला था, जो नेटवर्क या पेनड्राइव से जुड़ सकती थीं।

भारतीय EVM का ऑपरेटिंग सिस्टम और हार्डवेयर अत्यंत सीमित, ऑफलाइन और इन-हाउस PSUs (ECIL/BEL) द्वारा निर्मित है, जो पश्चिमी देशों की मशीनों से पूरी तरह अलग है।

9. उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) का रुख

2024 का ऐतिहासिक फैसला (VVPAT verification case): सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 100% VVPAT पर्ची मिलान या बैलेट पेपर पर वापस लौटने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।

अदालत का स्पष्ट मत: कोर्ट ने माना कि EVM प्रणाली सुरक्षित, त्वरित और बूथ कैप्चरिंग जैसी पुरानी बुराइयों को रोकने में सफल रही है। बिना किसी ठोस सबूत के केवल संदेह के आधार पर पूरी प्रणाली पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

सुझाव/निर्देश: कोर्ट ने चुनावों के बाद उम्मीदवारों (द्वितीय/तृतीय स्थान पर रहे) को संदेह होने पर micro-controller की मेमोरी जांच कराने का प्रावधान करने की मंजूरी दी।

10. दुनिया के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों में EVM और बैलेट पेपर की स्थिति

लोकतंत्र की वैश्विक व्यवस्था में मतदान के तरीकों को लेकर अलग-अलग देशों ने अपनी भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार अलग-अलग रास्ते चुने हैं।

1. किन-किन देशों में EVM या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग का प्रयोग होता है?

दुनिया के कई देश अपने यहां इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल वोटिंग का इस्तेमाल करते हैं, हालांकि हर देश की तकनीक भारत से अलग हो सकती है:

  • भारत (India): दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, जहां संपूर्ण राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव पूरी तरह से EVM और VVPAT के माध्यम से होते हैं।
  • ब्राजील (Brazil): ब्राजील अपनी राष्ट्रीय और स्थानीय चुनावों में पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग करता है, जहां मतदाता मशीन पर नंबर दर्ज करते हैं।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): अमेरिका में कोई एक केंद्रीय प्रणाली नहीं है। इसके विभिन्न राज्यों और काउंटियों में अलग-अलग तरीके हैं। कई राज्यों में Electronic DRE (Direct Recording Electronic) मशीनों या ऑप्टिकल स्कैनर (Optical Scanners) का उपयोग होता है, जहां मतदाता डिजिटल स्क्रीन पर वोट डालते हैं और मशीन पर्ची भी जनरेट करती है।
  • फिलीपींस (Philippines): यहां भी राष्ट्रीय चुनावों में ऑटोमेटेड ओसीआर (Optical Character Recognition) आधारित वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है।
  • एस्टोनिया (Estonia): यह देश दुनिया में ऑनलाइन/इंटरनेट वोटिंग (Online Voting) का pioneer माना जाता है। यहां के नागरिक सुरक्षित डिजिटल आईडी के जरिए इंटरनेट से भी वोट डाल सकते हैं।
  • अन्य देश: बेल्जियम, वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और भूटान व नामबिला (जो भारत निर्मित EVM का उपयोग करते हैं) जैसी जगहों पर भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के रूप प्रचलित हैं।

2. किन-किन बड़े लोकतांत्रिक देशों में बैलेट पेपर का प्रयोग होता है?

दुनिया के कई विकसित और बड़े लोकतांत्रिक देश आज भी पारंपरिक पेपर बैलेट (कागज के मतपत्र) या मैनुअल तरीकों से चुनाव कराते हैं:

  • यूनाइटेड किंगडम (UK / ब्रिटेन): ब्रिटेन में संसद और स्थानीय चुनावों में आज भी पूरी तरह से बैलेट पेपर का उपयोग किया जाता है। मतदाता बूथ पर जाकर पेपर पर क्रॉस का निशान लगाते हैं और उसे मतपेटी में डालते हैं।
  • कनाडा (Canada): कनाडा में संघीय और प्रांतीय स्तर पर पारदर्शी तरीके से कागज के बैलेट पेपर और हाथ से मार्किंग की व्यवस्था है।
  • जर्मनी (Germany): जर्मनी दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में एक है, लेकिन वहां की संवैधानिक अदालत (Federal Constitutional Court) के आदेश के बाद EVM पर प्रतिबंध लगा दिया गया और देश पूरी तरह पारंपरिक पेपर बैलेट पर लौट आया।
  • ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड और फ्रांस: फ्रांस के कुछ शहरी इलाकों में इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का प्रयोग होता है, लेकिन अधिकांश यूरोपीय देशों में आज भी पेपर बैलेट ही प्राथमिक माध्यम हैं। (स्विट्जरलैंड में डाक द्वारा या बैलेट से मतदान होता है)।
  • ऑस्ट्रेलिया (Australia): ऑस्ट्रेलिया में चुनावों के लिए वरीयता क्रम (Preferential Voting) वाले लंबे पेपर बैलेट का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मतदाता खुद भरते हैं।

3. जहां बैलेट पेपर का प्रयोग होता है, वहां ऐसा क्यों किया जाता है?

विकसित देशों द्वारा बैलेट पेपर या मैन्युअल प्रणाली को प्राथमिकता देने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:

1. भौतिक सत्यापन और जनता का विश्वास (Verifiability)

कई देशों की सोच यह है कि कागज का एक टुकड़ा सबसे पारदर्शी माध्यम है। एक आम नागरिक के लिए यह समझना बहुत आसान होता है कि उसका वोट कागज पर दर्ज होकर पेटी में गया है। इसमें किसी जटिल सॉफ्टवेयर या चिप की पारदर्शिता पर संदेह करने की गुंजाइश नहीं बचती।

2. जर्मनी की अदालत का ऐतिहासिक फैसला (संवैधानिक पारदर्शिता)

जर्मनी में जब EVM का प्रयोग शुरू हुआ था, तब वहां के नागरिकों ने अदालत में चुनौती दी। जर्मनी के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि “लोकतंत्र की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसे देश का आम नागरिक बिना किसी तकनीकी विशेषज्ञ (Technical Expert) की मदद के पूरी तरह समझ सके।” चूँकि EVM के अंदर का सोर्स कोड आम आदमी की समझ से बाहर होता है, इसलिए इसे लोकतांत्रिक पारदर्शिता के खिलाफ माना गया।

3. छोटी आबादी और कम भौगोलिक विस्तार

ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की आबादी (भारत की तुलना में) काफी कम है और वहां मतदाता केंद्र सीमित होते हैं। कम आबादी वाले देशों में कुछ ही घंटों में हाथों से पर्चियों की गिनती (Manual Counting) आसानी से पूरी हो जाती है, इसलिए उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की उतनी बड़ी आवश्यकता महसूस नहीं होती जितनी भारत जैसे 90+ करोड़ मतदाताओं वाले विशाल देश को है।

4. तकनीकी विफलता का डर (Technical Glitch Phobia)

पश्चिमी देशों में यह डर रहता है कि यदि चुनाव के दिन किसी सॉफ्टवेयर में तकनीकी खराबी आ गई, साइबर हमला हो गया या मशीनें हैंग हो गईं, तो पूरे देश का चुनाव संकट में पड़ सकता है। इसके मुकाबले कागज के बैलेट पेपर कभी ‘क्रैश’ नहीं होते।

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