आर्कटिक में सुरक्षा समझौता: ग्रीनलैंड की संप्रभुता और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा (Security Agreement in the Arctic: Greenland’s Sovereignty and Growing Competition Among Great Powers)

| UPSC पाठ्यक्रम से संबंध: GS-II — अंतरराष्ट्रीय संबंध, NATO, वैश्विक भू-राजनीति और भारत के रणनीतिक हित; GS-III — जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधन एवं ऊर्जा सुरक्षा। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) में एक ऐतिहासिक सुरक्षा समझौता संपन्न हुआ है। यह समझौता आर्कटिक क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह समझौता ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है और यह क्षेत्र वैश्विक शक्तियों के बीच सैन्य, आर्थिक और अंतरिक्ष सुरक्षा की प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र बन गया है। इस समझौते ने पूर्व में ग्रीनलैंड को “खरीदने” या उस पर पूर्ण प्रादेशिक नियंत्रण हासिल करने के अमेरिकी प्रयासों से उपजे राजनयिक तनाव को समाप्त कर एक नई सुरक्षा साझेदारी की नींव रखी है।
ग्रीनलैंड का भौगोलिक एवं राजनीतिक महत्त्व
- भौगोलिक स्थिति: ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप का हिस्सा है, लेकिन ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से यूरोप से जुड़ा हुआ है। यह उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है, जो इसे उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच एक ‘रणनीतिक पुल’ बनाता है।
- आर्कटिककेआठप्रमुखदेश(Arctic Eight):
- अमेरिका — अलास्का कनाडा डेनमार्क रूस नॉर्वे स्वीडन फिनलैंड
- आइसलैंड

- राजनीतिक स्थिति: राजनीतिक रूप से, ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य का एक स्वायत्त हिस्सा है।
- 2009 का स्व-सरकार अधिनियम (Self-Government Act): इस ऐतिहासिक अधिनियम के तहत ग्रीनलैंड को अपने आंतरिक मामलों, आर्थिक नीतियों, कानून व्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन पर व्यापक नियंत्रण प्राप्त है। हालांकि, इसकी विदेश नीति, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले अभी भी डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन द्वारा ही संचालित किए जाते हैं।
अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- अग्रिम रक्षा पंक्ति (Frontline Defences): अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से ग्रीनलैंड उसकी मुख्य भूमि की रक्षा के लिए अग्रिम चौकी की तरह है।
- मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी: ग्रीनलैंड की भौगोलिक अवस्थिति अंतरिक्ष निगरानी, प्रारंभिक बैलिस्टिक मिसाइल चेतावनी तंत्र और उत्तरी अटलांटिक की हवाई संप्रभुता की निगरानी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- रूस और चीन की घेराबंदी: अमेरिका ग्रीनलैंड का उपयोग आर्कटिक क्षेत्र में रूस की बढ़ती नौसैनिक पनडुब्बियों की गतिविधियों को ट्रैक करने और इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते आर्थिक कदमों को रोकने के लिए एक रणनीतिक मंच के रूप में करता है।
अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड सुरक्षा समझौते के प्रमुख प्रावधान
- सैन्य पहुंच का विस्तार: यह समझौता ग्रीनलैंड में स्थित अमेरिका के रणनीतिक ‘पितुफिक स्पेस बेस‘ (पूर्व नाम थुले एयर बेस) के विस्तार की अनुमति देता है। इसके अतिरिक्त, यह दक्षिण में नार्सार्सुआक और पूर्व में मेस्टर्सविग में अमेरिकी रक्षा सुविधाओं के विकास का प्रावधान करता है।
- यह प्रादेशिक सौदा नहीं है: अमेरिका ने ग्रीनलैंड के पूर्ण विलय या अधिग्रहण की अपनी पुरानी मांगों को त्याग दिया है। यह पूरी तरह से एक सैन्य और सुरक्षा पहुंच समझौता है जो डेनमार्क की संप्रभुता को स्वीकार करता है।
- विदेशी निवेश पर सख्त प्रतिबंध: समझौते के तहत नाटो (NATO), नाटो के भागीदार देशों और यूरोपीय संघ (EU) से बाहर के देशों द्वारा ग्रीनलैंड के संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश करने पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं।
- समय सीमा से मुक्त (No Expiry Date): इस समझौते की कोई समाप्ति तिथि नहीं है। यदि भविष्य में ग्रीनलैंड पूर्ण स्वतंत्रता भी प्राप्त कर लेता है, तब भी इस समझौते के सुरक्षात्मक प्रावधान और अमेरिकी पहुंच अधिकार प्रभावी रहेंगे।
आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
- रूस का सैन्यीकरण: रूस ने आर्कटिक में अपने सोवियत काल के दर्जनों सैन्य ठिकानों, हवाई पट्टियों और रडार स्टेशनों को पुनर्जीवित किया है। रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु-संचालित आइसब्रेकर (Icebreaker Fleet) बेड़ा है, जिससे वह इस क्षेत्र पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहता है।
- नाटो का विस्तार: फिनलैंड और स्वीडन के नाटो में शामिल होने के बाद से ‘आर्कटिक परिषद’ के आठ सदस्यों में से सात देश अब नाटो के सदस्य हैं (रूस को छोड़कर)। इसके कारण आर्कटिक में नाटो बनाम रूस का सीधा सैन्य तनाव बढ़ गया है।
- चीन की ‘पोलर सिल्क रोड‘ (Polar Silk Road): खुद को “निकट-आर्कटिक देश” घोषित कर चीन बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और वैज्ञानिक अनुसंधान जहाजों के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी दीर्घकालिक उपस्थिति स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
आर्कटिक का बढ़ता आर्थिक एवं सामरिक महत्त्व
- विशाल भौगोलिक विस्तार: आर्कटिक सर्कल के तहत 21 मिलियन वर्ग किलोमीटर भूमि और 13 मिलियन वर्ग किलोमीटर का मुख्य रूप से बर्फ से ढका समुद्र आता है।
- महत्वपूर्ण खनिजों का भंडार (Critical Minerals): ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में लिथियम, कोबाल्ट, निकल, यूरेनियम और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements – REEs) के विशाल भंडार हैं। ये खनिज आधुनिक तकनीक, सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा संक्रमण के लिए रीढ़ की हड्डी हैं।
- नए समुद्री मार्ग:पिघलती बर्फ के कारण 12,894 किलोमीटर लंबा उत्तर-पश्चिमी मार्ग जापान के योकोहामा बंदरगाह को सीधे नीदरलैंड के रॉटरडैम बंदरगाह से जोड़ता है। ये मार्ग पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में एशिया और यूरोप के बीच की दूरी को लगभग 30% से 40% तक कम कर देते हैं, जिससे समय और ईंधन की भारी बचत होगी।
- तेल और प्राकृतिक गैस: दुनिया के कुल अछूते तेल भंडारों का 13% (Undiscovered Oil Reserves) इसी क्षेत्र में है। दुनिया के कुल अछूते प्राकृतिक गैस भंडारों का 30% यहाँ छिपा है।
आर्कटिक परिषद: सहयोग और बहुपक्षवाद का प्रमुख मंच
आर्कटिक में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा के बीच पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और सतत विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से आर्कटिक परिषद (Arctic Council) की स्थापना की गई।
- स्थापना व आधार: इसकी स्थापना 1996 में ओटावा घोषणा के तहत की गई थी।
- मुख्य उद्देश्य: इसका लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और स्थानीय स्वदेशी समुदायों (Inuit) के कल्याण के लिए सहयोग बढ़ाना है।
- सैन्य सुरक्षा से दूरी: इस परिषद का कार्यक्षेत्र सैन्य सुरक्षा और रक्षा मुद्दों को शामिल नहीं करता, इसलिए यह सीधे नाटो-रूस सैन्य तनाव को नहीं सुलझा सकता।
- आठ मुख्य सदस्य देश (Arctic States): कनाडा (उत्तरी अमेरिका), डेनमार्क (ग्रीनलैंड के माध्यम से), फिनलैंड (उत्तरी यूरोप), आइसलैंड (उत्तरी अटलांटिक), नॉर्वे (उत्तरी यूरोप), रूस (उत्तरी यूरेशिया), स्वीडन (उत्तरी यूरोप), अमेरिका (अलास्का के माध्यम से)
- स्थायी पर्यवेक्षक देश (Observer States): भारत सहित छह देशों को 2013 के किरुना मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में पर्यवेक्षक का दर्जा दिया गया था। इन छह देशों में भारत, चीन, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर शामिल हैं। अन्य पर्यवेक्षक फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, पोलैंड, स्पेन, स्विट्जरलैंड और यूनाइटेड किंगडम (UK) है।
- गवर्नेंस की सीमाएं: पर्यवेक्षक देशों को परिषद में सीधे तौर पर स्वतंत्र मुद्दे उठाने या मतदान करने का अधिकार नहीं है। उन्हें अपनी बात रखने या किसी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए इन आठ मुख्य देशों में से किसी एक का सहारा लेना पड़ता है।
- वर्तमान संकट: रूस-यूक्रेन संघर्ष और फिनलैंड-स्वीडन के नाटो में शामिल होने के बाद से ‘आर्कटिक परिषद’ की कार्यप्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। आठ में से सात मुख्य देश नाटो ब्लॉक के सदस्य बन चुके हैं, जिससे रूस के साथ संवाद लगभग ठप हो गया है और इस वैश्विक मंच के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड के सामने चुनौतियाँ
- डेनमार्क का संतुलनकारी कार्य (Denmark’s Balancing Act): डेनमार्क के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोपेनहेगन और वाशिंगटन के बीच मजबूत रक्षा संबंधों को बनाए रखने के साथ-साथ ग्रीनलैंड पर अपनी संप्रभुता को अक्षुण्ण रखना था, ताकि वह अमेरिका का केवल एक “पिछला हिस्सा” बनकर न रह जाए।
- ग्रीनलैंड की सुरक्षा दुविधा: ग्रीनलैंड के सामने चुनौती यह है कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ने से उसकी सुरक्षा तो मजबूत होती है, लेकिन इससे वह महाशक्तियों के सीधे सैन्य टकराव का केंद्र भी बन सकता है।
- स्वदेशी आबादी और पर्यावरण संकट: ग्रीनलैंड की अधिकांश आबादी इनुइट समुदाय की है। बड़े पैमाने पर होने वाले सैन्यीकरण और औद्योगिक खनन से उनकी पारंपरिक जीवन शैली और आर्कटिक के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को गंभीर खतरा है।
भारत के लिए आर्कटिक का महत्त्व
- भारतीय आर्कटिक नीति (2022): भारत की आधिकारिक नीति विज्ञान और अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण, तथा खनिज सहयोग पर केंद्रित है। भारत स्वालबार्ड (नॉर्वे) में अपने अनुसंधान स्टेशन ‘हिमाद्रि‘ के माध्यम से दीर्घकालिक जलवायु अनुसंधान कर रहा है।
- वैश्विक मानसून से जुड़ाव: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि आर्कटिक की बर्फ का पिघलना सीधे तौर पर भारत के मानसून पैटर्न की तीव्रता और अनिश्चितता को प्रभावित करता है। इसलिए, भारत के कृषि क्षेत्र के लिए आर्कटिक का अध्ययन आवश्यक है।
- संसाधन सुरक्षा: भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए ग्रीनलैंड के क्रिटिकल मिनरल्स और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (REEs) तक पहुंच बनाना चाहता है। हालांकि, इस नए समझौते के बाद भारत को इन संसाधनों के लिए पश्चिमी ब्लॉक (अमेरिका-डेनमार्क) के नियमों के भीतर रहकर ही रणनीतिक साझेदारी करनी होगी।
आगे की राह
- बहुपक्षवाद को बढ़ावा: आर्कटिक को हथियारों की होड़ से बचाने के लिए ‘आर्कटिक परिषद‘ (Arctic Council) जैसी संस्थाओं को फिर से पूरी तरह सक्रिय और प्रभावी बनाना होगा, जहां रूस और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक संवाद बना रहे।
- टिकाऊ विकास (Sustainable Development): ग्रीनलैंड में खनन और वाणिज्यिक गतिविधियों को स्थानीय इनुइट समुदाय की सहमति और सख्त पर्यावरणीय मानकों के तहत ही अनुमति दी जानी चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सम्मान: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नए समुद्री मार्ग किसी एक देश के नियंत्रण में न रहकर ‘संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि’ (UNCLOS) के तहत सभी देशों के लिए खुले और सुरक्षित रहें।
निष्कर्ष
यह सुरक्षा समझौता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आर्कटिक का आर्थिक और भौगोलिक मूल्यांकन अब पूरी तरह से ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे‘ से किया जा रहा है। यह समझौता केवल संघर्ष की समाप्ति नहीं, बल्कि ‘आर्कटिक की जंग’ (Arctic Contest) के एक नए अध्याय की शुरुआत है। आने वाले समय में वैश्विक शांति इस बात पर निर्भर करेगी कि महाशक्तियां इस संवेदनशील और पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र का उपयोग टकराव के लिए करती हैं या वैश्विक भलाई और वैज्ञानिक सहयोग के लिए।