नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन क्या भारतीय विदेश नीति में किसी ‘बदलाव’ का संकेत है? (Does the New Delhi BRICS summit signal a ‘shift’ in Indian foreign policy?)

12-13 सितंबर 2026 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। भू-राजनीतिक तनावों, वैश्विक व्यापार युद्धों और विस्तारित 11-सदस्यीय ब्लॉक के भीतर आंतरिक मतभेदों के बावजूद, भारत ने सफलतापूर्वक सर्वसम्मति से 140-बिंदुओं वाले नई दिल्ली घोषणापत्र को पारित कराया। इस घोषणापत्र की सख्त पश्चिमी-विरोधी और बहुपक्षीय भाषा के कारण विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह भारत की विदेश नीति में किसी बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत है या यह केवल रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की निरंतरता है।

घोषणापत्र के कुछ बिंदु पहली नज़र में भारत के हालिया पश्चिमी झुकाव (जैसे Quad में सक्रियता) से अलग और भारत की पुरानी गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) छवि की ओर झुके हुए प्रतीत होते हैं:

  • एकतरफा प्रतिबंधों का कड़ा विरोध: नई दिल्ली घोषणापत्र में पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंधों (Unilateral Sanctions) की तीखी आलोचना की गई है, जो डॉलर को हथियार बनाने के खिलाफ है।
  • पश्चिम एशिया संकट पर कड़ा रुख: घोषणापत्र में इज़राइल द्वारा लेबनान में नागरिकों की हत्या और फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर जबरन कब्जे की आलोचना की गई है। यह भारत के हालिया इजरायल-समर्थक बयानों के विपरीत एक संतुलन बनाने का प्रयास दिखता है।
  • यूक्रेन का उल्लेख न होना: वर्ष 2022 के बाद यह पहला ऐसा ब्रिक्स घोषणापत्र है जिसमें यूक्रेन युद्ध का कोई सीधा संदर्भ नहीं है, जिसे रूस के वीटो और भारत के मौन समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।
  • डी-डॉलरलाइजेशन को बढ़ावा: ब्रिक्स भुगतान प्रणाली (BRICS Payment Mechanism) और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता।
  • रणनीतिक बहु-संरेखण (Multi-vector Engagement): यह सम्मेलन भारत की विदेश नीति में किसी क्रांतिकारी ‘बदलाव’ को नहीं, बल्कि एक अत्यधिक मुखर और परिपक्व बहु-संरेखण को दर्शाता है। भारत अब केवल एक मूक दर्शक नहीं है; वह एक गैर-पश्चिमी मंच पर फ्रंट-फुट पर आकर वैश्विक दक्षिण (Global South) की प्राथमिकताओं को तय कर रहा है।
  • दिखावा बनाम कूटनीतिक वास्तविकता: बहुपक्षीय मंचों पर ‘गुटनिरपेक्षता’ जैसी भाषा का प्रयोग अक्सर वैश्विक दक्षिण को एकजुट करने के लिए किया जाता है। हालांकि, वास्तविक दुनिया में भारत का झुकाव व्यापक स्तर पर द्विपक्षीय (Bilateral) समझौतों की ओर है। ब्रिक्स जैसे बड़े मंच भारत को वैश्विक मंच पर अपनी बात मजबूती से रखने के लिए स्थान देते हैं, भले ही सभी सदस्य देशों के व्यक्तिगत हित अलग-अलग हों।

गहन विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह बदलाव नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का एक उत्कृष्ट प्रदर्शन है:

  • ग्लोबल साउथ के संतुलित कर्ता (Global South Balancer): भारत ने ब्रिक्स मंच को पूरी तरह से ‘अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी’ (Anti-Western Block) बनने से रोका। भारत की उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि ब्रिक्स ‘गैर-पश्चिमी’ (Non-Western) बना रहे, न कि ‘पश्चिम-विरोधी’।
  • एक साथ दो नावों की सवारी: भारत ने मई-जून 2026 में अमेरिका के नेतृत्व वाले Quad देशों की बैठक की मेजबानी की और सितंबर में BRICS+ की। यह भारत की ‘मल्टी-वेक्टर’ (Multi-vector engagement) नीति को दर्शाता है।
  • आंतरिक मध्यस्थ के रूप में उभरना: इस सम्मेलन के इतर भारत की कूटनीति के कारण ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसी प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को एक मंच पर बातचीत का अवसर मिला, जिससे भू-राजनीतिक दरारों को पाटने में भारत की भूमिका मजबूत हुई।
  • वैश्विक कूटनीतिक जीत: मतभेदों के बावजूद सभी 11 सदस्यों (जिसमें चीन और ईरान भी शामिल हैं) को एक साझा एजेंडे पर लाना भारत की बड़ी राजनयिक सफलता है।
  • आतंकवाद पर कड़ा रुख: भारत घोषणापत्र में वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (FATF) के मानकों का पालन करने और आतंकवाद के खिलाफ सख्त भाषा को शामिल कराने में सफल रहा।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): भारत ने अपने सफल DPI मॉडल (UPI आदि) को ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित किया।

ब्रिक्स के भीतर अंतः-ब्रिक्स व्यापार (Intra-BRICS trade) को स्थानीय मुद्राओं में बढ़ावा देने पर बहुत जोर दिया जा रहा है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 40% और वैश्विक व्यापार का 25% हिस्सा कवर करता है। हालांकि, इसके सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं:

  • कोई स्थायी भुगतान तंत्र नहीं: भारत ने स्थानीय मुद्रा भुगतान का समर्थन तो किया है, लेकिन ब्रिक्स के दायरे में किसी ‘एक ही नियम से सब संचालित हो’ वाले स्थायी या बाध्यकारी वित्तीय ढांचे को स्वीकार नहीं किया है।
  • चीनी युआन का खतरा: यदि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जाती है, तो वैश्विक बाजार में चीनी युआन सबसे बड़ी मुद्रा बनकर उभर सकता है। भारत सुरक्षा और भू-राजनीतिक कारणों से अपनी अर्थव्यवस्था को युआन-केंद्रित वित्तीय तंत्र में फंसाने को लेकर बेहद सतर्क है।
  • पश्चिमी देशों के साथ संतुलन: एक तरफ ब्रिक्स घोषणापत्र में पश्चिम की आलोचना और दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) के साथ बढ़ते व्यापारिक व रक्षा संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना भारत की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
  • राजनयिक पूंजी का तर्कसंगत उपयोग (Rationalizing Diplomatic Capital): भारत के पास राजनयिक संसाधन और पूंजी सीमित हैं। इसलिए भारत को वैश्विक मंचों और मुद्दों का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए, ताकि देश के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को अधिकतम लाभ मिल सके।
  • मंच को चीन-केंद्रित होने से रोकना (Countering Chinese Hegemony): ब्रिक्स के लगातार होते विस्तार के बीच भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह समूह पूरी तरह से चीन-केंद्रित या उग्र पश्चिम-विरोधी (Anti-Western) एजेंडे का उपकरण न बने। भारत को इस मंच के विकासात्मक और बहुध्रुवीय चरित्र को बनाए रखना होगा।
  • वित्तीय तंत्र में युआन के प्रभुत्व को संतुलित करना (Balancing Currency Risks): डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं (Local Currency payment mechanisms) में व्यापार का समर्थन करते हुए भारत को सतर्क रहना होगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि यह व्यवस्था डॉलर के विकल्प के रूप में चीनी युआन (Yuan) के प्रभुत्व को अनियंत्रित बढ़ावा न दे।
  • व्यापक बहु-संरेखण को निरंतरता देना (Deepening Multi-alignment): भारत को ब्रिक्स जैसी गैर-पश्चिमी भागीदारी के साथ-साथ पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका, यूरोपीय संघ) और आसियान (ASEAN) के साथ अपने रणनीतिक संबंधों तथा द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को समान गति से आगे बढ़ाते रहना चाहिए।

नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 यह प्रमाणित करता है कि भारतीय विदेश नीति में कोई बुनियादी या दिशात्मक ‘बदलाव’ नहीं आया है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्मार्ट कूटनीति” का एक अत्यधिक परिपक्व और मुखर विस्तार है। वैश्विक ध्रुवीकरण के इस जटिल दौर में भारत ने न तो खुद को पश्चिमी ब्लॉक में समाहित किया है और न ही गैर-पश्चिमी धुरी का आँख बंद करके अनुसरण किया है। इसके बजाय, भारत ने सफलतापूर्वक खुद को पूर्व और पश्चिम तथा उत्तर और दक्षिण के बीच एक अपरिहार्य वैश्विक संतुलनकर्ता (Global Balancer) के रूप में स्थापित किया है, जो 21वीं सदी की बहु-ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में देश के बढ़ते कद को रेखांकित करता है।

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