वैश्विक मानचित्रकला में बदलाव: मर्कटोर से इक्विवेलेंट अर्थ तक – Global Cartographic Transformation: From Mercator to Equal Earth

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र महासभा नेहाल ही में’करेक्ट द मैप’ (Correct the Map) प्रस्ताव A/80/L.104 को भारी बहुमत से अपनाया है, जिसका उद्देश्य महाद्वीपों के सापेक्ष आकार का अधिक सटीक प्रतिनिधित्व करना है. यह प्रस्ताव मर्कटोर प्रक्षेप की ऐतिहासिक सीमाओं को रेखांकित करता है, जो उच्च-अक्षांश क्षेत्रों और विकसित देशों को उनके वास्तविक आकार से बहुत बड़ा दिखाता है, जबकि विकासशील क्षेत्रों (विशेषकर अफ्रीका और ग्लोबल साउथ) के पैमाने को कम करके प्रस्तुत करता है.

Q.

उत्तर

प्रस्तावना (Introduction)

वैश्विक मानचित्रकला (Cartography) के इतिहास मेंमर्कटोर (Mercator) प्रक्षेप सेलेकर इक्विवेलेंट अर्थ(Equal Earth) जैसी समान-क्षेत्रीय प्रक्षेप प्रणालियों की ओर बदलाव और संयुक्त राष्ट्र महासभा के हालिया प्रस्ताव नेमानचित्रों को केवल भौगोलिक साधन न मानकर शक्ति, प्रतिनिधित्व औ र राजनीतिक संप्रभुता के एक महत्वपूर्णउपकरण के रूप मेंस्थापित कर दिया है.

बहुआयामी विश्लेषण:

  • ऐतिहासिक ए वं मनोवैज्ञानिक आयाम: सोलहवीं शताब्दी मेंनौवहन के लिए विकसित मर्कटोर प्रक्षेप भूमध्य रेखा सेदूर जानेपर भूमि द्रव्यमान को लगातार बड़ा कर देता है. इससे यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसेउच्च-अक्षांश क्षेत्र अपनेवास्तविक आकार सेअत्यधिक बड़ेदिखाई देतेहैं, जबकि ग्लोबल साउथ (विशेषकर अफ्रीका और एशिया) के देश छोटे नजर आतेहैं. यह दृश्य परंपरा पीढ़ियों से लोगों की वैश्विक महत्ता और पैमाने की समझ को प्रभावित करती रही है.
  • तकनीकी एवं कार्टोग्राफिक आयाम: कोई भी सपाट मानचित्र बिना किसी विकृति के गोलाकार पृथ्वी को प्रदर्शित नहीं कर सकता है

भारतीय संदर्भऔर चिंताएँ:

➢ भारत ने’करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव का समर्थन तो किया, परंतु नई दिल्ली नेस्पष्ट किया कि यह समर्थन किसी विशिष्ट मानचित्र (जैसे’इक्वल अर्थ’) का पूर्णअनुमोदन नहीं है.

➢ भारत के समक्ष मुख्य चिंता भू-राजनीतिक संप्रभुता और सीमाओं के सटीक चित्रण की है.

➢ विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के अनुसार, भारत — की संप्रभुभूमि विशेषकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख— को केवल भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही दर्शाया जाना चाहिए.

➢ अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों की आड़ मेंगलत या भ्रामक मानचित्रकीय चित्रण भारत की क्षेत्रीय अखंडता के लिए सुरक्षा चुनौती बन सकतेहैं.

आगे की राह:

लाल रंग पुरानेमैप को और नीला-काला रंग नए मैप को दिखाता है।

  • कार्टोग्राफिक बहु लवाद (Cartographic Pluralism): शैक्षणिक संस्थानों और डिजिटल प्लेटफार्मों को किसी एक पारंपरिक मानचित्र पर निर्भर रहनेके बजाय विभिन्न उद्देश्यों (जैसे आकार तुलना के लिए समान-क्षेत्रीय मानचित्र और नौवहन के लिए मर्कटोर) के अनुसार सही प्रक्षेप का चयन करना चाहिए.
  • नीतिगत और कूटनीतिक सतर्कता: भारत जैसेदेशों को वैश्विक मंचों पर मानचित्र सुधार का समर्थन करते समय अपनी राष्ट्रीय सीमाओं और संप्रभुता के कानूनी हितों की रक्षा के लिए कड़े प्रावधान सुनिश्चित करनेचाहिए.
  • भौगोलिक साक्षरता मेंसुधार: पाठ्यपुस्तकों में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रत्येक मानचित्र एक तक नीकी निर्माण है, ताकि छात्रों मेंवैश्विक भूगोल की निष्पक्ष और वास्तविक समझ विकसित हो सके.

निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव इस बात को रेखांकित करता हैकि मानचित्र केवल तटस्थ कागजी दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि वेभू-राजनीति और प्रतिनिधित्व के जीवंत माध्यम हैं. भारत के भू-राजनीतिक हितों की रक्षा करते हुए, कार्टोग्राफिक बहुल वाद को अपनाना तथा क्षेत्रीय संप्रभुता के साथ वैश्विक मानचित्रकला मेंसंतुलन स्थापित क रना ही आधुनिक कूटनीति और न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है.

अभ्यास प्रश्न

Q.

  1. यह प्रस्ताव औपचारिक रूप से वैश्विक स्तर पर मर्कटोर प्रक्षेप पर पूर्णप्रतिबंध लगाता है.
  2. ‘इक्वल अर्थ’ प्रक्षेप एक समान-क्षेत्रीय प्रक्षेप (equal-area projection) है जो भूमि द्रव्यमान के सापेक्ष क्षेत्रों को संरक्षित रखता है.
  3. यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों की सीमाओं और संप्रभुता को कानूनी रूप से बदल देता है.

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 2
(B) केवल 1 और 2
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (A) केवल 2

अभ्यास प्रश्न

Q.

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