प्रसार भारती: क्या यह वास्तव में एक स्वतंत्र सार्वजनिक सेवा प्रसारक है? (Prasar Bharati: Is it truly an independent public service broadcaster?)

| UPSC पाठ्यक्रम से संबंध: GS-II — संवैधानिक संस्थाएँ, शासन, जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाएँ; GS-IV — निष्पक्षता, पारदर्शिता और सार्वजनिक सेवा के नैतिक मूल्य। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 138वें संस्करण के प्रसारण और हालिया मीडिया विमर्शों ने एक बार फिर भारत के लोक सेवा प्रसारक, प्रसार भारती की वास्तविक स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2014 में तत्कालीन सरकार द्वारा इसे ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (BBC) मॉडल की तर्ज पर पूरी तरह स्वतंत्र, प्रशासनिक रूप से मुक्त और संसद के प्रति जवाबदेह बनाने का वादा किया गया था। परंतु 12 वर्षों के बाद भी, यह संगठन एक वास्तविक ‘सार्वजनिक सेवा प्रसारक’ (Public Service Broadcaster) बनने के बजाय एक ‘सरकारी विभाग’ या ‘दिखावे के स्वायत्त संस्थान’ (Disguised Pretender) के रूप में कार्य कर रहा है।

प्रसार भारती के बारे में
परिचय एवं प्रकृति
- वैधानिक और स्वायत्त निकाय: प्रसार भारती एक स्वायत्त वैधानिक निकाय (Autonomous Statutory Body) है, जिसका गठन संसद के एक अधिनियम (प्रसार भारती अधिनियम, 1990) के तहत किया गया था।
- स्थापना व मुख्यालय: यह अधिनियम 23 नवंबर 1997 को प्रभावी हुआ और इसी दिन इस निगम की स्थापना की गई। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
- नोडल मंत्रालय: यह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तत्वावधान में काम करता है।
- पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर: यह देश का सार्वजनिक सेवा प्रसारक है, जिसका मुख्य उद्देश्य दूरदर्शन (DD) और आकाशवाणी (AIR) को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर स्वायत्तता प्रदान करना था।
- नियुक्ति प्रक्रिया: राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष चयन समिति की सिफारिश के आधार पर अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति की जाती है। इस चयन समिति की अध्यक्षता उपराष्ट्रपति करते हैं और इसमें प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के अध्यक्ष और राष्ट्रपति द्वारा नामित एक स्वतंत्र सदस्य शामिल होते हैं।
प्रमुख घटक
प्रसार भारती के अंतर्गत दो मुख्य विंग (Prasar Bharati Board) कार्य करते हैं:
- आकाशवाणी (All India Radio – AIR): इसे आधिकारिक तौर पर ‘आकाशवाणी’ के रूप में जाना जाता है, जिसका आदर्श वाक्य “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” है।
- दूरदर्शन (DD): इसकी स्थापना 1959 में हुई थी, जिसका आदर्श वाक्य “सत्यम शिवम सुंदरम” है।
प्रसार भारती की पृष्ठभूमि
- नेहरू का दृष्टिकोण (1948): संविधान सभा में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “प्रसारण का ढांचा आदर्श रूप से एक अर्ध-स्वायत्त निगम होना चाहिए, जो सरकार के नीतिगत नियंत्रण में तो हो, लेकिन उसका दैनिक संचालन किसी सरकारी विभाग की तरह न हो।”
- आपातकाल का सबक (1975): आपातकाल के दौरान ऑल इंडिया रेडियो (AIR) और दूरदर्शन को पूरी तरह से सरकार के प्रचार तंत्र में बदल दिया गया था। इसके बाद गठित बी.जी. वर्गीज समिति ने पूर्ण स्वायत्तता की सिफारिश की, जिसके आधार पर अंततः प्रसार भारती अधिनियम, 1990 पारित हुआ।
- सैम पित्रोदा समिति (2014): इस समिति ने प्रसार भारती को सरकार से ‘आर्म्स लेंथ रिलेशनशिप‘ (एक सुरक्षित दूरी) बनाए रखने और इसके कार्यबल को पूरी तरह पेशेवर (Professional) बनाने की सिफारिश की थी।
सार्वजनिक सेवा प्रसारण और सरकारी प्रसारण में अंतर
| विशिष्टता | सार्वजनिक सेवा प्रसारण (Public Service) | सरकारी प्रसारण (State/Government) |
| मूल दर्शन | यह नागरिकों के प्रति जवाबदेह होता है और इसका उद्देश्य सूचना, शिक्षा और मनोरंजन देना है। | यह सत्ता पक्ष और राजनीतिक कार्यपालिका की नीतियों व प्रचार का साधन होता है। |
| संपादकीय दृष्टिकोण | स्वतंत्र, निष्पक्ष और संतुलित (Contrasting Views को स्थान देना)। | एकतरफा संवाद, जहाँ सरकार की नीतियों की आलोचना को स्थान नहीं मिलता। |
| मूल्यांकन का आधार | कार्यक्रमों को केवल व्यावसायिक या राजनीतिक लाभ पर नहीं, बल्कि जनहित के मूल्य पर आंका जाता है। | कार्यक्रमों को सत्ता की राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर आंका जाता है। |
क्या प्रसार भारती वास्तव में स्वतंत्र है?
यद्यपि आधिकारिक तौर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं है (क्योंकि शिकायत दर्ज करने वाला मंच ही नहीं है), अधिनियम की मूल धाराओं को लागू न करना इसकी स्वायत्तता को बंधक बनाता है:
- धारा13, 14और15का निलंबन:
- अधिनियम की धारा 13 के तहत दोनों सदनों के 22 सांसदों वाली एक संसदीय समिति का गठन होना था, जिसका काम संसद की ओर से इसकी स्वायत्तता की रक्षा करना था, जिसे कभी गठित नहीं किया गया।
- धारा 14 और 15 के तहत नागरिकों की शिकायतों को सुनने और संपादकीय निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ‘ब्रॉडकास्टिंग काउंसिल‘ का गठन अनिवार्य था, जो आज तक अस्तित्व में नहीं आई।
- वित्तीय और प्रशासनिक अधीनता: यह बजटीय खर्चों, वेतन और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण (जैसे BIND योजना) के लिए पूरी तरह सरकारी अनुदान पर निर्भर है। साथ ही, इसके शीर्ष पदों पर नियुक्तियों में सरकार का सीधा वैचारिक और प्रशासनिक नियंत्रण होता है।
- मानव संसाधन का संकट (2021 ऑडिट): प्रसार भारती के पास लगभग 25,000 कर्मचारियों का विशाल ढांचा है, लेकिन इनमें से लगभग 70% कर्मचारी केवल ट्रांसमिशन और इंजीनियरिंग (मशीनरी संभालने) में लगे हैं, जबकि कंटेंट और पत्रकारिता से जुड़े कर्मचारी 20% से भी कम हैं। यह इसे एक ‘कंटेंट-संचालित ब्रॉडकास्टर’ के बजाय केवल एक ‘मशीन’ बनाता है।
हालिया महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश
- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुसार, केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, राज्य सरकारों या केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ी किसी भी इकाई को खुद से प्रसारण या ब्रॉडकास्टिंग गतिविधियों में सीधे उतरने की अनुमति नहीं है। इस तरह का कोई भी सरकारी प्रसारण केवल और केवल प्रसार भारती के माध्यम से ही किया जा सकता है।
- यह कदम जहाँ एक तरफ प्रसारण क्षेत्र में एकरूपता सुनिश्चित करता है और राज्य सरकारों द्वारा मीडिया के संभावित दुरुपयोग को रोकता है, वहीं दूसरी तरफ यह प्रसार भारती पर ‘सरकारी प्रसारण के एकमात्र माध्यम’ का ठप्पा और मजबूत कर देता है, जिससे इसकी स्वतंत्र ‘सार्वजनिक प्रसारक’ की छवि प्रभावित होती है।
यूनेस्को (UNESCO) का मानदंड
यूनेस्को के 2001 के स्पष्ट निर्देश के अनुसार: “सार्वजनिक सेवा प्रसारण न तो वाणिज्यिक (Commercial) होता है और न ही राज्य-नियंत्रित (State-controlled)। यह समाज के सभी वर्गों की आवाज होता है।”
- बीबीसी (BBC) मॉडल: यूके में जनता द्वारा सीधे दिए जाने वाले लाइसेंस शुल्क (TV License Fee) के कारण बीबीसी सरकार से वित्तीय रूप से स्वतंत्र है।
- प्रसार भारती की स्थिति: यूनेस्को के इस मानदंड पर प्रसार भारती पूरी तरह विफल रहता है, क्योंकि यह वित्तीय, प्रशासनिक और वैधानिक रूप से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की दया पर निर्भर है।
| विशेषता | प्रसार भारती (भारत) | बीबीसी – BBC (ब्रिटेन) |
| राजस्व का स्रोत | सरकारी बजटीय सहायता और विज्ञापन | जनता द्वारा दिया जाने वाला लाइसेंस शुल्क |
| जवाबदेही | सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और संसद | सीधे संसद और एक स्वतंत्र ट्रस्ट के प्रति |
| नियुक्ति प्रक्रिया | चयन समिति में सरकारी प्रभाव अधिक | स्वतंत्र जनसेवा चयन प्रक्रिया द्वारा |
संवैधानिक एवं कानूनी महत्त्व
- अनुच्छेद 19(1)(a): भारत में वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मीडिया की स्वतंत्रता का मूल स्रोत है। प्रसार भारती को इसी संवैधानिक अधिकार का एक तटस्थ संरक्षक होना चाहिए।
- ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय (1995): क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस पी.बी. सावंत ने स्पष्ट किया था कि “वायु तरंगें (Airwaves) सार्वजनिक संपत्ति हैं”। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि केंद्र सरकार को इनके संचालन के लिए एक स्वतंत्र, स्वायत्त सार्वजनिक प्राधिकरण की स्थापना करनी चाहिए, जो राज्य नियंत्रण से मुक्त हो। इस प्रकार, प्रसार भारती की स्वायत्तता सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ी है।
आगे की राह
- मनोवैज्ञानिक परिवर्तन: चंदा समिति (1966) की इस सिफारिश को अपनाना होगा कि प्रसारण के प्रति सरकारी दृष्टिकोण में “मनोवैज्ञानिक परिवर्तन” आए और सरकार इसे अपना मुखपत्र समझना बंद करे।
- संसदीय ओवरसाइट और स्वायत्तता: प्रसार भारती को किसी विशेष मंत्रालय (MIB) के प्रशासनिक नियंत्रण से बाहर निकालकर, अधिनियम की धारा 13 के तहत सीधे संसद की विशेष समिति के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
- संपादकीय स्वतंत्रता: ब्रॉडकास्टिंग काउंसिल (धारा 14-15) का तत्काल गठन किया जाए ताकि नागरिक समाज इसकी निष्पक्षता की निगरानी कर सके।
- 2029 का विधायी विकल्प: आगामी 2029 के आम चुनावों से पहले नागरिक समाज (जैसे ‘जन प्रसार’ आंदोलन) को एक ऐसी राजनीतिक प्रतिबद्धता की मांग करनी चाहिए जो संसद में संशोधन करके प्रसार भारती को फंड, स्टाफ और परिसंपत्तियों का पूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित करे।
निष्कर्ष
प्रसार भारती ने भारत के सुदूर और ग्रामीण क्षेत्रों तक सूचनाएं पहुँचाने और आपदाओं के समय राष्ट्र की सेवा करने में सराहनीय भूमिका निभाई है। परंतु, जब तक इसे राजनीतिक कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक एक ‘सरकारी प्रसारक‘ से ‘सार्वजनिक सेवा प्रसारक‘ बनने का इसका सफर अधूरा रहेगा। भारत जैसे जीवंत और विशाल लोकतंत्र में एक निष्पक्ष और स्वतंत्र प्रसार भारती केवल एक कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना और स्वस्थ जन-विमर्श की अनिवार्य शर्त है।