1. भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत निम्नलिखित में से कौन-सी संवैधानिक संस्थाएँ हैं?
- परिसीमन आयोग
- जिला योजना समिति
- महानगरीय योजना समिति
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (b) केवल 2 और 3
व्याख्या:
कथन 1 असत्य है: परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि यह संसद के अधिनियम के तहत गठित एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम पारित करने का अधिकार है, जिसके आधार पर राष्ट्रपति द्वारा इस आयोग की नियुक्ति की जाती है।
कथन 2 सत्य है: जिला योजना समिति (DPC) एक संवैधानिक संस्था है, जिसे 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान के भाग IX-A के अनुच्छेद 243 ZD के तहत अनिवार्य किया गया है। इसका कार्य जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित कर पूरे जिले के लिए एक विकास योजना का प्रारूप तैयार करना है।
कथन 3 सत्य है: महानगरीय योजना समिति (MPC) भी एक संवैधानिक संस्था है, जिसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 243 ZE के तहत किया गया है। यह समिति प्रत्येक महानगरीय क्षेत्र (10 लाख या अधिक आबादी वाले क्षेत्र) में संपूर्ण महानगरीय क्षेत्र के लिए विकास योजना का प्रारूप तैयार करने के लिए गठित की जाती है।
2. निम्नलिखित में से कौन अपने पद पर पुनर्नियुक्ति का पात्र होता है?
(a) मुख्य सूचना आयुक्त (CIC)
(b) राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष
(c) केंद्रीय वित्त आयोग के अध्यक्ष
(d) राज्य लोकायुक्त
उत्तर: (c) केंद्रीय वित्त आयोग के अध्यक्ष
व्याख्या:
कथन (a) असत्य है: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) अथवा अन्य सूचना आयुक्त अपने पद पर दोबारा या पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होते हैं।
कथन (b) असत्य है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार, राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के अध्यक्ष या सदस्य का कार्यकाल समाप्त होने के बाद वे उसी पद पर दोबारा नियुक्त (Reappointment) होने के पात्र नहीं होते हैं।
कथन (c) सत्य है: संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत गठित केंद्रीय वित्त आयोग के अध्यक्ष और उसके अन्य सदस्य राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित अवधि के लिए पद धारण करते हैं तथा वे अपने पद पर पुनर्नियुक्ति के पूर्णतः पात्र होते हैं।
कथन (d) असत्य है: विभिन्न राज्यों के लोकायुक्त अधिनियमों के विधिक प्रावधानों के अनुसार, राज्य के लोकायुक्त का कार्यकाल (सामान्यतः 5 वर्ष) समाप्त होने के पश्चात वे उस पद पर पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होते हैं।
3. लोक सभा के भंग होने की स्थिति में, संसद में लंबित निम्नलिखित विधेयकों पर विचार कीजिए:
- लोक सभा में लंबित विधेयक।
- लोक सभा द्वारा पारित लेकिन राज्य सभा में लंबित विधेयक।
- राज्य सभा द्वारा पारित लेकिन लोक सभा में लंबित विधेयक।
- राज्य सभा में लंबित लेकिन लोक सभा द्वारा पारित न किया गया विधेयक।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से विधेयक लोक सभा के भंग होने पर रद्द हो जाता है/जाते हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 2 और 4
(d) सभी 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b) केवल 1, 2 और 3
व्याख्या:
- कथन 1 सत्य है: संविधान के अनुच्छेद 107 के अनुसार, लोक सभा के विघटन पर लोक सभा के पटल पर लंबित सभी विधेयक स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।
- कथन 2 सत्य है: यदि कोई विधेयक निचला सदन (लोक सभा) पारित कर चुका हो लेकिन वह उच्च सदन (राज्य सभा) में लंबित हो, तो वह भी रद्द हो जाता है।
- कथन 3 सत्य है: यदि कोई विधेयक उच्च सदन (राज्य सभा) द्वारा पारित कर दिया गया हो परंतु निचले सदन में समीक्षा के लिए लंबित हो, तो वह भी स्वतः व्यपगत हो जाता है।
- कथन 4 असत्य है: जो विधेयक केवल राज्य सभा में ही प्रस्तुत होकर वहीं लंबित हो तथा लोक सभा द्वारा अभी तक पारित न किया गया हो, वह रद्द नहीं होता क्योंकि राज्य सभा एक स्थायी सदन है।
4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अनुच्छेद 200 के तहत, राज्यपाल राज्य विधायिका द्वारा पारित कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकते हैं।
- अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन के दौरान किसी राज्य के लिए संसद द्वारा बनाए गए कानून राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के तुरंत बाद स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) केवल 1
व्याख्या:
कथन 1 सत्य है: संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को राज्य विधायिका द्वारा पारित कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करने का अधिकार देता है। कुछ मामलों में, जैसे कि राज्य उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति को खतरे में डालने वाले विधेयकों के संदर्भ में, ऐसा आरक्षण अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त, ‘तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल‘ मामले (जिससे जुड़े विधिक घटनाक्रमों पर सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 के अंत और 2025 में ऐतिहासिक रुख स्पष्ट किया) में यह माना गया कि राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत ‘पॉकेट वीटो’ का प्रयोग कर विधेयकों को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकते। यदि विधानसभा द्वारा विधेयक को पुनः पारित कर दिया जाता है, तो राज्यपाल को अनिवार्य रूप से स्वीकृति देनी होगी, उसे दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजना असंवैधानिक है।
कथन 2 असत्य है: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान बनाए गए कानूनों के विपरीत, राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के दौरान किसी राज्य के लिए संसद द्वारा बनाए गए कानून राष्ट्रपति शासन समाप्त होने पर स्वतः ही निष्प्रभावी नहीं होते हैं। वे तब तक प्रभावी रूप से लागू रहते हैं जब तक कि राज्य विधायिका द्वारा विशेष रूप से उन्हें निरस्त, परिवर्तित या पुनः अधिनियमित न कर दिया जाए।
5.भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत विधायी विषयों के वर्गीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| सूची | अंतर्निहित विषय | |
| 1) | राज्य सूची | निगम कर |
| 2) | संघ सूची | उद्योग |
| 3) | समवर्ती सूची | विद्युत |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
युग्म (1) सुमेलित नहीं है। निगम कर कंपनियों के लाभ पर लगाया जाने वाला एक प्रमुख केंद्रीय कर है। भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत यह विषय संघ सूची (List I – प्रविष्टि 85) के अंतर्गत आता है।
युग्म (2) सुमेलित नहीं है। सामान्य तौर पर, उद्योग से जुड़े विषय राज्य सूची (List II – प्रविष्टि 24) के विन्यास के अंतर्गत विनियमित किए जाते हैं। यद्यपि कुछ विशिष्ट और सामरिक महत्व के उद्योग (जिनका नियंत्रण संसद जनहित में आवश्यक घोषित करे) संघ सूची (प्रविष्टि 52) के तहत आते हैं, परंतु सामान्य रूप से ‘उद्योग’ मूलतः राज्य सूची का ही विषय है।
युग्म (3) सही सुमेलित है। विद्युत एक ऐसा विधायात्मक विषय है, जिस पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें दोनों ही अपनी सीमाओं में कानून बना सकती हैं। यह विषय सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (List III – प्रविष्टि 38) के अंतर्गत समाहित किया गया है।
6. भारतीय संसद में प्रस्तुत होने वाले विभिन्न विधेयकों और उनके संवैधानिक अनुच्छेदों के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| क्रम | विधेयक का प्रकार | संबंधित अनुच्छेद |
| 1. | धन विधेयक | अनुच्छेद 110 |
| 2. | संविधान संशोधन विधेयक | अनुच्छेद 368 |
| 3. | साधारण विधेयक | अनुच्छेद 107 |
उपर्युक्त युग्मों में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
(a) केवल एक युग्म
(b) केवल दो युग्म
(c) सभी तीनों युग्म
(d) कोई भी युग्म नहीं
उत्तर: (c) सभी तीनों युग्म
व्याख्या:
- युग्म 1 सही सुमेलित है: संविधान के अनुच्छेद 110 में धन विधेयक को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसके अंतर्गत सरकार के कर (Tax) लगाने और संचित निधि से धन निकालने जैसे वित्तीय मामले आते हैं।
- युग्म 2 सही सुमेलित है: संविधान के भाग-20 के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के प्रावधानों में संशोधन करने की विशिष्ट विधिक शक्ति और प्रक्रिया प्रदान की गई है।
- युग्म 3 सही सुमेलित है: संविधान का अनुच्छेद 107 साधारण विधेयकों को संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत करने और उन्हें पारित करने की सामान्य विधायी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
7.भारत में लोक सेवा आयोगों के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 के प्रावधानों के आधार पर 1926 में केंद्रीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई थी।
- भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने संघीय लोक सेवा आयोग के साथ-साथ प्रांतीय लोक सेवा आयोग तथा दो या अधिक प्रांतों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग की व्यवस्था की थी।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही नहीं है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
सही उत्तर: (d)
व्याख्या:
कथन 1 सही है: ब्रिटिश काल के दौरान भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) में पहली बार देश में एक लोक सेवा आयोग की स्थापना का वैधानिक प्रावधान किया गया था। इसके बाद प्रशासनिक सुधारों के लिए गठित ली आयोग (Lee Commission, 1924) की मजबूत सिफारिशों का पालन करते हुए 1 अक्टूबर 1926 को भारत में पहली बार ‘केंद्रीय लोक सेवा आयोग’ का गठन किया गया। इसके प्रथम अध्यक्ष सर रॉस बार्कर बनाए गए थे।
कथन 2 सही है: इसके बाद आए भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने देश की प्रशासनिक संरचना का व्यापक विस्तार किया। इस अधिनियम के द्वारा न केवल केंद्र स्तर पर ‘संघीय लोक सेवा आयोग’ (Federal Public Service Commission) की स्थापना की गई, बल्कि प्रांतीय स्तर पर प्रांतीय लोक सेवा आयोग (Provincial PSC) तथा दो या अधिक प्रांतों की आपसी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग (Joint PSC) का स्पष्ट वैधानिक प्रावधान भी किया गया था। यही संघीय लोक सेवा आयोग स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने पर वर्तमान ‘संघ लोक सेवा आयोग’ (UPSC) के रूप में परिवर्तित हुआ।
चूँकि प्रश्न में पूछा गया है कि कौन-सा कथन “सही नहीं है”, और दोनों ही कथन ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल सही हैं, इसलिए उत्तर (d) होगा।
8. संविधान संशोधन की सीमाओं और न्यायपालिका द्वारा की जाने वाली न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संसद अनुच्छेद 368 के तहत अपनी संशोधन शक्ति का उपयोग करके संविधान के ‘मूल ढांचे’ को तब तक बदल सकती है जब तक उसे आधे राज्यों का अनुसमर्थन प्राप्त हो।
- सर्वोच्च न्यायालय ने ‘केशवानंद भारती वाद (1973)’ में यह स्पष्ट विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति स्वयं संविधान का एक हिस्सा है जिसे छीना नहीं जा सकता।
सही उत्तर का चयन कीजिए:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
कथन 1 गलत है: ‘केशवानंद भारती वाद (1973)’ के ऐतिहासिक निर्णय के बाद से संसद की संविधान संशोधन की शक्ति असीमित नहीं है। न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि संसद अनुच्छेद 368 का उपयोग करके संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन वह इसके ‘मूल ढांचे’ को नष्ट, परिवर्तित या समाप्त नहीं कर सकती। इसके लिए राज्यों का अनुसमर्थन प्राप्त होने पर भी मूल ढांचे से छेड़छाड़ करने वाले किसी भी संशोधन को वैध नहीं माना जा सकता।
कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे- केशवानंद भारती वाद और बाद में मिनर्वा मिल्स वाद) में यह विधिक सिद्धांत स्थापित किया कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता स्वयं संविधान के मूल ढांचे का एक अनिवार्य अंग है। संसद कानून बनाकर या संविधान संशोधन करके न्यायालय की इस समीक्षा करने की शक्ति को कभी भी सीमित या समाप्त नहीं कर सकती है। यदि कोई संशोधन इस अधिकार को कम करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
9. भारत के संविधान में संशोधन करने की विहित प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।
- संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक है।
- संसद द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति इस विधेयक पर अपनी स्वीकृति देने के लिए बाध्य है।
- इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है तथा इसमें संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) सभी 1, 2 और 3
उत्तर: (b) केवल 2 और 3
व्याख्या
कथन 1 गलत है: संविधान संशोधन विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की किसी भी पूर्व अनुमति या सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती है। इसे कोई भी मंत्री या निजी सांसद सीधे प्रस्तुत कर सकता है।
कथन 2 सही है: 24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा यह अनिवार्य (Obligatory) कर दिया गया है कि जब यह विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, तो राष्ट्रपति इस पर अपनी विधिक स्वीकृति देने के लिए पूरी तरह बाध्य हैं। वे इसे न तो रोक सकते हैं और न ही पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं।
कथन 3 सही है: इस विधेयक को लोक सभा और राज्य सभा दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग अपने विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत) से पारित करना अनिवार्य है। यदि दोनों सदनों में कोई गतिरोध होता है, तो संविधान के तहत संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
10. संविधान संशोधन का प्रस्ताव रखने वाले एक ‘निजी सदस्य विधेयक’ को पारित करने के लिए निम्नलिखित में से किसकी आवश्यकता होती है?
(a) साधारण बहुमत
(b) विशेष बहुमत
(c) विशेष बहुमत और राज्यों का अनुसमर्थन
(d) राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति
उत्तर: (b)
व्याख्या
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार, चाहे विधेयक किसी मंत्री (सरकारी सदस्य) द्वारा लाया जाए या किसी निजी सदस्य (Private Member) द्वारा, संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। विशेष बहुमत का अर्थ है सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत। (नोट: यदि संशोधन संविधान के संघीय ढांचे से जुड़ा हो, तब विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है, परंतु सामान्य तौर पर प्रत्येक संविधान संशोधन विधेयक के लिए मूल शर्त विशेष बहुमत ही होती है। इसके अतिरिक्त, इस विधेयक को पेश करने के लिए राष्ट्रपति की किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है)।
