☎
9235313184 9235446806 • Help & Enquiries
Home › CA for Mains› डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों को राहत हेतु बैंकों की जवाबदेही तय करने का…
CA for Mains

डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों को राहत हेतु बैंकों की जवाबदेही तय करने का सुप्रीम कोर्ट का  प्रस्ताव। (Supreme Court proposes bank accountability to provide relief for digital arrest victims)

By Result Mitra •
डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों को राहत हेतु बैंकों की जवाबदेही | Result Mitra
RESULT MITRA
30/10/2026

डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों को राहत हेतु बैंकों की जवाबदेही तय करने का सुप्रीम कोर्ट का प्रस्ताव।

Supreme Court proposes bank accountability to provide relief for digital arrest victims.
Source: The Hindu

समाचार का संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने देश में तेजी से बढ़ रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को नए नियामक उपायों को लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि वित्तीय संस्थानों (बैंकों) को अपनी प्रणाली में कमियों और उचित सतर्कता (Due Diligence) बरतने में विफलता के मामलों में पीड़ितों को वित्तीय रूप से पूरी तरह या आंशिक रूप से मुआवजा देना चाहिए। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब डिजिटल माध्यमों से करोड़ों रुपये की ठगी होती है, तो बैंक संदिग्ध लेन-देन (Transactions) को तुरंत क्यों नहीं रोकते।

यूपीएससी के लिए सीख

नियामक जवाबदेही: साइबर अपराधों से निपटने के लिए केवल कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर ही नहीं, बल्कि वित्तीय मध्यस्थों (बैंकों और टेक कंपनियों) पर भी सख्त देयता (Strict Liability) तय करने की आवश्यकता है।
तकनीकी समाधान: एआई (AI) और स्वचालित अलर्ट प्रणालियों का उपयोग करके असामान्य वित्तीय लेन-देन को तुरंत रोका जा सकता है।
सार्वजनिक जागरूकता: तकनीकी साक्षरता की कमी और डर के कारण शिक्षित लोग भी आसानी से ठगी का शिकार बन रहे हैं, जिसके लिए निरंतर जन-जागरूकता अभियान जरूरी हैं।

मुख्य प्रश्न

Q. “डिजिटल अरेस्ट जैसे नए साइबर अपराध भारतीय आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।” इस परिप्रेक्ष्य में वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करने और तकनीकी-नियामक ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए।

उत्तर की रूपरेखा

भूमिका: ‘डिजिटल अरेस्ट’ के बढ़ते खतरे और इसके वित्तीय व सामाजिक प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करें।
मुख्य भाग:
  • समस्या की गंभीरता: यह किस प्रकार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है।
  • वित्तीय संस्थानों (बैंकों) और बिचौलियों की भूमिका: क्यों बैंक और तकनीकी प्लेटफॉर्म जवाबदेह होने चाहिए।
  • वर्तमान प्रणालियों की सीमाएं: वास्तविक समय में समन्वय की कमी और तकनीकी अंतराल।
  • सुझाए गए उपाय: एआई-आधारित निगरानी, बैंक-दूरसंचार डेटा साझाकरण और सख्त नियामक मानक।
निष्कर्ष: बहु-हितधारक दृष्टिकोण अपनाते हुए एक सुरक्षित डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण पर बल दें।

मॉडल उत्तर

परिचय

हाल के वर्षों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ वित्तीय धोखाधड़ी का एक अत्यंत खतरनाक और नया रूप बनकर उभरा है, जिसमें साइबर अपराधी कानून प्रवर्तन अधिकारियों (जैसे सीबीआई, पुलिस या सीमा शुल्क) का रूप धारण करके नागरिकों को वीडियो कॉल के माध्यम से डराते-धमकाते हैं और उनकी जीवनभर की कमाई ठग लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने इस मुद्दे पर वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही और नियामक ढांचे की प्रभावशीलता पर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है।

डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी की बढ़ती चुनौती

मनोवैज्ञानिक भय और दोहन: ये गिरोह पीड़ितों को इस तरह भयभीत करते हैं कि अत्यधिक दबाव में आकर वे अपनी जमा पूंजी ट्रांसफर कर देते हैं।
अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: यह केवल व्यक्तिगत वित्तीय हानि नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया के विश्वास पर सीधा आघात है।
साक्षरता का अभाव: यह मिथक टूट चुका है कि केवल अशिक्षित लोग ही ठगी का शिकार होते हैं; डर और तकनीकी अज्ञानता के कारण उच्च शिक्षित वर्ग भी इसकी चपेट में आ रहा है।

बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही का प्रश्न

संदिग्ध लेन-देन की पहचान में विफलता: यदि कोई व्यक्ति, विशेषकर वरिष्ठ नागरिक, अपने खाते से अचानक बड़ी राशि निकालता है या स्थानांतरित करता है, तो बैंकों की आंतरिक निगरानी प्रणाली तुरंत चेतावनी क्यों नहीं जारी करती?
कड़े नियम और क्षतिपूर्ति: सुप्रीम कोर्ट का यह तर्क उचित है कि यदि बैंक अपनी उचित सतर्कता (Due Diligence) बरतने में विफल रहते हैं, तो उन्हें पीड़ितों को हर्जाना या मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।

तकनीकी और विधिक उपाय

स्वचालित अलर्ट और एआई का उपयोग: बैंक खातों और दूरसंचार डेटा के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए ताकि धोखाधड़ी वाले फोन नंबरों या खातों को तुरंत ब्लॉक किया जा सके।
मध्यस्थों (Intermediaries) की भूमिका: सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स (जैसे व्हाट्सएप आदि) को संदिग्ध खातों और फर्जी सरकारी प्रोफाइल की पहचान के लिए सख्त सॉफ्टवेयर और तकनीक विकसित करनी चाहिए।

सरकार द्वारा किए गए प्रयास और पहल

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C): गृह मंत्रालय के तहत स्थापित यह केंद्र देश में साइबर अपराधों से एकीकृत रूप से निपटने के लिए राज्यों के साथ समन्वय करता है।
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP): नागरिकों को तुरंत ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने और वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में ठगा गया पैसा होल्ड कराने के लिए ‘1930’ हेल्पलाइन नंबर और पोर्टल की शुरुआत की गई है।
आरबीआई (RBI) के नए दिशा-निर्देश: सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान के बाद, केंद्रीय बैंक द्वारा केवाईसी (KYC) संशोधन और वित्तीय धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त संस्थागत सुरक्षा उपाय प्रस्तावित किए गए हैं, जिससे बिचौलियों की जवाबदेही तय हो सके।

निष्कर्ष

डिजिटल अरेस्ट जैसी साइबर आपदाओं से निपटने के लिए केवल पुलिस जांच पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए एक त्रि-स्तरीय सुरक्षा चक्र की आवश्यकता है—जिसमें कड़े नियामक दिशानिर्देश (RBI और MeitY द्वारा), बैंकों की सख्त वित्तीय जवाबदेही और नागरिकों के बीच निरंतर जन-जागरूकता शामिल हो। एक सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल भविष्य के लिए वित्तीय तंत्र को अधिक पारदर्शी और संवेदनशील बनाना समय की मुख्य मांग है।

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1
‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाले के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह एक प्रकार का साइबर अपराध है जिसमें ठग कानून प्रवर्तन अधिकारियों या सरकारी एजेंसियों का रूप धरकर पीड़ितों को डराते-धमकाते हैं और ऑनलाइन अवैध रूप से पैसे ट्रांसफर करवाते हैं।
2. हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया है कि वित्तीय धोखाधड़ी रोकने में विफलता के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों
Result Mitra – UPSC/PCS Preparation
RESULT MITRA
Result Mitra – UPSC/PCS Preparation
Source: The Hindu
Share this post: TG f
Scroll to Top