Source: The Hindu
संदर्भ
हाल ही में, विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और विधायी चर्चाओं के माध्यम से भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही बहस पर प्रकाश डाला गया है। इसके अंतर्गत व्यक्तिगत कानूनों की मौजूदा स्थिति, संविधान के अनुच्छेद 44 के प्रावधानों, UCC के पक्ष एवं विपक्ष के तर्कों, तथा विधि आयोग के सुझावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
Q. भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने के समक्ष मौजूद मुख्य व्यावहारिक चुनौतियों और संभावनाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। यह संविधान के अंतर्गत लैंगिक न्याय के उद्देश्यों को बढ़ावा देते हुए सांस्कृतिक तथा धार्मिक बहुलता की रक्षा किस प्रकार कर सकता है?
उत्तर प्रारूप
परिचय
समान नागरिक संहिता (UCC) को परिभाषित करें।
संविधान के भाग IV में शामिल अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का उल्लेख करें।
वर्तमान राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और राज्यों द्वारा इस दिशा में उठाए जा रहे कदमों का संक्षिप्त संदर्भ दें।
मुख्य भाग
- UCC के पक्ष में तर्क: लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, राष्ट्र की एकता और धर्मनिरपेक्षता को मजबूती।
- UCC के विपक्ष में विरोध और चिंताएं: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25), सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण (अनुच्छेद 29), तथा जनजातीय रिवाजों की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां।
- विधि आयोग और सुधार का दृष्टिकोण: समुदायों के बीच एकरूपता थोपने के बजाय “समुदायों के भीतर लैंगिक समानता” स्थापित करने पर जोर।
निष्कर्ष
संवैधानिक नैतिकता, राष्ट्रीय एकता और विभिन्न समुदायों के बीच व्यापक सामाजिक संवाद व आम सहमति के साथ एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर बल दें।
परिचय
समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों में धर्म-निरपेक्ष एक समान कानून लागू करना है। संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत यह राज्य का नीति निदेशक तत्व है। वर्तमान में विभिन्न राज्यों द्वारा इस दिशा में उठाए जा रहे कदमों के कारण यह अत्यधिक प्रासंगिक हो गया है।
मुख्य भाग
समर्थन में मुख्य तर्क (Arguments in Favour):
लैंगिक न्याय और महिला अधिकार (Gender Justice): UCC के पक्षकारों का तर्क है कि यह विभिन्न धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण प्रावधानों को समाप्त करेगा, जिससे महिलाओं को विवाह, भरण-पोषण और उत्तराधिकार में समान अधिकार मिल सकेंगे।
सच्ची धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र निर्माण (Secularism & National Integration): यह सभी नागरिकों को धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर एक समान कानूनी दायरे में लाता है, जो एक आधुनिक राष्ट्र की पहचान और संविधान की मूल भावना के अनुरूप है।
कानूनी सरलीकरण और एकरूपता (Legal Uniformity): वर्तमान में विभिन्न धर्मों के अलग-अलग पर्सनल लॉ होने के कारण न्यायिक प्रक्रिया जटिल हो जाती है; एक संहिता होने से मुकदमों के निस्तारण में तेजी आएगी और न्याय प्रणाली सुगम बनेगी।
आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य (Modern Values): यह रूढ़िवादिता और असमानता पर आधारित प्रथाओं को समाप्त कर स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों को धरातल पर उतारने में मदद करता है।
विरोध और आपत्तियां (Arguments Against):
धार्मिक स्वतंत्रता का हनन (Religious Freedom): अल्पसंख्यक समुदायों और विचारकों का मानना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 (अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता) के प्रतिकूल हो सकता है।
सांस्कृतिक विविधता और पहचान को खतरा (Cultural Diversity): अनुच्छेद 29 के तहत प्रदत्त नागरिकों के विशिष्ट वर्गों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार है, जिसकी सुरक्षा को लेकर चिंताएं व्यक्त की जाती हैं।
जनजातीय परंपराओं और रिवाजों की सुरक्षा (Tribal Protection): देश के कई जनजातीय और पूर्वोत्तर समुदायों की अपनी विशिष्ट परंपराएं और रीति-रिवाज हैं, जिन्हें अचानक बाधित करना सामाजिक और राजनीतिक अशांति का कारण बन सकता है।
विश्वास की कमी और राजनीतिक संवेदनशीलता: अल्पसंख्यकों के मन में यह आशंका रहती है कि इस प्रकार के कानून बहुसंख्यकवादी संस्कृति को थोपने का माध्यम बन सकते हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है।
आगे की राह / समाधान (The Way Forward):
समुदायों के भीतर समानता पर जोर: जैसा कि विधि आयोग के परामर्शपत्रों में रेखांकित किया गया है, प्राथमिकता विभिन्न समुदायों के बीच पूर्ण एकरूपता लाने के बजाय, प्रत्येक समुदाय के भीतर महिलाओं और पुरुषों के बीच लैंगिक समानता और न्याय सुनिश्चित करने की होनी चाहिए।
क्रमिक और समावेशी दृष्टिकोण: सुधारों की प्रक्रिया को बलपूर्वक थोपने के बजाय विस्तृत सामाजिक परामर्श, जन-जागरूकता और व्यापक आम सहमति के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
लक्षित विधाई सुधार: एक साथ संपूर्ण संहिता लागू करने की बजाय विभिन्न पर्सनल लॉ में मौजूद गंभीर विसंगतियों और भेदभावपूर्ण प्रथाओं में चरणबद्ध तरीके से सुधार किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन एक संवेदनशील और जटिल विषय है, जिसके लिए राष्ट्रीय अखंडता, लैंगिक समानता और अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकारों के बीच एक सूक्ष्म व परिपक्व संतुलन की आवश्यकता है। समाज के सभी वर्गों को विश्वास में लेकर व्यापक संवाद के जरिए ही इस दिशा में आगे बढ़ना न्यायसंगत होगा।
अभ्यास प्रश्न
Q. भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 देश के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने के लिए राज्य को निर्देशित करता है, जो न्यायपालिका द्वारा प्रवर्तनीय एक मौलिक अधिकार है।
2. विधि आयोग द्वारा प्रस्तुत दृष्टिकोण के अनुसार, तत्काल प्राथमिकता विभिन्न समुदायों के बीच पूर्ण एकरूपता थोपने के बजाय समुदायों के भीतर लैंगिक समानता और न्याय स्थापित करना होना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b) केवल 2
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