तिब्बत के पठार पर जलवायु परिवर्तन और हिमनद पतन

Source: The Hindu

चीनी शोधकर्ताओं ने बढ़ते तापमान और तिब्बत के पठार पर हिमनदों के तेजी से पीछे हटने(Glacial Retreat) के बीच एक स्पष्ट संबंध उजागर किया है। नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को हुई घातक हिमनद पतन की घटना और पठार पर 14,000 से अधिक हिमनद झीलों की मैपिंग के बाद, यह चेतावनी दी गई हैकि इससे हिमनद झील के फटनेसेआनेवाली बाढ़ (GLOFs) जैसी आपदाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव भारत और नेपाल जैसे downstream (निचले इलाकों के) देशों पर पड़ रहा है।

Q.

उत्तर का प्रारूप (Answer Format)

प्रस्तावना:

तिब्बत के पठार पर ग्लेशियरों के सिकुड़ने और नेपाल-चीन सीमा पर हुई हिमनद पतन की घटनाओं का उल्लेख करते हुए वैश्विक तापन (Global Warming) को इसके मूल कारण के रूप में प्रस्तुत करें।

मुख्य भाग (Body):

  • कारण एवं आँकड़े: पिछले छह दशकों में ग्लेशियर क्षेत्र में आई भारी गिरावट (करीब 39,000 वर्ग किमी तक सिमटना) और कुछ क्षेत्रों में 40% तक हिमनदों का सिकुड़ना।
  • बढ़ता आपदा जोखिम: पठार पर 14,000 से अधिक हिमनद झीलों का होना और चीन की दक्षिणी सीमाओं के करीब हिमालयी क्षेत्रों में इनका ‘सबसे स्पष्ट रूप से बढ़ना’।
  • भारत और नेपाल पर प्रभाव: हिमनद झील के फटने से आनेवाली बाढ़ (GLOFs), भूस्खलन और निचले जलग्रहण क्षेत्रों में जीवन- संकट।
  • आवश्यक कदम: वैज्ञानिक डेटा साझाकरण (Data Sharing), सीमा पार सहयोग और सटीक हिमनद मैपिंग।

निष्कर्ष:

तात्कालिक और दिखावटी प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठकर क्षेत्रीय स्तर पर पूर्व-रोकथाम (Prevention) और सहयोगात्मक आपदा प्रबंधन ढांचे को अपनाने की आवश्यकता पर बल दें।

उत्तर (Answer)

चीनी विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं (जैसे कांग शिचांग और नी योंग) के हालिया अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि तिब्बत के पठार पर बढ़ता तापमान हिमनद पतन (Glacial Collapse) और हिमनद झीलों के विस्तार का प्रमुख कारक बन चुका है। नेपाल-चीन सीमा पर हुई घातक घटनाओं और पठार पर 14,000 से अधिक हिमनद झीलों की मौजूदगी ने दक्षिण एशियाई देशों, विशेषकर भारत और नेपाल के लिए गंभीर पर्यावरणीय और सुरक्षा खतरे उत्पन्न कर दिए हैं।

  • तापमान वृद्धि और हिमनदों का सिकुड़ना: पिछले छह दशकों के अध्ययनों के अनुसार, तिब्बत के पठार पर ग्लेशियर क्षेत्र 51,000 और 44,000 वर्ग किमी से घटकर 39,000 वर्ग किमी रह गया है, तथा कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियर लगभग 40% तक सिकुड़ चुके हैं।
  • ग्लेशियल झीलों में तीव्र वृद्धि: ग्लोबल वार्मिंग के कारण सम्पूर्ण पठार पर ग्लेशियरों में 24% की गिरावट आई है और चीन की “दक्षिणी सीमाओं” के करीब हिमालयी हिस्से में इन झीलों की वृद्धि “सबसे अधिक स्पष्ट” दर्ज की गई है।
  • आपदाओं का बढ़ता खतरा: इन विशाल और तेजी से फैलती झीलों के कारण हिमनद झील के फटने से आनेवाली बाढ़ (GLOFs), भूस्खलन और आकस्मिक जल प्रलय का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
  • भारत और नेपाल के लिए चिंता: चूँकि ये संवेदनशील क्षेत्र भारत और नेपाल की उत्तर दिशा से जुड़े हैं, इसलिए इन क्षेत्रों में होने वाले जलवायविक परिवर्तन downstream (निचले) क्षेत्रों की नदियों और बस्तियों को सीधे प्रभावित करते हैं।
  • नदी घाटियों पर संकट: भारत (ब्रह्मपुत्र, गंगा और तिस्ता बेसिन के ऊपरी हिस्से) तथा नेपाल (कोसी, गंडकी और कर्णाली बेसिन) की नदियाँ पिघलते ग्लेशियरों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं।
  • आपदाओं का जोखिम: अनियंत्रित रूप से फैलती हिमनद झीलें जब अचानक फटती हैं, तो नेपाल और भारत के पर्वतीय क्षेत्रों (जैसे सिक्किम और उत्तराखंड) में भारी तबाही, अचानक बाढ़ (Flash Floods) और बुनियादी ढाँचे का विध्वंस होता है।
  • सीमा पार सहयोग (Transboundary Cooperation): भारत, नेपाल और चीन को कूटनीतिक कटुता से ऊपर उठकर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए एक साझा क्षेत्रीय मंच बनाना चाहिए।
  • करीबी मैपिंग (Closer Mapping): उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों की उपग्रह और ड्रोन आधारित निरंतर निगरानी की जाए।
  • वास्तविक समय डेटा साझाकरण: मौसम, तापमान वृद्धि और हिमनद झीलों के जल स्तर से जुड़े वैज्ञानिक आँकड़ों का पारदर्शी आदान-प्रदान हो।
  • उन्नत तकनीक आधारित मैपिंग: उपग्रह इमेजिंग, ड्रोन निरीक्षण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके उच्च जोखिम वाली झीलों की निरंतर निगरानी की जाए।
  • पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems): संवेदनशील नदी घाटियों में स्वचालित जल-स्तर संवेदक (Sensors) और डिजिटल सायरन आधारित मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किए जाएँ।
  • सतत विकास और ज़ोनिंग: हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और भारी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए कठोर पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) तथा वैज्ञानिक भूमि-उपयोग ज़ोनिंग लागू हो।

निष्कर्ष

तिब्बत के पठार पर पिघलते ग्लेशियर और अनियंत्रित रूप से बढ़ती हिमनद झीलें अब केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय आपदा चुनौती हैं। अतः भारत, नेपाल और चीन सहित संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र के देशों को पारंपरिक कटुता से ऊपर उठकर संयुक्त वैज्ञानिक अनुसंधान, डेटा पारदर्शिता और ‘पूर्व-रोकथाम’ आधारित दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग को अपनाना होगा, तभी दक्षिण एशिया को आसन्न जल प्रलय और आपदाओं से बचाया जा सकता है।

Prelims practice question

Q.

तिब्बत के पठार और हिमालयी क्षेत्रों में जलवायुपरिवर्तन के प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. पिछले छह दशकों में तिब्बत के पठार पर हिमनदों का क्षेत्र घटकर लगभग 39,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है।
  2. किंगहाइ-तिब्बत पठार पर वर्तमान में 14,000 से अधिक हिमनद झीलें मौजूद हैं जो तेजी से फैल रही हैं।
  3. चीन की दक्षिणी सीमाओं के पास स्थित हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदों का विस्तार सबसे कम और नगण्य दर्ज किया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (A)

Mains Practice Question

Q.

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