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पूर्वोत्तर मानसून: अप्रत्याशित बारिश और दक्षिण भारत के लिए बढ़ती चुनौती (Northeast Monsoon: Unexpected Rains and a Growing Challenge for South India)

By Result Mitra •

UPSC पाठ्यक्रम से संबंध: GS-I — भारतीय मानसून एवं जलवायु
GS-III — आपदा प्रबंधन, कृषि और जल संसाधन

हाल ही में समाप्त हुए दक्षिण-पश्चिम मानसून में 12.6% की भारी कमी दर्ज की गई, जिसमें दीर्घकालिक औसत (868.6 मिमी) के मुकाबले मात्र 759.4 मिमी बारिश हुई। यह पिछले 11 वर्षों में भारत का सबसे सूखा दक्षिण-पश्चिम मानसून रहा, जिसने देश भर में खरीफ फसलों की बुवाई को गंभीर रूप से प्रभावित किया और खाद्य मुद्रास्फीति  के जोखिम को बढ़ा दिया। इस गंभीर पृष्ठभूमि में, देश की नजरें अब पूर्वोत्तर मानसून पर टिकी हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग  के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के बीच होने वाली पूर्वोत्तर मानसूनी वर्षा सामान्य रहने की संभावना है। हालाँकि, अल नीनो  की स्थिति और वर्षा के पूर्वानुमान में अनिश्चितता के कारण तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में बाढ़, जलभराव और सूखे जैसी स्थितियों का जोखिम बना हुआ है।

भारतीय उपमहाद्वीप में वर्ष के दौरान दो प्रमुख मानसूनी प्रणालियाँ सक्रिय होती हैं, जिनकी भौगोलिक विशेषताएं एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं:

विशिष्टतादक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon)पूर्वोत्तर मानसून (North-East Monsoon)
अवधिजून से सितंबर (ग्रीष्मकाल के बाद)अक्टूबर से दिसंबर (शीतकाल की शुरुआत)
हवाओं की दिशादक्षिण-पश्चिम (समुद्र) से उत्तर-पूर्व (भूमि) की ओर।उत्तर-पूर्व (भूमि) से दक्षिण-पश्चिम (समुद्र) की ओर। इसे ‘लौटता हुआ मानसून’ भी कहते हैं।
वर्षा का योगदानयह भारत का मुख्य मानसून है, जो देश की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 75% से 80% हिस्सा प्रदान करता है।यह एक क्षेत्रीय मानसून है, जो भारत की कुल वार्षिक वर्षा का केवल 20% से 25% हिस्सा योगदान करता है।
प्रभावित क्षेत्रउत्तर-पूर्व भारत, भारत के विशाल मैदानी भाग और पश्चिमी घाट (संपूर्ण भारत)।मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीप: तमिलनाडु, पुडुचेरी, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक और केरल।
नमी का स्रोतअरब सागर और बंगाल की खाड़ी।मध्य एशिया और साइबेरिया से आने वाली शुष्क हवाएं जब बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वहां से नमी ग्रहण करती हैं।

जब दक्षिण-पश्चिम मानसून 12.6% की कमी के साथ समाप्त होता है, तो इसके बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ते हैं:

  • कृषि पर आघात: भारत की लगभग 50% कृषि भूमि अभी भी सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी से खरीफ फसलों (जैसे—धान, मक्का, गन्ना और दलहन) का रकबा घट जाता है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
  • खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation): अनाजों और फसलों के कम उत्पादन के कारण बाजार में आपूर्ति बाधित होती है, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं। यह आम नागरिक की क्रय शक्ति को प्रभावित करता है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मंदी: कृषि आय कम होने से ग्रामीण क्षेत्रों में मांग  घटती है, जिसका सीधा असर ऑटोमोबाइल, FMCG और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों पर पड़ता है।
  • भूजल और जलाशयों का संकट: कम बारिश के कारण देश के प्रमुख जलाशयों का जलस्तर गिर जाता है, जिससे रबी फसलों (जैसे गेहूं) के लिए सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होता है।

अल नीनो (प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का असामान्य रूप से गर्म होना) का भारतीय मानसून के साथ संबंध अत्यंत जटिल और विरोधाभासी है:

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून पर प्रभाव: अल नीनो सीधे तौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है और सूखे की स्थिति पैदा करता है (जैसा कि इस वर्ष 11 साल का सबसे सूखा मानसून दर्ज हुआ)।
  • पूर्वोत्तर मानसून के साथ विरोधाभासी संबंध: ऐतिहासिक रूप से, एक मजबूत अल नीनो वर्ष को पूर्वोत्तर मानसून के लिए अनुकूल माना जाता रहा है। उदाहरण के लिए, 1997 और 2009 के तीव्र अल नीनो वर्षों के दौरान तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों में सामान्य से काफी अधिक बारिश दर्ज की गई थी।
  • अनिश्चितता और अपवाद: अल नीनो का यह नियम हमेशा लागू नहीं होता। वर्ष 1982 और 2002 भी तीव्र अल नीनो वर्ष थे, लेकिन उस दौरान पूर्वोत्तर मानसून अत्यंत कमजोर और सूखा रहा था।
  • भौगोलिक कारण: मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो के वार्मिंग पैटर्न्स बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवाती परिसंचरणों (Cyclonic Circulations) को अप्रत्याशित तरीकों से विक्षेपित (Deflect) कर देते हैं। इस कारण कभी सूखा पड़ता है, तो कभी चक्रवातों के कारण कुछ ही दिनों में विनाशकारी बारिश हो जाती है।

अल नीनो और पूर्वोत्तर मानसून के इस खतरनाक अंतर्संबंध का सबसे ज्वलंत और विनाशकारी उदाहरण 1 दिसंबर, 2015 की चेन्नई बाढ़ है:

  • घटना: वर्ष 2015 एक शक्तिशाली अल नीनो वर्ष था। पूर्वोत्तर मानसून के दौरान चेन्नई में 24 घंटे के भीतर एक सदी (100 वर्ष) की सबसे भारी बारिश दर्ज की गई थी।
  • प्रभाव: इस भीषण जलप्रलय में 500 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई, बुनियादी ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया और राज्य में लगभग 18 लाख लोग विस्थापित हुए थे।
  • सबक: 2015 की आपदा ने यह साबित किया कि जब अल नीनो सक्रिय होता है, तो पूर्वोत्तर मानसून का मिजाज पूरी तरह ‘अति-तीव्र चरम मौसम घटना’ में बदल सकता है। वर्तमान वर्ष की मौसमी स्थितियां भी 2015 के पैटर्न से मेल खाती हैं, जो एक बड़ी चेतावनी है।
  • पूर्वानुमानों की व्यापक त्रुटि सीमा (Wide Error Window): दक्षिण-पश्चिम मानसून की तुलना में पूर्वोत्तर मानसून का पूर्वानुमान लगाना बेहद कठिन है। जहां दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान में त्रुटि की सीमा मात्र 5% होती है, वहीं पूर्वोत्तर मानसून के लिए यह 12% तक विस्तृत होती है। यह अनिश्चितता स्थानीय प्रशासन को तैयारी का मौका नहीं देती।
  • अनियोजित शहरीकरण और ‘अर्बन हीट आइलैंड‘: चेन्नई, बेंगलुरु और तिरुवनंतपुरम जैसे महानगरों में प्राकृतिक जलमार्गों, झीलों और आर्द्रभूमियों (जैसे चेन्नई का पलिकाकरनई मार्शलैंड) पर अवैध अतिक्रमण हो चुका है। कंक्रीट के विस्तार के कारण शहरों की पानी सोखने की प्राकृतिक क्षमता समाप्त हो गई है, जिससे शहरी बाढ़ एक वार्षिक संकट बन गई है।
  • शमन (Mitigation) के बजाय राहत (Relief) पर ध्यान: भारत का आपदा प्रबंधन तंत्र आज भी संकट आने के बाद ‘राहत और बचाव’ कार्य करने में अधिक सक्रिय होता है, जबकि मानसून से पूर्व ‘जोखिम शमन और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने’ पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
  • चक्रवातों की तीव्रता: अक्टूबर से दिसंबर के बीच बंगाल की खाड़ी के गर्म होने के कारण कम दबाव के क्षेत्र तेजी से गंभीर चक्रवातों में बदल जाते हैं, जिससे तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही होती है।

इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए केंद्र और दक्षिणी राज्यों को मिलकर एक बहु-स्तरीय नीति अपनानी होगी:

  • बुनियादी ढांचे का अग्रिम सुदृढ़ीकरण: मानसून के आगमन से पहले शहरों के सभी स्टॉर्मवॉटर ड्रेन्स (जल निकासी नालों) की गाद (desiltation) को पूरी तरह साफ किया जाए। निचले इलाकों में रहने वाली संवेदनशील आबादी के लिए पहले से ही आपदा-रोधी राहत आश्रय तैयार किए जाएं।
  • स्पंज शहरों (Sponge Cities) का निर्माण: कंक्रीट के ढांचों के स्थान पर पारगम्य फुटपाथ, शहरी वनीकरण और रेन गार्डन को बढ़ावा दिया जाए ताकि वर्षा का जल सतह पर बहने के बजाय सीधे जमीन के भीतर अवशोषित हो सके।
  • मौसम चेतावनी प्रणालियों (EWS) का आधुनिकीकरण: आईएमडी को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बिग डेटा और अतिरिक्त डॉपलर रडार नेटवर्क का उपयोग करके अति-स्थानीय स्तर पर अचानक होने वाली भारी बारिश (Flash Floods) की सटीक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना होगा।
  • वित्तीय और बजटीय प्रावधान: चक्रवातों और मूसलाधार बारिश से होने वाले नुकसान की त्वरित भरपाई के लिए राज्यों को अपने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के तहत बुनियादी ढांचे की मरम्मत के लिए विशेष अग्रिम बजटीय आवंटन करना चाहिए।
  • पारंपरिक जल प्रणालियों का पुनरुद्धार: दक्षिण भारत की पारंपरिक ‘एरी’ (Eri – तालाब प्रणाली) और आर्द्रभूमियों को अतिक्रमण मुक्त कर पुनर्जीवित किया जाए, जिससे बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ जल संचयन भी संभव हो सके।

निष्कर्ष

पूर्वोत्तर मानसून का अत्यधिक अप्रत्याशित और उग्र होना इस बात का स्पष्ट संकेतक है कि जलवायु परिवर्तन अब एक भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की भयावह वास्तविकता है। दक्षिण भारत के लिए चुनौती केवल वर्षा के जल को प्रबंधित करने की नहीं है, बल्कि प्रकृति के बदलते मिजाज के अनुकूल अपने शहरी और ग्रामीण विकास मॉडल को पुनर्गठित करने की है। समय की मांग है कि तदर्थ (ad-hoc) उपायों को छोड़कर ‘जलवायु-अनुकूल अवसंरचना‘ के निर्माण को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया जाए। सुरक्षात्मक तैयारियों में किया गया आज का निवेश, कल होने वाले अरबों के आर्थिक नुकसान और अमूल्य मानव जीवन की रक्षा का सबसे प्रभावी साधन सिद्ध होगा।



“अल नीनो के बदलते वैश्विक प्रतिरूपों और पूर्वोत्तर मानसून की अंतर्निहित अनिश्चितताओं ने प्रायद्वीपीय भारत के शहरी और ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।” 2015 की चेन्नई आपदा के अनुभवों से सीखते हुए इस संकट से निपटने के लिए आवश्यक नीतिगत और बुनियादी ढांचागत सुधारों की विवेचना कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)


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