वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा व अधिकारों हेतु नया केरलम विधेयक (New Keralam Bill to Protect the Dignity and Rights of Senior Citizens)
वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा व अधिकारों हेतु नया केरलम विधेयक
New Keralam Bill to Protect the Dignity and Rights of Senior Citizens
संदर्भ
केरल (केरलम) राज्य अपनी बदलती जनसांख्यिकीय संरचना (Demographic Transition) के कारण उत्पन्न सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए कानूनी ढाँचा तैयार कर रहा है। भारत में केरल में बुजुर्ग आबादी का प्रतिशत सबसे अधिक है। वैश्वीकरण, युवाओं के प्रवास और एकल परिवारों (Nuclear Families) के बढ़ते चलन के कारण पारंपरिक पारिवारिक देखभाल प्रणाली कमजोर हुई है।
इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित विधेयक देखभालकर्ताओं के मानकों को संस्थागत बनाने, सुरक्षा निकायों की स्थापना करने, डिजिटल समावेशिता बढ़ाने, बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार को रोकने तथा उनकी सामाजिक सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करता है।
UPSC मुख्य परीक्षा के लिए कैसे पढ़ें
- सामान्य अध्ययन पत्र-II: कल्याणकारी योजनाएँ एवं शासन: वरिष्ठ नागरिकों का स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, कानूनी संरक्षण तथा नियामक संस्थाओं की भूमिका।
- सामान्य अध्ययन पत्र-I: भारतीय समाज: जनसांख्यिकीय संक्रमण, एकल परिवारों का विस्तार और सामाजिक सुरक्षा पर वैश्वीकरण का प्रभाव।
महत्त्वपूर्ण अवधारणाएँ
- एजिंग इन प्लेस: घर एवं समुदाय में सम्मानजनक वृद्धावस्था।
- सिल्वर इकोनॉमी: वृद्धजनों की आर्थिक भागीदारी।
- केयर इकोनॉमी: देखभाल सेवाओं का मानकीकरण एवं विनियमन।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
“भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण आयु संरचना में बदलाव ला रहा है, जिससे जराचिकित्सा देखभाल एक तत्काल नीतिगत प्राथमिकता बन गई है। इस संदर्भ में, बुजुर्गों के समक्ष आने वाली सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए तथा चर्चा कीजिए कि एक समग्र कानूनी और संस्थागत ढाँचा किस प्रकार सक्रिय और गरिमापूर्ण वृद्धावस्था सुनिश्चित कर सकता है।”
Answer Format
भूमिका: भारत में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और ‘गरिमापूर्ण एवं सक्रिय वृद्धावस्था’ की आवश्यकता पर संक्षिप्त प्रकाश।
मुख्य भाग 1 (सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ):
- सामाजिक: पारंपरिक पारिवारिक तंत्र का कमजोर होना, एकल परिवार, सामाजिक अलगाव, दुर्व्यवहार और डिजिटल अलगाव।
- आर्थिक एवं स्वास्थ्य: वित्तीय असुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा तंत्र की कमी, स्वास्थ्य पर अत्यधिक निजी खर्च, मानकीकृत गृह-देखभाल का अभाव।
मुख्य भाग 2 (आवश्यक कानूनी व संस्थागत ढाँचा):
- संस्थागत तंत्र (संरक्षण इकाइयाँ, रजिस्टर और शिकायत निवारण)।
- देखभाल सेवा की गुणवत्ता (प्रमाणन ढाँचा, देखभाल केंद्रों का विनियमन)।
- अधिकार-आधारित दृष्टिकोण (डिजिटल समावेश, कानूनी सहायता, दुर्व्यवहार से सुरक्षा और नीति निर्माण में भागीदारी)।
निष्कर्ष: बुजुर्गों की देखभाल को केवल ‘कल्याणकारी/दान’ के दृष्टिकोण से हटाकर ‘अधिकार-आधारित’ मॉडल की ओर ले जाने पर जोर।
मॉडल उत्तर
भूमिका
भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण के कारण वृद्धजनों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। यूएनएफपीए की भारत वृद्धावस्था रिपोर्ट, 2023 के अनुसार, 2022 में 60 वर्ष से अधिक आयु के 14.9 करोड़ लोग (लगभग 10.5%) थे, जिनकी संख्या 2050 तक बढ़कर 34.7 करोड़ (20.8%) होने का अनुमान है। अतः गरिमापूर्ण एवं सक्रिय वृद्धावस्था सुनिश्चित करना एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत प्राथमिकता बन गया है।
सामाजिक चुनौतियाँ
- पारिवारिक देखभाल में कमी: शहरीकरण, प्रवास और एकल परिवारों के विस्तार से संयुक्त परिवारों की पारंपरिक देखभाल व्यवस्था कमजोर हो रही है। एलएएसआई के अनुसार, लगभग 48.2% बुजुर्ग स्वास्थ्य व्यय के लिए पूरी तरह परिवार पर निर्भर हैं।
- सामाजिक अलगाव: जीवनसाथी की मृत्यु, संतानों का प्रवास और भावनात्मक सहारे की कमी के कारण बुजुर्ग, विशेषकर विधवा महिलाएँ, अकेलेपन एवं मानसिक तनाव का सामना करती हैं।
- दुर्व्यवहार: हेल्पएज इंडिया की 2023 की रिपोर्ट में वृद्ध महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार में 16% वृद्धि का उल्लेख है। इसमें शारीरिक हिंसा, मौखिक अपमान और भावनात्मक उत्पीड़न शामिल हैं।
- डिजिटल विभाजन: डिजिटल भुगतान, टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन पेंशन सेवाओं के विस्तार के बावजूद बुजुर्गों की डिजिटल पहुँच सीमित है। हेल्पएज के अनुसार, 60% वृद्ध महिलाएँ डिजिटल उपकरणों का उपयोग नहीं कर पाई थीं।
आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ
- वित्तीय असुरक्षा: अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश बुजुर्गों के पास पर्याप्त पेंशन, बचत और बीमा नहीं है। हेल्पएज के अनुसार, 78% वृद्ध महिलाएँ सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से अनजान थीं।
- स्वास्थ्य संबंधी बोझ: एलएएसआई के अनुसार, 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 35% लोगों को हृदय संबंधी रोग, 14% को मधुमेह और 8% को पुरानी फेफड़ों की बीमारी है। बुजुर्ग-निर्भरता वाले परिवारों में विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय की दर 33.2% दर्ज की गई।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच: लगभग एक-तिहाई बुजुर्ग सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग कर पाते हैं, जिससे निजी एवं महँगी चिकित्सा पर निर्भरता बढ़ती है।
- देखभाल सेवाओं का अभाव: घरेलू नर्सिंग, दीर्घकालिक देखभाल, पुनर्वास तथा प्रशिक्षित जराचिकित्सकों की अपर्याप्त उपलब्धता एक गंभीर चुनौती है।
सरकारी पहल
- राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE): वृद्धजनों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाओं तथा जराचिकित्सा सुविधाओं के विकास को बढ़ावा देता है।
- माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007: भरण-पोषण अधिकरणों, वृद्धाश्रमों और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण हेतु कानूनी आधार प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP): पात्र वृद्धजनों, विधवाओं और दिव्यांग व्यक्तियों को सामाजिक पेंशन प्रदान करता है।
- आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना: पात्र लाभार्थियों को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित स्वास्थ्य उपचार हेतु वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है।
- एल्डरलाइन (14567): वरिष्ठ नागरिकों को सहायता, परामर्श और शिकायत निवारण संबंधी सेवाएँ उपलब्ध कराती है।
- राज्य स्तरीय पेंशन योजनाएँ: वृद्धजनों को अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करके सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करती हैं।
आवश्यक कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा
- भरण-पोषण अधिकरणों को सुदृढ़ करना: समयबद्ध सुनवाई, आदेशों का प्रभावी क्रियान्वयन और निःशुल्क कानूनी सहायता सुनिश्चित की जाए। प्रस्तावित संशोधनों में दायित्व का विस्तार तथा ₹10,000 की मासिक सीमा हटाने जैसे प्रावधान शामिल रहे हैं।
- दुर्व्यवहार से संरक्षण: पुलिस, हेल्पलाइन, समाज कल्याण विभाग और विधिक सेवा प्राधिकरण को एकीकृत शिकायत निवारण तंत्र से जोड़ा जाए। हेल्पएज के अनुसार, 56% वृद्ध महिलाएँ शिकायत तंत्र से अनजान थीं।
- देखभाल केंद्रों का विनियमन: वृद्धाश्रमों, दिवस-देखभाल केंद्रों और घरेलू देखभाल एजेंसियों का अनिवार्य पंजीकरण, नियमित निरीक्षण तथा कर्मचारियों का प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए।
- एकीकृत जराचिकित्सा सेवाएँ: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में वृद्धजन ओपीडी, घर-आधारित स्वास्थ्य जाँच, दीर्घकालिक रोगों की निगरानी, भौतिक चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
- डिजिटल समावेशन: सरल डिजिटल सेवाओं, ऑफलाइन सहायता केंद्रों और डिजिटल साक्षरता अभियानों का विस्तार किया जाए।
- नीति निर्माण में भागीदारी: राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय वृद्धजन आयोगों और जिला स्तरीय वरिष्ठ नागरिक परिषदों के माध्यम से बुजुर्गों की निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाई जाए।
निष्कर्ष
भारत को वृद्धावस्था को भार नहीं, बल्कि अधिकारों, गरिमा और सक्रिय भागीदारी की अवस्था के रूप में देखना होगा। पर्याप्त पेंशन, सुलभ जराचिकित्सा सेवाएँ, प्रशिक्षित देखभालकर्मी, प्रभावी कानूनी संरक्षण और डिजिटल समावेशन इसके प्रमुख आधार हैं। अतः वृद्धजन नीति को सामान्य कल्याणकारी दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर अधिकार-आधारित, पर्याप्त वित्तपोषित और प्रभावी रूप से क्रियान्वित व्यवस्था में परिवर्तित करना आवश्यक है।
अभ्यास प्रश्न
भारत में वृद्धजनों की देखभाल से संबंधित प्रमुख योजनाएँ
- अटल वयो अभ्युदय योजना (AVYAY): वृद्धजनों के कल्याण, वृद्धाश्रमों, डे-केयर केंद्रों तथा सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन को बढ़ावा देने वाली योजना।
- राष्ट्रीय वयोश्री योजना (RVY): पात्र वरिष्ठ नागरिकों को आयु-संबंधी दिव्यांगता एवं शारीरिक कमजोरियों से निपटने के लिए सहायक उपकरण प्रदान करती है।
- राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP): गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले पात्र वृद्धजनों, विधवाओं और दिव्यांग व्यक्तियों को सामाजिक पेंशन के माध्यम से सहायता प्रदान करता है।
- वृद्धजनों की स्वास्थ्य देखभाल हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPHCE): वृद्धजनों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों और जराचिकित्सा केंद्रों के माध्यम से विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने पर केंद्रित है।
- अटल पेंशन योजना (APY): असंगठित क्षेत्र सहित पात्र अभिदाताओं को 60 वर्ष की आयु के बाद योगदान के आधार पर ₹1,000 से ₹5,000 तक की गारंटीकृत न्यूनतम मासिक पेंशन प्रदान करती है।
भारत की अंतरराष्ट्रीय एवं नीतिगत प्रतिबद्धताएँ
- वृद्ध व्यक्तियों पर राष्ट्रीय नीति (NPOP), 1999: वृद्धजनों की आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और सम्मानजनक जीवन को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई नीति।
- वृद्धावस्था पर मैड्रिड अंतरराष्ट्रीय कार्ययोजना (2002): वृद्धजनों के विकास, स्वास्थ्य एवं कल्याण तथा अनुकूल वातावरण के निर्माण पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय कार्ययोजना।
- स्वस्थ वृद्धावस्था का संयुक्त राष्ट्र दशक (2021–2030): वृद्धजनों के स्वास्थ्य, कार्यात्मक क्षमता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए वैश्विक पहल।
- सतत विकास लक्ष्य-3 (SDG-3): सभी आयु वर्गों के लोगों के लिए स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करने और कल्याण को बढ़ावा देने का लक्ष्य।