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‘सूचना का अधिकार’ से ‘सूचना से इनकार’ का बदलता स्वरूप (The Shifting Nature of the ‘Right to Information’ to ‘Denial of Information’)

By Result Mitra •
UPSC Syllabus Linkage: G.S-2 (भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन): महत्वपूर्ण पहलू: पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत तंत्र। नागरिक अधिकार: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 का कार्यान्वयन, चुनौतियाँ और सुशासन (Good Governance) में इसकी भूमिका। संवैधानिक एवं सांविधिक निकाय: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और राज्य सूचना आयोगों (SIC) की भूमिका तथा प्रभावशीलता।  

हाल ही में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के लागू होने के 21 वर्ष पूरे हुए हैं। इस अवसर पर जारी केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में विभिन्न सूचना आयोगों में 4 लाख से अधिक अपीलें और शिकायतें लंबित हैं। इसके साथ ही, सरकारी विभागों में स्वतः संज्ञान लेकर जानकारियां साझा न करने (Voluntary Non-disclosure) की बढ़ती प्रवृत्ति और हालिया विधायी संशोधनों ने नीति विश्लेषकों के बीच यह चिंता पैदा कर दी है कि यह ऐतिहासिक कानून धीरे-धीरे “राइट टू डिनाई इंफॉर्मेशन” (सूचना से इनकार का अधिकार) में तब्दील होता जा रहा है।

सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, भारत सरकार का एक ऐतिहासिक कानून है, जिसे 15 जून 2005 को संसद में पारित किया गया था और 12 अक्टूबर 2005 को लागू किया गया था।

  • मूल अधिकार: यह आम नागरिकों को सरकार और सरकारी संस्थानों से सवाल पूछने और जानकारी हासिल करने का कानूनी अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत) देता है।
  • संवैधानिक आधार: सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे राजनारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1975) में यह स्पष्ट किया है कि सूचना का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत ‘वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का एक अभिन्न हिस्सा है।
  • दायरा: इसके तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री कार्यालयों सहित सभी केंद्रीय, राज्यीय और स्थानीय सरकारी विभागों, पुलिस, न्यायालयों, सरकारी बैंकों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों/कॉलेजों से जानकारी मांगी जा सकती है (सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां जैसे IB, RAW, CBI इसके दायरे से बाहर हैं)।
  • कार्यप्रणाली व समय-सीमा: नागरिक मात्र ₹10 के सामान्य शुल्क (BPL के लिए मुफ्त) पर ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन लोक सूचना अधिकारी (PIO) के समक्ष कर सकते हैं, जिसका जवाब 30 दिनों के भीतर (जीवन और स्वतंत्रता के मामले में 48 घंटों में) देना अनिवार्य है। असंतोष की स्थिति में प्रथम अपील और उसके बाद सूचना आयोगों में द्वितीय अपील का प्रावधान है।
  • संस्थागत ढांचा: इसके तहत केंद्र स्तर पर केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और राज्यों में राज्य सूचना आयोग (SIC) की स्थापना की गई है, जो अपीलीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करते हैं।

स्वतः संज्ञान प्रकटीकरण (धारा 4) की विफलता और स्वैच्छिक गैर-प्रकटीकरण

अधिनियम की धारा 4(1)(b) यह अनिवार्य बनाती है कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों (PAs) को अपने संगठन, कार्यों, बजट और नीतियों से जुड़ी 16 श्रेणियों की सूचनाओं को स्वयं (Suo Motu) अपनी वेबसाइटों पर डालना चाहिए ताकि नागरिकों को आवेदन ही न करना पड़े।

  • डेटा की हकीकत: हाल ही में सीआईसी पोर्टल पर सूचीबद्ध 94 प्रमुख सरकारी विभागों की वेबसाइटों के स्वतंत्र विश्लेषण में पाया गया कि केवल 33 विभागों के पास ही वर्ष 2024-25 के लिए अनुभाग-वार विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट उपलब्ध थी।
  • सूचनाओं का पूर्ण अभाव: 43 विभागों की वेबसाइटों पर कोई भी प्रासंगिक रिपोर्ट नहीं मिली। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों के पोर्टल पर भी आरटीआई से संबंधित आवश्यक डेटा गायब या अत्यधिक पुराना था। इसे नौकरशाही का ‘स्वैच्छिक गैर-प्रकटीकरण‘ कहा जा रहा है।

पारदर्शिता ऑडिट और ग्रेडिंग में निराशाजनक प्रदर्शन

सार्वजनिक प्राधिकरणों के पारदर्शिता स्तर को जांचने के लिए किसी तीसरे पक्ष  से ऑडिट कराना और रिपोर्ट सीआईसी को सौंपना अनिवार्य है।

कम भागीदारी: पंजीकृत कुल 2,303 सार्वजनिक प्राधिकरणों में से केवल 1,446 (62.7%) ने ही अपनी ऑडिट रिपोर्ट जमा की। यानी लगभग 37% विभागों ने अपनी जवाबदेही की जांच कराने से ही परहेज किया।

  • निराशाजनक ग्रेडिंग: रिपोर्ट जमा करने वाले विभागों में से 50% से अधिक ने ‘Grade C’ या उससे भी नीचे (Grade D और E) का स्कोर प्राप्त किया। आधे से अधिक सरकारी संस्थान पारदर्शिता के न्यूनतम मानकों पर भी विफल साबित हो रहे हैं।

लंबित मामलों का बढ़ता अंबार

चूंकि सरकारी विभाग स्वयं जानकारियां सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं, इसलिए सूचना आयोगों पर आरटीआई आवेदनों की बाढ़ आ गई है।

  • वार्षिक आवेदनों में उछाल: वर्ष 2024-25 के चक्र में देश भर में लगभग 23 लाख आरटीआई अनुरोध दर्ज किए गए।
  • पेंडेंसी दर: इन 23 लाख अनुरोधों में से लगभग 5.1 लाख (22%) आवेदन पिछले वर्षों से लंबित (Backlog) चले आ रहे थे। मामलों के निपटान में औसतन 1 से 2 वर्ष का समय लग रहा है, जो “समय पर न्याय” के सिद्धांत के खिलाफ है।

अपीलों के इस अंबार को निपटाने वाले सूचना आयोग खुद प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हैं।

  • सरकार द्वारा मुख्य सूचना आयुक्तों और अन्य सूचना आयुक्तों के खाली पदों को समय पर नहीं भरा जा रहा है। कई राज्यों में आयोग महीनों तक बिना प्रमुख के कार्य करते हैं, जिससे अपीलों की सुनवाई पूरी तरह ठप हो जाती है।

दंडात्मक प्रावधानों का कमजोर क्रियान्वयन:

  • आरटीआई अधिनियम की धारा 20 के तहत दोषी लोक सूचना अधिकारियों (PIOs) पर ₹250 प्रतिदिन (अधिकतम ₹25,000) जुर्माना लगाने का प्रावधान है। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर, केवल 2% से 4% पात्र मामलों में ही जुर्माना लगाया जाता है। जवाबदेही की इस कमी ने नौकरशाही में ‘गैर-अनुपालन की संस्कृति’ (Culture of Non-compliance) को जन्म दिया है।
  • RTI (संशोधन) अधिनियम, 2019: इस संशोधन ने सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता पर गहरा आघात किया। पहले इनका दर्जा मुख्य चुनाव आयुक्त के समकक्ष था, लेकिन अब केंद्र सरकार को इनके कार्यकाल, वेतन और सेवा शर्तों को तय करने का एकपक्षीय अधिकार मिल गया है, जिससे इनकी वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता कमजोर हुई है।
  • डीपीडिया (DPDP) एक्ट, 2023 का प्रभाव: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) को संशोधित कर दिया। अब ‘व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा’ के नाम पर लोक सूचना अधिकारी (PIOs) वास्तविक भ्रष्टाचार-विरोधी आरटीआई आवेदनों और विसंगतियों को भी खारिज कर रहे हैं।

आरटीआई अधिनियम के क्रियान्वयन में कमियों के बावजूद, पिछले दो दशकों में इसके द्वारा स्थापित मील के पत्थर भारतीय लोकतंत्र के लिए असाधारण हैं:

  • दुनिया का सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला कानून: प्रोग्रेसिव डिजिटल सिटिजनशिप रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का आरटीआई अधिनियम वैश्विक स्तर पर सबसे सक्रिय रूप से उपयोग किया जाने वाला सूचना कानून है। भारत में प्रतिवर्ष औसतन 40 से 60 लाख आरटीआई आवेदन (केंद्र और राज्यों को मिलाकर) दायर किए जाते हैं, जो कि अमेरिका के FOIA (Freedom of Information Act) से कहीं अधिक है।
  • भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार: आरटीआई की सबसे बड़ी उपलब्धि बड़े स्तर पर संस्थागत भ्रष्टाचार को उजागर करना रही है। आदर्श हाउसिंग घोटाला, 2G स्पेक्ट्रम आवंटन, और कोयला ब्लॉक आवंटन जैसे देश को हिला देने वाले अरबों रुपयों के घोटालों का पर्दाफाश आरटीआई आवेदनों के माध्यम से ही संभव हो सका था।
  • नागरिक सशक्तीकरण और जमीनी लोकतंत्र (Grassroots Empowerment): कुल आरटीआई आवेदनों में से लगभग 65% से अधिक आवेदन ग्रामीण या अर्ध-शहरी क्षेत्रों के आम नागरिकों द्वारा दायर किए जाते हैं। राशन कार्ड, पेंशन, मनरेगा की मजदूरी और स्थानीय विकास कार्यों की जानकारी पाकर हाशिए पर खड़े नागरिकों ने सीधे प्रशासन से जवाब मांगकर भ्रष्टाचार को जमीनी स्तर पर कम किया है।
  • अल्पसंख्यक और वंचित वर्गों की भागीदारी: डेटा दर्शाता है कि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की प्रशासनिक कार्यों में भागीदारी आरटीआई के बाद 40% तक बढ़ी है, क्योंकि यह कानून सादे कागज पर ₹10 में या गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के लोगों के लिए बिल्कुल मुफ्त में सूचना का अधिकार देता है।
  • धारा 4 का कठोर प्रवर्तन: केंद्रीय सूचना आयोग को उन 37% सार्वजनिक प्राधिकरणों के खिलाफ दंडात्मक प्रशासनिक कदम उठाने चाहिए जो अपनी थर्ड-पार्टी ऑडिट रिपोर्ट जमा नहीं कर रहे हैं। मंत्रालयों के लिए अपनी वेबसाइट्स को वास्तविक समय (Real-time) में अपडेट करना अनिवार्य किया जाए।
  • शून्य-रिक्ति (Zero-Vacancy) दृष्टिकोण: न्यायपालिका की तर्ज पर सूचना आयुक्तों के पदों को भरने के लिए एक समयबद्ध और पारदर्शी चयन समिति की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि पद खाली होने से पहले ही अगले आयुक्त की नियुक्ति हो जाए।
  • तकनीकी समावेशन: पूरे देश के लिए एक एकीकृत (Unified) और यूजर-फ्रेंडली आरटीआई पोर्टल विकसित किया जाए, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं में आवेदन करने और दस्तावेजों को आसानी से खोजने (Searchable Formats) की व्यवस्था हो।
  • संतुलन और स्पष्टता: संसद और न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि डीपीडिया (DPDP) अधिनियम का उपयोग भ्रष्टाचार को छिपाने के कवच के रूप में न किया जाए। व्यक्तिगत गोपनीयता और व्यापक जनहित के बीच एक तार्किक सीमा रेखा तय होनी चाहिए।
  • जुर्माने का कड़ाई से क्रियान्वयन: धारा 20 के तहत दोषी पीआईओ (PIO) पर जुर्माना लगाने की दर (जो वर्तमान में मात्र 2-4% है) को बढ़ाया जाए ताकि प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

सूचना का अधिकार अधिनियम केवल एक प्रक्रियात्मक कानून नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण की रीढ़ है। यदि नौकरशाही की ‘स्वैच्छिक गैर-प्रकटीकरण’ की मानसिकता और संस्थागत कमजोरियों को जल्द दूर नहीं किया गया, तो शासन में पारदर्शिता का यह सबसे मजबूत उपकरण अपनी प्रासंगिकता खो देगा। सरकार को इसे एक चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि सुशासन (Good Governance) के एक पूरक माध्यम के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि एक सूचित नागरिक ही एक मजबूत लोकतंत्र का आधार होता है।

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