वैश्विक कार्बन गठबंधन और भारत (Global Carbon Alliance and India)
| UPSC Syllabus Linkage GS-II: अंतरराष्ट्रीय संबंध, वैश्विक संस्थाएँ और जलवायु कूटनीति।GS-III: पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास। |
चर्चा में क्यों?
हाल ही में भारत में पर्यावरण और औद्योगिक नीति के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक मील का पत्थर देखा गया है। देश के सात प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों की लगभग 500 भारतीय कंपनियों ने राष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के तहत अपनी पहली आधिकारिक अनुपालन रिपोर्ट दर्ज की है। वर्ष 2023 से नीतिगत स्तर पर तैयार की जा रही यह योजना अब वास्तविक उत्सर्जन लक्ष्यों, कड़े जुर्मानों और वास्तविक विधिक संस्थाओं के साथ धरातल पर आ चुकी है। अनुमान है कि इसके पहले कार्बन क्रेडिट की ट्रेडिंग नवंबर 2026 और जनवरी 2027 के बीच पावर एक्सचेंजों पर शुरू हो जाएगी। इसी समय, वैश्विक स्तर पर ‘ओपन कोएलिशन ऑन कम्प्लायंस कार्बन मार्केट्स‘ (OCCCM) नामक एक नए वैश्विक कार्बन गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हो गई है, जिससे भारत की भागीदारी को लेकर नीतिगत गलियारों में बहस छिड़ गई है।

वैश्विक कार्बन गठबंधन (OCCCM) क्या है?
- उत्पत्ति और संस्थापक: इस गठबंधन की शुरुआत मई 2024 में यूरोपीय संघ (EU), चीन और ब्राजील द्वारा फ्लोरेंस (इटली) में की गई थी।
- सदस्य देश: वर्तमान में इसमें जर्मनी, न्यूजीलैंड, कनाडा, फ्रांस, नॉर्वे, सिंगापुर, तुर्की और यूनाइटेड किंगडम (UK) जैसे बड़े देश शामिल हो चुके हैं।
- मुख्य उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य दुनिया भर के विभिन्न ‘अनुपालन कार्बन बाजारों’ (Compliance Carbon Markets) के बीच समन्वय स्थापित करना है। यह मंच इस बात पर काम करता है कि विभिन्न देशों के कार्बन बाजार आपस में कैसे संवाद करें।
- कार्यप्रणाली: यह मुख्य रूप से ‘निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन’ (MRV) प्रणालियों, कार्बन लेखांकन (Carbon Accounting) पद्धतियों और उच्च-सत्यता वाले ऑफसेट के उपयोग से जुड़े नियमों को आपस में सुसंगत करने का एक सहयोगात्मक मंच है।
- प्रशासनिक ढांचा: इसकी संरचना में एक उच्च स्तरीय निर्णय लेने वाली संस्था, कार्यकारी बैठकें, विशिष्ट विषयगत कार्य समूह और एक समर्पित सचिवालय शामिल है।
कार्बन मूल्य निर्धारण का महत्त्व
कार्बन मूल्य निर्धारण (Carbon Pricing) वैश्विक जलवायु परिवर्तन शमन (Mitigation) का एक बेहद प्रभावी आर्थिक उपकरण है:
- लागत प्रभावी शमन: यह पूरी अर्थव्यवस्था में उत्सर्जन को कम करने की लागत को न्यूनतम करता है। यह प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर वित्तीय बोझ डालकर कंपनियों को स्वच्छ तकनीकों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
- नवाचार को बढ़ावा: कार्बन की कीमत तय होने से उद्योग जगत ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर (CCUS) और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान और नवाचार करने के लिए विवश होता है।
- कमजोर वर्गों की सुरक्षा: कार्बन टैक्स या ट्रेडिंग से प्राप्त होने वाले राजस्व का उपयोग सरकारें उन गरीब या कमजोर समुदायों की मदद के लिए कर सकती हैं जो जलवायु परिवर्तन (जैसे लू, बेमौसम बारिश, बाढ़) से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
- राजस्व का जरिया: ऐसे समय में जब सरकारी संसाधन और बजटीय व्यवस्थाएं तंग हैं, कार्बन मूल्य निर्धारण सरकारों को वित्तीय संसाधन जुटाने का एक बड़ा माध्यम प्रदान करता है।
भारत का बदलता कार्बन परिदृश्य
भारत का कार्बन कूटनीति और घरेलू बाजार में रुख तेजी से बदला है:
- ‘आपूर्तिकर्ता‘ से ‘बाजार निर्माता‘: पहले भारत केवल स्वैच्छिक कार्बन बाजार (Voluntary Carbon Market) में एक सप्लायर था, जहां हमारी परियोजनाएं विकसित देशों को क्रेडिट बेचती थीं। अब भारत ने अपना स्वयं का अनिवार्य अनुपालन बाजार (CCTS) खड़ा कर लिया है।
- वैश्विक अनिवार्यता: दुनिया भर के 50 से अधिक देश पहले ही कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र लागू कर चुके हैं। भारत अब इस वास्तविकता से पीछे नहीं हट सकता कि कार्बन की कीमत तय करना देश के औद्योगिक भविष्य के लिए अनिवार्य हो चुका है।
- वैश्विक लक्ष्य: भारत अपने ‘पंचामृत’ लक्ष्यों के तहत 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 45% कम करने और 2070 तक नेट-जीरो (Net-Zero) उत्सर्जन हासिल करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।

भारत को OCCCM से क्यों जुड़ना चाहिए? पक्ष में तर्क
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को इस गठबंधन का हिस्सा बनने में देरी नहीं करनी चाहिए:
- नियम तय करने वाले कमरे में उपस्थिति: यदि भारत बाहर रहता है, तो वैश्विक कार्बन व्यापार और क्रेडिट सत्यापन के कठोर नियम यूरोपीय संघ और चीन मिलकर तय कर देंगे। भारत के लिए जोखिम एक ‘आउटसाइडर’ बने रहने में अधिक है। कमरे के भीतर रहकर भारत चर्चाओं को अपने और अन्य विकासशील देशों के पक्ष में मोड़ सकता है।
- CBAM और सीमा पार कार्बन टैक्स से सुरक्षा: यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) अब लागू हो चुका है और कई अन्य देश अपने संस्करण लाने की सोच रहे हैं। OCCCM हालांकि सीधे CBAM का नाम नहीं लेता, लेकिन यह सदस्य देशों को बॉर्डर कार्बन टैक्स के भू-राजनीतिक परिदृश्य से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार करता है।
- अंतर-संचालनीयता (Interoperability) से राजस्व: यदि भारत की CCTS प्रणाली वैश्विक मानकों के अनुकूल हो जाती है, तो भारतीय कंपनियां उन देशों या क्षेत्रों को अपने उच्च-मूल्य वाले कार्बन क्रेडिट बेच सकेंगी जहां उत्सर्जन के नियम बहुत ज्यादा सख्त हैं, जिससे देश में भारी विदेशी निवेश और राजस्व आएगा।
- समान विचारधारा वाले विकासशील देशों का साथ: इस गठबंधन में ब्राजील एक संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल है। ब्राजील की मौजूदगी भारत को एक सुरक्षा कवच देती है कि यह मंच पूरी तरह से केवल पश्चिमी देशों के एजेंडे से संचालित नहीं होगा।
गठबंधन में शामिल होने की चुनौतियाँ और चिंताएँ
- वैश्विक बनाम घरेलू प्राथमिकताओं में टकराव: वर्तमान में OCCCM किसी देश पर जबरन कोई शमन लक्ष्य नहीं थोपता है। लेकिन जैसे-जैसे इस गठबंधन के भीतर महत्वपूर्ण और कड़े नीतिगत फैसले लिए जाएंगे, भारत पर अपने औद्योगिक विकास को धीमा करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बन सकता है।
- घरेलू उद्योगों (MSMEs) पर प्रभाव: भारत का घरेलू कार्बन बाजार (CCTS) अभी बिल्कुल शुरुआती चरण में है। वैश्विक मानकों को तुरंत और पूरी तरह से लागू करने से भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
- कीमतों में अस्थिरता: वैश्विक बाजारों के साथ एकीकरण से घरेलू कार्बन क्रेडिट की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का असर दिख सकता है, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए दीर्घकालिक वित्तीय नियोजन मुश्किल हो सकता है।
आगे की राह
- ‘यथाशीघ्र‘ कदम उठाना: भारत को इस मंच से दूरी बनाने के बजाय इसमें जल्द से जल्द शामिल होना चाहिए ताकि शुरुआती दौर में ही नियमों को अपने अनुकूल प्रभावित किया जा सके।
- ज्ञान और तकनीकी आदान-प्रदान का उपयोग: शुरुआत में भारत को इस गठबंधन का उपयोग केवल कार्बन बाजारों की वास्तुकला को समझने और तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए करना चाहिए।
- सशक्त घरेलू MRV तंत्र: भारत को अपनी घरेलू CCTS के तहत मॉनिटरिंग और वेरिफिकेशन (MRV) प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर इतना पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना होगा कि कोई भी देश भारतीय क्रेडिट की गुणवत्ता पर सवाल न उठा सके।
निष्कर्ष
आज के दौर में जहां वैश्विक स्तर पर भू-राजनीति खंडित है और UNFCCC जैसे बड़े मंचों पर जलवायु वार्ताएं अक्सर गतिरोध का शिकार हो जाती हैं, वहां विभिन्न देशों द्वारा समर्थित ऐसे छोटे गठबंधन ही भविष्य के नियमों को तय करेंगे। भारत अब कार्बन मूल्य निर्धारण से बच नहीं सकता क्योंकि वह स्वयं इस राह पर चल पड़ा है। इसलिए, आर्थिक हितों और जलवायु न्याय के बीच संतुलन साधते हुए, भारत के लिए OCCCM जैसे वैश्विक गठबंधनों का हिस्सा बनना एक नीतिगत और रणनीतिक अनिवार्यता है।