चक्रवात अर्नाब के बाद सक्रिय शासन Proactive Governance After Cyclone Arnab
By Result Mitra•
RESULT MITRA
29/10/2026
चक्रवात अर्नाब के बाद सक्रिय शासन
Proactive Governance After Cyclone Arnab
Source: The Hindu
संदर्भ
उत्तर हिंद महासागर के इस सीज़न के पहले चक्रवात ‘अर्नाब’ ने 28 अक्टूबर को एक ‘बेहद गंभीर चक्रवाती तूफान’ के रूप में आंध्र प्रदेश के तट पर दस्तक दी। इसके तेजी से आगे बढ़ने और पूर्वानुमान मॉडलों के अनुमान से पहले तट पर पहुँचने के कारण जिला प्रशासन के पास निकासी के लिए बहुत कम समय बचा था। हालांकि आपदा प्रबंधन की तत्परता से जनहानि कम रही, लेकिन परिवहन, बिजली और कृषि क्षेत्र (विशेषकर धान की फसलों) पर पड़े व्यापक प्रभावों ने प्रशासन के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
यूपीएससी के लिए सीख
आपदा प्रबंधन और तत्परता: केवल राहत और बचाव कार्यों से आगे बढ़कर “शून्य-व्यवधान” (zero-disruption) दृष्टिकोण और सक्रिय शासन (proactive governance) की ओर बढ़ना।
पूर्वानुमान प्रणाली की सीमाएं: तीव्र गति से बदलने वाले चक्रवातों के ट्रैक और तीव्रता का सटीक आकलन करने के लिए मौसम संबंधी मॉडलों और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (EWS) को उन्नत करना।
कृषि और आजीविका की सुरक्षा: बार-बार आने वाली बाढ़ और अत्यधिक बारिश से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की फसलों को बचाने के लिए लचीली रणनीतियाँ बनाना।
बुनियादी ढांचे का लचीलापन: तटीय क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना ताकि कमजोर वर्ग के लोग आपदा के बाद गरीबी के दुचक्र में न फँसें।
मुख्य प्रश्न
Q. उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के तेजी से तीव्र होने और उनके अनिश्चित व्यवहार से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। हाल ही में आए चक्रवात अर्नाब के संदर्भ में, आपदा प्रबंधन में केवल जनहानि को न्यूनतम करने से आगे बढ़कर एक व्यापक ‘शून्य-व्यवधान’ (zero-disruption) दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिए।
प्रश्न का उत्तर प्रारूप
प्रस्तावना
हिंद महासागर में चक्रवातों के बदलते स्वरूप (रैपिड इंटेंसिफिकेशन) का उल्लेख करते हुए चक्रवात अर्नाब का परिचय दें।
मुख्य भाग:
चक्रवात के पूर्वानुमान में आने वाली बाधाएँ और कम निकासी समय की समस्या।
बिजली, परिवहन और कृषि (धान की फसलों) पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव।
‘शून्य-व्यवधान’ (Zero-disruption) दृष्टिकोण की आवश्यकता और इसके मुख्य आयाम।
निष्कर्ष
जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे और उन्नत तकनीक के समन्वय के साथ आपदा प्रबंधन की भावी रणनीति प्रस्तुत करें।
प्रस्तावना
जलवायु परिवर्तन के कारण हिंद महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि होने से उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में तेजी से तीव्रता (Rapid Intensification) और उनके व्यवहार में अनिश्चितता देखी जा रही है। हाल ही में आया चक्रवात अर्नाब इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसने पूर्वानुमान और आपदा तैयारियों के समक्ष एक अभूतपूर्व चुनौती खड़ी की।
1. पूर्वानुमान में बाधाएँ और प्रशासनिक चुनौतियाँ
त्वरित तीव्रता और कम निकासी समय:
चक्रवात अर्नाब के मार्ग में अनिश्चितता और अचानक बढ़ी गति के कारण मौसम विज्ञानियों और जिला प्रशासन को तटीय आबादी को सुरक्षित निकालने (evacuation) का बहुत कम समय मिला।
पूर्वानुमान मॉडलों की सीमाएँ:
पारंपरिक मौसम संबंधी मॉडल जलवायु परिवर्तन से प्रेरित चक्रवातों की गतिशीलता का सटीक आकलन करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं।
2. सामाजिक-आर्थिक और कृषिगत प्रभाव
कृषि क्षति:
आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे तटीय राज्यों में चक्रवात के कारण भारी जलभराव हुआ, जिससे 80,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में धान की फसलें जलमग्न और नष्ट हो गईं।
अवसंरचनात्मक अस्त-व्यस्तता:
हवा की तेज गति (125-135 किमी/घंटा) और विशाखापत्तनम में 24 घंटों के दौरान हुई 220 मिमी भारी वर्षा से बिजली नेटवर्क ध्वस्त हो गए और परिवहन सेवाएं बाधित हुईं।
3. ‘शून्य-व्यवधान’ (Zero-Disruption) दृष्टिकोण का मूल्यांकन
पारंपरिक आपदा प्रबंधन ‘शून्य जनहानि’ (Zero Human Casualty) पर ध्यान केंद्रित करता है, लेकिन ‘शून्य-व्यवधान’ नीति का उद्देश्य आपदा के बाद सामाजिक और आर्थिक जीवन को सामान्य बनाए रखना है:
क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा:
तटीय क्षेत्रों में बिजली की लाइनों को भूमिगत (underground cabling) करना और चक्रवात-रोधी संचार टावरों की स्थापना करना।
आपदा-रोधी आवास और बुनियादी ढाँचा:
तटीय बस्तियों में सी-वॉल (Sea Walls) का निर्माण और चक्रवात आश्रय स्थलों को टिकाऊ तकनीकों से लैस करना।
आर्थिक सुरक्षा कवच:
छोटे और सीमांत किसानों के लिए त्वरित फसल बीमा दावों का भुगतान और कृषि-ऋण पुनर्गठन ताकि चक्रवात के बाद गरीबी का चक्र न बने।
4. पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण आयाम
मैंग्रोव और प्राकृतिक अवरोध:
चक्रवात की तीव्रता और तटीय अपरदन (coastal erosion) को कम करने के लिए मैंग्रोव वनों और तटीय आर्द्रभूमियों (wetlands) का बायो-शील्ड के रूप में पुनरुद्धार।
मृदा लवणता का प्रबंधन:
चक्रवाती तूफानों से कृषि भूमि में समुद्री पानी घुसने के बाद मृदा सुधार हेतु त्वरित उपाय और लवण-सहनशील (salinity-resistant) फसल किस्मों को बढ़ावा देना।
5. तकनीकी नवाचार और संस्थागत ढाँचा
AI और बिग डेटा का उपयोग:
भविष्यवाणियों की सटीकता बढ़ाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग और सुपरकंप्यूटिंग पर आधारित उन्नत मौसम मॉडलों का एकीकरण।
सामुदायिक-आधारित आपदा प्रतिक्रिया (CBDR):
स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से मछुआरों और तटीय निवासियों को पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems) और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों से जोड़ना।
निष्कर्ष
चक्रवातों के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए भारत को ‘प्रतिक्रियात्मक’ (Reactive) के बजाय ‘सक्रिय और अग्रदयी’ (Proactive) दृष्टिकोण अपनाना होगा। अत्याधुनिक AI-आधारित मौसम मॉडलों, मजबूत बुनियादी ढांचे और ‘शून्य-व्यवधान’ रणनीति के समन्वय से ही जलवायु परिवर्तन के दौर में तटीय अर्थव्यवस्थाओं और जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
अभ्यास प्रश्न
Q. चक्रवातों और तटीय आपदा प्रबंधन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चक्रवातों का तेजी से तीव्र होना मुख्य रूप से समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय नमी पर निर्भर करता है।
2. “शून्य-व्यवधान” दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य केवल आपदा के समय राहत शिविरों की संख्या बढ़ाना है।