भारत में भीड़ प्रबंधन का गहराता संकट (The deepening crisis of crowd management in India)

| UPSC पाठ्यक्रम से संबंध: GS-III — आपदा प्रबंधन एवं आंतरिक सुरक्षा; GS-II — शासन, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक सेवाएँ; GS-IV — नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में 17 अक्टूबर 2026 को कोलकाता के चोरबागान में एक दुर्गा पूजा पंडाल में मची भीषण भगदड़ में 19 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए। महासप्तमी की शाम को घटी इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने पूजा समिति के पदाधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) का मामला दर्ज किया है और मामले की उच्च स्तरीय जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है। इस घटना ने एक बार फिर भारत में त्योहारों के दौरान भीड़ नियंत्रण, बुनियादी ढांचे की कमियों और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

घटना की पृष्ठभूमि
- स्थान और तिथि: चोरबागान सर्वजनिन दुर्गा पूजा पंडाल, उत्तर कोलकाता; 17 अक्टूबर 2026
- भौगोलिक सीमाएँ: उत्तर कोलकाता का यह क्षेत्र बेहद संकरी गलियों और घनी आबादी वाले पुराने ढाँचे के लिए जाना जाता है, जहाँ लाखों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए संचलन क्षेत्र नगण्य था।
- तात्कालिक पारिस्थितिकी: महासप्तमी की रात को दर्शनार्थियों की संख्या चरम पर थी, तभी अचानक तेज बारिश शुरू होने से बाहर खड़ी भीड़ बचने के लिए एक साथ पंडाल की ओर दौड़ पड़ी।
- प्रशासनिक प्रतिक्रिया: राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है और पुलिस ने पूजा समिति के पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर गैर-इरादतन हत्या (धारा 105, BNS) के तहत मामला दर्ज किया है।
भगदड़ क्या है? (What is a Stampede?)
आपदा प्रबंधन के तकनीकी संदर्भ में, भगदड़ एक ऐसी स्थिति है जिसमें किसी वास्तविक या काल्पनिक खतरे, अथवा तीव्र आकर्षण (जैसे किसी सेलिब्रिटी या प्रसाद को पाने की होड़) के कारण एक बड़ी भीड़ अचानक अनियंत्रित होकर एक ही दिशा में दौड़ने लगती है।
- भीड़ का चरम जमाव: जब प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में 4 से अधिक लोग जमा हो जाते हैं, तो भीड़ तरल की तरह व्यवहार करने लगती है जहाँ किसी भी व्यक्ति का अपनी गति पर नियंत्रण नहीं रहता।
- ट्रॉमैटिक एस्फिक्सिया: भगदड़ में अधिकांश मौतें गिरने या कुचलने से ज्यादा खड़े-खड़े भीड़ के भौतिक दबाव से फेफड़ों में ऑक्सीजन की कमी और दम घुटने के कारण होती हैं।
हाल ही में भीड़ कुप्रबंधन से संबंधित घटित अन्य घटनाएँ
भारत में धार्मिक और सार्वजनिक मेलों में भीड़ का अनियंत्रित होना एक आवर्ती समस्या बन चुका है:
- हाथरस सत्संग भगदड़, उत्तर प्रदेश (जुलाई 2024): एक धार्मिक समागम (सत्संग) के बाद बाबा के चरणधूलि छूने की होड़ और दलदली निकास मार्ग के कारण 121 लोगों की मौत हुई थी, जहाँ अनुमति से तीन गुना अधिक (2.5 लाख) भीड़ एकत्र हो गई थी।
- प्रयागराज महाकुंभ मेला भीड़ जनित हादसा (जनवरी 2025): ‘अमृत स्नान’ के दौरान मौनी अमावस्या को अचानक मची भगदड़ में 30 श्रद्धालुओं की जान चली गई।
- शीतला माता मंदिर क्रश, बिहार (मार्च 2026): चैत्र नवरात्रि के दौरान एक संकरे प्रवेश मार्ग में भारी जन-दबाव के कारण 9 महिला श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई।
भगदड़ के प्रमुख कारण
- भ्रामक और अपुष्ट सार्वजनिक घोषणाएँ: चोरबागान में भगदड़ का सबसे बड़ा कारण लाउडस्पीकर पर आयोजकों द्वारा की गई यह अपुष्ट घोषणा थी कि “पंडाल का एक हिस्सा गिर रहा है”। इस गलत सूचना ने भीड़ में तीव्र मनोवैज्ञानिक डर पैदा कर दिया।
- बुनियादी ढाँचे की ढाँचागत कमियाँ: आपातकालीन निकास द्वारों (Emergency Exits) का अत्यधिक संकरा होना तथा संकरी गलियों में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था (Lighting) न होना, जिससे लोग भागते समय एक-दूसरे पर गिरते चले गए।
- वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन न होना: पंडाल के क्षेत्रफल की तुलना में क्षमता से 4-5 गुना अधिक भीड़ को भीतर आने दिया गया, जिससे प्रति वर्ग मीटर जन-घनत्व खतरनाक स्तर को पार कर गया।
- प्रशासनिक शिथिलता और ‘ड्रॉप गेट्स’ की कमी: भीड़ के दबाव को अलग-अलग चरणों में रोकने के लिए सड़कों पर लगाए जाने वाले बैरिकेड्स या ‘ड्रॉप गेट्स’ का उचित प्रबंधन पुलिस द्वारा नहीं किया गया था।
- ‘गोल्डन ऑवर’ का नुकसान: घटना स्थल के अत्यंत संकरे होने और चारों तरफ वाहनों तथा लोगों के जाम के कारण पहली चिकित्सा टीम और एम्बुलेंस को पीड़ितों तक पहुँचने में 40 मिनट से 1 घंटे का समय लगा, जिससे मौतों का आंकड़ा बढ़ गया।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशानिर्देश
- बहन क्षमता का आकलन: किसी भी स्थान पर प्रति वर्ग मीटर 4 से अधिक व्यक्तियों की मौजूदगी खतरनाक मानी जाती है। आयोजकों को कार्यक्रम स्थल की क्षमता के अनुसार ही ‘प्रवेश टिकट’ या ‘दर्शन स्लॉट’ तय करने चाहिए।
- संचार प्रोटोकॉल: आपातकालीन स्थिति में घोषणा करने का अधिकार केवल प्रशिक्षित अधिकारियों या आपदा टीम के पास होना चाहिए। भ्रामक या डराने वाली घोषणाओं पर सख्त पाबंदी है।
- निकास द्वारों का नियमन: आपातकालीन द्वार हमेशा चौड़े होने चाहिए, जिन पर कोई अवरोध न हो और वे बाहर की तरफ खुलते हों।
- रूट सेग्रेगेशन: आने वाले और जाने वाले श्रद्धालुओं के मार्ग पूरी तरह अलग होने चाहिए ताकि आमने-सामने भीड़ का टकराव न हो।
भीड़ प्रबंधन हेतु सरकार के अन्य प्रयास
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: इसके तहत जिला मजिस्ट्रेट (DM) और स्थानीय पुलिस को सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाले आयोजकों पर भारी जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई (धारा 51 से 60) का अधिकार प्राप्त है।
- स्मार्ट सिटी मिशन के तहत आईसीसीसी (ICCC): कई शहरों में स्थापित ‘एकीकृत कमान और नियंत्रण केंद्रों’ के माध्यम से बड़े मेलों (जैसे प्रयागराज महाकुंभ) की लाइव सीसीटीवी निगरानी की जाती है।
- मेगा इवेंट्स हेतु एसओपी (SOP): केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा बड़े धार्मिक ट्रस्टों (जैसे वैष्णो देवी, तिरुपति) के लिए विशेष सुरक्षा ऑडिट और अनिवार्य एनओसी (NOC) प्रोटोकॉल लागू किए गए हैं।
| भीड़ प्रबंधन में वैश्विक सर्वोत्तम अभ्यास (Global Best Practices) सऊदी अरब (हज प्रबंधन): मक्का में हज के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ‘स्मार्ट ब्रेसलेट्स’ और रियल-टाइम क्राउड फ्लो सिमुलेशन का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक हाजी के आवागमन का समय और मार्ग पहले से एल्गोरिदम द्वारा निर्धारित होता है। यूनाइटेड किंगडम (लंदन ओलंपिक और सार्वजनिक उत्सव): यूके में ‘वेफाइंडिंग’ डिजाइन प्रणाली और गतिशील रूप से बदलने वाले डिजिटल साइनबोर्ड्स का उपयोग किया जाता है, जो भीड़ के घनत्व को देखते हुए स्वचालित रूप से वैकल्पिक रास्तों की ओर इशारा करने लगते हैं। जापान (टोक्यो पैसेंजर फ्लो मैनेजमेंट): जापान के रेलवे स्टेशनों और त्योहारों में ‘इंटरलाकिंग बैरियर सिस्टम’ और ‘लिक्विड फ्लो थ्योरी’ का उपयोग किया जाता है, जहाँ भीड़ को पानी की धारा की तरह माना जाता है और संकीर्ण मोड़ों पर गति धीमी करने वाले सॉफ्ट हर्डल्स लगाए जाते हैं। जर्मनी (लव परेड आपदा के बाद सुधार): जर्मनी में बड़े आयोजनों के लिए अनिवार्य ‘क्राउड डायनेमिक्स कंप्यूटर मॉडलिंग’ कानून लागू है, जिसमें किसी भी पंडाल या स्टेडियम का डिजिटल ब्लूप्रिंट कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में डालकर आपातकालीन निकासी का वर्चुअल टेस्ट किया जाता है। |
आगे की राह
- AI-संचालित भीड़ विश्लेषण: अब पारंपरिक कैमरों के स्थान पर Artificial Intelligence (AI) आधारित डेंसिटी ट्रैकर का उपयोग होना चाहिए, जो भीड़ का घनत्व क्रिटिकल लेवल पर पहुँचते ही प्रशासन को स्वतः अलार्म भेज दे।
- कठोर कानूनी जवाबदेही: केवल वालंटियर्स या छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई के बजाय, सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाले शीर्ष आयोजकों और संबंधित क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारियों पर ‘आपराधिक लापरवाही’ का मुकदमा चलना चाहिए।
- पब्लिक एड्रेस सिस्टम का केंद्रीकरण: त्योहारों के दौरान सभी लाउडस्पीकर का नियंत्रण कक्ष स्थानीय पुलिस चौकी या आपदा नियंत्रण कक्ष से लिंक्ड होना चाहिए ताकि अफवाहों को फैलने से रोका जा सके।
- फर्स्ट रेस्पॉन्डर्स का प्रशिक्षण: स्थानीय पूजा समितियों के युवाओं को भीड़ मनोविज्ञान और प्राथमिक चिकित्सा का बुनियादी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे पुलिस के पहुँचने से पहले स्थिति संभाल सकें।
निष्कर्ष
धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव भारत की सामाजिक विविधता और जीवंतता के प्रतीक हैं, लेकिन किसी भी नागरिक की जान की कीमत पर उत्सव नहीं मनाया जा सकता। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है। कोलकाता की चोरबागान त्रासदी एक कड़वी चेतावनी है कि जब तक हम ‘रिएक्टिव आपदा प्रबंधन’ (आपदा के बाद जागना) की मानसिकता को छोड़कर ‘प्रोएक्टिव भीड़ प्रबंधन’ (शून्य जनहानि का लक्ष्य) की ओर नहीं बढ़ेंगे, तब तक आस्था के ये मंडप निर्दोषों के लिए असुरक्षित बने रहेंगे।