जाति और विज्ञान का अंतरविरोध: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन (The Contradiction Between Caste and Science: An Analytical Study)

हाल ही में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी में एक पोस्टर सामने आया, जिसने देश के अकादमिक और वैज्ञानिक जगत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस पोस्टर में ‘मनुस्मृति’ के उद्धरणों के आधार पर पारंपरिक वर्ण-व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की पूर्व-निर्धारित भूमिकाओं) का महिमामंडन किया गया था।

यह घटना इसलिए मायने रखती है क्योंकि यह स्पष्ट करती है कि कैसे भारत के सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थान भी उस जातिवादी मानसिकता और वैचारिक ध्रुवीकरण से अछूते नहीं हैं, जो आधुनिक भारत के संवैधानिक मूल्यों, समतावादी समाज और वैज्ञानिक चेतना के बिल्कुल विपरीत है।

IIT मंडी जैसी घटनाओं में जिस पारंपरिक वर्ण-व्यवस्था को ‘प्राकृतिक’ या ‘तार्किक’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है, आधुनिक विज्ञान उसे पूरी तरह खारिज करता है:

जेनेटिक्स और जीनोम अध्ययनों ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि मानव विविधताएं, बौद्धिक क्षमताएं और कौशल किसी भी प्रकार के आनुवंशिक या जातिगत पदानुक्रम पर आधारित नहीं होते हैं। किसी विशेष जाति में जन्म लेने से किसी व्यक्ति को बौद्धिक या शारीरिक श्रेष्ठता प्राप्त नहीं होती।

एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) और सामाजिक परिस्थितियां

आधुनिक जीव विज्ञान की शाखा ‘एपिजेनेटिक्स’ यह साबित करती है कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच दिखने वाली जैविक या स्वास्थ्य संबंधी असमानताएं (जैसे कुपोषण, औसत आयु या कुछ बीमारियां) जन्मजात या आनुवंशिक नहीं हैं। इसके विपरीत, ये सदियों से चली आ रही ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों, संसाधनों के असमान वितरण और सामाजिक भेदभाव का परिणाम हैं।

विज्ञान और जाति व्यवस्था के मूल सिद्धांतों में एक बुनियादी टकराव है:

विज्ञान हर अवधारणा को तर्क, प्रयोग और अनुभवजन्य साक्ष्यों (empirical evidence) की कसौटी पर कसता है। इसके विपरीत, जाति व्यवस्था जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और पवित्रता-अपवित्रता (purity and pollution) के काल्पनिक और अवैतिहासिक सिद्धांतों पर टिकी है।

विज्ञान निरंतर परिवर्तनशील है; नए प्रमाण मिलने पर यह पुराने सिद्धांतों को छोड़ देता है। इसके विपरीत, वर्ण या जाति व्यवस्था समाज को एक अपरिवर्तनीय और कठोर ढांचे में बांधती है, जहाँ व्यक्ति की योग्यता नहीं, बल्कि उसका जन्म उसका भविष्य तय करता है।

अक्सर यह माना जाता है कि IITs और IISc जैसे उच्च शिक्षण संस्थान विशुद्ध रूप से ‘तार्किक’ और ‘जाति-मुक्त’ क्षेत्र हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति भिन्न है:

‘मेधा’ (Merit) की संकीर्ण व्याख्या

विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग अक्सर ‘मेरिट’ को एक स्वतंत्र तत्व मानते हैं, जबकि समाजशास्त्र के अनुसार मेरिट काफी हद तक सामाजिक पूंजी (Social Capital), आर्थिक सुदृढ़ता और पीढ़ीगत विशेषाधिकारों का परिणाम होती है।

माइक्रो-अग्रेसन्स (Micro-aggressions)

हाशिए के समाजों (SC/ST/OBC) से आने वाले छात्रों और शोधकर्ताओं को इन संस्थानों में सूक्ष्म भेदभाव का सामना करना पड़ता है। IIT मंडी जैसी घटनाएं इन संस्थानों के भीतर रूढ़िवादी ताकतों के वैचारिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती हैं, जिससे समावेशी शैक्षणिक माहौल प्रभावित होता है।

ज्ञान प्रणालियों का पदानुक्रम और श्रम का अनादर

जाति व्यवस्था ने भारत में विज्ञान के व्यावहारिक विकास को ऐतिहासिक रूप से बाधित किया है:

मानसिक बनाम शारीरिक श्रम का विभाजन

जाति व्यवस्था ने मानसिक श्रम को ‘उच्च’ और पवित्र माना, जबकि व्यावहारिक या शारीरिक श्रम को ‘निम्न’ श्रेणी में डाल दिया।

पारंपरिक व्यावहारिक विज्ञान की उपेक्षा

भारत की श्रमजीवी जातियों के पास धातु कर्म (metallurgy), कृषि विज्ञान, कपड़ा निर्माण और पारंपरिक वास्तुकला का समृद्ध व्यावहारिक विज्ञान (applied science) था। लेकिन जातिगत पूर्वाग्रहों के कारण इस ज्ञान को ‘विज्ञान’ न मानकर केवल ‘शारीरिक श्रम’ समझा गया। इसके कारण भारत में अकादमिक विज्ञान और व्यावहारिक तकनीक के बीच एक बड़ी खाई बन गई।

भारतीय संविधान और संवैधानिक मूल्यों से संबंधित आधिकारिक स्रोत — भारत का संविधान – India Code

यदि भारत को 21वीं सदी में एक वास्तविक वैज्ञानिक और तार्किक महाशक्ति बनना है, तो उसे निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाने होंगे:

वैज्ञानिक संस्थानों का संवेदीकरण (Sensitization)

IITs और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल तकनीकी शिक्षा ही नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) और मानवाधिकारों के प्रति संवेदीकरण अनिवार्य किया जाना चाहिए। ऐसी संस्थाओं में छद्म-विज्ञान या जातिगत श्रेष्ठता को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों पर सख्त प्रशासनिक रोक होनी चाहिए।

लोक-विज्ञान (People’s Science) का प्रसार

पाठ्यक्रम में विज्ञान को इस तरह पढ़ाया जाए कि वह सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों को तोड़ने का माध्यम बने, न कि उनका वैज्ञानिकरण (pseudo-scientific justification) करने का उपकरण।

विविधता और समावेशन (Diversity & Inclusion)

उच्च शिक्षण संस्थानों के संकाय (Faculty) और शोध विभागों में समाज के सभी वर्गों के न्यायसंगत प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया जाए, ताकि संस्थान का चरित्र लोकतांत्रिक बना रहे।

जाति और विज्ञान का अंतरविरोध केवल एक अकादमिक बहस नहीं है, बल्कि यह भारत के मानव संसाधन के पूर्ण विकास की राह में एक बड़ा अवरोध है। बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने कहा था कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है। विज्ञान का वास्तविक लाभ और तार्किक सोच समाज के अंतिम व्यक्ति तक तभी पहुंचेगी, जब देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थान ‘वर्ण-व्यवस्था’ जैसी रूढ़ियों से मुक्त होकर संवैधानिक मूल्यों और आधुनिक जीव विज्ञान के सिद्धांतों को आत्मसात करेंगे। भारत का वैश्विक नेतृत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वह ‘जाति की रूढ़िवादी चेतना’ पर ‘विज्ञान की आधुनिक चेतना’ को कितनी मजबूती से स्थापित करता है।

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