इथियोपिया-इरिट्रिया तनाव और टिग्रे संघर्ष (Ethiopia-Eritrea Tensions and the Tigray Conflict)
चर्चा में क्यों?
हाल ही में अक्टूबर 2025 में, इथियोपिया के टिग्रे क्षेत्र में टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (TPLF) और इथियोपियाई सरकारी बलों के बीच दोबारा भीषण सैन्य संघर्ष भड़क गया है । नवंबर 2022 में हस्ताक्षरित ऐतिहासिक ‘प्रिटोरिया शांति समझौते’ के बाद क्षेत्र में स्थायी शांति की जो उम्मीद जगी थी, वह अब पूरी तरह धराशायी हो चुकी है। इथियोपिया के भीतर आंतरिक गृहयुद्ध की इस वापसी और पड़ोसी देश इरिट्रिया के साथ बढ़ते सीमाई व कूटनीतिक तनाव ने हॉर्न ऑफ अफ्रीका में एक नए, पूर्ण पैमाने के इथियोपिया-इरिट्रिया युद्ध की आशंका को जन्म दे दिया है। इसके अतिरिक्त, इथियोपिया द्वारा अस्मेरा में अपना दूतावास बंद करने और दोनों देशों के बीच आधिकारिक कूटनीतिक संबंधों के टूटने से वैश्विक समुदाय की चिंताएं अत्यधिक बढ़ गई हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- इरिट्रिया का उदय और स्थल-अवरुद्ध इथियोपिया (1993): इरिट्रिया लंबे समय तक इथियोपिया का ही एक प्रांत था। एक लंबे और हिंसक स्वतंत्रता संग्राम के बाद, 1993 में जनमत संग्रह के माध्यम से इरिट्रिया एक स्वतंत्र देश बना। इसके परिणामस्वरूप, इथियोपिया ने लाल सागर तक अपनी सीधी पहुंच खो दी और वह दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला ‘स्थल-अवरुद्ध’ देश बन गया।
- बाडमे सीमा विवाद और युद्ध (1998-2000): दोनों देशों के बीच संबंधों में कड़वाहट तब और बढ़ गई जब 1998 में बाडमे सीमावर्ती शहर के नियंत्रण को लेकर दोनों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में करीब 80,000 लोग मारे गए। वर्ष 2000 में अल्जीयर्स समझौते के तहत युद्ध तो समाप्त हो गया, लेकिन वास्तविक सीमांकन को लेकर गतिरोध और अविश्वास बरकरार रहा।
- TPLF का वर्चस्व: इस ऐतिहासिक संघर्ष के दौरान इथियोपिया की गठबंधन सरकार (EPRDF) पर ‘टिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट’ (TPLF) का पूर्ण नियंत्रण था। इसी कारण इरिट्रिया के राष्ट्रपति इसायस अफ़वेर्की और TPLF के नेतृत्व के बीच गहरी व्यक्तिगत और राजनीतिक दुश्मनी स्थापित हो गई ।
संघर्ष के कारण और इरिट्रिया की भूमिका
टिग्रे संकट और इथियोपिया-इरिट्रिया के बीच मौजूदा टकराव के पीछे कई गहरे संरचनात्मक कारण हैं:
- अबी अहमद की नीतियां और केंद्रीयकरण: 2018 में पीएम बनने के बाद अबी अहमद ने इथियोपिया के पारंपरिक ‘जातीय संघवाद’ को कमजोर कर राजनीतिक शक्तियों का केंद्रीयकरण करना शुरू किया। उन्होंने सत्ताधारी गठबंधन को भंग कर ‘प्रॉसपेरिटी पार्टी’ बनाई, जिससे TPLF ने खुद को राष्ट्रीय राजनीति से अलग-थलग और असुरक्षित महसूस किया।
- ‘गैर-संवैधानिक’ चुनाव विवाद (2020): कोविड-19 महामारी के कारण जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय चुनावों को स्थगित कर दिया, तो TPLF ने इसे मानने से इनकार कर दिया और सितंबर 2020 में टिग्रे में अपने स्वतंत्र क्षेत्रीय चुनाव करवा लिए। केंद्र द्वारा इसे अवैध घोषित करने और नवंबर 2020 में टिग्रेली बलों द्वारा इथियोपियाई सेना के उत्तरी कमांड बेस पर हमले के बाद पूर्ण पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू हो गया।
- इरिट्रिया की प्रतिशोधात्मक भूमिका: इस संघर्ष में इरिट्रिया ने तुरंत इथियोपियाई सरकारी सेना के साथ गठबंधन कर लिया। इरिट्रिया का प्राथमिक उद्देश्य कोई क्षेत्रीय लाभ नहीं, बल्कि अपने पुराने दुश्मन TPLF की सैन्य और राजनीतिक क्षमता को पूरी तरह से नष्ट करना था। युद्ध के दौरान इरिट्रियाई सैनिकों पर टिग्रे में बड़े पैमाने पर युद्ध अपराध, मानवाधिकार उल्लंघन और नागरिक हत्याओं के गंभीर आरोप लगे।
- लाल सागर (Red Sea) तक पहुंच का भू-राजनीतिक विवाद: इथियोपिया का मानना है कि उसके आर्थिक अस्तित्व के लिए लाल सागर तक सीधी पहुंच अनिवार्य है। जनवरी 2024 में इथियोपिया द्वारा सोमालीलैंड के साथ किए गए एक बंदरगाह समझौते ने इरिट्रिया को अत्यधिक आशंकित कर दिया। इरिट्रिया को डर है कि इथियोपिया भविष्य में सैन्य बल पर उसके असाब बंदरगाह पर कब्जा कर सकता है।
प्रमुख समझौते और टिग्रे संकट
- 2018 का इथियोपिया-इरिट्रिया शांति समझौता: प्रधानमंत्री अबी अहमद ने सत्ता में आते ही इरिट्रिया के साथ दशकों पुराने सीमा विवाद को समाप्त करने के लिए एक साहसिक शांति समझौता किया। इस कूटनीतिक सफलता के लिए उन्हें 2019 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि, इस समझौते ने परोक्ष रूप से TPLF को घेरने का काम किया, जिससे आंतरिक असंतोष बढ़ा।
- प्रिटोरिया शांति समझौता (नवंबर 2022): दो साल के विनाशकारी गृहयुद्ध (जिसमें भुखमरी और हिंसा से लाखों लोग मारे गए) के बाद, अफ्रीकी संघ की मध्यस्थता में दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया में एक स्थायी युद्धविराम समझौता हुआ।
- शर्तें और कमियां: समझौते के तहत TPLF अपने भारी हथियार डालने और केंद्र की संप्रभुता स्वीकार करने पर सहमत हुआ। बदले में केंद्र सरकार ने विदेशी ताकतों (इरिट्रिया) की वापसी का वादा किया। हालांकि, इरिट्रिया इस समझौते का हिस्सा नहीं था, इसलिए उसने टिग्रे के सीमावर्ती क्षेत्रों से अपनी सेना हटाने से इनकार कर दिया, जिससे यह समझौता समय बम (Time Bomb) साबित हुआ।
संघर्ष का नया घटनाक्रम और वर्तमान स्थिति
- TPLF में आंतरिक तख्तापलट (मार्च 2025): TPLF के भीतर शांति समझौते को लेकर गहरे मतभेद उभरे। धुर विरोधियों ने संक्रमणकालीन प्रशासन के उदारवादी प्रमुख गेटाचेव रेडा को पद से हटा दिया और देब्रेत्शियन गेब्रेमाइकल के कट्टरपंथी गुट ने संगठन की कमान संभाल ली।
- नया सैन्य गठबंधन और चौतरफा हमला (सितंबर 2025): 20 सितंबर 2025 को TPLF और कई अन्य असंतुष्ट सशस्त्र समूहों ने मिलकर अबी अहमद सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एक संयुक्त मोर्चे का गठन किया। इसके तीन दिन बाद (23 सितंबर) विद्रोहियों ने टिग्रे, अम्हारा और अफ़ार क्षेत्रों में सरकारी सेना पर व्यापक हमला बोल दिया।
- रणनीतिक शहरों पर नियंत्रण (अक्टूबर 2025): विद्रोही ताकतों ने टिग्रे की प्रांतीय राजधानी मेकेले और उसके हवाई अड्डे पर दोबारा कब्जा कर लिया है, जिससे सरकारी सेना को पीछे हटना पड़ा है।
- इरिट्रिया का सैन्य आक्रमण: 9 अक्टूबर 2025 को इथियोपिया ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को आधिकारिक तौर पर सूचित किया कि इरिट्रिया की नियमित सेना इथियोपियाई सीमा के 60 किमी भीतर तक घुस आई है। इरिट्रिया के विदेश मंत्री उस्मान सालेह ने इसे इथियोपिया द्वारा किया गया “घोषित युद्ध” बताया है।
- बहुआयामी गृहयुद्ध (Multi-front War): वर्तमान में इथियोपिया त्रिकोणीय संकट में है—केंद्र सरकार एक तरफ टिग्रेली विद्रोहियों से लड़ रही है, तो दूसरी तरफ अम्हारा क्षेत्र के ‘फानो’ (Fano) मिलिशिया भी सरकार के खिलाफ खड़े हैं, जिन्हें इरिट्रिया का परोक्ष समर्थन प्राप्त है। इसके कारण सूडान-जिबूती को जोड़ने वाला इथियोपिया का मुख्य व्यापारिक गलियारा पूरी तरह ठप हो गया है।

भू-राजनीतिक और वैश्विक प्रभाव
- वैश्विक नौवहन मार्ग को खतरा: यह संघर्ष बाब-अल-मंडेब जलडमरूमुध्य और लाल सागर के अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों के अत्यंत करीब है। इस क्षेत्र में अस्थिरता स्वेज नहर के माध्यम से होने वाले वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति को बाधित कर सकती है।
- महाशक्तियों का छद्म युद्ध (Proxy War): हॉर्न ऑफ अफ्रीका में चीन (जिबूती में सैन्य बेस), अमेरिका, यूएई और तुर्की जैसे देशों के गहरे रणनीतिक हित हैं। संघर्ष बढ़ने पर इन शक्तियों द्वारा अलग-अलग गुटों को हथियारों की आपूर्ति करने से यह एक अंतरराष्ट्रीय छद्म युद्ध में बदल सकता है।
- भारत के लिए निहितार्थ: भारत का अफ्रीका के साथ होने वाला एक बड़ा समुद्री व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। इसके अतिरिक्त, इथियोपिया में भारतीय निवेश और वहां रहने वाले प्रवासियों की सुरक्षा दांव पर लगी है।
आगे की राह
- द्विपक्षीय और बहुपक्षीय कूटनीति: अफ्रीकी संघ (African Union) और संयुक्त राष्ट्र को तुरंत हस्तक्षेप कर इथियोपिया और इरिट्रिया के बीच सीधी वार्ता बहाल करानी होगी। इरिट्रिया की सेना की इथियोपियाई क्षेत्र से पूर्ण वापसी पहली अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।
- समावेशी राष्ट्रीय संवाद: पीएम अबी अहमद को केवल सैन्य बल पर निर्भर रहने के बजाय इथियोपिया के सभी जातीय समूहों (टिग्रे, अम्हारा, ओरोमो) को शामिल कर एक ‘व्यापक राजनीतिक समझौता’ करना होगा, जिससे जातीय संघवाद की चिंताओं को दूर किया जा सके।
- सशस्त्र समूहों का व्यवस्थित विमुद्रीकरण (DDR): टिग्रे संकट के स्थायी समाधान के लिए विद्रोही बलों के निरस्त्रीकरण, विमुद्रीकरण और समाज में उनके पुनर्गठन की प्रक्रिया को कड़ाई से लागू करना होगा।
- आर्थिक सह-निर्भरता का विकास: इथियोपिया की ‘स्थल-अवरुद्ध’ चुनौती को हल करने के लिए इरिट्रिया और सोमालिया के साथ ‘बंदरगाह साझाकरण समझौतों’ पर अंतरराष्ट्रीय गारंटी के तहत बातचीत होनी चाहिए, ताकि संघर्ष की जगह आर्थिक विकास ले सके।
निष्कर्ष
इथियोपिया-इरिट्रिया तनाव और टिग्रे का वर्तमान संकट यह स्पष्ट करता है कि जब तक ऐतिहासिक विवादों, जातीय आकांक्षाओं और संप्रभुता के मुद्दों का कोई न्यायसंगत और स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक सैन्य बल से थोपी गई शांति अस्थायी ही रहेगी। हॉर्न ऑफ अफ्रीका में स्थिरता केवल हथियारों की गूंज से नहीं, बल्कि कूटनीतिक परिपक्वता, समावेशी शासन और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के माध्यम से ही संभव है।