असंगठित श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा (Social Security for Unorganised Workers)
असंगठित श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा
Social Security for Unorganised Workers
समाचार का संदर्भ
सामाजिक सुरक्षा संहिता के कार्यान्वयन के एक वर्ष बाद, केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने असंगठित श्रमिकों तथा गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्डों का गठन किया है। हालांकि बोर्डों का गठन स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इस तंत्र की अत्यधिक केंद्रीकृत प्रकृति इसके इष्टतम परिणामों में बाधा बन सकती है क्योंकि इसमें राज्यों और विपक्षी दलों के प्रतिनिधित्व का अभाव है।
यूपीएससी के लिए सीख
- संविधान और संघवाद: श्रम संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्यों दोनों का सहयोगात्मक रवैया आवश्यक है।
- गिग और असंगठित अर्थव्यवस्था: देश के कुल कार्यबल का 92% से अधिक हिस्सा असंगठित और गिग/प्लेटफॉर्म सेक्टर में है, जिनके लिए प्रभावी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।
- गवर्नेंस और नीतिगत कमियां: केंद्रीकृत बोर्ड संरचना और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों तथा विपक्षी शासित राज्यों के प्रतिनिधित्व की कमी सहकारी संघवाद को प्रभावित करती है।
यूपीएससी के लिए मुख्य परीक्षा का प्रश्न
प्रश्न का उत्तर प्रारूप
- परिचय: असंगठित और गिग श्रमिकों के संदर्भ में सामाजिक सुरक्षा संहिता और हाल ही में गठित राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्डों का संक्षिप्त उल्लेख करें।
- मुख्य भाग:
- असंगठित एवं गिग श्रमिकों के समक्ष मौजूद मुख्य सामाजिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ (जैसे- स्वास्थ्य सुरक्षा, मातृत्व लाभ, वृद्धावस्था सुरक्षा का अभाव)।
- हाल ही में गठित बोर्डों की संरचना से जुड़ी कमियां (जैसे- अत्यधिक केंद्रीकरण, विपक्षीय/राज्य सरकारों और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व)।
- श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के नाते संघवाद (Federalism) का महत्व और अर्जुन सेनगुप्ता समिति तथा अन्य रिपोर्ट्स की सिफारिशें।
- निष्कर्ष: श्रमिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए केंद्र, राज्यों और ट्रेड यूनियनों के बीच समावेशी व सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाने पर बल दें।
प्रश्न का मॉडल उत्तर
परिचय
देश के कुल कार्यबल का 92 प्रतिशत से अधिक हिस्सा असंगठित और गिग एवं प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। हाल ही में श्रम मंत्रालय द्वारा ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ के तहत असंगठित तथा गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्डों का गठन किया गया है। हालांकि यह एक विलंबित लेकिन स्वागत योग्य कदम है, फिर भी इसकी केंद्रीकृत प्रकृति और विसंगतियों के कारण श्रमिकों की सुरक्षा पर चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं।
1. मौजूदा सामाजिक सुरक्षा की स्थिति और कमियां:
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार सामाजिक सुरक्षा का अर्थ स्वास्थ्य देखभाल और संकट के समय (जैसे बुढ़ापा, बीमारी, कार्यस्थल पर चोट) आय की गारंटी देना है।
- भारत में यद्यपि सरकार सामाजिक सुरक्षा कवरेज बढ़ने का दावा करती है, परंतु असंगठित और गिग श्रमिक इस सुरक्षा दायरे से कोसों दूर हैं।
2. बोर्डों की केंद्रीकृत संरचना और ढांचागत बाधाएं:
- इन बोर्डों की अध्यक्षता केंद्रीय श्रम मंत्री द्वारा की जाती है और इसमें केंद्र सरकार द्वारा नामित सदस्य होते हैं।
- इसमें विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्य सरकारों और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
3. संघीय और नीतिगत चुनौतियां:
- संविधान की समवर्ती सूची में ‘श्रम’ होने के बावजूद, अत्यधिक केंद्रीय नियंत्रण सहकारी संघवाद की भावना के विपरीत है।
- लगभग दो दशक पहले गठित ‘असंजीव सेनगुप्ता आयोग’ तथा केरल सरकार के लिए न्यायमूर्ति वी. गोपाला गौड़ा की रिपोर्ट द्वारा सुझाए गए सुधार आज भी लंबित हैं।
निष्कर्ष
असंगठित क्षेत्र के विशाल जनसमूह की सामाजिक सुरक्षा चिंताओं का समाधान करने के लिए केंद्र सरकार को सभी राज्यों, ट्रेड यूनियनों और हितधारकों को एक मंच पर लाना चाहिए। जब तक नीति निर्माण में विकेंद्रीकरण और समावेशिता को नहीं अपनाया जाएगा, तब तक ‘सब ऑप्टिमल आउटकम्स’ (असंतोषजनक परिणामों) की यह समस्या बनी रहेगी।
अभ्यास प्रश्न
- भारत के संविधान के अनुसार ‘श्रम’ समवर्ती सूची का एक विषय है।
- हाल ही में गठित ‘असंगठित श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड’ की अध्यक्षता सीधे प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
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