असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी राज्य की चुनौतियाँ (Social Security for Workers in the Unorganized Sector & the Challenges of a Welfare State)

| UPSC पाठ्यक्रम से संबंध GS Paper-II: केंद्र-राज्य संबंध, सहकारी संघवाद, सरकारी नीतियाँ एवं कल्याणकारी योजनाएँ तथा संवैधानिक निकायों एवं संस्थागत तंत्र की भूमिका।GS Paper-III: समावेशी विकास, रोजगार, आर्थिक विकास एवं श्रम सुधार तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था और गिग अर्थव्यवस्था। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत ‘असंगठित श्रमिकों‘ तथा ‘गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों‘ के लिए बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्डों (National Social Security Boards) का गठन किया है। हालांकि इस कदम की सराहना की जा रही है, परंतु बोर्डों की अत्यधिक केंद्रीकृत संरचना (जिसमें विपक्ष शासित राज्यों और प्रमुख ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधित्व की कमी है) इसके परिणामों को ‘उप-इष्टतम‘ बना रही है। इसके अतिरिक्त, मार्च 2026 में केरल सरकार के लिए जस्टिस वी. गोपाला गौड़ा द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट ने भी इस तंत्र के संघवाद-विरोधी और श्रमिक-विरोधी लक्षणों पर चिंता जताकर इस बहस को पुनः गरमा दिया है।

भारत में असंगठित क्षेत्र और श्रमिकों की स्थिति
- कार्यबल की हिस्सेदारी: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार भारत के कुल कार्यबल का 92% से अधिक हिस्सा असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जो लगभग 45 करोड़ से अधिक श्रमिकों की आबादी है।
- क्षेत्रवार निर्भरता: ई-श्रम पोर्टल पर अब तक 31.48 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिक पंजीकृत हो चुके हैं। इसमें से 53.77% महिलाएं हैं, जो महिला कार्यबल के सशक्तिकरण और समावेशिता को दर्शाता है। इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी कृषि क्षेत्र (लगभग 16.4 करोड़) की है।
- आय की विषमता: ई-श्रम पोर्टल के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि पंजीकृत श्रमिकों में से 94% से अधिक की मासिक आय 10,000 रुपये या उससे कम है।
- सामाजिक संरचना: नामांकित कार्यबल का 74% से अधिक हिस्सा अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित है, जो यह दर्शाता है कि सामाजिक और आर्थिक वंचना एक दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
- वैश्विक स्थिति: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सामाजिक सुरक्षा कवरेज वर्ष 2021 के 24.4% से बढ़कर 2024 में 48.8% हो गई है, लेकिन सार्वभौमिक कवरेज (Universal Coverage) का लक्ष्य अभी भी दूर है।
सामाजिक सुरक्षा का अर्थ एवं महत्त्व
- अर्थ (ILO के अनुसार): अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक, सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है “वह संरक्षण जो समाज अपने सदस्यों को स्वास्थ्य देखभाल और आय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रदान करता है।” यह विशेष रूप से बुढ़ापे, बीमारी, बेरोजगारी, विकलांगता, मातृत्व या परिवार के मुख्य कमाने वाले की मृत्यु की स्थिति में सुरक्षा कवच का काम करता है।
- महत्त्व:
- गरीबी के दुष्चक्र से मुक्ति: यह किसी अप्रत्याशित संकट (जैसे बीमारी या दुर्घटना) के समय श्रमिक परिवारों को अत्यंत गरीबी में डूबने से बचाता है।
- मानव पूंजी का विकास: बेहतर स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा के माध्यम से यह देश की उत्पादकता और मानव संसाधन को मजबूत करता है।
- आर्थिक स्थिरता: यह समाज के निचले तबके की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को बनाए रखता है, जिससे घरेलू मांग और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
सामाजिक सुरक्षा कवरेज के आँकड़े और वर्तमान स्थिति
- आधिकारिक दावा: सरकार के हालिया दावों के अनुसार, देश में सामाजिक सुरक्षा कवरेज 2015 के 19% से बढ़कर 2026 तक लगभग 64.3% (लगभग 94 करोड़ नागरिक) हो गया है। इसमें खाद्यान्न सुरक्षा (PM-GKAY) और बुनियादी बैंकिंग जैसी वित्तीय समावेशन की नीतियां शामिल हैं।
- वास्तविक स्थिति (संरचनात्मक अंतर): इस व्यापक दावे के बावजूद, वास्तविक धरातल पर संकट गंभीर है। अनौपचारिक और गिग क्षेत्र के 92% से अधिक श्रमिक जीवन बीमा, पेंशन, सवैतनिक अवकाश (Paid Leave) और व्यापक स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे ILO द्वारा परिभाषित बुनियादी सामाजिक सुरक्षा के मानकों से अब भी वंचित हैं।
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा
- राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP):
- अनुच्छेद 41: काम पाने का, शिक्षा पाने का और बुढ़ापे, बीमारी तथा अशक्तता की दशाओं में लोक सहायता पाने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 42: कार्य की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा मातृत्व सहायता का उपबंध करता है।
- अनुच्छेद 43: श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी और एक सभ्य जीवन स्तर सुनिश्चित करने की बात करता है।
- विधिक सुरक्षा: असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 के बाद अब सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के माध्यम से असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए एक ‘सामाजिक सुरक्षा कोष’ (Social Security Fund) का प्रावधान किया गया है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और राष्ट्रीय बोर्डों का गठन
श्रम सुधारों के तहत 44 जटिल केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर 4 संहिताओं में बदला गया, जिसमें ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ सबसे महत्वपूर्ण है। हाल ही में इसके तहत दो राष्ट्रीय बोर्डों का गठन किया गया है:
- असंगठित श्रमिक राष्ट्रीय बोर्ड: इसमें कुल 40 सदस्य शामिल हैं (जिसमें 7 श्रमिक प्रतिनिधि और 7 नियोक्ता प्रतिनिधि शामिल हैं)।
- गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिक राष्ट्रीय बोर्ड: इसमें 22 सदस्य शामिल हैं (जिसमें 5 एग्रीगेटर/कंपनियां और 5 श्रमिक प्रतिनिधि शामिल हैं)।
- केंद्रीकरण का विवाद: इन दोनों बोर्डों की कमान और अध्यक्षता पूरी तरह से केंद्र सरकार (केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री) के हाथ में सौंप दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बोर्डों के पास स्वतंत्र वित्तीय अधिकार नहीं हैं, जिससे ये केवल सलाहकार निकाय बनकर रह गए हैं।
सरकार द्वारा की गई प्रमुख पहलें
- ई-श्रम पोर्टल: यह असंगठित श्रमिकों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस है, जो एक Universal Account Number (UAN) प्रदान करता है और इसे 15 से अधिक केंद्रीय योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत, पीएम-किसान) के साथ एकीकृत किया गया है।
- अटल पेंशन योजना (APY): वर्तमान में 7.25 करोड़ से अधिक ग्राहकों के साथ असंगठित क्षेत्रके लिए वृद्धावस्था सुरक्षा का बड़ा माध्यम है।
- प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (PM-SYM): 15,000 रुपये से कम कमाने वाले 60 वर्ष से अधिक आयु के श्रमिकों के लिए 3,000 रुपये की न्यूनतम सुनिश्चित मासिक पेंशन।
- श्रम संहिताओं (Labour Codes) का एकीकरण: 44 जटिल श्रम कानूनों को सरल बनाकर 4 संहिताओं में बदला गया, जिसमें ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ प्रमुख है।
- स्वास्थ्य सुरक्षा: आयुष्मान भारत (PM-JAY) के तहत लगभग 40 करोड़ कार्ड जारी कर प्रति परिवार 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर।
- खाद्य सुरक्षा: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के जरिए लगभग 80.67 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न।
अर्जुन सेनगुप्ता आयोग की सिफारिशें
असंगठित क्षेत्र के उद्यमों पर गठित राष्ट्रीय आयोग (National Commission for Enterprises in the Unorganised Sector—NCEUS) का गठन वर्ष 2004 में किया गया था। इसकी अध्यक्षता अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता ने की थी।
- कानूनी अधिकार के रूप में सुरक्षा: आयोग ने सिफारिश की थी कि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा को एक ‘संवैधानिक और कानूनी अधिकार’ बनाया जाना चाहिए, न कि केवल सरकारी दान या तदर्थ योजना.
- राष्ट्रीय न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा पैकेज: NCEUS ने एक ऐसे पैकेज का सुझाव दिया था जिसमें स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ, जीवन और दुर्घटना बीमा, तथा वृद्धों के लिए भविष्य निधि/पेंशन अनिवार्य रूप से शामिल हो.
- समर्पित सामाजिक सुरक्षा कोष: केंद्र और राज्यों के निश्चित बजटीय योगदान, नियोक्ताओं के अंशदान और करों (Cess) के माध्यम से एक स्वतंत्र और समर्पित राष्ट्रीय कोष बनाने की वकालत की गई थी.
असंगठित क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
- अत्यधिक केंद्रीकरण और संघवाद विरोधी ढांचा: श्रम संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। इसके बावजूद, नए बोर्डों की कमान पूरी तरह से केंद्र सरकार (श्रम मंत्री की अध्यक्षता) के हाथ में है। विपक्षी राज्यों और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की आवाज को इसमें पर्याप्त जगह नहीं दी गई है, जैसा कि जस्टिस गोपाला गौड़ा की रिपोर्ट में भी उजागर किया गया है।
- अपूर्ण कवरेज और बहिष्करण त्रुटियाँ: ई-श्रम पर करोड़ों पंजीकरण के बावजूद, दूरदराज के क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण वास्तविक प्रवासी मजदूर और निर्माण श्रमिक अभी भी लाभ से वंचित हैं।
- फंडिंग और बजटीय आवंटन की कमी: भारत सामाजिक सुरक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2% से भी कम खर्च करता है, जो कई विकासशील देशों और अधिकांश विकसित देशों (जहां यह 10-15% है) की तुलना में बेहद कम है।
- गिग अर्थव्यवस्था में विनियमन का अभाव: ओला, उबर, जोमैटो और स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स में लगे गिग वर्कर्स को औपचारिक रूप से ‘कर्मचारी’ का दर्जा नहीं मिला है, जिससे कंपनियाँ भविष्य निधि (EPF) या ग्रेच्युटी के योगदान से बच जाती हैं।
- ऐतिहासिक सिफारिशों की अनदेखी: लगभग दो दशक पहले अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता वाले आयोग (NCEUS) ने अनौपचारिक क्षेत्र के लिए जो सुरक्षात्मक और कल्याणकारी ढांचा सुझाया था, उसे आज भी पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका है।
- राजकोषीय सीमाएं : भारत का सीमित टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात 45 करोड़ की विशाल आबादी को बिना सह-अंशदान (Co-contribution) के पूर्ण सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में आड़े आता है।
आगे की राह
- सहयोगात्मक संघवाद का सुदृढ़ीकरण: केंद्र सरकार को नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सभी राज्य सरकारों और श्रमिक संगठनों को नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं में समान भागीदार बनाना चाहिए।
- यूनिवर्सल बेसिक सोशल सिक्योरिटी: भोजन और बैंकिंग से आगे बढ़कर, ई-श्रम के यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) के माध्यम से देशव्यापी पोर्टेबल पेंशन और स्वास्थ्य सुरक्षा पैकेज को ‘अधिकार-आधारित’ बनाया जाए।
- एग्रीगेटर उपकर (Cess Model): राजस्थान के गिग वर्कर्स कानून की तर्ज पर, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर होने वाले प्रत्येक लेनदेन पर एक छोटा सामाजिक सुरक्षा उपकर लगाकर एक समर्पित फंड स्थापित किया जाना चाहिए।
- रीयल-टाइम डेटा रिफ्रेशमेंट: ई-श्रम पोर्टल पर दर्ज श्रमिकों के डेटा को समय-समय पर अपडेट करने के लिए एक स्वचालित तंत्र विकसित किया जाए ताकि प्रवासियों को ट्रैक किया जा सके।
- ESIC और EPFO का सुदृढ़ीकरण: कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) का निजीकरण करने के बजाय इसे पेशेवर बनाना चाहिए और छोटे उद्यमों (20 से कम श्रमिकों वाले) के लिए भी इसे स्वैच्छिक या आंशिक-सब्सिडी मॉडल पर लागू किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
असंगठित क्षेत्र के श्रमिक देश के आर्थिक विकास के मूक सारथी हैं। एक कल्याणकारी राज्य के रूप में भारत का मूल्यांकन इस बात से नहीं हो सकता कि उसकी नीतियां कागजों पर कितनी प्रभावी हैं, बल्कि इस बात से होगा कि कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति को संकट के समय राज्य का कितना सहारा मिलता है। सामाजिक सुरक्षा बोर्डों का गठन एक संरचनात्मक शुरुआत है, लेकिन इसे ‘उप-इष्टतम‘ होने से बचाने के लिए विकेंद्रीकरण, राज्यों के साथ समन्वय और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना अनिवार्य है, तभी ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा चरितार्थ हो सकेगा।