नारियल की जड़ में लगने वाले रोग से निपटने के लिए सहभागी विज्ञान क्यों महत्वपूर्ण है?

UPSC प्रासंगिकता


● GS पेपर II: शासन में नागरिकों की भूमिका, किसानों की भागीदारी।
● GS पेपर III: कृषि, पौधों के रोग, जलवायु परिवर्तन, जैव प्रौद्योगिकी।

चर्चा में क्यों?


फाइटोप्लाज्मा (Phytoplasma) द्वारा जनित ‘रूट विल्ट’ (जड़ का मुरझाना) रोग ने केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के बड़े नारियल उत्पादक क्षेत्रों को तबाह कर दिया है। ये तीन राज्य मिलकर भारत के कुल नारियल उत्पादन का लगभग 82-83% हिस्सा उत्पादित करते हैं। 150 वर्षों के शोध के बाद भी इस बीमारी का कोई निश्चित इलाज नहीं मिल पाया है। इसी कारण, विशेषज्ञ अब इस बीमारी से लड़ने के लिए सहभागी विज्ञान (Participatory Science) और किसानों के नेतृत्व में चयन को एक स्थायी समाधान के रूप में वकालत कर रहे हैं।


पृष्ठभूमि:

नारियल और रूट विल्ट रोग
नारियल भारत की सबसे महत्वपूर्ण वृक्षारोपण और बागवानी फसलों में से एक है, जो प्रायद्वीपीय भारत की अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। केरल का अलाप्पुझा और तमिलनाडु का पोलाची जैसे क्षेत्र वैश्विक स्तर पर नारियल के परिदृश्य के रूप में जाने जाते हैं।


रूट विल्ट रोग के लक्षण और प्रभाव:


● यह फाइटोप्लाज्मा के कारण होता है, जो एक बैक्टीरिया जैसा जीव है।
● यह ‘वेक्टर-जनित’ (Vector-borne) है, जो चूसने वाले कीटों के माध्यम से फैलता है।
● यह घातक तो नहीं है लेकिन पेड़ को बहुत कमजोर कर देता है, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आती है।
● एक सदी से अधिक के शोध के बावजूद इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है।
● एक बार संक्रमित होने के बाद, पेड़ अनुत्पादक हो जाते हैं और संक्रमण के भंडार (Reservoirs) के रूप में कार्य करते रहते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर बीमारी तेजी से फैलती है।
अब यह बीमारी इतनी तेजी से क्यों फैल रही है?
पहले रूट विल्ट धीरे-धीरे फैलता था, लेकिन आज इसके विस्तार में तेजी आई है, जिसके पीछे निम्नलिखित कारक हैं:

  1. जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न तनाव: बढ़ता तापमान और अनियमित जलवायु पैटर्न नारियल के पेड़ों को कमजोर कर रहे हैं। अजैविक तनाव (Abiotic stress) पौधों की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) को कम कर देता है, जिससे वे रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
  2. नए कीटों का उदय: सफेद मक्खी (Whiteflies) और अन्य चूसने वाले कीटों के प्रसार ने इस बीमारी के वाहकों की संख्या बढ़ा दी है, जिससे संक्रमण की दर तेज हो गई है।
  3. मोनोकल्चर और निरंतर वृक्षारोपण: बड़े और बिना किसी रुकावट वाले नारियल के बागान हवा और कीटों के माध्यम से बीमारी को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में मदद करते हैं।
    प्रभाव: प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में 30 लाख से अधिक नारियल के पेड़ पहले ही प्रभावित हो चुके हैं।
    सामाजिक-आर्थिक परिणाम
    पोलाची जैसे क्षेत्रों में, नारियल के बागानों में कोको और जायफल जैसी अंतर-फसलों (Intercropping) की खेती की जाती है।
    ● नारियल की ऊपरी छतरी (Canopy) इन फसलों को आवश्यक छाया प्रदान करती है।
    ● नारियल के पेड़ों के नष्ट होने से अंतर-फसलें सीधे उच्च तापमान और गर्मी के संपर्क में आ जाती हैं।
    ● परिणाम: इससे न केवल नारियल का नुकसान होता है, बल्कि पूरी खेती प्रणाली ही चरमरा जाती है, जिससे किसानों की आजीविका और ग्रामीण लचीलेपन (Resilience) पर खतरा मंडराने लगता है।
    मौजूदा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की सीमाएँ
  4. एकीकृत फसल प्रबंधन (Integrated Crop Management): अनुसंधान संस्थानों ने पोषक तत्व प्रबंधन और जैविक-अजैविक आदानों के संयोजन को बढ़ावा दिया है। हालांकि, इस बीमारी के लक्षण काफी समय बाद दिखाई देते हैं। जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक नुकसान अपरिवर्तनीय (Irreversible) हो चुका होता है।
  5. प्रतिरोधी और सहनशील किस्में: CPCRI ने एक प्रतिरोधी (Resistant) और तीन सहनशील (Tolerant) किस्में जारी की हैं। लेकिन, इनकी पौध (Seedling) का उत्पादन सालाना केवल कुछ हजार तक ही सीमित है, जो लाखों प्रभावित पेड़ों की तुलना में बहुत कम है।
    प्रजनन (Breeding) सबसे प्रभावी दीर्घकालिक समाधान क्यों है?
    अफ्रीका और कैरिबियन के वैश्विक अनुभव बताते हैं कि फाइटोप्लाज्मा रोगों के खिलाफ प्रतिरोधी/सहनशील किस्मों का प्रजनन ही सबसे सफल रणनीति है। हालांकि विदेशी किस्मों का आयात किया जा सकता है, लेकिन एक अधिक टिकाऊ समाधान भारत के भीतर ही मौजूद है।
    सहभागी विज्ञान: मुख्य तर्क
    सहभागी विज्ञान क्या है? इसमें रोग-सहनशील पौधों की पहचान करने, वास्तविक क्षेत्रीय स्थितियों में उनके प्रदर्शन की निगरानी करने और सफल किस्मों के प्रजनन में किसानों और वैज्ञानिकों के बीच सक्रिय सहयोग शामिल है।
    किसान केंद्र में क्यों हैं? अत्यधिक संक्रमित क्षेत्रों में भी, कुछ नारियल के पेड़ बीमारी के भारी दबाव के बावजूद जीवित रहते हैं। इन पेड़ों में प्राकृतिक रूप से सहनशीलता वाले जीन (Genes) होते हैं। किसानों को प्रशिक्षित करके वे:
    ● ऐसे विशिष्ट पेड़ों की पहचान कर सकते हैं।
    ● उनका दीर्घकालिक रिकॉर्ड रख सकते हैं।
    ● व्यवस्थित क्षेत्र चयन (Field selection) में सहायता कर सकते हैं।
    यह दृष्टिकोण अनुसंधान संस्थानों पर बोझ कम करता है, क्षेत्र-संबंधित डेटा उत्पन्न करता है और किस्मों के विकास की गति को बढ़ाता है।
    सहभागी प्रजनन के लाभ:
    ● विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत चयन।
    ● स्थानीय रूप से अनुकूलित किस्मों की पहचान।
    ● किसान-आधारित नर्सरी के माध्यम से तेजी से प्रसार।
    ● वैज्ञानिक समाधानों में किसानों के भरोसे और स्वामित्व में वृद्धि।
    ● साथ ही, ‘पौधा किस्म और किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001’ के तहत किसानों को रॉयल्टी का लाभ भी मिल सकता है।
    समन्वित संस्थागत कार्रवाई की आवश्यकता
    रूट विल्ट के तेजी से प्रसार को देखते हुए अब खंडित प्रयासों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
    ● CPCRI, नारियल विकास बोर्ड (CDB) और केरल, तमिलनाडु एवं कर्नाटक के राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के बीच मजबूत समन्वय।
    ● डेटा संग्रह और सहनशील किस्मों के सत्यापन के लिए एक साझा ढांचा।
    आगे की राह (Way Forward)
    ● स्थानिक (Endemic) क्षेत्रों में नागरिक विज्ञान (Citizen Science) और सहभागी चयन को बढ़ावा देना।
    ● किसान प्रशिक्षण और विकेंद्रीकृत प्रजनन कार्यक्रमों में निवेश करना।
    ● रोगग्रस्त पेड़ों को तेजी से बदलने के लिए नर्सरी के बुनियादी ढांचे का विस्तार करना।
    ● वृक्षारोपण फसल नीति में जलवायु लचीलेपन (Climate Resilience) को एकीकृत करना।
    निष्कर्ष
    रूट विल्ट रोग जलवायु परिवर्तन, कीट गतिशीलता और मोनोकल्चर की संवेदनशीलता का एक जटिल परिणाम है। इलाज के अभाव में, भारत की नारियल अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए ‘सहभागी विज्ञान’ सबसे विश्वसनीय और टिकाऊ मार्ग है। वैज्ञानिक समाधानों के सह-निर्माता के रूप में किसानों को सशक्त बनाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है।
    UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न


  1. प्रश्न 1. नारियल रूट विल्ट रोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
  2. यह एक वायरस के कारण होता है और इससे नारियल के पेड़ों की तत्काल मृत्यु हो जाती है।
  3. यह रोग कीट वाहकों, विशेष रूप से चूसने वाले कीटों के माध्यम से फैलता है।
  4. संक्रमित पेड़ जीवित रहने पर भी संक्रमण के स्रोत के रूप में कार्य करते रहते हैं।
    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
    A) केवल 1 B) केवल 2 और 3 C) केवल 1 और 2 D) 1, 2 और 3
    सही उत्तर: B


प्रश्न 2. वृक्षारोपण फसलों में फाइटोप्लाज्मा-जनित रोगों के प्रबंधन के लिए प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का प्रजनन सबसे प्रभावी रणनीति क्यों माना जाता है?


A) रासायनिक नियंत्रण अत्यधिक प्रभावी लेकिन महंगा है।
B) लक्षण तुरंत दिखाई देते हैं, जिससे उन्हें जल्दी हटाना संभव होता है।
C) इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है और संक्रमित पौधे बीमारी के भंडार बने रहते हैं।
D) फाइटोप्लाज्मा प्रतिरोधी किस्मों में जीवित नहीं रह सकता।
सही उत्तर: C


    प्रश्न 3. कृषि में सहभागी विज्ञान (Participatory Science) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. इसमें फसल की किस्मों की पहचान और चयन में किसानों की सक्रिय भागीदारी शामिल होती है।
    2. यह वास्तविक क्षेत्र की स्थितियों में स्थानीय रूप से अनुकूलित किस्मों की पहचान करने में मदद करता है।
    3. यह वैज्ञानिक संस्थानों की भूमिका को पूरी तरह से प्रतिस्थापित (Replace) कर देता है।
      उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
      A) केवल 1 और 2 B) केवल 2 C) केवल 1 and 3 D) 1, 2 और 3
      सही उत्तर: A

    Leave a Comment

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Scroll to Top