न्यायपालिका में महिला प्रतिनिधित्व
संदर्भ
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की गई है।
वर्ष 2026 में यह दूसरा अवसर है जब किसी महिला को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में प्रस्तावित किया गया है। यह कदम भारतीय न्यायपालिका में लैंगिक प्रतिनिधित्व, विविधता और समावेशन के महत्व को रेखांकित करता है।
यह मुद्दा निम्नलिखित संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्रश्नों को सामने लाता है
- न्यायपालिका में लैंगिक विविधता और सामाजिक न्याय की भूमिका।
- उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों से जुड़ी कॉलेजियम प्रणाली और पारदर्शिता।
- न्यायिक निर्णयों में दृष्टिकोण की व्यापकता और संवेदनशीलता।
- महिला न्यायविदों के मार्ग में आने वाली संरचनात्मक और सामाजिक बाधाएँ।
- संस्थागत प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक विश्वास के बीच संबंध।
वर्तमान आँकड़े
वर्तमान में कार्यरत 37 न्यायाधीशों में 2 महिला न्यायाधीश (न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति वी. मोहना) हैं। कुल कार्यरत न्यायाधीशों का लगभग 5.4% से 6%।
देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 781 कार्यरत न्यायाधीशों में से 116 महिला न्यायाधीश हैं--लगभग 14.85%।
निचली न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों का राष्ट्रीय औसत लगभग 35% से 38.3% है।
उत्तर-लेखन का प्रारूप
भूमिका
न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति का संक्षिप्त उल्लेख। वर्तमान संदर्भ (हालिया कॉलेजियम सिफारिशें, आँकड़े) में लैंगिक प्रतिनिधित्व की प्रासंगिकता।
मुख्य भाग
1. निर्णयों में संवेदनशीलता और संतुलित दृष्टिकोण। 2. लोकतांत्रिक समावेशन और संस्थागत विश्वास में वृद्धि। 3. न्यायिक सक्रियता और लैंगिक न्याय की दिशा में योगदान।
1. विधिक पेशे में लंबे कार्यघंटे और बुनियादी सुविधाओं का अभाव। 2. पारिवारिक उत्तरदायित्वों का असमान बोझ। 3. बार (Bar) से बेंच में सीधी पदोन्नति में महिलाओं का कम अनुपात। 4. कॉलेजियम प्रणाली में चयन मानदंडों की स्पष्टता और पारदर्शिता का अभाव। 5. नेटवर्क और मेंटरशिप की कमी ('Old Boys' Club' संस्कृति)।
1. चयन प्रक्रिया (MOP) को अधिक वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी बनाना। 2. जिला न्यायपालिका के स्तर से ही अनुकूल कार्यवातावरण तैयार करना। 3. रोस्टर प्रणाली और संस्थागत सहायता तंत्र को मजबूत करना। 4. राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया पर विचार।
निष्कर्ष
लैंगिक न्याय और विविधता किसी भी जीवंत लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त हैं। एक समावेशी न्यायपालिका ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता की सही रक्षा कर सकती है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय देश के संविधान के संरक्षक हैं। संविधान की प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की बात करती है, जो न्यायपालिका में भी पूरी तरह प्रतिबिंबित होना चाहिए। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा महिला न्यायाधीशों की संस्तुति इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, परंतु न्यायपालिका के उच्च पदों पर लैंगिक असंतुलन अभी भी एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
वर्तमान में उच्च न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अत्यंत कम है उच्च न्यायालयों में केवल 14% और सर्वोच्च न्यायालय में 3–6% के आसपास। यह स्थिति न केवल संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है, बल्कि न्याय की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती है।
न्यायपालिका में लैंगिक विविधता केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं है, बल्कि यह न्याय की गुणवत्ता और निष्पक्षता से सीधा जुड़ा हुआ विषय है। जब तक न्यायपालिका अपने आंतरिक ढांचे में समावेशी नहीं होगी, तब तक न्याय का समान वितरण अधूरा रहेगा। इसलिए, संस्थागत सुधारों के माध्यम से महिलाओं के लिए न्यायपालिका के द्वारों को अधिक सुगम बनाना समय की मांग है। लैंगिक न्याय और विविधता किसी भी जीवंत लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त हैं। एक समावेशी न्यायपालिका ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता की सही रक्षा कर सकती है।

