
| सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 (GS Paper-3): भारत में कृषि, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, जल संसाधन तथा समावेशी विकास । |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में जारी 2025-26 डायनामिक ग्राउंडवाटर असेसमेंट की रिपोर्ट ने भारत में गहरे होते जल संकट की एक भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हरित क्रांति का अग्रदूत रहा पंजाब राज्य 152% की भूजल दोहन दर के साथ देश में सबसे गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। इसके अतिरिक्त, पंजाब के कुल 153 ब्लॉकों में से 72% ब्लॉक ‘रेड जोन‘ (अति-दोहित) में तब्दील हो चुके हैं, जो देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक है। यह डेटा स्पष्ट करता है कि भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले क्षेत्रों में अब पानी की हर बूंद के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताना-बाना भी सूख रहा है।
भूजल अतिदोहन क्या है और इससे जुड़े प्रमुख आंकड़े
भूजल अतिदोहन (Groundwater Over-exploitation): जब किसी विशिष्ट क्षेत्र में भूमिगत जलभृतों (Aquifers) से पानी निकालने की दर, वर्षा या अन्य प्राकृतिक स्रोतों द्वारा उसके पुनर्भरण (Recharge) की दर से अधिक हो जाती है, तो उसे भूजल का अतिदोहन कहा जाता है। सरल शब्दों में, यह बैंक खाते से जमा राशि से अधिक पैसे निकालने जैसा है, जो अंततः खाते को शून्य कर देता है।
महत्वपूर्ण आंकड़े और तथ्य:
- वैश्विक हिस्सेदारी: भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हम वैश्विक स्तर पर निकाले जाने वाले कुल भूजल का एक-तिहाई (33% से अधिक) अकेले उपभोग करते हैं, जो अमेरिका और चीन के कुल योग से भी अधिक है।
- गिरावट की गति: उपग्रह डेटा (GRACE Mission) के अनुसार, उत्तर-पश्चिम भारत में भूजल का स्तर हर साल लगभग 1 से 3 सेंटीमीटर की दर से नीचे जा रहा है।
- कुओं का बढ़ता स्तर: नवीनतम डेटा के अनुसार, भारत के मॉनसून के बाद की अवधि में 40 मीटर से अधिक गहरे जल स्तर वाले अवलोकन कुओं (Observation Wells) का अनुपात वर्ष 2022 और 2025 के बीच 2 प्रतिशत अंक बढ़ गया है।
- नीति आयोग की चेतावनी: नीति आयोग की ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक’ (CWMI) रिपोर्ट के अनुसार, भारत इतिहास के सबसे खराब जल संकट से गुजर रहा है और देश की लगभग 60 करोड़ आबादी पानी की गंभीर कमी का सामना कर रही है।
भूजल अतिदोहन के प्रमुख कारण
- धान-गेहूं का चक्र (Rice-Wheat Monoculture): हरित क्रांति के बाद से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान और गेहूं जैसी जल-गहन फसलों का प्रतिरूप (Cropping Pattern) स्थापित हो गया है। अकेले पंजाब में इन दो फसलों के लिए प्रति वर्ष 25 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल का दोहन किया जा रहा है।
- मुफ्त/रियायती बिजली नीति: कई राज्य सरकारों द्वारा कृषि क्षेत्र के लिए मुफ्त या अत्यधिक रियायती बिजली दी जाती है। इसके कारण किसान बिना किसी आर्थिक नियंत्रण या जिम्मेदारी के 24 घंटे शक्तिशाली पंप चलाते हैं, जिससे पानी की भारी बर्बादी होती है।
- बाजार की अनिश्चितता और विविविधीकरण का अभाव: किसान वैकल्पिक फसलों (जैसे बाजरा, दलहन, तिलहन) की ओर इसलिए नहीं बढ़ते क्योंकि बाजार में भंडारण विकल्पों की कमी, सुनिश्चित कीमतों (MSP) का अभाव, और कमजोर प्रसंस्करण बुनियादी ढांचा है। धान-गेहूं में सुनिश्चित सरकारी खरीद के कारण किसान इसे कम जोखिम भरा मानते हैं।
- ऐतिहासिक कानूनी खामियां: भारत में आज भी औपनिवेशिक काल का ‘ईजमेंट एक्ट, 1882′ (Easement Act) लागू है। यह कानून भूमि के मालिक को उसकी जमीन के नीचे मौजूद पानी पर असीमित अधिकार देता है, जिससे भूजल को एक सार्वजनिक संसाधन के रूप में विनियमित करना बेहद कठिन हो जाता है।
- तीव्र शहरीकरण और कंक्रीटीकरण: शहरों के अनियोजित विस्तार के कारण कंक्रीट की परतें बिछ गई हैं। इससे वर्षा का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता, जबकि पेयजल और निर्माण कार्यों के लिए निकासी लगातार बढ़ रही है।
भूजल अतिदोहन के बहुआयामी प्रभाव
1. आर्थिक और कृषि प्रभाव (Economic & Agricultural)
- कृषि लागत में भारी वृद्धि: जैसे-जैसे जल स्तर नीचे जाता है, किसानों को गहरे ट्यूबवेल खोदने और अधिक हॉर्सपावर के पंप खरीदने पड़ते हैं। इससे कृषि इनपुट लागत बढ़ जाती है और किसान कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
- जल उत्पादकता में कमी: अध्ययनों (जैसे Discover Sustainability) से पता चलता है कि बड़े खेतों में छोटे खेतों की तुलना में भूजल उत्पादकता धान के अनुपात में कम दर्ज की गई है। यानी बड़े खेत पानी का अधिक अपव्यय कर रहे हैं।
- खाद्य सुरक्षा पर खतरा: भारत की सिंचाई का लगभग 60-70% हिस्सा भूजल पर निर्भर है। यदि यह संसाधन समाप्त हो गया, तो देश की अनाज आत्मनिर्भरता खतरे में पड़ जाएगी।
2. सामाजिक प्रभाव और जल संपदा अंतर (Water Wealth Gap)
- अमीर बनाम गरीब किसान की खाई: Economic and Political Weekly (EPW) के अध्ययन के अनुसार, अमीर किसान अपनी वित्तीय क्षमता के कारण निचले जल स्तर तक पहुंचने में सक्षम हैं। इसके विपरीत, गरीब या सीमांत किसान गहरे कुएं नहीं खोद सकते।
- अनियंत्रित निर्भरता (Unregulated Dependencies): पानी समाप्त होने पर छोटे किसान अमीर जमींदारों से पानी खरीदने को मजबूर हैं। यह उनकी पूंजी को बड़े भूस्वामियों की ओर स्थानांतरित कर रहा है, जिससे ग्रामीण भारत में असमानता गहरी हो रही है।
- लैंगिक असमानता: ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के पारंपरिक स्रोत सूखने से महिलाओं और बच्चियों को पानी लाने के लिए मिलों पैदल चलना पड़ता है। इससे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है और बालिकाओं की शिक्षा छूट जाती है।
3. पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभाव (Environmental & Ecological)
- जमीन का धंसना (Land Subsidence): जब भूमिगत जलभृत पूरी तरह खाली हो जाते हैं, तो ऊपर की मिट्टी और चट्टानें सिकुड़ने लगती हैं। इससे शहरी क्षेत्रों में इमारतें धंसने और दरारें आने का खतरा बढ़ जाता है।
- जल की गुणवत्ता में भारी गिरावट: जल स्तर बहुत नीचे चले जाने से पानी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले हानिकारक तत्व जैसे आर्सेनिक, फ्लोराइड और यूरेनियम की सांद्रता (Concentration) खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है, जिससे कैंसर और फ्लोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियां फैल रही हैं।
- नदियों का सूखना: भूजल स्तर गिरने से नदियों को मिलने वाला ‘बेस-फ्लो’ समाप्त हो जाता है, जिससे नदियां और स्थानीय आर्द्रभूमियां स्थायी रूप से सूख जाती हैं।
सरकार के प्रयास
- अटल भूजल योजना: यह विश्व बैंक सहायता प्राप्त योजना है, जिसका उद्देश्य सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल मांग प्रबंधन और वॉटर बजटिंग को बढ़ावा देना है।
- जल शक्ति अभियान: देश भर में वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल निकायों के पुनरुद्धार के लिए एक जन-आंदोलन।
- पीएम-कुसुम (PM-KUSUM): किसानों को सौर पंप प्रदान करना ताकि ग्रिड बिजली पर निर्भरता कम हो।
- ‘पानी बचाओ, पैसा कमाओ‘ योजना (पंजाब सरकार): इस अनूठी योजना के तहत किसानों को एक निर्धारित सीमा से कम बिजली (पंपिंग के लिए) खर्च करने पर सीधे उनके बैंक खाते में पैसे दिए जाते हैं।
चुनौतियाँ
- योजनाओं में कम नामांकन (Low Enrolment): ‘पानी बचाओ, पैसा कमाओ’ जैसी बेहतरीन पर्यावरण-अनुकूल योजनाओं में भी जागरूकता की कमी और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण किसानों का नामांकन बहुत कम है।
- राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: वोट बैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारें कृषि बिजली पर पूरी तरह से शुल्क लगाने या सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने से कतराती हैं।
- काश्तकारों (Tenants) की उपेक्षा: अधिकांश सरकारी नीतियां और सब्सिडी जमीन या पंप के मालिकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। वास्तविक खेती करने वाले पट्टेदार या बटाईदार किसान इन लाभों से वंचित रह जाते हैं।
- प्रौद्योगिकी की उच्च प्रारंभिक लागत: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली लगाने की शुरुआती लागत अधिक होती है, जिसे छोटे किसान बिना वित्तीय सहायता के वहन नहीं कर सकते।
आगे की राह (Way Forward)
- कल्याणकारी नीतियों का पुनर्गठन: बिजली सब्सिडी के वर्तमान ढांचे को बदलने की आवश्यकता है। सब्सिडी का लाभ सीधे काश्तकारों और छोटे किसानों को वित्तीय सहायता के रूप में दिया जाना चाहिए, न कि मुफ्त बिजली के रूप में। इससे पानी निकालने की अतिरिक्त लागत इतनी निषेधात्मक हो जाएगी कि पानी की बर्बादी रुकेगी।
- सामूहिक सिंचाई बुनियादी ढांचा: व्यक्तिगत ट्यूबवेलों के बजाय सहकारी या सामुदायिक ट्यूबवेल प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इससे छोटे किसानों को पानी के बाजार में अमीर जमींदारों के शोषण से बचाया जा सकेगा।
- फसल विविधीकरण हेतु मूल्य सुरक्षा: किसानों को धान का विकल्प चुनने के लिए प्रेरित करने हेतु मक्का, बाजरा और दालों जैसी फसलों के लिए मजबूत आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains), प्रसंस्करण इकाइयां और सुनिश्चित बाजार मूल्य प्रदान करना होगा।
- सार्वजनिक विश्वास सिद्धांत: ईजमेंट एक्ट, 1882 में संशोधन कर भूजल को एक निजी संपत्ति के बजाय ‘राष्ट्रीय साझा संसाधन’ घोषित किया जाना चाहिए, ताकि राज्य इसका नियमन जनहित में कर सके।
- स्पंज सिटी (Sponge City) की अवधारणा: शहरी नियोजन में ऐसी पारगम्य (Permeable) सड़कों और हरित क्षेत्रों का निर्माण किया जाए जो वर्षा जल को अधिकतम सोखकर भूजल को प्राकृतिक रूप से रीचार्ज कर सकें।
निष्कर्ष
भूजल भारत की एक ‘अदृश्य जीवन रेखा’ है, जो देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को थामे हुए है। पंजाब का वर्तमान संकट यह चेतावनी है कि यदि हमने ‘असीमित निष्कर्षण’ की मानसिकता को नहीं बदला, तो देश के कई हिस्से आने वाले समय में मरुस्थल में बदल जाएंगे। समय आ गया है कि हम जल प्रबंधन में ‘निष्कर्षण आधारित दृष्टिकोण‘ से हटकर ‘संरक्षण और न्यायसंगत वितरण‘ (Paradigm Shift) को अपनाएं। पानी का संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र में सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने की बुनियादी शर्त है।
