
| UPSC Syllabus Linkage: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 (Governance & Social Justice): गरीबी और विकासात्मक मुद्दे, स्वास्थ्य और मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र के विकास और प्रबंधन से जुड़े विषय। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 (Indian Economy): भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों की जुगत, वृद्धि, विकास और रोजगार। |
चर्चा में क्यों?
विश्व बैंक की हालिया चेतावनियों और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्यों के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था एक ‘मौन तबाही’ (Silent Catastrophe) के कगार पर खड़ी है। अगले दशक में वैश्विक दक्षिण (Global South) के करीब 1.2 बिलियन युवा कार्यशील आयु वर्ग में प्रवेश करेंगे, लेकिन इसके विपरीत दुनिया भर में केवल 400 मिलियन व्यावहारिक नौकरियां ही पैदा होने का अनुमान है। यह स्थिति वैश्विक स्तर पर 800 मिलियन नौकरियों के ऐतिहासिक घाटे को दर्शाती है। यदि इस विशाल जनसांख्यिकीय उभार को उत्पादक रोजगार नहीं मिला, तो यह आर्थिक लाभांश बनने के बजाय दुनिया भर में व्यापक अस्थिरता, सामाजिक ध्रुवीकरण और चरमपंथ का कारक बन जाएगा। ऐसे अभूतपूर्व संकट के समय भारत, जो दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, अपनी रणनीतिक राह कैसे चुनता है, यह वैश्विक और घरेलू दोनों स्तरों पर निर्णायक होगा।
वैश्विक बेरोजगारी संकट के प्रमुख कारक
- विफल होता पारंपरिक जनसांख्यिकीय मॉडल: दशकों से आर्थिक विचारकों का मानना था कि जन्मदर घटने से कार्यशील आबादी का अनुपात बढ़ता है, जिससे बचत और तीव्र आर्थिक विकास (जैसा कि 20वीं सदी के अंत में ईस्ट एशियन टाइगर्स देशों में देखा गया) संभव होता है। लेकिन आज यह आर्थिक खाका काम नहीं कर रहा है।
- समय से पहले विऔद्योगीकरण: आधुनिक विनिर्माण (Manufacturing) अब श्रम-गहन नहीं रहा। रोबोटिक्स, एआई और उन्नत ऑटोमेशन के कारण फैक्ट्रियों को अब बहुत कम मानव श्रम की आवश्यकता होती है। परिणामतः, विकासशील देश अपने कार्यबल को औद्योगिक क्षेत्र में खपाने से पहले ही नौकरियां खो रहे हैं।
- बढ़ती डिजिटल और कौशल की खाई: वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था अत्यधिक कुशल, तकनीक-संचालित और ज्ञान-आधारित हो चुकी है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अनुसार, पारंपरिक कोडिंग, डेटा एंट्री और कस्टमर सर्विस जैसी व्हाइट-कॉलर नौकरियां तेजी से खत्म हो रही हैं, जबकि वैश्विक दक्षिण के करोड़ों युवाओं के पास आधुनिक डिजिटल कौशल, व्यावसायिक प्रशिक्षण या उच्च शिक्षा तक पहुंच ही नहीं है।
भारत में रोजगार की वर्तमान स्थिति और संरचनात्मक चुनौतियाँ
भारत वर्तमान में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के बावजूद ‘रोजगारहीन विकास’ (Jobless Growth) के विरोधाभास से जूझ रहा है:
- बेरोजगारी के आंकड़े: पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) और CMIE के आंकड़ों के अनुसार, भारत की सामान्य बेरोजगारी दर 7% से 8% के आसपास बनी हुई है। अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षित युवाओं और शहरी कार्यबल (15-29 वर्ष) में यह दर 15% से अधिक है।
- कृषि पर अत्यधिक निर्भरता बनाम कम उत्पादकता: देश की लगभग 43-45% आबादी अभी भी कृषि और संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर है, जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का योगदान घटकर महज 16% (FY24) रह गया है। यह बड़े पैमाने पर ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ (Disguised Unemployment) को दर्शाता है।
- असंगठित क्षेत्र और गिग इकोनॉमी की सीमाएं: भारतीय कार्यबल का लगभग 85-90% हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में है, जहाँ नौकरी की सुरक्षा, पेंशन या स्वास्थ्य बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। यद्यपि गिग इकोनॉमी (जैसे जोमैटो, स्विगी, ओला) ने त्वरित रोजगार दिए हैं, परंतु ये नौकरियां श्रम अधिकारों और स्थिरता के पैमाने पर कमजोर हैं।
- निम्न महिला श्रम शक्ति भागीदारी (Low FLFPR): भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम (लगभग 25-30%) है, जो देश की आधी आबादी को आर्थिक मुख्यधारा से बाहर रखती है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश बनाम आपदा: भारत की औसत आयु इस समय 30 वर्ष से कम है और इसकी 65% आबादी कार्यशील आयु वर्ग (15-59 वर्ष) में है। यदि इस ऊर्जावान आबादी को समय रहते उत्पादक रोजगार नहीं मिला, तो यह आर्थिक वरदान के बजाय सामाजिक ध्रुवीकरण, हताशा और अपराध को जन्म देने वाली जनसांख्यिकीय आपदा में तब्दील हो सकता है।
संकट से निपटने हेतु भारत सरकार के मौजूदा प्रयास
सरकार ने आर्थिक नीतियों को रोजगार-उन्मुख बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं:
- उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना: घरेलू विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने और बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा करने के लिए 14 प्रमुख क्षेत्रों में वित्तीय प्रोत्साहन।
- प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना: केंद्रीय बजट के तहत देश की शीर्ष 500 कंपनियों में 1 करोड़ युवाओं को व्यावहारिक व्यावसायिक अनुभव और इंटर्नशिप के अवसर प्रदान करने की पहल।
- कौशल भारत मिशन और मुद्रा योजना: युवाओं को आधुनिक उद्योगों के अनुरूप प्रशिक्षित करना तथा बिना गारंटी के ऋण देकर स्वरोजगार को बढ़ावा देना।
- ईपीएफओ-लिंक्ड प्रोत्साहन (EPFO-linked Incentives): औपचारिक क्षेत्र में पहली बार नौकरी पाने वाले युवाओं और उनके नियोक्ताओं को भविष्य निधि अंशदान में सहायता देकर औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देना।
रणनीतिक राह: भारत के लिए बहु-आयामी समाधान
वैश्विक संकट के इस दौर में यदि भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को संभालना है, तो उसे जादुई नीतिगत बदलावों के बजाय लक्षित क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियों (Sector-Specific Strategies) पर ध्यान केंद्रित करना होगा:
- कृषि का ‘एग्रो-बिजनेस’ में रूपांतरण: ग्रामीण युवाओं के शहरों की ओर अनियंत्रित पलायन को रोकने के लिए पारंपरिक कृषि को तकनीक-सक्षम व्यावसायिक मॉडल में बदलना होगा। कोल्ड-चैन लॉजिस्टिक्स, स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण और जलवायु-अनुकूल खेती में निवेश बढ़ाकर ऐसी ग्रामीण मूल्य श्रृंखलाएं बनानी होंगी जो लाभकारी रोजगार दे सकें।
- स्वास्थ्य सेवा और ‘केयर इकोनॉमी’ का विस्तार: प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों, नर्सों और सामाजिक सुरक्षा सहायकों की मांग बढ़ रही है। इस क्षेत्र का विकास भारत को ‘दोहरा लाभांश’ देगा—पहला, यह बड़े पैमाने पर ऐसी नौकरियां पैदा करेगा जिनका ऑटोमेशन या आउटसोर्सिंग संभव नहीं है (विशेषकर महिलाओं के लिए); दूसरा, यह देश की मानव पूंजी को मजबूत करेगा।
- पर्यटन और संस्कृति का दोहन: पर्यटन उद्योग स्वभाव से ही श्रम-गहन है और इस पर ऑटोमेशन का न्यूनतम असर पड़ता है। परिवहन प्रदाताओं से लेकर हस्तशिल्प कलाकारों और ऐतिहासिक संरक्षण तक, इस क्षेत्र में रोजगार पैदा करने की तीव्र ‘गुणक क्षमता’ है।
- विनिर्माण का पुनर्गठन: भारी विनिर्माण की सीमाओं को देखते हुए भारत को ‘हरित-संक्रमण विनिर्माण’ पर ध्यान देना चाहिए—जैसे सौर पैनल घटकों, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और ऊर्जा-कुशल सामग्रियों का निर्माण। इसके साथ ही युवाओं के लिए ‘फुर्तीली कौशल प्रणालियों’ को अपनाना होगा।
- विनियामक कमियों को दूर करना: देश में छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को फलने-फूलने के लिए जटिल कानूनों, इंस्पेक्टर राज और प्रशासनिक अनिश्चितताओं को समाप्त करना होगा। व्यापार करने की लागत को कम करना और डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष
वैश्विक स्तर पर युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी को एक वैश्विक आपदा बनने से रोकने के लिए राष्ट्रीय नीतियों, राजनीतिक इच्छाशक्ति और निजी क्षेत्र की गतिशीलता में एक अभूतपूर्व तालमेल की आवश्यकता है। विकसित राष्ट्रों को तकनीक और आसान ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों को कड़े संस्थागत और श्रम सुधार करने होंगे। वित्तीय और तकनीकी संसाधन दुनिया में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, कमी है तो केवल एक ‘समावेशी वैश्विक व्यवस्था’ के साझा संकल्प की। भारत के लिए यह समय केवल सकल घरेलू उत्पाद की दौड़ में प्रथम आने का नहीं, बल्कि ‘रोजगार-केंद्रित विकास’ को अपनी आर्थिक नियति बनाने का है।
मेंस अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Question):
“ग्लोबल साउथ में जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने की क्षमता आज गंभीर वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के कारण संकट में है। भारत जैसे अत्यधिक युवा आबादी वाले देश के लिए रोजगार सृजन और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन साधने हेतु किन रणनीतिक सुधारों की आवश्यकता है? विस्तार से विश्लेषण करें।”
