ब्रिक्स बैंक: एक ऐसा विकल्प जो वास्तविकता में नहीं बदल पाया

जब भारत 12-13 सितंबर 2026 को “ह्यूमैनिटी फर्स्ट” के बैनर तले नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, तब इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि क्या ब्रिक्स (BRICS) और इसका न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली वित्तीय व्यवस्था का एक ठोस विकल्प बन पाए हैं? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक हो गया है क्योंकि स्थापना के एक दशक बाद भी यह बैंक अमेरिकी डॉलर के दबदबे को तोड़ने और वैश्विक वित्तीय मंच पर ‘ग्लोबल साउथ’ की वास्तविक आवाज बनने के अपने मूल वादे की कसौटी पर संघर्ष करता दिख रहा है।

  • वर्ष 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा में जब ब्रिक्स बैंक की स्थापना की घोषणा हुई, तो इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित ‘ब्रेटन वुड्स सिस्टम’—यानी विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)—के खिलाफ एक बड़े वित्तीय विद्रोह के रूप में देखा गया था।
  • विकासशील देशों की यह एक ऐसी महत्वाकांक्षी सामूहिक पहल थी, जिसका उद्देश्य बिना किसी कठोर राजनीतिक शर्तों के बुनियादी ढांचे के लिए धन जुटाना, स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) के उपयोग को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से अमेरिकी डॉलर के एकछत्र राज को कम (De-dollarization) करना था।
  • शंघाई में इसके मुख्यालय और सदस्य देशों की समान हिस्सेदारी के साथ इसे एक लोकतांत्रिक और निष्पक्ष वैश्विक वित्तीय वास्तुकला (Alternative Financial Architecture) के सपने के रूप में पेश किया गया था।
  • लेकिन स्थापना के एक दशक बाद, आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह महत्वाकांक्षी परियोजना एक अधूरी हकीकत नजर आती है। ब्रिक्स बैंक वह वैकल्पिक वैश्विक शक्ति बनने में विफल रहा है, जिसका वादा इसके संस्थापकों ने किया था।

ब्रिक्स बैंक का मुख्य उद्देश्य विकासशील देशों को बिना किसी कठोर राजनीतिक शर्तों के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए ऋण देना था, लेकिन इसके वास्तविक वित्तीय आंकड़े इसकी सीमाओं को उजागर करते हैं:

  • सीमित ऋण क्षमता: 2024 के अंत तक NDB का कुल प्रोजेक्ट अप्रूवल महज $39 अरब डॉलर तक ही पहुंच पाया है। इसके विपरीत, विश्व बैंक अकेले एक वर्ष में लगभग $100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान करता है। यानी ब्रिक्स बैंक अपने पूरे एक दशक के सफर में उतना ऋण भी नहीं दे पाया, जितना उसके प्रतिद्वंदी संस्थान महज छह महीनों में जारी कर देते हैं।
  • अमेरिकी डॉलर पर अटूट निर्भरता: जिस बैंक का जन्म ‘डी-डॉलरलाइजेशन’ (Dollarization को कम करने) और स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा देने के लिए हुआ था, उसके कुल बकाया बॉन्ड्स (Outstanding Bonds) का 50% हिस्सा आज भी अमेरिकी डॉलर में है। चीनी युआन केवल बचे हुए हिस्से में अपनी जगह बना पाया है, जबकि दक्षिण अफ्रीकी रैंड (Rand) की हिस्सेदारी 1% से भी कम है।
  • स्थानीय मुद्राओं का धीमा सफर: बैंक के नेतृत्व ने खुद स्वीकार किया है कि वे 2025 के अंत तक अपने पोर्टफोलियो का 30% हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में करने का लक्ष्य रख रहे थे, लेकिन यह आंकड़ा भी लगभग 22% के आसपास ही सिमट कर रह गया। भारत के संदर्भ में बात करें तो, पहला रुपया-मूल्यवर्ग बॉन्ड (Rupee-denominated bond) बैंक खुलने के एक दशक बाद यानी सितंबर 2025 तक केवल प्लानिंग स्टेज में ही अटका हुआ था।

2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध ने ब्रिक्स बैंक के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया। रूस इस बैंक का एक प्रमुख संस्थापक सदस्य और 20% का हिस्सेदार है।

  • क्रेडिट रेटिंग का दबाव: पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद जब वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (S&P, Fitch, Moody’s) ने दबाव बनाया, तो ब्रिक्स बैंक को अपनी वैश्विक क्रेडिट साख (Credit Standing) बचाने के लिए रूस में अपने सभी ऑपरेशन्स को फ्रीज करना पड़ा।
  • संस्थानों की बेबसी: एक ऐसा बैंक जो पश्चिमी वित्तीय प्रणाली के विकल्प के रूप में उभरा था, वह खुद पश्चिमी रेटिंग एजेंसियों के नियमों से बंधा हुआ है और प्रतिबंधों के डर से अपने ही एक संस्थापक देश की मदद करने से पीछे हट गया।

ब्रिक्स देशों ने IMF के एकाधिकार को तोड़ने और सदस्य देशों को वित्तीय संकट से बचाने के लिए 2015 में $100 अरब डॉलर का कंटिजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (CRA) बनाया था। सिद्धांत रूप में यह ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए एक क्रांतिकारी कदम था, लेकिन हकीकत कुछ और है:

  • एक दशक में शून्य उपयोग: पिछले 10 वर्षों में इस आपातकालीन सुरक्षा कवच (CRA) को एक बार भी सक्रिय नहीं किया गया।
  • वही पुराना IMF का जाल: इसके पीछे का मुख्य कारण इसका गुप्त नियम (Fine Print) है। यदि कोई सदस्य देश अपने आवंटित कोटे के 30% से अधिक का उपयोग करना चाहता है, तो उसे पहले IMF के किसी प्रोग्राम (शर्तों) में प्रवेश करना अनिवार्य है। यानी जिस वित्तीय गुलामी से बचने के लिए यह फंड बना था, उसका रास्ता घूम-फिर कर वापस IMF की चौखट पर ही खत्म होता है। इस फंड के पास न तो कोई स्थायी स्टाफ है और न ही अपनी कोई स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था।

हालाँकि भले ही हर ब्रिक्स सम्मेलन में डॉलर के खात्मे की सुर्खियां बनती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। 2025 के सम्मेलन में 126-पेज के ब्रिक्स घोषणापत्र में “De-dollarization” शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं किया गया था। सदस्य देशों के अपने आंतरिक मतभेद और अविश्वास इसकी सबसे बड़ी वजह हैं:

  • रूस और चीन का रुख: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद स्पष्ट किया था कि “रूस ने डॉलर को छोड़ने का कोई प्रयास नहीं किया है।” वहीं चीन अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और अपनी मुद्रा ‘युआन’ को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए इसका उपयोग करना चाहता है।
  • भारत का संशय: भारत हमेशा से वाशिंगटन के किसी भी अप्रत्यक्ष आर्थिक या रणनीतिक प्रतिशोध के डर से एक ‘साझा ब्रिक्स मुद्रा’ (Common BRICS Currency) के विचार का विरोध करता आया है। भारत कभी नहीं चाहेगा कि वह किसी ऐसे वित्तीय संस्थान का हिस्सा बने जो अंततः बीजिंग के भू-राजनीतिक हितों को पूरा करता हो।
  • दक्षिण अफ्रीका की चिंता: दक्षिण अफ्रीका भी साझा मुद्रा को एक बेहद जोखिम भरा कदम मानता है। इन आंतरिक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने बैंक के भीतर एक साझा विजन (Shared Vision) को कभी पनपने ही नहीं दिया।

दस्तावेजों और घोषणाओं से स्पष्ट होता है कि ब्रिक्स देश किसी नई वैकल्पिक वित्तीय वास्तुकला (Alternative Financial Architecture) का निर्माण नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे वर्तमान पश्चिमी व्यवस्था के भीतर ही अपने लिए एक बड़ी हिस्सेदारी चाहते हैं।

  • वर्तमान में, IMF में अकेले अमेरिका के पास 16.49% वोटिंग राइट्स हैं। चूंकि किसी भी बड़े फैसले के लिए 85% बहुमत की आवश्यकता होती है, इसलिए वाशिंगटन के पास हर महत्वपूर्ण निर्णय पर एक ‘प्रभावी वीटो’ (Effective Veto) है।
  • कज़ान और रियो सम्मेलनों के घोषणापत्रों में भी ब्रिक्स देशों ने वैश्विक वित्तीय ढांचे को बदलने की मांग नहीं की, बल्कि केवल IMF के भीतर “कोटा-आधारित और पर्याप्त संसाधनों” के सुधार की मांग की है। वे नियम बदलने के बजाय खेल के उसी नियम में अपनी सीटें बढ़ाना चाहते हैं।

यह कहना गलत होगा कि ब्रिक्स बैंक पूरी तरह से बंद हो चुका है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब इरामीरात (UAE) जैसे नए देशों का जुड़ना यह दिखाता है कि ग्लोबल साउथ में पश्चिमी-प्रभुत्व वाली संस्थाओं के प्रति गहरा असंतोष है। इस बैंक ने भारत में नवीकरणीय ऊर्जा, सड़कों और मेट्रो परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण ऋण भी दिए हैं।

लेकिन एक विकास बैंक होना और एक वैश्विक वित्तीय विकल्प होना, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। यह बैंक अमेरिकी डॉलर में कर्ज लेता है, पश्चिमी रेटिंग एजेंसियों के नियमों के सामने झुकता है और सुरक्षा के लिए उसी IMF की शरण लेता है जिसे वह चुनौती देने निकला था। अंततः, न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का कोई ‘क्रांतिकारी विकल्प’ नहीं है, बल्कि यह केवल वर्तमान पश्चिमी ढांचे के भीतर सांस लेने वाला एक साधारण रीजनल डेवलपमेंट बैंक बनकर रह गया है।

यदि ब्रिक्स बैंक को वाकई वैश्विक वित्तीय मंच पर खुद को एक प्रासंगिक और मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना है, तो उसे अपनी रणनीतियों में बुनियादी बदलाव करने होंगे:

  • आंतरिक भू-राजनीति से ऊपर उठना: सदस्य देशों, विशेषकर भारत और चीन को अपने द्विपक्षीय और सीमा विवादों को बैंक की नीतियों से दूर रखना होगा। जब तक बैंक के भीतर एक ‘साझा विजन’ (Shared Vision) नहीं होगा, तब तक यह पश्चिमी ताकतों के सामने टिक नहीं पाएगा।
  • रेटिंग प्रणालियों का स्वदेशीकरण: NDB को पश्चिमी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (S&P, Moody’s) पर अपनी निर्भरता खत्म करनी चाहिए। ब्रिक्स देशों को अपनी खुद की एक स्वतंत्र वैश्विक रेटिंग एजेंसी बनानी होगी, जो बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं का निष्पक्ष मूल्यांकन कर सके।
  • स्थानीय मुद्रा प्रणालियों का व्यावहारिक विस्तार: कागजी दावों से अलग, सदस्य देशों को आपसी व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं (जैसे रुपया, रैंड, रीयल) में लेन-देन को आसान और व्यावहारिक बनाना होगा। इसके लिए सीमा पार भुगतान प्रणालियों (Cross-border Payment Systems) को मजबूत करना और रुपया-मूल्यवर्ग जैसे बॉन्ड्स को तेजी से बाजार में उतारना बेहद जरूरी है।
  • CRA को IMF के जाल से मुक्त करना: $100 अरब डॉलर के आपातकालीन फंड (CRA) के नियमों में सुधार करना होगा। इसके तहत IMF के साथ जुड़ी अनिवार्य शर्त को हटाकर एक स्वतंत्र और स्वायत्त निगरानी ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, ताकि संकट के समय सदस्य देश बिना किसी हिचकिचाहट के इसका उपयोग कर सकें।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top