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CA for Mains

चीन से व्यापार: निर्यात बढ़ा, पर घाटे का शतक कायम (Trade with China: Exports rise, but the century of deficit persists)

By Result Mitra •

Date: 15/10/2026

RESULT MITRA · IAS PCS INSTITUTE

चीन से व्यापार: निर्यात बढ़ा, पर घाटे का शतक कायम

Trade with China: Exports rise, but the century of deficit persists.

Source: The Hindu

संदर्भ

चीन के कस्टम्स विभाग के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली तीन तिमाहियों (जनवरी-सितंबर) में भारत का चीन को निर्यात 40.7% बढ़कर $19.26 अरब पहुँच गया है। इसके बावजूद, चीन से आयात 23.3% बढ़कर $125.19 अरब होने के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़कर रिकॉर्ड $105.93 अरब हो चुका है।

दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार $144.45 अरब रहा। भारतीय पक्ष के लिए मुख्य चिंता व्यापार घाटे की तीव्र वृद्धि, भारतीय उत्पादों को चीनी बाजार में सीमित पहुंच तथा चीन द्वारा उर्वरक एवं दुर्लभ पृथ्वी (Rare Earths) धातुओं पर लागू निर्यात नियंत्रण है। हालिया ब्रिक्स बैठक में शीर्ष नेतृत्व ने इन ढांचागत असंतुलनों को दूर करने पर सहमति जताई है।

UPSC मुख्य परीक्षा हेतु सीख

GS Paper 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध & नीति): भारत-चीन द्विपक्षीय संबंध, आर्थिक कूटनीति, भू-राजनीतिक तनावों के बीच व्यापारिक निर्भरता, और वैश्विक मंचों (जैसे BRICS, WTO) में असंतुलन से जुड़े मुद्दों का विश्लेषण।
GS Paper 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था & विनिर्माण): व्यापार घाटा (Trade Deficit), चालू खाता घाटा (CAD), आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा (Supply Chain Resilience), विनिर्माण क्षेत्र की चुनौतियाँ, और आत्मनिर्भर भारत/PLI योजनाओं की प्रासंगिकता।
रणनीतिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा: दवाओं (APIs), सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा (सौर घटकों) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में एकल देश पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को समझना।
UPSC Mains Question

Q. “भारत और चीन के बीच बढ़ता द्विपक्षीय व्यापार और रिकॉर्ड व्यापार घाटा भारत की दीर्घकालिक आर्थिक संप्रभुता के लिए एक संरचनात्मक चुनौती है।” इस कथन के आलोक में भारत-चीन व्यापार असंतुलन के मूल कारणों का परीक्षण कीजिए तथा इस निर्भरता को कम करने हेतु व्यावहारिक रणनीतियों का सुझाव दीजिए।

उत्तर का प्रारूप

भूमिका: वर्ष 2026 के ताजा व्यापारिक आँकड़ों ($105.93 अरब का व्यापार घाटा) का उल्लेख करते हुए द्विपक्षीय व्यापार की वर्तमान स्थिति का परिचय।
मुख्य भाग:

○ असंतुलन के कारण: तैयार माल (इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, उर्वरक) के आयात बनाम कच्चे माल (सीफूड, नेफ्था) के निर्यात का अंतर।

○ बाजार पहुँच और गैर-टैरिफ बाधाएँ: भारतीय फर्मों (फार्मा, आईटी और कृषि) के लिए चीनी बाजार में प्रवेश की कठिनाइयाँ।

○ आपूर्ति और रणनीतिक जोखिम: चीन द्वारा दुर्लभ पृथ्वी (Rare Earths) और उन्नत घटकों पर निर्यात नियंत्रण।

○ आगे की राह (Way Forward): PLI योजनाओं का विस्तार, ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति, घरेलू स्तर पर मध्यवर्ती वस्तुओं (Intermediates) का उत्पादन और द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से बाजार पहुँच की माँग।

निष्कर्ष (Conclusion): संतुलित आर्थिक वृद्धि और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए समग्र दृष्टिकोण।

मॉडल उत्तर

भूमिका

चीन के सीमा शुल्क प्रशासन द्वारा जारी हालिया आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार $144.45 अरब तक पहुँच गया है। यद्यपि भारत का निर्यात 40.7% बढ़कर $19.26 अरब हुआ है, किंतु चीन से आयात $125.19 अरब तक पहुँच जाने के कारण व्यापार घाटा $105.93 अरब के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया है।

व्यापार असंतुलन के मुख्य आयाम एवं कारण

संरचनात्मक व्यापार विषमता: भारत चीन को मुख्य रूप से प्राथमिक और निचले मूल्य वाले उत्पाद जैसे समुद्री उत्पाद (Seafood products), नेफ्था और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड के कुछ हिस्सों का निर्यात करता है। इसके विपरीत, भारत चीन से भारी मात्रा में तैयार इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और विनिर्माण से जुड़ी अंतरिम वस्तुएँ (intermediates) आयात करता है।
बाजार पहुँच (Market Access) का अभाव: प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हालिया ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की बैठकों में भी इस बात को रेखांकित किया गया कि भारतीय कंपनियों को चीनी बाजार में समान और सार्थक पहुँच नहीं मिलती है।
चीनी निर्यात नियंत्रण: उर्वरकों और दुर्लभ पृथ्वी (Rare Earths) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन द्वारा लगाए जा रहे कड़े निर्यात नियंत्रण भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए अनिश्चितता पैदा करते हैं।

आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी प्रभाव (Multidimensional Impacts)

आर्थिक आयाम–चालू खाता घाटे (CAD) पर दबाव: चीन के साथ $105.93 अरब का भारी व्यापार घाटा भारत के कुल व्यापार संतुलन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनता है और भारतीय रुपये की विनिमय दर में अस्थिरता का जोखिम रहता है।
रणनीतिक एवं आपूर्ति श्रृंखला जोखिम आयाम– अत्यधिक भू-राजनीतिक निर्भरता: सक्रिय औषधीय घटकों (APIs – 70%), सौर कोशिकाओं/मॉड्यूल (65-70%) और सेमीकंडक्टर उपकरणों के लिए चीन पर उच्च निर्भरता के कारण सीमा पार तनाव या सैन्य गतिरोध की स्थिति में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली अत्यधिक संवेदनशील (Vulnerable) हो जाती है।
तकनीकी एवं औद्योगिक विनिर्माण आयाम–मूल्य संवर्धन (Value Addition) में गिरावट: भारत चीन से उच्च-तकनीकी एवं तैयार पूंजीगत वस्तुएं (Capital Goods) आयात करता है और बदले में केवल कम मूल्य वाले कच्चे माल (जैसे नेफ्था, सीफूड) का निर्यात करता है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था केवल “अंतिम असेंबली पॉइंट” बनकर रह जाती है, जिससे स्वदेशी आर एंड डी (R&D) और तकनीकी नवाचार अवरुद्ध होता है।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग–घरेलू विनिर्माण का ह्रास (Inverted Duty Structure & Dumping): चीन से आने वाले सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान, खिलौने, प्लास्टिक और रसायन भारतीय एमएसएमई (MSMEs) की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता को नुकसान पहुँचाते हैं। इससे स्थानीय उद्योगों का विस्थापन होता है और विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन की क्षमता प्रभावित होती है।
हरित संक्रमण एवं ऊर्जा सुरक्षा आयाम–नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों पर अनिश्चितता: भारत के नेट-ज़ीरो (Net-Zero) और सौर ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य काफी हद तक चीनी सौर वेफर्स, घटकों और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं (Rare Earth Elements) के आयात पर आधारित हैं। चीन द्वारा हाल ही में लगाए गए निर्यात नियंत्रण भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन (Clean Energy Transition) की गति को धीमा कर सकते हैं।

आगे की राह

घरेलू मध्यवर्ती विनिर्माण (Upstream Manufacturing): भारत को केवल अंतिम उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और मशीनरी के लिए आवश्यक ‘इंटरमीडिएट्स’ (कच्चे माल और पुर्जों) का देश में ही उत्पादन बढ़ाना होगा।
रणनीतिक विविधीकरण (China Plus One): महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति के लिए आसियान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक साझेदारियों को अधिक मजबूत करना चाहिए।
द्विपक्षीय कूटनीति का उपयोग: ब्रिक्स और अन्य कूटनीतिक मंचों का उपयोग करते हुए चीनी बाजारों में भारतीय आईटी, फार्मा और कृषि उत्पादों के लिए बाधा-मुक्त और पारदर्शी पहुँच सुनिश्चित कराई जानी चाहिए।

निष्कर्ष

भारत और चीन के आर्थिक संबंध वर्तमान में एक गहरी संरचनात्मक असंगति का सामना कर रहे हैं। यद्यपि कूटनीतिक बैठकों में चिंताओं को दूर करने पर सहमति बनी है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है जब भारत अपनी घरेलू विनिर्माण क्षमताओं (Make in India) को सुदृढ़ करे और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति को अधिक संतुलित बनाए।

अभ्यास प्रश्न

Q. भारत-चीन व्यापार संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में भारत का चीन के साथ कुल द्विपक्षीय व्यापार और व्यापार घाटा दोनों में वृद्धि दर्ज की गई है।

2. भारत चीन को मुख्य रूप से उच्च-मूल्य वर्धित इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी का निर्यात करता है, जबकि चीन से कच्चे माल का आयात करता है।

3. भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच हालिया बैठकों में व्यापार असंतुलन और बाजार पहुँच से जुड़ी चिंताओं को दूर करने पर चर्चा हुई है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3
अभ्यास प्रश्न का उत्तर देखें
उत्तर: (C) केवल 1 और 3

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