वन अधिकार बनाम विकास परियोजनाएँ: ग्राम सभा की सहमति पर नया विवाद

वन अधिकार बनाम विकास परियोजनाएँ: ग्राम सभा की सहमति पर नया विवाद

हाल ही में, केंद्रीय जनजातीय कार्यमंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) ने नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) को भेजे गए एक आधिकारिक संचार में यह स्पष्ट किया है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत वन निकासी (forest clearance) के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति का कोई प्रावधान नहीं है और ऐसे मामले उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। यह विवाद तब सामने आया जब ऊर्जा मंत्रालय के तहत आने वाली विकास और जलविद्युत परियोजनाएं (जैसे तीस्ता-IV एचईपी) ग्राम सभाओं की सहमति और वन निकासी की लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं (औसत 106 महीने) के कारण गंभीर रूप से विलंबित या ठप हो गईं। इस घटनाक्रम ने जनजातीय अधिकारों के संरक्षण और राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे के विकास के बीच एक बार फिर नीतिगत पशोपेश और प्रशासनिक टकराव को उजागर कर दिया है।

Q.

उत्तर का प्रारूप

प्रस्तावना → वैधानिक स्थिति → न्यायिक दृष्टिकोण → चुनौतियाँ → प्रभाव → समाधान

  • वैधानिक स्थिति: ग्राम सभा की भूमिका और सहमति की कानूनी स्थिति।
  • न्यायिक दृष्टिकोण: नियमगिरि मामले से ग्राम सभा की भूमिका स्पष्ट करें।
  • चुनौतियाँ: वैधानिक अस्पष्टता एवं प्रशासनिक समन्वय की कमी।
  • प्रभाव: जनजातीय अधिकार, पर्यावरण और विकास पर प्रभाव।
  • समाधान: अधिकार-सम्मत, सहभागी और समयबद्ध स्वीकृति व्यवस्था।

मूल मंत्र:

“कानून क्या कहता है → समस्या क्या है → संतुलन कैसे बने?”

वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पारंपरिक वन निवासियों के ऐतिहासिक अन्याय का निवारण और उनके वन अधिकारों को कानूनी मान्यता देना है। दूसरी ओर, जलविद्युत जैसी परियोजनाओं के लिए वन भूमि का व्यपवर्तन आवश्यक हो सकता है। हालिया विवाद ने ग्राम सभा की सहमति, वन निकासी और जनजातीय अधिकारों के बीच वैधानिक एवं प्रशासनिक अस्पष्टता को सामने रखा है।

1. वैधानिक स्थिति: क्या ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति आवश्यक है?

वन अधिकार अधिनियम में ग्राम सभा को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है, लेकिन प्रत्येक गैर-वन उपयोग के लिए ग्राम सभा की स्वतंत्र अनिवार्य सहमति को स्पष्ट वैधानिक शर्त के रूप में निर्धारित नहीं किया गया है।

  • धारा 3: व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता।
  • धारा 5: वन, जैव-विविधता एवं सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण में ग्राम सभा की भूमिका।
  • धारा 6: वन अधिकारों की पहचान एवं सत्यापन में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका।

अतः वन अधिकारों के अनुपालन और ग्राम सभा की सहमति को समान मानना उचित नहीं है।

हालांकि, अधिकारों की पहचान एवं निपटारे को दरकिनार करके वन भूमि का व्यपवर्तन जनजातीय अधिकारों के गंभीर प्रश्न पैदा कर सकता है।

2. पंचायत उपबंध और भूमि अधिग्रहण का आयाम

अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 ग्राम सभा को विशेष स्व शासन संबंधी अधिकार देता है। इसलिए अनुसूचित क्षेत्रों में केवल वन अधिकार अधिनियम ही नहीं, बल्कि इस कानून और संबंधित राज्य कानूनों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इसी प्रकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन कानून, 2013 भूमि अधिग्रहण तथा विस्थापन से प्रभावित जनजातीय समुदायों की सुरक्षा पर बल देता है। इसलिए वन निकासी ≠ वन अधिकारों का अनुपालन ≠ भूमि अधिग्रहण, इन प्रक्रियाओं के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

3. न्यायिक दृष्टिकोण: नियमगिरि का उदाहरण

उड़ीसा खनन निगम बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2013 मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम सभाओं को डोंगरिया कोंध समुदाय के धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े दावों पर विचार करने की महत्वपूर्ण भूमिका दी।

यह निर्णय दर्शाता है कि ग्राम सभा को केवल औपचारिक प्रशासनिक संस्था न मानकर स्थानीय अधिकारों और पर्यावरणीय न्याय के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए।

4. विकास परियोजनाओं में प्रशासनिक विलंब

वन निकासी की जटिल प्रक्रियाएँ विशेषकर बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को प्रभावित करती हैं। हालिया संसदीय चर्चा में राष्ट्रीय जलविद्युत निगम की परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृति में औसतन लगभग 106 महीने अर्थात लगभग 9 वर्ष लगने की समस्या सामने आई है। 520 मेगावाट की तीस्ता-4 जलविद्युत परियोजना इसका प्रमुख उदाहरण है।

इससे—

  • परियोजना लागत बढ़ती है;
  • ऊर्जा उत्पादन में देरी होती है;
  • निवेश जोखिम बढ़ता है;
  • क्षेत्रीय विकास प्रभावित होता है।

हालाँकि, वन स्वीकृति में विलंब को केवल ग्राम सभा की प्रक्रिया का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। वन अधिकारों के दावे, पर्यावरणीय मूल्यांकन, वन्यजीव स्वीकृति, भूमि अधिग्रहण तथा केंद्र-राज्य समन्वय भी महत्वपूर्ण कारक हैं।

5. जनजातीय अधिकार और पर्यावरणीय न्याय

वन जनजातीय समुदायों के लिए केवल भूमि नहीं, बल्कि आजीविका, संस्कृति, पहचान और सामुदायिक संसाधनों का आधार है। दूसरी ओर, जलविद्युत परियोजनाएँ ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास में योगदान देती हैं। विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों में परियोजनाओं के मूल्यांकन में

  • वहन क्षमता
  • संचयी पर्यावरणीय प्रभाव
  • भूस्खलन एवं आपदा जोखिम
  • जैव-विविधता संरक्षण

को पर्याप्त महत्व देना आवश्यक है। अतः चुनौती “जनजातीय अधिकार बनाम विकास” नहीं, बल्कि “अधिकार-सम्मत” सतत विकास सुनिश्चित करने की है।

6. प्रशासनिक एवं संघीय चुनौतियाँ

एक परियोजना में जनजातीय कार्यमंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, ऊर्जा मंत्रालय, राज्य सरकार, वन विभाग, जिला प्रशासन और ग्राम सभा जैसी अनेक संस्थाएँ शामिल होती हैं। इनके बीच अधिकारों के अतिव्यापन से निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है।

मुख्य समस्याएँ हैं

  • वन अधिकारों के दावों और वन अभिलेखों में असंगति;
  • स्वीकृतियों की क्रमिक प्रक्रिया;
  • राज्यों की असमान प्रशासनिक क्षमता;
  • ग्राम सभाओं को तकनीकी जानकारी का अभाव;
  • केंद्र-राज्य तथा अंतर-मंत्रालयी समन्वय की कमी।
  • वैधानिक स्पष्टता: वन अधिकार अधिनियम, पंचायत उपबंध कानून, भूमि अधिग्रहण कानून और वन संरक्षण कानून के बीच स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएँ।
  • अधिकार-प्रथम, समयबद्ध स्वीकृति: पहले वन अधिकारों का वास्तविक निपटारा हो और उसके बाद वन स्वीकृति को निश्चित समय-सीमा में पूरा किया जाए।
  • सार्थक ग्राम सभा: ग्राम सभाओं को परियोजना के पर्यावरणीय, सामाजिक एवं पुनर्वास प्रभावों की जानकारी स्थानीय भाषा में दी जाए तथा आवश्यक विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध कराई जाए।
  • एकीकृत स्वीकृति व्यवस्था: विभिन्न स्वीकृतियों के लिए एकीकृत डिजिटल व्यवस्था विकसित की जाए, लेकिन जनजातीय एवं पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर न किया जाए।
  • लाभ-साझेदारी: प्रभावित समुदायों को रोजगार, स्थानीय विकास निधि तथा परियोजना से होने वाले दीर्घकालीन लाभों में भागीदारी दी जाए।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 को विकास विरोधी कानून तथा ग्राम सभा को विकास में बाधा मानना उचित नहीं है। आवश्यकता जनजातीय अधिकारों की रक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता और समयबद्ध बुनियादी ढाँचा विकास के बीच संस्थागत संतुलन की है। भारत को “अधिकार बनाम विकास” के द्वंद्व से आगे बढ़कर अधिकार-सम्मत, सहभागी और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न (Practive question)

Q. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. ग्राम सभा को वन अधिकारों की पहचान एवं सत्यापन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गई है।

2. अधिनियम प्रत्येक वन भूमि के गैर-वन उपयोग से पहले ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति को स्पष्ट रूप से आवश्यक बनाता है।

3. नियमगिरि मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम सभा की भूमिका को धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण से जोड़ा।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c) केवल 1 और 3

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