चर्चा में क्यों?
हाल के दिनों में NEET और अन्य भर्ती परीक्षाओं में कुप्रबंधन व पेपर लीक के कारण भारत सहित वैश्विक स्तर पर छात्रों और युवाओं में अभूतपूर्व असंतोष देखा गया है। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में उभरा यह स्वतःस्फूर्त आक्रोश अब केवल शैक्षणिक सुधारों तक सीमित न रहकर शासन, प्राधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर गहरा सवालिया निशान लगा रहा है।

वर्तमान ‘जेन ज़ेड’ (Gen Z) आंदोलन क्या है?
• ‘जेन ज़ेड’ आंदोलन आज की उस युवा पीढ़ी का विद्रोह है जो पुरानी, जर्जर और नाकाम हो चुकी व्यवस्थाओं को पैचवर्क (कामचलाऊ सुधार) से ठीक करने के बजाय उन्हें सिरे से बदलने की इच्छा रखती है।
• यह आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक दलों के झंडे या किसी एक बड़े चेहरे के बिना चलता है। यह एक स्वायत्त, विकेंद्रीकृत (decentralized) और पूरी तरह से स्वतःस्फूर्त (spontaneous) आंदोलन है, जहां युवा किसी राजनीतिक एजेंडे के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, आत्मसम्मान और सुरक्षित भविष्य की लड़ाई के लिए खुद सड़कों पर उतर रहा है।
• नेपाल और बांग्लादेश जैसे हमारे पड़ोसियों में जो हुआ, वह इस बात का गवाह है कि जब युवाओं के गुस्से को दबाया जाता है, तो स्थापित सत्ताएं ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।
• आज भारत में भी राजनीतिक दलों और नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि मुख्यधारा की राजनीति और छात्र समुदाय के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है।

आंदोलन / असंतोष के मूल कारण
युवाओं के भीतर धधक रहे इस गुस्से के पीछे कई गहरे ढांचागत कारण हैं:
• आर्थिक अनिश्चितता और परीक्षा तंत्र का पतन: सालों तक कड़ी मेहनत करने के बावजूद जब युवाओं को पता चलता है कि पेपर लीक या भ्रष्टाचार के कारण उनका भविष्य अंधकार में है, तो उनका धैर्य टूट जाता है।
• संस्थागत विफलता: लोकतंत्र के स्तंभ—चाहे वह कार्यपालिका हो, संसद हो, या मीडिया जो ‘चेक एंड बैलेंस’ का काम करते हैं—युवाओं की नजर में अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। युवाओं को लगता है कि यह तंत्र उनकी आवाज सुनने में असमर्थ है।
• सत्ता का केंद्रीकरण और असुरक्षा: निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में युवाओं की कोई वास्तविक हिस्सेदारी नहीं है। सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण ने उनके मन में यह असुरक्षा पैदा कर दी है कि उनके लोकतांत्रिक और संवैधानिक सुरक्षा कवच व्यवस्थित रूप से कमजोर किए जा रहे हैं।
विरोध का बदलता स्वरूप: डिजिटल से सड़क तक
आज के युवाओं ने विरोध प्रदर्शन के व्याकरण को पूरी तरह बदल दिया है:
• डिजिटल कुरुक्षेत्र: अब आंदोलनों की योजना बंद कमरों में नहीं बनती। एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स नए हथियार हैं। झारखंड में छात्र नेताओं की भूख हड़ताल और आंदोलनों ने सोशल मीडिया के जरिए कुछ ही घंटों में लाखों युवाओं को लामबंद (mobilize) कर दिया।
• अराजक और नेतृत्वहीन ढांचा: चूंकि इन आंदोलनों का कोई एक तय कमांडर नहीं होता, इसलिए सरकारों के लिए इन्हें किसी समझौते या राजनीतिक दबाव से दबाना या इनका राजनीतिकरण करना बेहद मुश्किल हो जाता है। डिजिटल स्पेस से शुरू हुई यह लामबंदी पलक झपकते ही सड़क पर एक विशाल जनसैलाब का रूप ले लेती है।
इतिहास से सीख: ‘एक चिंगारी’ का खतरा
सत्ता में बैठे लोगों को इतिहास की चेतावनियों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ एक छोटा सा आंदोलन देखते ही देखते देश के बड़े हिस्से में फैल गया था, क्योंकि तत्कालीन व्यवस्था से निराश होकर देश के सबसे बुद्धिमान और होनहार युवा उस उग्र रास्ते पर चल पड़े थे।
आज जब झारखंड जैसी सरकारें परीक्षा नियमों की अनियमितताओं के बाद परीक्षाओं को पूरी तरह रद्द करने जैसे अदूरदर्शी फैसले लेती हैं, तो युवाओं की हताशा चरम पर पहुंच जाती है। असंतोष की यह स्थिति किसी भी समय एक बड़ी दावानल (आग) का रूप ले सकती है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए यह एक चेतावनी क्यों है?
यह आंदोलन स्थापित लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक सीधे खतरे की घंटी है:
• ‘दिमागी नक्सल’ या ‘राष्ट्रविरोधी’ जैसी ब्रांडिंग का खोखलापन: जब भी युवा अपनी जायज मांगों के लिए आवाज उठाते हैं, तो सत्ता प्रतिष्ठान और चाटुकार मीडिया उन्हें ‘विदेशी एजेंट’ या ‘दिमागी नक्सल’ कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं। यह रवैया युवाओं को मुख्यधारा से और दूर धकेलता है।
• परिवर्तनीय ज्यामिति (Variable Geometry) का दौर: देश का राजनीतिक परिदृश्य अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहां स्थितियां बहुत तेजी से और अप्रत्याशित रूप से बदल सकती हैं। चुनावी राजनीति और मतदान के प्रति युवाओं की घटती दिलचस्पी यह दर्शाती है कि वे अब बदलाव के लिए केवल वोट देने को काफी नहीं मानते। यदि संस्थाओं ने संवाद नहीं साधा, तो युवा व्यवस्था-विरोधी (anti-establishment) ताकतों की ओर रुख कर सकते हैं।
आगे की राह
इस आसन्न संकट से बचने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को तुरंत अपने तौर-तरीकों में सुधार करना होगा:
• दमनकारी नीतियों का तत्काल त्याग: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज या अंधाधुंध बल प्रयोग पूरी तरह आत्मघाती है। यह राज्य के प्रति स्थायी नफरत को जन्म देता है।
• परीक्षा और चयन तंत्र में पूर्ण शुचिता: राष्ट्रीय और राज्य स्तर की सभी परीक्षाओं में जीरो-लीक और पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी, ताकि युवाओं का भरोसा बहाल हो सके।
• सार्थक और वास्तविक समावेशन: सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को चुनावी चश्मे से ऊपर उठकर युवाओं से सीधा संवाद करना होगा। नीति-निर्माण में युवाओं को वास्तविक हिस्सेदारी देनी होगी, न कि उन्हें सिर्फ एक वोट बैंक के रूप में देखना होगा।
निष्कर्ष
युवाओं का यह राष्ट्रव्यापी असंतोष किसी लोकतंत्र की विफलता का नहीं, बल्कि उसके भीतर सुधार की एक छटपटाहट का प्रतीक है। राजनीतिक दिग्गजों और नीति निर्माताओं को अपनी आंखें खुली रखनी होंगी। यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं ने समय रहते इस चेतावनी को नहीं पहचाना और खुद को नहीं बदला, तो आने वाले समय में इन विरोध प्रदर्शनों के परिणाम अत्यधिक अनिश्चित, अनियंत्रित और देश की स्थिरता के लिए विनाशकारी हो सकते हैं। लोकतंत्र की दीर्घायु युवाओं की आवाज को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण का वास्तविक भागीदार बनाने में है।
