नवउदारवाद और युवा संकट: रोजगार एवं आर्थिक असुरक्षा की चुनौती (Neoliberalism and the Youth Crisis: The Challenge of Employment and Economic Insecurity)
| UPSC पाठ्यक्रम से संबंध: GS-II — कल्याणकारी योजनाएँ, सामाजिक न्याय और कमजोर वर्ग; GS-III — भारतीय अर्थव्यवस्था, रोजगार एवं समावेशी विकास; |

चर्चा में क्यों?
हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर (जैसे फ्रांस, स्पेन, अल्बानिया, श्रीलंका और भारत में) युवाओं द्वारा बेरोजगारी, घटती वास्तविक मजदूरी और सरकारी नौकरियों की कमी को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं । हाल ही में प्रकाशित एक शोध-पत्र ने यह स्पष्ट किया है कि कैसे नवउदारवादी पूंजीवाद ने लोक कल्याणकारी ढांचे को कमजोर कर युवाओं के भविष्य को गंभीर आर्थिक असुरक्षा में धकेल दिया है।
नवउदारवाद (Neoliberalism) क्या है?
नवउदारवाद एक समकालीन आर्थिक और राजनीतिक दर्शन है जो:
- मुक्त बाजार, निजीकरण, विनिवेश और वैश्वीकरण की वकालत करता है।
- यह अर्थव्यवस्था में राज्य के हस्तक्षेप को न्यूनतम करने और सार्वजनिक व्यय (कल्याणकारी योजनाओं) में कटौती करने पर जोर देता है।
- इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि बाजार की शक्तियां (मांग और आपूर्ति) स्वयं ही संसाधनों का सबसे कुशल आवंटन कर सकती हैं।
नवउदारवाद संबंधी वैश्विक और भारतीय परिदृश्य
- वैश्विक परिदृश्य:
- उच्च युवा बेरोजगारी: वैश्विक उत्तर (Global North) और G7 देशों में युवा बेरोजगारी दर (15-24 वर्ष) खतरनाक स्तर पर है। उदाहरण के लिए, स्पेन में यह 26.5%, इटली में 22.2%, और फ्रांस में 16.3% तक पहुंच चुकी है।
- राष्ट्रीय आय में श्रमिकों के हिस्से में गिरावट: 1980 के दशक (रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थैचर के दौर) के बाद से विकसित देशों में राष्ट्रीय आय में श्रम का कुल हिस्सा लगातार गिरा है, जबकि कॉर्पोरेट मुनाफा चरम पर है।

- भारतीय परिदृश्य:
- भारत ने 1991 के एलपीजी (LPG) सुधारों के बाद नवउदारवादी रास्ते को अपनाया। इसके कारण सेवा क्षेत्र (IT, बैंकिंग) ने तो तेजी से तरक्की की, लेकिन श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing) पिछड़ गया।
- ‘इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत में कुल बेरोजगारों में लगभग 83% हिस्सेदारी युवाओं की है, जो यह दर्शाती है कि भारत का आर्थिक विकास बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करने में असमर्थ रहा है।
युवा संकट: रोजगार एवं आर्थिक असुरक्षा
आज की युवा पीढ़ी (विशेषकर Gen Z) इतिहास के सबसे बड़े संकटों में से एक का सामना कर रही है:
- शिक्षित बेरोजगारी: माध्यमिक या उससे उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में बेरोजगारी दर अनपढ़ युवाओं की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक है।
- असुरक्षित और अस्थायी रोजगार: नवउदारवाद ने गीग इकोनॉमी और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था (जैसे जोमैटो, ब्लिंकिट, ओला) को जन्म दिया है। यहाँ युवाओं को रोजगार तो मिलता है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा (भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा) और नौकरी की स्थिरता पूरी तरह नदारद होती है।
- शिक्षा का व्यावसायीकरण: सार्वजनिक वित्तपोषण में कटौती के कारण उच्च शिक्षा अत्यधिक महंगी हो गई है। युवा डिग्री हासिल करने के लिए भारी कर्ज के दुष्चक्र में फंस रहे हैं, जबकि बाजार में उन डिग्रियों के बदले सम्मानजनक वेतन वाली नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं।
नवउदारवादी मॉडल के कारण उत्पन्न चुनौतियाँ
| नवउदारवाद के सकारात्मक पक्ष | युवा रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव |
| तीव्र जीडीपी संवृद्धि: वैश्विक पूंजी और विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह में अभूतपूर्व वृद्धि। | अल्प-उपभोग का संकट: जब श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी गिरती है, तो बाजार में वस्तुओं की कुल मांग कम हो जाती है, जिससे विकास दर धीमी होती है। |
| उद्यमशीलता और स्टार्टअप: नवाचार, तकनीक और ई-कॉमर्स के क्षेत्रों में नए रास्ते खुले। | श्रम-विस्थापन तकनीक (AI का खतरा): पूंजीपति अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए मानव श्रम को मशीनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बदल रहे हैं। |
| उपभोक्तावाद का विस्तार: वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता व पहुंच में आसानी। | श्रम कानूनों का लचीलापन: ‘हायर एंड फायर’ नीति के कारण कॉर्पोरेट क्षेत्रों में छंटनी आम हो गई है, जिससे युवाओं में मानसिक तनाव बढ़ा है। |
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
भारत सरकार ने इस संकट की गंभीरता को पहचानते हुए, विशेषकर हालिया नीतिगत ढांचों में, बाजार के भरोसे बैठने के बजाय सीधे हस्तक्षेप करना शुरू किया है:
- रोजगार आधारित प्रोत्साहन:
- योजना A (प्रथम बार रोजगार): नए कर्मचारियों के कार्यबल में प्रवेश को आसान बनाने के लिए ईपीएफओ (EPFO) में पंजीकरण पर एक महीने का वेतन (₹15,000 तक) दिया जाता है।
- योजना B (विनिर्माण में रोजगार): विनिर्माण क्षेत्र में अतिरिक्त रोजगार सृजन के आधार पर कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों को वित्तीय प्रोत्साहन।
- योजना C (नियोक्ताओं को समर्थन): सभी क्षेत्रों में अतिरिक्त कर्मचारियों को रखने पर नियोक्ताओं के EPFO योगदान की सरकार द्वारा प्रतिपूर्ति।
- राष्ट्रीय प्रेंटिसशिप/इंटर्नशिप कार्यक्रम: देश की शीर्ष 500 कंपनियों में युवाओं को व्यावहारिक कार्य-अनुभव (Stipend के साथ) देने के लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का उपयोग किया जा रहा है, ताकि ‘कौशल बेमेल’ को सुधारा जा सके।
- पीएम कौशल विकास योजना (PMKVY): उद्योगों की आधुनिक जरूरतों (जैसे डेटा एनालिटिक्स, एआई) के अनुसार युवाओं को री-स्किल और अप-स्किल करना।
आगे की राह (Way Forward)
- कीनेसियन और कल्याणकारी दृष्टिकोण की बहाली: जैसा कि लेख के आर्थिक सिद्धांत सुझाते हैं, केवल कॉर्पोरेट्स को टैक्स छूट देने से नौकरियां नहीं बनेंगी। सरकार को स्वास्थ्य, शिक्षा और हरित बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा, जिससे वास्तविक मांग पैदा हो।
- श्रम-प्रधान विनिर्माण पर ध्यान: कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और चमड़ा जैसे क्षेत्रों को विशेष प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जो बड़ी संख्या में अर्ध-कुशल युवाओं को रोजगार दे सकें।
- सामाजिक सुरक्षा का सार्वभौमीकरण: गिग और अनुबंध श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कोड को सख्त कानून बनाकर लागू किया जाए, ताकि उनकी आर्थिक असुरक्षा कम हो सके।
- शिक्षा प्रणाली में सुधार: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत उच्च शिक्षा को व्यावसायिक और सस्ती बनाया जाए ताकि युवाओं को शिक्षा के लिए कर्ज के जाल में न फंसना पड़े।
निष्कर्ष
नवउदारवादी आर्थिक मॉडल ने दुनिया को समृद्धि के नए शिखर तो दिखाए हैं, लेकिन इसने समकालीन युवा पीढ़ी के भविष्य को दांव पर लगा दिया है भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश के चरम पर है, यह संकट एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ में बदल सकता है। भारत सरकार द्वारा शुरू की गई ELI योजनाएं इस दिशा में एक सही सुधारात्मक कदम हैं, लेकिन जब तक शिक्षा के बढ़ते खर्च और नौकरियों की अस्थिरता जैसे बुनियादी नवउदारवादी दोषों को ठीक नहीं किया जाता, तब तक युवाओं का यह संकट पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। राज्य को पुनः एक नियामक और कल्याणकारी संरक्षक के रूप में अपनी केंद्रीय भूमिका में वापस आना ही होगा।