Geography Daily Practice MCQ | Result Mitra
Geography Daily Practice MCQ
Geography · Daily Practice Questions
1. विषुवत वृत्त पर क्षोभ मंडल की ऊँचाई ध्रुवों की तुलना में अधिक होती है।
2. इस परत में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान में वृद्धि होती है, जिसे ‘तापमान का व्युत्क्रमण’ कहते हैं।
3. वायुमंडल का लगभग 90% जलवाष्प और धूल कण इसी परत में संकेंद्रित होते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
उत्तर: (c)
क्षोभ मंडल वायुमंडल की सबसे निचली और सघन परत है, जिसकी ऊँचाई में क्षेत्रीय भिन्नता पाई जाती है। विषुवत वृत्त (Equator) पर तीव्र सूर्यताप के कारण संवहन धाराएँ अत्यधिक शक्तिशाली होती हैं, जो वायु को लगभग 18 किमी की ऊँचाई तक ऊपर धकेल देती हैं, जबकि ध्रुवों पर यह ऊँचाई घटकर मात्र 8 किमी रह जाती है। इस परत की सबसे विशिष्ट पहचान ‘सामान्य ताप ह्रास दर’ (Normal Lapse Rate) है, जिसके अंतर्गत प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान में 1°C की कमी आती है। कथन 2 इसलिए गलत है क्योंकि ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि (तापमान का व्युत्क्रमण) केवल विशेष स्थानीय परिस्थितियों में होती है, न कि इस परत के सामान्य स्वभाव में। इसके अतिरिक्त, वायुमंडल के कुल जलवाष्प और धूल कणों का लगभग 90% हिस्सा इसी परत में संकेंद्रित होता है, जिसके परिणामस्वरूप बादल, वर्षा, बिजली कड़कना और चक्रवात जैसी समस्त मौसमी घटनाएँ इसी मंडल तक सीमित रहती हैं। यही कारण है कि इसे ‘परिवर्तन मंडल’ भी कहा जाता है और यह जैव-मंडल के अस्तित्व के लिए अनिवार्य आधार प्रदान करता है।
| सूची-I (वनस्पति) | सूची-II (मुख्य क्षेत्र) |
|---|---|
| (A) उष्णकटिबंधीय सदाबहार | (1) सुंदरवन (पश्चिम बंगाल) |
| (B) कटीले वन एवं झाड़ियाँ | (2) उत्तर-पूर्वी राज्यों की पहाड़ियाँ |
| (C) मैंग्रोव वन | (3) हिमालय के दक्षिणी ढाल |
| (D) पर्वतीय वन | (4) राजस्थान एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र |
कूट: ABCD
उत्तर: (a)
(A) भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों (जैसे असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश) की पहाड़ियों पर २०० सेमी से अधिक वर्षा होती है। यहाँ उच्च आर्द्रता और तापमान के कारण ‘उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन’ पाए जाते हैं। ये वन अत्यंत सघन होते हैं और इनमें ऊँचे वृक्षों के साथ-साथ विभिन्न स्तरों पर लताएँ और झाड़ियाँ पाई जाती हैं।
(B) पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात और पंजाब-हरियाणा के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में ७० सेमी से कम वार्षिक वर्षा होती है। यहाँ की वनस्पति में ‘कटीले वन और झाड़ियाँ’ प्रमुख हैं। इन पौधों की जड़ें लंबी और पत्तियाँ छोटी या काँटों के रूप में होती हैं, ताकि वाष्पीकरण कम हो सके। मुख्य वृक्षों में बबूल और खेजड़ी शामिल हैं।
(C) पश्चिम बंगाल में स्थित ‘सुंदरवन’ विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है। यहाँ गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियाँ समुद्र के खारे पानी से मिलती हैं, जिससे दलदली पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है। इन वनों में ‘सुंदरी’ नामक वृक्ष पाया जाता है, जिसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है और नाव बनाने के काम आती है।
(D) हिमालय के दक्षिणी ढालों पर ऊँचाई के साथ जलवायु परिवर्तन के कारण ‘पर्वतीय वन’ पाए जाते हैं। १५०० से २५०० मीटर की ऊँचाई पर ओक और चेस्टनट जैसे चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष मिलते हैं, जबकि अधिक ऊँचाई पर चीड़ और देवदार जैसे शंकुधारी वन पाए जाते हैं। यह क्षेत्र अपनी जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है।
1. नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग, जो मालवा के पठार के अधिकतर क्षेत्रों पर फैला है, मध्य उच्चभूमि कहलाता है।
2. यह क्षेत्र पश्चिम में चौड़ा लेकिन पूर्व में संकीर्ण है।
3. चंबल, सिंध, बेतवा और केन जैसी नदियाँ इस क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहती हैं, जो इसके ढाल को दर्शाती हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
उत्तर: (d)
नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित प्रायद्वीपीय पठार का वह मुख्य भाग, जो मालवा के पठार के अधिकतर क्षेत्रों पर फैला है, मध्य उच्चभूमि के नाम से जाना जाता है। यह भौगोलिक रूप से उत्तर-पश्चिम में अरावली श्रेणी और दक्षिण में विंध्य श्रेणी से घिरा हुआ है। इस क्षेत्र की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह पश्चिम में काफी चौड़ा है, लेकिन जैसे-जैसे हम पूर्व की ओर बढ़ते हैं, यह संकीर्ण होता जाता है। इसके सुदूर पूर्वी विस्तार को स्थानीय स्तर पर बुंदेलखंड और बघेलखंड के नाम से पुकारा जाता है, जबकि इसके और पूर्व में छोटा नागपुर का पठार स्थित है। इस क्षेत्र का सामान्य ढाल दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है, जिसकी पुष्टि यहाँ बहने वाली चंबल, सिंध, बेतवा और केन जैसी नदियों के प्रवाह मार्ग से होती है। मध्य उच्चभूमि का पश्चिमी हिस्सा अपनी विशिष्ट ‘बीहड़’ (Badland) भू-आकृति के लिए भी विख्यात है, जो विशेष रूप से चंबल बेसिन में नदियों के तीव्र कटाव के कारण निर्मित हुई है। यह पूरा भू-भाग प्राचीन आग्नेय और कायांतरित शैलों से बना है, जो भारत की भू-गर्भिक स्थिरता का प्रतीक है।
अभिकथन (A): चाय की खेती मुख्य रूप से पहाड़ियों के ढलानों पर की जाती है।
कारण (R): चाय के पौधों की जड़ों में पानी का जमाव हानिकारक होता है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
उत्तर: (b)
अभिकथन (A) सही है। चाय एक महत्वपूर्ण रोपण कृषि है, जिसकी खेती के लिए पहाड़ी ढलानों को प्राथमिकता दी जाती है। भारत में असम, दार्जीलिंग (पश्चिम बंगाल) और नीलगिरी की पहाड़ियाँ इसके प्रमुख केंद्र हैं। पहाड़ियों पर खेती करने का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक जल निकासी (Natural Drainage) सुनिश्चित करना है। इसके अतिरिक्त, चाय के लिए ठंडी जलवायु और वर्ष भर समान रूप से होने वाली बौछारों की आवश्यकता होती है, जो उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में सुलभ होती है।
कारण (R) सही है। चाय के पौधों की जैविक संरचना ऐसी होती है कि वे अपनी जड़ों के पास ठहरे हुए पानी को सहन नहीं कर सकते। यदि जड़ों में पानी का जमाव (Water-logging) होता है, तो जड़ें सड़ने लगती हैं और पौधा नष्ट हो जाता है। पहाड़ी ढलान गुरुत्वाकर्षण के कारण वर्षा के अतिरिक्त जल को तेजी से नीचे बहा देते हैं, जिससे मृदा में नमी तो बनी रहती है लेकिन पानी जमा नहीं हो पाता। यही कारण है कि चाय के लिए ढालू भूमि अनिवार्य है।
उत्तर: (a)
भारत के प्रायद्वीपीय पठार पर स्थित अमरकंटक (मैकाल श्रेणी) का पठार एक अत्यंत महत्वपूर्ण जल-विभाजक और ‘अरीय अपवाह प्रतिरूप’ (Radial Drainage Pattern) का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस केंद्रीय बिंदु से निकलने वाली नदियाँ अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं, जिनमें नर्मदा, सोन और महानदी (सिहावा के निकट) प्रमुख हैं। नर्मदा नदी यहाँ से निकलकर पश्चिम की ओर एक लंबी भ्रंश घाटी में बहते हुए अरब सागर में गिरती है, जबकि सोन नदी उत्तर की ओर प्रवाहित होकर गंगा नदी में मिल जाती है। इसी क्षेत्र के निकटवर्ती भाग से महानदी का उद्गम होता है, जो दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। यह भौगोलिक संरचना न केवल भारत के नदी तंत्र को निर्धारित करती है, बल्कि मध्य भारत की कृषि और पारिस्थितिकी के लिए एक जीवन रेखा के रूप में भी कार्य करती है।
अभिकथन (A): हिमालयी नदियाँ अपने मार्ग में ‘V’ आकार की घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ और जलप्रपात बनाती हैं।
कारण (R): ये नदियाँ अभी अपनी युवावस्था में हैं और हिमालय के उत्थान के साथ-साथ ऊर्ध्वाधर अपरदन कर रही हैं।
कूट:
उत्तर: (d)
अभिकथन (A) सही है। हिमालयी नदियाँ (जैसे सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र) ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों से निकलती हैं। तीव्र ढाल के कारण इनका वेग बहुत अधिक होता है, जिससे ये पहाड़ों को काटकर गहरी गार्ज (Gorges) और V-आकार की घाटियाँ बनाती हैं। मार्ग में चट्टानों की कठोरता में भिन्नता के कारण ये जलप्रपात और क्षिप्रिकाओं का भी निर्माण करती हैं।
कारण (R) सही है। हिमालय एक नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountain) है जो अभी भी ऊपर उठ रहा है। इसके साथ बहने वाली नदियाँ ‘पूर्ववर्ती अपवाह’ (Anticedent Drainage) का उदाहरण पेश करती हैं, जो निरंतर नीचे की ओर कटाई (Vertical Downcutting) करती रहती हैं। चूँकि ये नदियाँ अपनी प्रारंभिक अवस्था में हैं, इसलिए इनका मुख्य कार्य घाटी को गहरा करना है। अतः कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
1. भारत में पाया जाने वाला अधिकांश लौह अयस्क ‘मैग्नेटाइट’ प्रकार का है, जिसमें लोहे का अंश 70% से अधिक होता है।
2. तांबा (Copper) के उत्पादन में मध्य प्रदेश का ‘बालाघाट’ (मलांजखंड) क्षेत्र भारत में प्रथम स्थान पर है।
3. अभ्रक (Mica) के निक्षेप मुख्य रूप से छोटा नागपुर पठार के उत्तरी किनारों पर पाए जाते हैं, जहाँ कोडरमा (झारखंड) एक प्रमुख केंद्र है।
4. बॉक्साइट एक धात्विक खनिज है जिससे एल्युमीनियम प्राप्त किया जाता है और ओडिशा इसका सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (b)
भारत अपनी विशिष्ट भू-गर्भिक संरचना के कारण खनिज संसाधनों में अत्यंत समृद्ध है, जहाँ प्राचीन धारवाड़ और कड़पा क्रम की चट्टानों में धात्विक खनिजों का संकेंद्रण है। छोटा नागपुर का पठार, जिसे ‘भारत का रूर’ कहा जाता है, लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज और अभ्रक का प्रमुख केंद्र है। यहाँ से प्राप्त होने वाला अधिकांश लौह अयस्क उच्च कोटि का ‘हेमेटाइट’ है, जबकि कोयला मुख्य रूप से गोंडवाना काल की चट्टानों से प्राप्त होता है। प्रायद्वीपीय भारत के अन्य हिस्सों, जैसे राजस्थान में तांबा (खेतड़ी) और जस्ता, तथा ओडिशा में बॉक्साइट के विशाल भंडार मौजूद हैं। खनिजों का यह असमान वितरण न केवल क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को निर्धारित करता है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और निर्यात क्षमता का मुख्य आधार भी है। यह संसाधन भारत के बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हैं।
| सूची-I (परत) | सूची-II (तत्व) |
|---|---|
| (A) सियाल | (1) निकेल और लोहा |
| (B) सीमा | (2) सिलिका और एल्युमीनियम |
| (C) निफे | (3) सिलिका और मैग्नीशियम |
| (D) संपूर्ण पृथ्वी (औसत) | (4) लोहा और ऑक्सीजन |
कूट: ABCD
उत्तर: (a)
(A) सियाल (SIAL): यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है, जो मुख्य रूप से महाद्वीपीय भूपर्पटी (Continental Crust) का निर्माण करती है। इसका नाम सिलिका (Si) और एल्युमीनियम (Al) के प्रथम अक्षरों से बना है। इसका औसत घनत्व 2.7 होता है और यहाँ ग्रेनाइट जैसी अम्लीय चट्टानों की प्रधानता होती है।
(B) सीमा (SIMA): सियाल के नीचे स्थित इस परत में सिलिका (Si) और मैग्नीशियम (Mg) तत्वों की अधिकता होती है। यह मुख्य रूप से महासागरीय अधस्तल (Oceanic Crust) और निचले क्रस्ट का हिस्सा है। इसका घनत्व सियाल से अधिक (2.9 से 4.7) होता है और इसमें बेसाल्टिक चट्टानें पाई जाती हैं।
(C) निफे (NIFE): यह पृथ्वी की सबसे आंतरिक परत यानी ‘कोर’ (Core) को दर्शाता है। यह भारी धातुओं निकेल (Ni) और फेरस यानी लोहे (Fe) से बनी है। इस परत का घनत्व सर्वाधिक (11 से 13) होता है। इसकी उच्च चुंबकीय प्रकृति ही पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और गुरुत्वाकर्षण का मुख्य आधार है।
(D) संपूर्ण पृथ्वी (औसत): यदि पूरी पृथ्वी (क्रस्ट से कोर तक) के औसत रासायनिक संगठन का विश्लेषण करें, तो लोहा (35%) सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है। इसके पश्चात ऑक्सीजन (30%) और सिलिकॉन (15%) का स्थान आता है। यह संगठन सौरमंडल के निर्माण और पृथ्वी के विभेदीकरण (Differentiation) की प्रक्रिया को दर्शाता है।
| सूची-I (परिणाम) | सूची-II (मुख्य कारण) |
|---|---|
| (A) सुनामी | (1) बांधों का निर्माण और भारी जलभराव |
| (B) द्रवीकरण | (2) समुद्री अधस्तल में शक्तिशाली भूकंप |
| (C) भ्रंश | (3) ढीली मृदा का तरल की तरह व्यवहार |
| (D) प्रेरित भूकंप | (4) विवर्तनिक प्लेटों का खिसकना |
कूट: ABCD
उत्तर: (c)
(A) सुनामी (Tsunami): जब समुद्र के भीतर या उसके निकट शक्तिशाली भूकंप आता है, तो समुद्री अधस्तल (Ocean Floor) में अचानक ऊर्ध्वाधर विस्थापन होता है। इसके कारण समुद्री जल में विशाल और विनाशकारी लहरें उत्पन्न होती हैं, जिन्हें सुनामी कहते हैं। यह गहरे समुद्र में कम ऊँची लेकिन तट के पास पहुँचकर अत्यंत ऊँची और घातक हो जाती हैं।
(B) द्रवीकरण (Liquefaction): तीव्र भूकंपीय झटकों के दौरान, जब जल-संतृप्त ढीली मृदा (जैसे रेतीली मिट्टी) अपनी मजबूती खो देती है और एक तरल पदार्थ की तरह व्यवहार करने लगती है, तो इसे मृदा द्रवीकरण कहते हैं। इसके कारण भूमि धंस जाती है और बड़ी इमारतें बिना टूटे ही तिरछी होकर जमीन में समा जाती हैं।
(C) भ्रंश (Faulting): पृथ्वी की विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) के बीच होने वाले तनाव या दबाव के कारण जब चट्टानें टूटकर एक-दूसरे के सापेक्ष खिसकती हैं, तो उस दरार को भ्रंश कहते हैं। यही भ्रंश रेखाएँ भूकंप का मुख्य स्रोत होती हैं, जहाँ संचित ऊर्जा अचानक मुक्त होकर धरातल पर कंपन पैदा करती है।
(D) प्रेरित भूकंप (Induced Seismicity): यह मानवीय गतिविधियों के कारण आने वाले भूकंप हैं। जब बड़े बांधों का निर्माण किया जाता है, तो विशाल जलाशयों में भारी जलभराव के कारण नीचे की चट्टानों पर अत्यधिक दबाव (Hydrostatic Pressure) पड़ता है। यह दबाव चट्टानों में हलचल पैदा कर देता है, जिससे उस क्षेत्र में भूकंप आने की संभावना बढ़ जाती है।
जलप्रपात — नदी
1. धुआँधार — नर्मदा नदी
2. जोन्हा (गौतम धारा) — रारू नदी
3. चुलिया — चम्बल नदी
4. तीरथगढ़ — महानदी
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
उत्तर: (C)
युग्म (1) सही सुमेलित है। धुआँधार जलप्रपात मध्य प्रदेश के जबलपुर में नर्मदा नदी पर स्थित है। संगमरमर की चट्टानों के बीच से गिरते समय जल की बूंदें धुएं जैसा आभास कराती हैं।
युग्म (2) सही सुमेलित है। जोन्हा जलप्रपात (जिसे गौतम धारा भी कहते हैं) झारखंड में रारू नदी पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि गौतम बुद्ध ने यहाँ स्नान किया था।
युग्म (3) सही सुमेलित है। चुलिया जलप्रपात राजस्थान के चित्तौड़गढ़/कोटा क्षेत्र में चम्बल नदी पर स्थित है। यह राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध प्रपातों में से एक है।
युग्म (4) सुमेलित नहीं है। तीरथगढ़ जलप्रपात छत्तीसगढ़ की कांगेर घाटी में मुनगाबहार नदी (इंद्रावती की सहायक) पर स्थित है, न कि मुख्य महानदी पर। यह एक ‘सोपानदार’ प्रपात है।
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