☎
9235313184 9235446806 • Help & Enquiries
Home › CA for Mains› Unemployment falling, yet lack of ‘decent work’ in India.”
CA for Mains

Unemployment falling, yet lack of ‘decent work’ in India.”

By Result Mitra •
बेरोजगारी गिरने के बावजूद भारत में ‘सभ्य कार्य’ (डिसेंट वर्क) की कमी | Result Mitra
RESULT MITRA

बेरोजगारी गिरने के बावजूद भारत में ‘सभ्य कार्य’ (डिसेंट वर्क) की कमी।

“Unemployment falling, yet lack of ‘decent work’ in India.”

दिनांक: 02/11/2026 Source: The Hindu UPSC / PCS

संदर्भ

यह समाचार भारत में रोजगार के आंकड़ों और कार्य की गुणवत्ता के बीच के अंतर को उजागर करता है। लेख के अनुसार, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2017-18 से 2023-24 के दौरान भारत की बेरोजगारी दर 6.1% से घटकर 3.2% हो गई है और कार्यबल भागीदारी में वृद्धि हुई है। हालांकि, रोजगार के अवसरों में इस वृद्धि के बावजूद, अधिकांश श्रमिकों के पास औपचारिक अनुबंध, सामाजिक सुरक्षा, चिकित्सा लाभ और नौकरी की सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी और अनौपचारिक क्षेत्र के विस्तार का पता चलता है।

यूपीएससी के लिए सीख

  • समावेशी और सतत विकास (Inclusive and Sustainable Growth): केवल मात्रात्मक रोजगार सृजन (बेरोजगारी दर कम करना) पर्याप्त नहीं है; विकास की गुणवत्ता के लिए ‘डिसेंट वर्क’ (सभ्य कार्य) और सामाजिक सुरक्षा का होना अनिवार्य है।
  • सामाजिक असमानता और श्रम बाजार: श्रम बाजार की अनौपचारिक प्रकृति, लैंगिक असमानता (महिला श्रम शक्ति भागीदारी) और जातिगत अंतर किस प्रकार विकास के लाभों को असमान बनाते हैं।
  • श्रम सुधार और नीतियां: गिग इकॉनमी, चार श्रम संहिता (Four Labour Codes) और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

Q. “भारत में बेरोजगारी दरों में गिरावट के बावजूद, कार्य की गुणवत्ता और ‘सभ्य कार्य’ (डिसेंट वर्क) की कमी एक गंभीर नीतिगत चिंता बनी हुई है।” इस कथन के आलोक में, भारतीय श्रम बाजार में अनौपचारिकरण की मुख्य चुनौतियों का विश्लेषण करें और इस समस्या के समाधान हेतु आवश्यक उपायों का सुझाव दें।

उत्तर संरचना

  • प्रस्तावना: बेरोजगारी दरों में हालिया गिरावट और ‘डिसेंट वर्क’ (SDG-8) की अवधारणा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत करें।
  • मुख्य भाग
    • भारत में कार्य की गुणवत्ता और अनौपचारिकरण की मुख्य चुनौतियां (जैसे- सामाजिक सुरक्षा का अभाव, कृषि और असंगठित क्षेत्र की स्थिति)।
    • इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम (जैसे- सामाजिक असमानता, जाति और लिंग आधारित भेदभाव, और आर्थिक झटकों के प्रति संवेदनशीलता)।
    • इस स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक उपाय और आगे की राह (जैसे- पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा, चार श्रम संहिता का प्रभावी क्रियान्वयन)।
  • निष्कर्ष: विकास को केवल ‘जॉब-काउंटिंग’ के बजाय ‘जॉब-क्वालिटी’ दृष्टिकोण से जोड़ने पर बल देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष दें।

मॉडल उत्तर

प्रस्तावना

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 2017-18 के 6.1% से घटकर 2023-24 में 3.2% हो गई है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार ‘डिसेंट वर्क’ (सभ्य कार्य)—जो न्यायसंगत आय, कार्यस्थल अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और गरिमा की गारंटी देता है—की व्यापक अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि केवल ‘रोजगार की संख्या’ बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ‘कार्य की गुणवत्ता’ में सुधार करना आज की प्राथमिक आवश्यकता है।

अनौपचारिकरण और रोजगार की खराब गुणवत्ता की चुनौती

  • अनुबंध एवं सुरक्षा का अभाव: भारत का लगभग 90% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है। बहुसंख्यक श्रमिकों के पास लिखित अनुबंध, सवेतन अवकाश, पीएफ (PF) या स्वास्थ्य बीमा का अभाव है।
  • कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों पर निर्भरता: कृषि क्षेत्र आज भी भारत के सबसे बड़े श्रमबल को रोजगार देता है, लेकिन यह सबसे कम गुणवत्ता वाला रोजगार (Low-quality employment) सृजित करता है, जहां अधिकांश श्रमिक अवैतनिक पारिवारिक श्रम या स्व-नियोजित हैं।
  • गिग और प्लेटफॉर्म इकॉनमी की अनिश्चितता: जोमैटो, स्विगी या ओला जैसे प्लेटफॉर्म्स में ऐप-आधारित काम बढ़ा है, परंतु इन गिग वर्कर्स को ‘नियोक्ता-कर्मचारी’ का कानूनी दर्जा न मिलने से नौकरी की सुरक्षा और न्यूनतम वेतन का अधिकार नहीं मिल पाता।

सामाजिक, लैंगिक और क्षेत्रीय असमानता

  • लैंगिक विसंगति (Gender Disparity): यद्यपि हाल के वर्षों में महिला श्रमबल भागीदारी (FLFPR) बढ़ी है, परंतु वे अक्सर निम्न-वेतन, असुरक्षित और अवैतनिक देखभाल कार्यों (Unpaid care work) में केंद्रित हैं।
  • जातिगत एवं सामाजिक बाधाएं: अनुसूचित जनजाति (ST), अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाली महिलाएं और श्रमिक ‘डिसेंट वर्क’ के सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर हैं।
  • क्षेत्रीय असंतुलन (Regional Disparities): गोवा, केरल, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्यों में ‘डिसेंट वर्क’ का स्तर बेहतर है, जबकि बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस मामले में काफी पीछे हैं।

आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव

  • कम उपभोग एवं बचत: सामाजिक सुरक्षा न होने से श्रमिक कम बचत करते हैं, जिससे वे स्वास्थ्य या आर्थिक झटकों (जैसे कोविड-19 जैसी महामारी) के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यह अर्थव्यवस्था में समग्र मांग (Aggregate Demand) को कमजोर करता है।
  • कर आधार और उत्पादकता में कमी: व्यापक अनौपचारिक अर्थव्यवस्था राज्य के कर राजस्व को सीमित करती है और श्रमिकों की कम कार्य-कुशलता के कारण राष्ट्रीय उत्पादकता (Productivity) को प्रभावित करती है।
  • हरित संक्रमण (Just Transition) की चुनौती: जलवायु परिवर्तन और हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते भारत के लिए यह जरूरी है कि नए ‘ग्रीन जॉब्स’ भी सभ्य और सुरक्षित कार्य की श्रेणी में आएं।

सुधार के उपाय

  • व्यापक एवं पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा: ई-श्रम (e-Shram) पोर्टल पर पंजीकृत श्रमिकों को केवल डेटाबेस तक सीमित न रखकर उन्हें अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और जीवन बीमा का वास्तविक लाभ दिया जाए।
  • श्रम संहिताओं (Labour Codes) का प्रभावी कार्यान्वयन: वर्ष 2025 में प्रस्तावित चार श्रम संहितायें लागू की गई हैं, परंतु इनका क्रियान्वयन आधा-अधूरा है। ठेका श्रम (Contractualization) पर लगाम लगाते हुए अनिवार्य लिखित अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा अंशदान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • उद्यमों के प्रोत्साहन को श्रम शर्तों से जोड़ना: कर लाभ, सब्सिडी या PLI (उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन) योजना प्राप्त करने वाले कॉरपोरेट्स के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे अपने कार्यबल को लिखित अनुबंध और न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करें।
  • समावेशी और अंतर-विभागीय (Intersectional) नीतियां: महिलाओं को औपचारिक श्रम में बनाए रखने के लिए किफायती बाल देखभाल (Childcare facilities), सुरक्षित परिवहन और कार्यस्थल पर भेदभाव विरोधी कड़े नियम लागू किए जाएं।
  • कौशल विकास और औपचारिकरण: ‘स्किल इंडिया’ और ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ के माध्यम से पारंपरिक व असंगठित क्षेत्र के कारीगरों और श्रमिकों को औपचारिक बाजार से जोड़ा जाए ताकि उनकी सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) बढ़ सके।

निष्कर्ष

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन केवल ‘जॉब-काउंटिंग’ (रोजगार की संख्या) से नहीं, बल्कि ‘जॉब-क्वालिटी’ (कार्य की गरिमा और सुरक्षा) से होना चाहिए। यदि भारत को ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो उसे अनौपचारिक और असुरक्षित श्रमबल पर निर्भर रहने के बजाय एक न्यायसंगत, समावेशी और सुरक्षित श्रम पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना होगा।

अभ्यास प्रश्न

Q. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के संदर्भ में, ‘डिसेंट वर्क’ (सभ्य कार्य) की संकल्पना में निम्नलिखित में से कौन-से आयाम शामिल हैं?
  1. उचित और न्यायसंगत आय
  2. कार्यस्थल पर सामाजिक सुरक्षा और गरिमा
  3. सभी श्रमिकों के लिए अनिवार्य सरकारी नौकरी की गारंटी

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) केवल 1 और 2

हमारी Free Classes देखें!

हमारी Free Classes देखने के लिए अभी Result Mitra YouTube Channel को Subscribe करें!

Subscribe Now
Result Mitra – UPSC/PCS Preparation
Source: The Hindu
Share this post: TG f
Scroll to Top